बुधवार, 6 जुलाई 2022

पाजेब: जैनेन्द्र कुमार

 

पाजेब: जैनेन्द्र कुमार  

बाज़ार में एक नई तरह की पाजेब चली है. पैरों में पड़कर वे बड़ी अच्छी मालूम होती हैं. उनकी कड़ियां आपस में लचक के साथ जुड़ी रहती हैं कि पाजेब का मानो निज का आकार कुछ नहीं है, जिस पांव में पड़े उसी के अनुकूल ही रहती हैं.

पास-पड़ोस में तो सब नन्हीं-बड़ी के पैरों में आप वही पाजेब देख लीजिए. एक ने पहनी कि फिर दूसरी ने भी पहनी. देखा-देखी में इस तरह उनका न पहनना मुश्किल हो गया है.

हमारी मुन्नी ने भी कहा कि बाबूजी, हम पाजेब पहनेंगे. बोलिए भला कठिनाई से चार बरस की उम्र और पाजेब पहनेगी.

मैंने कहा, कैसी पाजेब?

बोली, वही जैसी रुकमन पहनती है, जैसी शीला पहनती है.

मैंने कहा, अच्छा-अच्छा.

बोली, मैं तो आज ही मंगा लूंगी.

मैंने कहा, अच्छा भाई आज सही.

उस वक्त तो ख़ैर मुन्नी किसी काम में बहल गई. लेकिन जब दोपहर आई मुन्नी की बुआ, तब वह मुन्नी सहज मानने वाली न थी.

बुआ ने मुन्नी को मिठाई खिलाई और गोद में लिया और कहा कि अच्छा, तो तेरी पाजेब अबके इतवार को ज़रूर लेती आऊंगी.

इतवार को बुआ आई और पाजेब ले आई. मुन्नी पहनकर खुशी के मारे यहां-से-वहां ठुमकती फिरी. रुकमन के पास गई और कहा-देख रुकमन, मेरी पाजेब. शीला को भी अपनी पाजेब दिखाई. सबने पाजेब पहनी देखकर उसे प्यार किया और तारीफ़ की. सचमुच वह चांदी कि सफेद दो-तीन लड़ियां-सी टखनों के चारों ओर लिपटकर, चुपचाप बिछी हुई, बहुत ही सुघड़ लगती थी, और बच्ची की खुशी का ठिकाना न था.

और हमारे महाशय आशुतोष, जो मुन्नी के बड़े भाई थे, पहले तो मुन्नी को सजी-बजी देखकर बड़े ख़ुशी हुए. वह हाथ पकड़कर अपनी बढ़िया मुन्नी को पाजेब-सहित दिखाने के लिए आस-पास ले गए. मुन्नी की पाजेब का गौरव उन्हें अपना भी मालूम होता था. वह ख़ूब हंसे और ताली पीटी, लेकिन थोड़ी देर बाद वह ठुमकने लगे कि मुन्नी को पाजेब दी, सो हम भी बाईसिकिल लेंगे.

बुआ ने कहा कि अच्छा बेटा अबके जन्म-दिन को तुझे बाईसिकिल दिलवाएंगे.

आशुतोष बाबू ने कहा कि हम तो अभी लेंगे.

बुआ ने कहा, ‘छी-छी, तू कोई लड़की है? जिद तो लड़कियां किया करती हैं. और लड़कियां रोती हैं. कहीं बाबू साहब लोग रोते हैं?”

आशुतोष बाबू ने कहा कि तो हम बाईसिकिल ज़रूर लेंगे जन्म-दिन वाले रोज.

बुआ ने कहा कि हां, यह बात पक्की रही, जन्म-दिन पर तुमको बाईसिकिल मिलेगी.

इस तरह वह इतवार का दिन हंसी-खुशी पूरा हुआ. शाम होने पर बच्चों की बुआ चली गई. पाजेब का शौक घड़ीभर का था. वह फिर उतारकर रख-रखा दी गई; जिससे कहीं खो न जाए. पाजेब वह बारीक और सुबुक काम की थी और खासे दाम लग गए थे.

श्रीमतीजी ने हमसे कहा, क्यों जी, लगती तो अच्छी है, मैं भी अपने लिए बनवा लूं?

मैंने कहा कि क्यों न बनावाओ! तुम कौन चार बरस की नहीं हो?

ख़ैर, यह हुआ. पर मैं रात को अपनी मेज पर था कि श्रीमती ने आकर कहा कि तुमने पाजेब तो नहीं देखी?

मैंने आश्चर्य से कहा कि क्या मतलब?

बोली कि देखो, यहां मेज-वेज पर तो नहीं है? एक तो है पर दूसरे पैर की मिलती नहीं है. जाने कहां गई?

मैंने कहा कि जाएगी कहां? यहीं-कहीं देख लो. मिल जाएगी.

उन्होंने मेरे मेज के कागज उठाने-धरने शुरू किए और आलमारी की किताबें टटोल डालने का भी मनसूबा दिखाया.

मैंने कहा कि यह क्या कर रही हो? यहां वह कहां से आएगी?

जवाब में वह मुझी से पूछने लगी कि फिर कहां है?

मैंने कहा तुम्हीं ने तो रखी थी. कहां रखी थी?

बतलाने लगी कि दोपहर के बाद कोई दो बजे उतारकर दोनों को अच्छी तरह संभालकर उस नीचे वाले बाक्स में रख दी थीं. अब देखा तो एक है, दूसरी गायब है.

मैंने कहा कि तो चलकर वह इस कमरे में कैसे आ जाएगी? भूल हो गई होगी. एक रखी होगी, एक वहीं-कहीं फर्श पर छूट गई होगी. देखो, मिल जाएगी. कहीं जा नहीं सकती.

इस पर श्रीमती कहा-सुनी करने लगीं कि तुम तो ऐसे ही हो. ख़ुद लापरवाह हो, दोष उल्टे मुझे देते हो. कह तो रही हूं कि मैंने दोनों संभालकर रखी थीं.

मैंने कहा कि संभालकर रखी थीं, तो फिर यहां-वहां क्यों देख रही थी? जहां रखी थीं वहीं से ले लो न. वहां नहीं है तो फिर किसी ने निकाली ही होगी.

श्रीमती बोलीं कि मेरा भी यही ख्याल हो रहा है. हो न हो, बंसी नौकर ने निकाली हो. मैंने रखी, तब वह वहां मौजूद था.

मैंने कहा, तो उससे पूछा?

बोलीं, वह तो साफ इंकार कर रहा है.

मैंने कहा, तो फिर?

श्रीमती जोर से बोली, तो फिर मैं क्या बताऊं? तुम्हें तो किसी बात की फिकर है नही. डांटकर कहते क्यों नहीं हो, उस बंसी को बुलाकर? ज़रूर पाजेब उसी ने ली है.

मैंने कहा कि अच्छा, तो उसे क्या कहना होगा? यह कहूं कि ला भाई पाजेब दे दे!

श्रीमती झल्ला कर बोलीं कि हो चुका सब कुछ तुमसे. तुम्हीं ने तो उस नौकर की जात को शहजोर बना रखा है. डांट न फटकार, नौकर ऐसे सिर न चढ़ेगा तो क्या होगा?

बोलीं कि कह तो रही हूं कि किसी ने उसे बक्स से निकाला ही है. और सोलह में पंद्रह आने यह बंसी है. सुनते हो न, वही है.

मैंने कहा कि मैंने बंसी से पूछा था. उसने नहीं ली मालूम होती.

इस पर श्रीमती ने कहा कि तुम नौकरों को नहीं जानते. वे बड़े छंटे होते हैं. बंसी चोर ज़रूर है. नहीं तो क्या फरिश्ते लेने आते?

मैंने कहा कि तुमने आशुतोष से भी पूछा?

बोलीं, पूछा था. वह तो ख़ुद ट्रंक और बक्स के नीचे घुस-घुसकर खोज लगाने में मेरी मदद करता रहा है. वह नहीं ले सकता.

मैंने कहा, उसे पतंग का बड़ा शौक है.

बोलीं कि तुम तो उसे बताते-बरजते कुछ हो नहीं. उमर होती जा रही है. वह यों ही रह जाएगा. तुम्हीं हो उसे पतंग की शह देने वाले.

मैंने कहा कि जो कहीं पाजेब ही पड़ी मिल गई हो तो?

बोलीं, नहीं, नहीं! मिलती तो वह बता न देता?

ख़ैर, बातों-बातों में मालूम हुआ कि उस शाम आशुतोष पतंग और डोर का पिन्ना नया लाया है.

श्रीमती ने कहा कि यह तुम्हीं हो जिसने पतंग की उसे इजाजत दी. बस सारे दिन पतंग-पतंग. यह नहीं कि कभी उसे बिठाकर सबक की भी कोई बात पूछो. मैं सोचती हूं कि एक दिन तोड़-ताड़ दूं उसकी सब डोर और पतंग.

मैंने कहा कि ख़ैर; छोड़ो. कल सवेरे पूछ-ताछ करेंगे.

सवेरे बुलाकर मैंने गंभीरता से उससे पूछा कि क्यों बेटा, एक पाजेब नहीं मिल रही है, तुमने तो नहीं देखी?

वह गुम हो गया. जैसे नाराज हो. उसने सिर हिलाया कि उसने नहीं ली. पर मुंह नहीं खोला.

मैंने कहा कि देखो बेटे, ली हो तो कोई बात नहीं, सच बता देना चाहिए.

उसका मुंह और भी फूल आया. और वह गुम-सुम बैठा रहा.


मेरे मन में उस समय तरह-तरह के सिद्धांत आए. मैंने स्थिर किया कि अपराध के प्रति करुणा ही होनी चाहिए. रोष का अधिकार नहीं है. प्रेम से ही अपराध-वृति को जीता जा सकता है. आतंक से उसे दबाना ठीक नहीं है. बालक का स्वभाव कोमल होता है और सदा ही उससे स्नेह से व्यवहार करन चाहिए, इत्यादि.

मैंने कहा कि बेटा आशुतोष, तुम घबराओ नहीं. सच कहने में घबराना नहीं चाहिए. ली हो तो खुल कर कह दो, बेटा! हम कोई सच कहने की सजा थोड़े ही दे सकते हैं. बल्कि बोलने पर तो इनाम मिला करता है.

आशुतोष तब बैठा सुनता रहा. उसका मुंह सूजा था. वह सामने मेरी आंखों में नहीं देख रहा था. रह-रहकर उसके माथे पर बल पड़ते थे.

क्यों बेटे, तुमने ली तो नहीं?”

उसने सिर हिलाकर क्रोध से अस्थिर और तेज आवाज में कहा कि मैंने नहीं ली, नहीं ली, नहीं ली. यह कहकर वह रोने को हो आया, पर रोया नहीं. आंखों में आंसू रोक लिए.

उस वक्त मुझे प्रतीत हुआ, उग्रता दोष का लक्षण है.

मैंने कहा, देखो बेटा, डरो नहीं; अच्छा जाओ, ढूंढ़ो; शायद कहीं पड़ी हुई वह पाजेब मिल जाए. मिल जाएगी तो हम तुम्हें इनाम देंगे.

वह चला गया और दूसरे कमरे में जाकर पहले तो एक कोने में खड़ा हो गया. कुछ देर चुपचाप खड़े रहकर वह फिर यहां-वहां पाजेब की तलाश में लग गया.

श्रीमती आकर बोलीं, आशू से तुमने पूछ लिया? क्या ख्याल है?

मैंने कहा कि संदेह तो मुझे होता है. नौकर का तो काम यह है नहीं!

श्रीमती ने कहा, नहीं जी, आशू भला क्यों लेगा?

मैं कुछ बोला नहीं. मेरा मन जाने कैसे गंभीर प्रेम के भाव से आशुतोष के प्रति उमड़ रहा था. मुझे ऐसा मालूम होता था कि ठीक इस समय आशुतोष को हमें अपनी सहानुभूति से वंचित नहीं करना चाहिए. बल्कि कुछ अतिरिक्त स्नेह इस समय बालक को मिलना चाहिए. मुझे यह एक भारी दुर्घटना मालूम होती थी. मालूम होता था कि अगर आशुतोष ने चोरी की है तो उसका इतना दोष नहीं है; बल्कि यह हमारे ऊपर बड़ा भारी इल्जाम है. बच्चे में चोरी की आदत भयावह हो सकती है, लेकिन बच्चे के लिए वैसी लाचारी उपस्थित हो आई, यह और भी कहीं भयावह है. यह हमारी आलोचना है. हम उस चोरी से बरी नहीं हो सकते.

मैंने बुलाकर कहा, “अच्छा सुनो. देखो, मेरी तरफ़ देखो, यह बताओ कि पाजेब तुमने छुन्नू को दी है न?”

वह कुछ देर कुछ नहीं बोला. उसके चेहरे पर रंग आया और गया. मैं एक-एक छाया ताड़ना चाहता था.

मैंने आश्वासन देते हुए कहा कि डरने की कोई बात नहीं. हां, हां, बोलो डरो नहीं. ठीक बताओ, बेटे! कैसा हमारा सच्चा बेटा है!

मानो बड़ी कठिनाई के बाद उसने अपना सिर हिलाया.

मैंने बहुत ख़ुशी होकर कहा कि दी है न छुन्नू को?

उसने सिर हिला दिया.

अत्यंत सांत्वना के स्वर में स्नेहपूर्वक मैंने कहा कि मुंह से बोलो. छुन्नू को दी है?

उसने कहा, “हां-आं.”

मैंने अत्यंत हर्ष के साथ दोनों बांहों में लेकर उसे उठा लिया. कहा कि ऐसे ही बोल दिया करते हैं अच्छे लड़के. आशू हमारा राजा बेटा है. गर्व के भाव से उसे गोद में लिए-लिए मैं उसकी मां की तरफ़ गया. उल्लासपूर्वक बोला कि देखो हमारे बेटे ने सच कबूल किया है. पाजेब उसने छुन्नू को दी है.

सुनकर मां उसकी बहुत ख़ुशी हो आईं. उन्होंने उसे चूमा. बहुत शाबाशी दी ओर उसकी बलैयां लेने लगी!

आशुतोष भी मुस्करा आया, अगरचे एक उदासी भी उसके चेहरे से दूर नहीं हुई थी.

उसके बाद अलग ले जाकर मैंने बड़े प्रेम से पूछा कि पाजेब छुन्नू के पास है न? जाओ, मांग ला सकते हो उससे?

आशुतोष मेरी ओर देखता हुआ बैठा रहा. मैंने कहा कि जाओ बेटे! ले आओ.

उसने जवाब में मुंह नहीं खोला.

मैंने आग्रह किया तो वह बोला कि छुन्नू के पास नहीं हुई तो वह कहां से देगा?

मैंने कहा कि तो जिसको उसने दी होगी उसका नाम बता देगा. सुनकर वह चुप हो गया. मेरे बार-बार कहने पर वह यही कहता रहा कि पाजेब छुन्नू के पास न हुई तो वह देगा कहां से?

अंत में हारकर मैंने कहा कि वह कहीं तो होगी. अच्छा, तुमने कहां से उठाई थी?

पड़ी मिली थी.”

और फिर नीचे जाकर वह तुमने छुन्नू को दिखाई?”

हां!”

फिर उसी ने कहा कि इसे बेचेंगे!”

हां!”

कहां बेचने को कहा?”

कहा मिठाई लाएंगे?”

नहीं, पतंग लाएंगे?”

हां!”

सो पाजेब छुन्नू के पास रह गई?”

हां!”

तो उसी के पास होनी चाहिए न! या पतंग वाले के पास होगी! जाओ, बेटा, उससे ले आओ. कहना, हमारे बाबूजी तुम्हें इनाम देंगे.

वह जाना नहीं चाहता था. उसने फिर कहा कि छुन्नू के पास नहीं हुई तो कहां से देगा!

मुझे उसकी ज़िद बुरी मालूम हुई. मैंने कहा कि तो कहीं तुमने उसे गाड़ दिया है? क्या किया है? बोलते क्यों नहीं?

वह मेरी ओर देखता रहा, और कुछ नहीं बोला.

मैंने कहा, कुछ कहते क्यों नहीं?

वह गुम-सुम रह गया. और नहीं बोला.

मैंने डपटकर कहा कि जाओ, जहां हो वही से पाजेब लेकर आओ.

जब वह अपनी जगह से नहीं उठा और नहीं गया तो मैंने उसे कान पकड़कर उठाया. कहा कि सुनते हो? जाओ, पाजेब लेकर आओ. नहीं तो घर में तुम्हारा काम नहीं है.

उस तरह उठाया जाकर वह उठ गया और कमरे से बाहर निकल गया. निकलकर बरामदे के एक कोने में रूठा मुंह बनाकर खड़ा रह गया.

मुझे बड़ा क्षोभ हो रहा था. यह लड़का सच बोलकर अब किस बात से घबरा रहा है, यह मैं कुछ समझ न सका. मैंने बाहर आकर धीरे से कहा कि जाओ भाई, जाकर छुन्नू से कहते क्यों नहीं हो?

पहले तो उसने कोई जवाब नहीं दिया और जवाब दिया तो बार-बार कहने लगा कि छुन्नू के पास नहीं हुई तो वह कहां से देगा?

मैंने कहा कि जितने में उसने बेची होगी वह दाम दे देंगे. समझे न जाओ, तुम कहो तो.

छुन्नू की मां तो कह रही है कि उसका लड़का ऐसा काम नहीं कर सकता. उसने पाजेब नहीं देखी.

जिस पर आशुतोष की मां ने कहा कि नहीं तुम्हारा छुन्नू झूठ बोलता है. क्यों रे आशुतोष, तैने दी थी न?

आशुतोष ने धीरे से कहा, हां, दी थी.

दूसरे ओर से छुन्नू बढ़कर आया और हाथ फटकारकर बोला कि मुझे नहीं दी. क्यों रे, मुझे कब दी थी?

आशुतोष ने जिद बांधकर कहा कि दी तो थी. कह दो, नहीं दी थी?

नतीजा यह हुआ कि छुन्नू की मां ने छुन्नू को ख़ूब पीटा और ख़ुद भी रोने लगी. कहती जाती कि हाय रे, अब हम चोर हो गए. कुलच्छनी औलाद जाने कब मिटेगी?

बात दूर तक फैल चली. पड़ोस की स्त्रियों में पवन पड़ने लगी. और श्रीमती ने घर लौटकर कहा कि छुन्नू और उसकी मां दोनों एक-से हैं. मैंने कहा कि तुमने तेजा-तेजी क्यों कर डाली? ऐसी कोई बात भला सुलझती है!

बोली कि हां, मैं तेज बोलती हूं. अब जाओ ना, तुम्हीं उनके पास से पाजेब निकालकर लाते क्यों नहीं? तब जानूं, जब पाजेब निकलवा दो.

मैंने कहा कि पाजेब से बढ़कर शांति है. और अशांति से तो पाजेब मिल नहीं जाएगी.

श्रीमती बुदबुदाती हुई नाराज़ होकर मेरे सामने से चली गईं.

थोड़ी देर बाद छुन्नू की मां हमारे घर आई. श्रीमती उन्हें लाई थी. अब उनके बीच गर्मी नहीं थी, उन्होंने मेरे सामने आकर कहा कि छुन्नू तो पाजेब के लिए इनकार करता है. वह पाजेब कितने की थी, मैं उसके दाम भर सकती हूं.

मैंने कहा,“यह आप क्या कहती है! बच्चे बच्चे हैं. आपने छुन्नू से सहूलियत से पूछा भी!”

उन्होंने उसी समय छुन्नू को बुलाकर मेरे सामने कर दिया. कहा कि क्यों रे, बता क्यों नहीं देता जो तैने पाजेब देखी हो?

छुन्नू ने जोर से सिर हिलाकर इनकार किया. और बताया कि पाजेब आशुतोष के हाथ में मैंने देखी थी और वह पतंग वालों को दे आया है. मैंने ख़ूब देखी थी, वह चांदी की थी.

तुम्हें ठीक मालूम है?”

हां, वह मुझसे कह रहा था कि तू भी चल. पतंग लाएंगे.”

पाजेब कितनी बड़ी थी? बताओ तो.”

छुन्नू ने उसका आकार बताया, जो ठीक ही था.

मैंने उसकी मां की तरफ़ देखकर कहा देखिए न पहले यही कहता था कि मैंने पाजेब देखी तक नहीं. अब कहता है कि देखी है.

मां ने मेरे सामने छुन्नू को खींचकर तभी धम्म-धम्म पीटना शुरू कर दिया. कहा कि क्यों रे, झूठ बोलता है? तेरी चमड़ी न उधेड़ी तो मैं नहीं.

मैंने बीच-बचाव करके छुन्नू को बचाया. वह शहीद की भांति पिटता रहा था. रोया बिल्कुल नहीं और एक कोने में खड़े आशुतोष को जाने किस भाव से देख रहा था.

ख़ैर, मैंने सबको छुट्टी दी. कहा, जाओ बेटा छुन्नू खेलो. उसकी मां को कहा, आप उसे मारिएगा नहीं. और पाजेब कोई ऐसी बड़ी चीज़ नहीं है.

छुन्नू चला गया. तब, उसकी मां ने पूछा कि आप उसे कसूरवर समझते हैं?

मैंने कहा कि मालूम तो होता है कि उसे कुछ पता है. और वह मामले में शामिल है.

इस पर छुन्नू की मां ने पास बैठी हुई मेरी पत्नी से कहा,“चलो बहनजी, मैं तुम्हें अपना सारा घर दिखाए देती हूं. एक-एक चीज़ देख लो. होगी पाजेब तो जाएगी कहां?”

मैंने कहा,“छोड़िए भी. बेबात को बात बढ़ाने से क्या फायदा.” सो ज्यों-त्यों मैंने उन्हें दिलासा दिया. नहीं तो वह छुन्नू को पीट-पाट हाल-बेहाल कर डालने का प्रण ही उठाए ले रही थी. कुलच्छनी, आज उसी धरती में नहीं गाड़ दिया तो, मेरा नाम नहीं.

ख़ैर, जिस-तिस भांति बखेड़ा टाला. मैं इस झंझट में दफ्तर भी समय पर नहीं जा सका. जाते वक्त श्रीमती को कह गया कि देखो, आशुतोष को धमकाना मत. प्यार से सारी बातें पूछना. धमकाने से बच्चे बिगड़ जाते हैं, और हाथ कुछ नहीं आता. समझी न?

शाम को दफ्तर से लौटा तो श्रीमती से सूचना दी कि आशुतोष ने सब बतला दिया है. ग्यारह आने पैसे में वह पाजेब पतंग वाले को दे दी है. पैसे उसने थोड़े-थोड़े करके देने को कहे हैं. पांच आने जो दिए वह छुन्नू के पास हैं. इस तरह रत्ती-रत्ती बात उसने कह दी है.

कहने लगी कि मैंने बड़े प्यार से पूछ-पूछकर यह सब उसके पेट में से निकाला है. दो-तीन घंटे में मगज़ मारती रही. हाय राम, बच्चे का भी क्या जी होता है.

मैं सुनकर ख़ुशी हुआ. मैंने कहा कि चलो अच्छा है, अब पांच आने भेजकर पाजेब मंगवा लेंगे. लेकिन यह पतंग वाला भी कितना बदमाश है, बच्चों के हाथ से ऐसी चीज़ें लेता है. उसे पुलिस में दे देना चाहिए. उचक्का कहीं का!

फिर मैंने पूछा कि आशुतोष कहां है?

उन्होंने बताया कि बाहर ही कहीं खेल-खाल रहा होगा.

मैंने कहा कि बंसी, जाकर उसे बुला तो लाओ.

बंसी गया और उसने आकर कहा कि वे अभी आते हैं.

क्या कर रहा है?”

छुन्नू के साथ गिल्ली डंडा खेल रहे हैं.”

थोड़ी देर में आशुतोष आया. तब मैंने उसे गोद में लेकर प्यार किया. आते-आते उसका चेहरा उदास हो गया और गोद में लेने पर भी वह कोई विशेष प्रसन्न नहीं मालूम नहीं हुआ.

उसकी मां ने ख़ुशी होकर कहा कि आशुतोष ने सब बातें अपने आप पूरी-पूरी बता दी हैं. हमारा आशुतोष बड़ा सच्चा लड़का है.

आशुतोष मेरी गोद में टिका रहा. लेकिन अपनी बड़ाई सुनकर भी उसको कुछ हर्ष नहीं हुआ, ऐसा प्रतीत होता था.

मैंने कहा कि आओ चलो. अब क्या बात है. क्यों हज़रत, तुमको पांच ही आने तो मिले हैं न? हम से पांच आने मांग लेते तो क्या हम न देते? सुनो, अब से ऐसा मत करना, बेटे!

कमरे में जाकर मैंने उससे फिर पूछताछ की,“क्यों बेटा, पतंग वाले ने पांच आने तुम्हें दिए न?”

हां”

और वह छुन्नू के पास हैं न!”

हां!”

अभी तो उसके पास होंगे न!”

नहीं”

ख़र्च कर दिए!”

नहीं”

नहीं ख़र्च किए?”

हां”

ख़र्च किए, कि नहीं ख़र्च किए?”

उस ओर से प्रश्न करने वह मेरी ओर देखता रहा, उत्तर नहीं दिया.

बताओं ख़र्च कर दिए कि अभी हैं?”

जवाब में उसने एक बार ‘हां’ कहा तो दूसरी बात ‘नहीं’ कहा.

मैंने कहा, तो यह क्यों नहीं कहते कि तुम्हें नहीं मालूम है?

हां.”

बेटा, मालूम है न?”

हां.”

पतंग वाले से पैसे छुन्नू ने लिए हैं न?

हां”

तुमने क्यों नहीं लिए?”

वह चुप.

इकन्नियां कितनी थी, बोलो?”

दो.”

बाक़ी पैसे थे?”

हां”

दुअन्नी थी!”

हां.”

मुझे क्रोध आने लगा. डपटकर कहा कि सच क्यों नहीं बोलते जी? सच बताओ कितनी इकन्नियां थी और कितना क्या था.”
वह गुम-सुम खड़ा रहा, कुछ नहीं बोला.

बोलते क्यों नहीं?”

वह नहीं बोला.

सुनते हो! बोला-नहीं तो…”

आशुतोष डर गया. और कुछ नहीं बोला.

सुनते नहीं, मैं क्या कह रहा हूं?”

इस बार भी वह नहीं बोला तो मैंने कान पकड़कर उसके कान खींच लिए. वह बिना आंसू लाए गुम-सुम खड़ा रहा.

अब भी नहीं बोलोगे?”

वह डर के मारे पीला हो आया. लेकिन बोल नहीं सका. मैंने जोर से बुलाया “बंसी यहां आओ, इनको ले जाकर कोठरी में बंद कर दो.”

बंसी नौकर उसे उठाकर ले गया और कोठरी में मूंद दिया.

दस मिनट बाद फिर उसे पास बुलवाया. उसका मुंह सूजा हुआ था. बिना कुछ बोले उसके ओंठ हिल रहे थे. कोठरी में बंद होकर भी वह रोया नहीं.

मैंने कहा, “क्यों रे, अब तो अकल आई?”

वह सुनता हुआ गुम-सुम खड़ा रहा.

अच्छा, पतंग वाला कौन सा है? दाई तरफ़ का चौराहे वाला?”

उसने कुछ ओठों में ही बड़बड़ा दिया. जिसे मैं कुछ समझ न सका.

वह चौराहे वाला? बोलो…”

हां.”

देखो, अपने चाचा के साथ चले जाओ. बता देना कि कौन सा है. फिर उसे स्वयं भुगत लेंगे. समझते हो न?”

यह कहकर मैंने अपने भाई को बुलवाया. सब बात समझाकर कहा, “देखो, पांच आने के पैसे ले जाओ. पहले तुम दूर रहना. आशुतोष पैसे ले जाकर उसे देगा और अपनी पाजेब मांगेगा. अव्वल तो यह पाजेब लौटा ही देगा. नहीं तो उसे डांटना और कहना कि तुझे पुलिस के सुपुर्द कर दूंगा. बच्चों से माल ठगता है? समझे? नरमी की ज़रूरत नहीं हैं.”

और आशुतोष, अब जाओ. अपने चाचा के साथ जाओ.” वह अपनी जगह पर खड़ा था. सुनकर भी टस-से-मस होता दिखाई नहीं दिया.

नहीं जाओगे!”

उसने सिर हिला दिया कि नहीं जाऊंगा.

मैंने तब उसे समझाकर कहा कि “भैया घर की चीज़ है, दाम लगे हैं. भला पांच आने में रुपयों का माल किसी के हाथ खो दोगे! जाओ, चाचा के संग जाओ. तुम्हें कुछ नहीं कहना होगा. हां, पैसे दे देना और अपनी चीज़ वापस मांग लेना. दे तो दे, नहीं दे तो नहीं दे. तुम्हारा इससे कोई सरोकार नहीं. सच है न, बेटे! अब जाओ.”

पर वह जाने को तैयार ही नहीं दिखा. मुझे लड़के की गुस्ताखी पर बड़ा बुरा मालूम हुआ. बोला,“इसमें बात क्या है? इसमें मुश्किल कहां है? समझाकर बात कर रहे है सो समझता ही नहीं, सुनता ही नहीं.”

मैंने कहा कि,“क्यों रे नहीं जाएगा?”

उसने फिर सिर हिला दिया कि नहीं जाऊंगा.

मैंने प्रकाश, अपने छोटे भाई को बुलाया. कहा,“प्रकाश, इसे पकड़कर ले जाओ.”

प्रकाश ने उसे पकड़ा और आशुतोष अपने हाथ-पैरों से उसका प्रतिकार करने लगा. वह साथ जाना नहीं चाहता था.

मैंने अपने ऊपर बहुत जब्र करके फिर आशुतोष को पुचकारा, कि जाओ भाई! डरो नहीं. अपनी चीज़ घर में आएगी. इतनी-सी बात समझते नहीं. प्रकाश इसे गोद में उठाकर ले जाओ और जो चीज़ मांगे उसे बाज़ार में दिला देना. जाओ भाई आशुतोष!

पर उसका मुंह फूला हुआ था. जैसे-तैसे बहुत समझाने पर वह प्रकाश के साथ चला. ऐसे चला मानो पैर उठाना उसे भारी हो रहा हो. आठ बरस का यह लड़का होने को आया फिर भी देखो न कि किसी भी बात की उसमें समझ नहीं हैं. मुझे जो गुस्सा आया कि क्या बतलाऊं! लेकिन यह याद करके कि गुस्से से बच्चे संभलने की जगह बिगड़ते हैं, मैं अपने को दबाता चला गया. ख़ैर, वह गया तो मैंने चैन की सांस ली.

लेकिन देखता क्या हूं कि कुछ देर में प्रकाश लौट आया है.

मैंने पूछा, “क्यों?”

बोला कि आशुतोष भाग आया है.

मैंने कहा कि “अब वह कहां है?”

वह रूठा खड़ा है, घर में नहीं आता.”

जाओ, पकड़कर तो लाओ.”

वह पकड़ा हुआ आया. मैंने कहा, “क्यों रे, तू शरारत से बाज नहीं आएगा? बोल, जाएगा कि नहीं?”

वह नहीं बोला तो मैंने कसकर उसके दो चांटे दिए. थप्पड़ लगते ही वह एक दम चीखा, पर फौरन चुप हो गया. वह वैसे ही मेरे सामने खड़ा रहा.

मैंने उसे देखकर मारे गुस्से से कहा कि ले जाओ इसे मेरे सामने से. जाकर कोठरी में बंद कर दो. दुष्ट!

इस बार वह आध-एक घंटे बंद रहा. मुझे ख्याल आया कि मैं ठीक नहीं कर रहा हूं, लेकिन जैसे कोई दूसरा रास्ता न दिखता था. मार-पीटकर मन को ठिकाना देने की आदत पड़ कई थी, और कुछ अभ्यास न था.

ख़ैर, मैंने इस बीच प्रकाश को कहा कि तुम दोनों पतंग वाले के पास जाओ.

मालूम करना कि किसने पाजेब ली है. होशियारी से मालूम करना. मालूम होने पर सख्ती करना. मुरव्वत की ज़रूरत नहीं. समझे.

प्रकाश गया और लौटने पर बताया कि उसके पास पाजेब नहीं है.

सुनकर मैं झल्ला आया, कहा कि तुमसे कुछ काम नहीं हो सकता. जरा सी बात नहीं हुई, तुमसे क्या उम्मीद रखी जाए?

वह अपनी सफाई देने लगा. मैंने कहा, “बस, तुम जाओ.”

प्रकाश मेरा बहुत लिहाज मानता था. वह मुंह डालकर चला गया. कोठरी खुलवाने पर आशुतोष को फर्श पर सोता पाया. उसके चेहरे पर अब भी आंसू नहीं थे. सच पूछो तो मुझे उस समय बालक पर करुणा हुई. लेकिन आदमी में एक ही साथ जाने क्या-क्या विरोधी भाव उठते हैं!

मैंने उसे जगाया. वह हड़बड़ाकर उठा. मैंने कहा, “कहो, क्या हालत है?”

थोड़ी देर तक वह समझा ही नहीं. फिर शायद पिछला सिलसिला याद आया.

झट उसके चेहरे पर वहीं जिद, अकड़ ओर प्रतिरोध के भाव दिखाई देने लगे.

मैंने कहा कि या तो राजी-राजी चले जाओ नहीं तो इस कोठरी में फिर बंद किए देते हैं.

आशुतोष पर इसका विशेष प्रभाव पड़ा हो, ऐसा मालूम नहीं हुआ.

ख़ैर, उसे पकड़कर लाया और समझाने लगा. मैंने निकालकर उसे एक रुपया दिया और कहा, “बेटा, इसे पतंग वाले को दे देना और पाजेब मांग लेना कोई घबराने की बात नहीं. तुम समझदार लड़के हो.”

उसने कहा कि जो पाजेब उसके पास नहीं हुई तो वह कहां से देगा?

इसका क्या मतलब, तुमने कहा न कि पांच आने में पाजेब दी है. न हो तो छुन्नू को भी साथ ले लेना. समझे?”

वह चुप हो गया. आखिर समझाने पर जाने को तैयार हुआ. मैंने प्रेमपूर्वक उसे प्रकाश के साथ जाने को कहा. उसका मुंह भारी देखकर डांटने वाला ही था कि इतने में सामने उसकी बुआ दिखाई दी.

बुआ ने आशुतोष के सिर पर हाथ रखकर पूछा कि कहां जा रहे हो, मैं तो तुम्हारे लिए केले और मिठाई लाई हूं.

आशुतोष का चेहरा रूठा ही रहा. मैंने बुआ से कहा कि उसे रोको मत, जाने दो.

आशुतोष रुकने को उद्यत था. वह चलने में आनाकानी दिखाने लगा. बुआ ने पूछा, “क्या बात है?”

मैंने कहा, “कोई बात नहीं, जाने दो न उसे.”

पर आशुतोष मचलने पर आ गया था. मैंने डांटकर कहा, “प्रकाश, इसे ले क्यों नहीं जाते हो?”

बुआ ने कहा कि बात क्या है? क्या बात है?

मैंने पुकारा, “बंसी, तू भी साथ जा. बीच से लौटने न पाए.” सो मेरे आदेश पर दोनों आशुतोष को जबरदस्ती उठाकर सामने से ले गए. बुआ ने कहा, “क्यों उसे सता रहे हो?”

मैंने कहा कि कुछ नहीं, जरा यों ही-

फिर मैं उनके साथ इधर-उधर की बातें ले बैठा. राजनीति राष्ट्र की ही नहीं होती, मुहल्ले में भी राजनीति होती है. यह भार स्त्रियों पर टिकता है. कहां क्या हुआ, क्या होना चाहिए इत्यादि चर्चा स्त्रियों को लेकर रंग फैलाती है. इसी प्रकार कुछ बातें हुईं, फिर छोटा-सा बक्सा सरका कर बोली, इनमें वह कागज है जो तुमने मांगें थे. और यहां-

यह कहकर उन्होंने अपने बास्कट की जेब में हाथ डालकर पाजेब निकालकर सामने की, जैसे सामने बिच्छू हों. मैं भयभीत भाव से कह उठा कि यह क्या?

बोली कि उस रोज भूल से यह एक पाजेब मेरे साथ चली गई थी.

 

आकाशदीप : जयशंकर प्रसाद

 

आकाशदीप  :  जयशंकर प्रसाद

1
बन्दी!”
क्या है? सोने दो।”
मुक्त होना चाहते हो?”
अभी नहीं, निद्रा खुलने पर, चुप रहो।”
फिर अवसर न मिलेगा।”
बड़ा शीत है, कहीं से एक कम्बल डालकर कोई शीत से मुक्त करता।”
आँधी की सम्भावना है। यही अवसर है। आज मेरे बन्धन शिथिल हैं।”
तो क्या तुम भी बन्दी हो?”
हाँ, धीरे बोलो, इस नाव पर केवल दस नाविक और प्रहरी हैं।”
शस्त्र मिलेगा?”
मिल जायगा। पोत से सम्बद्ध रज्जु काट सकोगे?”
हाँ।”
समुद्र में हिलोरें उठने लगीं। दोनों बन्दी आपस में टकराने लगे। पहले बन्दी ने अपने को स्वतन्त्र कर लिया। दूसरे का बन्धन खोलने का प्रयत्न करने लगा। लहरों के धक्के एक-दूसरे को स्पर्श से पुलकित कर रहे थे। मुक्ति की आशा-स्नेह का असम्भावित आलिंगन। दोनों ही अन्धकार में मुक्त हो गये। दूसरे बन्दी ने हर्षातिरेक से उसको गले से लगा लिया। सहसा उस बन्दी ने कहा-”यह क्या? तुम स्त्री हो?”
क्या स्त्री होना कोई पाप है?”-अपने को अलग करते हुए स्त्री ने कहा।
शस्त्र कहाँ है-तुम्हारा नाम?”
चम्पा।”
तारक-खचित नील अम्बर और समुद्र के अवकाश में पवन ऊधम मचा रहा था। अन्धकार से मिलकर पवन दुष्ट हो रहा था। समुद्र में आन्दोलन था। नौका लहरों में विकल थी। स्त्री सतर्कता से लुढक़ने लगी। एक मतवाले नाविक के शरीर से टकराती हुई सावधानी से उसका कृपाण निकालकर, फिर लुढक़ते हुए, बन्दी के समीप पहुँच गई। सहसा पोत से पथ-प्रदर्शक ने चिल्लाकर कहा-”आँधी!”
आपत्ति-सूचक तूर्य बजने लगा। सब सावधान होने लगे। बन्दी युवक उसी तरह पड़ा रहा। किसी ने रस्सी पकड़ी, कोई पाल खोल रहा था। पर युवक बन्दी ढुलक कर उस रज्जु के पास पहुँचा, जो पोत से संलग्न थी। तारे ढँक गये। तरंगें उद्वेलित हुईं, समुद्र गरजने लगा। भीषण आँधी, पिशाचिनी के समान नाव को अपने हाथों में लेकर कन्दुक-क्रीड़ा और अट्टहास करने लगी।
एक झटके के साथ ही नाव स्वतन्त्र थी। उस संकट में भी दोनों बन्दी खिलखिला कर हँस पड़े। आँधी के हाहाकार में उसे कोई न सुन सका।

2
अनन्त जलनिधि में ऊषा का मधुर आलोक फूट उठा। सुनहली किरणों और लहरों की कोमल सृष्टि मुस्कराने लगी। सागर शान्त था। नाविकों ने देखा, पोत का पता नहीं। बन्दी मुक्त हैं।
नायक ने कहा-”बुधगुप्त! तुमको मुक्त किसने किया?”
कृपाण दिखाकर बुधगुप्त ने कहा-”इसने।”
नायक ने कहा-”तो तुम्हें फिर बन्दी बनाऊँगा।”
किसके लिये? पोताध्यक्ष मणिभद्र अतल जल में होगा-नायक! अब इस नौका का स्वामी मैं हूँ।”
तुम? जलदस्यु बुधगुप्त? कदापि नहीं।”-चौंक कर नायक ने कहा और अपना कृपाण टटोलने लगा! चम्पा ने इसके पहले उस पर अधिकार कर लिया था। वह क्रोध से उछल पड़ा।
तो तुम द्वंद्वयुद्ध के लिये प्रस्तुत हो जाओ; जो विजयी होगा, वह स्वामी होगा।”-इतना कहकर बुधगुप्त ने कृपाण देने का संकेत किया। चम्पा ने कृपाण नायक के हाथ में दे दिया।
भीषण घात-प्रतिघात आरम्भ हुआ। दोनों कुशल, दोनों त्वरित गतिवाले थे। बड़ी निपुणता से बुधगुप्त ने अपना कृपाण दाँतों से पकड़कर अपने दोनों हाथ स्वतन्त्र कर लिये। चम्पा भय और विस्मय से देखने लगी। नाविक प्रसन्न हो गये। परन्तु बुधगुप्त ने लाघव से नायक का कृपाण वाला हाथ पकड़ लिया और विकट हुंकार से दूसरा हाथ कटि में डाल, उसे गिरा दिया। दूसरे ही क्षण प्रभात की किरणों में बुधगुप्त का विजयी कृपाण हाथों में चमक उठा। नायक की कातर आँखें प्राण-भिक्षा माँगने लगीं।
बुधगुप्त ने कहा-”बोलो, अब स्वीकार है कि नहीं?”
मैं अनुचर हूँ, वरुणदेव की शपथ। मैं विश्वासघात नहीं करूँगा।” बुधगुप्त ने उसे छोड़ दिया।
चम्पा ने युवक जलदस्यु के समीप आकर उसके क्षतों को अपनी स्निग्ध दृष्टि और कोमल करों से वेदना विहीन कर दिया। बुधगुप्त के सुगठित शरीर पर रक्त-बिन्दु विजय-तिलक कर रहे थे।
विश्राम लेकर बुधगुप्त ने पूछा “हम लोग कहाँ होंगे?”
बालीद्वीप से बहुत दूर, सम्भवत: एक नवीन द्वीप के पास, जिसमें अभी हम लोगों का बहुत कम आना-जाना होता है। सिंहल के वणिकों का वहाँ प्राधान्य है।”
कितने दिनों में हम लोग वहाँ पहुँचेंगे?”
अनुकूल पवन मिलने पर दो दिन में। तब तक के लिये खाद्य का अभाव न होगा।”
सहसा नायक ने नाविकों को डाँड़ लगाने की आज्ञा दी, और स्वयं पतवार पकड़कर बैठ गया। बुधगुप्त के पूछने पर उसने कहा-”यहाँ एक जलमग्न शैलखण्ड है। सावधान न रहने से नाव टकराने का भय है।”

3
तुम्हें इन लोगों ने बन्दी क्यों बनाया?”
वणिक् मणिभद्र की पाप-वासना ने।”
तुम्हारा घर कहाँ है?”
जाह्नवी के तट पर। चम्पा-नगरी की एक क्षत्रिय बालिका हूँ। पिता इसी मणिभद्र के यहाँ प्रहरी का काम करते थे। माता का देहावसान हो जाने पर मैं भी पिता के साथ नाव पर ही रहने लगी। आठ बरस से समुद्र ही मेरा घर है। तुम्हारे आक्रमण के समय मेरे पिता ने ही सात दस्युओं को मारकर जल-समाधि ली। एक मास हुआ, मैं इस नील नभ के नीचे, नील जलनिधि के ऊपर, एक भयानक अनन्तता में निस्सहाय हूँ-अनाथ हूँ। मणिभद्र ने मुझसे एक दिन घृणित प्रस्ताव किया। मैंने उसे गालियाँ सुनाईं। उसी दिन से बन्दी बना दी गई।”-चम्पा रोष से जल रही थी।
मैं भी ताम्रलिप्ति का एक क्षत्रिय हूँ, चम्पा! परन्तु दुर्भाग्य से जलदस्यु बन कर जीवन बिताता हूँ। अब तुम क्या करोगी?”
मैं अपने अदृष्ट को अनिर्दिष्ट ही रहने दूँगी। वह जहाँ ले जाय।” -चम्पा की आँखें निस्सीम प्रदेश में निरुद्देश्य थी। किसी आकांक्षा के लाल डोरे न थे। धवल अपांगों में बालकों के सदृश विश्वास था। हत्या-व्यवसायी दस्यु भी उसे देखकर काँप गया। उसके मन में एक सम्भ्रमपूर्ण श्रद्धा यौवन की पहली लहरों को जगाने लगी। समुद्र-वक्ष पर विलम्बमयी राग-रञ्जित सन्ध्या थिरकने लगी। चम्पा के असंयत कुन्तल उसकी पीठ पर बिखरे थे। दुर्दान्त दस्यु ने देखा , अपनी महिमा में अलौकिक एक तरुण बालिका! वह विस्मय से अपने हृदय को टटोलने लगा। उसे एक नई वस्तु का पता चला। वह थी-कोमलता!
उसी समय नायक ने कहा-”हम लोग द्वीप के पास पहुँच गये।”
बेला से नाव टकराई। चम्पा निर्भीकता से कूद पड़ी। माँझी भी उतरे। बुधगुप्त ने कहा-”जब इसका कोई नाम नहीं है, तो हम लोग इसे चम्पा-द्वीप कहेंगे।”
चम्पा हँस पड़ी।

4
पाँच बरस बाद-
शरद के धवल नक्षत्र नील गगन में झलमला रहे थे। चन्द्र की उज्ज्वल विजय पर अन्तरिक्ष में शरदलक्ष्मी ने आशीर्वाद के फूलों और खीलों को बिखेर दिया।
चम्पा के एक उच्चसौध पर बैठी हुई तरुणी चम्पा दीपक जला रही थी। बड़े यत्न से अभ्रक की मञ्जूषा में दीप धरकर उसने अपनी सुकुमार उँगलियों से डोरी खींची। वह दीपाधार ऊपर चढऩे लगा। भोली-भोली आँखें उसे ऊपर चढ़ते बड़े हर्ष से देख रही थीं। डोरी धीरे-धीरे खींची गई। चम्पा की कामना थी कि उसका आकाश-दीप नक्षत्रों से हिलमिल जाय; किन्तु वैसा होना असम्भव था। उसने आशाभरी आँखें फिरा लीं।
सामने जल-राशि का रजत शृंगार था। वरुण बालिकाओं के लिए लहरों से हीरे और नीलम की क्रीड़ा शैल-मालायें बन रही थीं-और वे मायाविनी छलनायें-अपनी हँसी का कलनाद छोड़कर छिप जाती थीं। दूर-दूर से धीवरों का वंशी-झनकार उनके संगीत-सा मुखरित होता था। चम्पा ने देखा कि तरल संकुल जल-राशि में उसके कण्डील का प्रतिबिम्ब अस्तव्यस्त था! वह अपनी पूर्णता के लिए सैकड़ों चक्कर काटता था। वह अनमनी होकर उठ खड़ी हुई। किसी को पास न देखकर पुकारा-”जया!”
एक श्यामा युवती सामने आकर खड़ी हुई। वह जंगली थी। नील नभोमण्डल-से मुख में शुद्ध नक्षत्रों की पंक्ति के समान उसके दाँत हँसते ही रहते। वह चम्पा को रानी कहती; बुधगुप्त की आज्ञा थी।
महानाविक कब तक आवेंगे, बाहर पूछो तो।” चम्पा ने कहा। जया चली गई।
दूरागत पवन चम्पा के अञ्चल में विश्राम लेना चाहता था। उसके हृदय में गुदगुदी हो रही थी। आज न जाने क्यों वह बेसुध थी। वह दीर्घकाल दृढ़ पुरुष ने उसकी पीठ पर हाथ रख चमत्कृत कर दिया। उसने फिरकर कहा-”बुधगुप्त!”
बावली हो क्या? यहाँ बैठी हुई अभी तक दीप जला रही हो, तुम्हें यह काम करना है?”
क्षीरनिधिशायी अनन्त की प्रसन्नता के लिए क्या दासियों से आकाश-दीप जलवाऊँ?”
हँसी आती है। तुम किसको दीप जलाकर पथ दिखलाना चाहती हो? उसको, जिसको तुमने भगवान् मान लिया है?”
हाँ, वह भी कभी भटकते हैं, भूलते हैं, नहीं तो, बुधगुप्त को इतना ऐश्वर्य क्यों देते?”
तो बुरा क्या हुआ, इस द्वीप की अधीश्वरी चम्पारानी!”
मुझे इस बन्दीगृह से मुक्त करो। अब तो बाली, जावा और सुमात्रा का वाणिज्य केवल तुम्हारे ही अधिकार में है महानाविक! परन्तु मुझे उन दिनों की स्मृति सुहावनी लगती है, जब तुम्हारे पास एक ही नाव थी और चम्पा के उपकूल में पण्य लाद कर हम लोग सुखी जीवन बिताते थे-इस जल में अगणित बार हम लोगों की तरी आलोकमय प्रभात में तारिकाओं की मधुर ज्योति में-थिरकती थी। बुधगुप्त! उस विजन अनन्त में जब माँझी सो जाते थे, दीपक बुझ जाते थे, हम-तुम परिश्रम से थककर पालों में शरीर लपेटकर एक-दूसरे का मुँह क्यों देखते थे? वह नक्षत्रों की मधुर छाया.....”
तो चम्पा! अब उससे भी अच्छे ढंग से हम लोग विचर सकते हैं। तुम मेरी प्राणदात्री हो, मेरी सर्वस्व हो।”
नहीं-नहीं, तुमने दस्युवृत्ति छोड़ दी परन्तु हृदय वैसा ही अकरुण, सतृष्ण और ज्वलनशील है। तुम भगवान के नाम पर हँसी उड़ाते हो। मेरे आकाश-दीप पर व्यंग कर रहे हो। नाविक! उस प्रचण्ड आँधी में प्रकाश की एक-एक किरण के लिए हम लोग कितने व्याकुल थे। मुझे स्मरण है, जब मैं छोटी थी, मेरे पिता नौकरी पर समुद्र में जाते थे-मेरी माता, मिट्टी का दीपक बाँस की पिटारी में भागीरथी के तट पर बाँस के साथ ऊँचे टाँग देती थी। उस समय वह प्रार्थना करती-'भगवान! मेरे पथ-भ्रष्ट नाविक को अन्धकार में ठीक पथ पर ले चलना।' और जब मेरे पिता बरसों पर लौटते तो कहते-'साध्वी! तेरी प्रार्थना से भगवान् ने संकटों में मेरी रक्षा की है।' वह गद्गद हो जाती। मेरी माँ? आह नाविक! यह उसी की पुण्य-स्मृति है। मेरे पिता, वीर पिता की मृत्यु के निष्ठुर कारण, जलदस्यु! हट जाओ।”-सहसा चम्पा का मुख क्रोध से भीषण होकर रंग बदलने लगा। महानाविक ने कभी यह रूप न देखा था। वह ठठाकर हँस पड़ा।
यह क्या, चम्पा? तुम अस्वस्थ हो जाओगी, सो रहो।”-कहता हुआ चला गया। चम्पा मुठ्ठी बाँधे उन्मादिनी-सी घूमती रही।

5
निर्जन समुद्र के उपकूल में वेला से टकरा कर लहरें बिखर जाती थीं। पश्चिम का पथिक थक गया था। उसका मुख पीला पड़ गया। अपनी शान्त गम्भीर हलचल में जलनिधि विचार में निमग्न था। वह जैसे प्रकाश की उन्मलिन किरणों से विरक्त था।
चम्पा और जया धीरे-धीरे उस तट पर आकर खड़ी हो गईं। तरंग से उठते हुए पवन ने उनके वसन को अस्त-व्यस्त कर दिया। जया के संकेत से एक छोटी-सी नौका आई। दोनों के उस पर बैठते ही नाविक उतर गया। जया नाव खेने लगी। चम्पा मुग्ध-सी समुद्र के उदास वातावरण में अपने को मिश्रित कर देना चाहती थी।
इतना जल! इतनी शीतलता! हृदय की प्यास न बुझी। पी सकूँगी? नहीं! तो जैसे वेला में चोट खाकर सिन्धु चिल्ला उठता है, उसी के समान रोदन करूँ? या जलते हुए स्वर्ण-गोलक सदृश अनन्त जल में डूब कर बुझ जाऊँ?”-चम्पा के देखते-देखते पीड़ा और ज्वलन से आरक्त बिम्ब धीरे-धीरे सिन्धु में चौथाई-आधा, फिर सम्पूर्ण विलीन हो गया। एक दीर्घ निश्वास लेकर चम्पा ने मुँह फेर लिया। देखा, तो महानाविक का बजरा उसके पास है। बुधगुप्त ने झुक कर हाथ बढ़ाया। चम्पा उसके सहारे बजरे पर चढ़ गयी। दोनों पास-पास बैठ गये।
इतनी छोटी नाव पर इधर घूमना ठीक नहीं। पास ही वह जलमग्न शैल खण्ड है। कहीं नाव टकरा जाती या ऊपर चढ़ जाती, चम्पा तो?”
अच्छा होता, बुधगुप्त! जल में बन्दी होना कठोर प्राचीरों से तो अच्छा है।”
आह चम्पा, तुम कितनी निर्दय हो! बुधगुप्त को आज्ञा देकर देखो तो, वह क्या नहीं कर सकता। जो तुम्हारे लिये नये द्वीप की सृष्टि कर सकता है, नई प्रजा खोज सकता है, नये राज्य बना सकता है, उसकी परीक्षा लेकर देखो तो....। कहो, चम्पा! वह कृपाण से अपना हृदय-पिण्ड निकाल अपने हाथों अतल जल में विसर्जन कर दे।”-महानाविक-जिसके नाम से बाली, जावा और चम्पा का आकाश गूँजता था, पवन थर्राता था-घुटनों के बल चम्पा के सामने छलछलाई आँखों से बैठा था।
सामने शैलमाला की चोटी पर हरियाली में विस्तृत जल-देश में, नील पिंगल सन्ध्या, प्रकृति की सहृदय कल्पना, विश्राम की शीतल छाया, स्वप्नलोक का सृजन करने लगी। उस मोहिनी के रहस्यपूर्ण नीलजाल का कुहक स्फुट हो उठा। जैसे मदिरा से सारा अन्तरिक्ष सिक्त हो गया। सृष्टि नील कमलों में भर उठी। उस सौरभ से पागल चम्पा ने बुधगुप्त के दोनों हाथ पकड़ लिये। वहाँ एक आलिंगन हुआ, जैसे क्षितिज में आकाश और सिन्धु का। किन्तु उस परिरम्भ में सहसा चैतन्य होकर चम्पा ने अपनी कंचुकी से एक कृपाण निकाल लिया।
बुधगुप्त! आज मैं अपने प्रतिशोध का कृपाण अतल जल में डुबा देती हूँ। हृदय ने छल किया, बार-बार धोखा दिया!”-चमककर वह कृपाण समुद्र का हृदय बेधता हुआ विलीन हो गया।
तो आज से मैं विश्वास करूँ, क्षमा कर दिया गया?”-आश्चर्यचकित कम्पित कण्ठ से महानाविक ने पूछा।
'विश्वास? कदापि नहीं, बुधगुप्त ! जब मैं अपने हृदय पर विश्वास नहीं कर सकी, उसी ने धोखा दिया, तब मैं कैसे कहूँ? मैं तुम्हें घृणा करती हूँ, फिर भी तुम्हारे लिए मर सकती हूँ। अंधेर है जलदस्यु। तुम्हें प्यार करती हूँ।” चम्पा रो पड़ी।
वह स्वप्नों की रंगीन सन्ध्या, तम से अपनी आँखें बन्द करने लगी थी। दीर्घ निश्वास लेकर महानाविक ने कहा-”इस जीवन की पुण्यतम घड़ी की स्मृति में एक प्रकाश-गृह बनाऊँगा, चम्पा! चम्पा यहीं उस पहाड़ी पर। सम्भव है कि मेरे जीवन की धुंधली सन्ध्या उससे आलोकपूर्ण हो जाय।”

6
चम्पा के दूसरे भाग में एक मनोरम शैलमाला थी। वह बहुत दूर तक सिन्धु-जल में निमग्न थी। सागर का चञ्चल जल उस पर उछलता हुआ उसे छिपाये था। आज उसी शैलमाला पर चम्पा के आदि-निवासियों का समारोह था। उन सबों ने चम्पा को वनदेवी-सा सजाया था। ताम्रलिप्ति के बहुत से सैनिक नाविकों की श्रेणी में वन-कुसुम-विभूषिता चम्पा शिविकारूढ़ होकर जा रही थी।
शैल के एक उँचे शिखर पर चम्पा के नाविकों को सावधान करने के लिए सुदृढ़ दीप-स्तम्भ बनवाया गया था। आज उसी का महोत्सव है। बुधगुप्त स्तम्भ के द्वार पर खड़ा था। शिविका से सहायता देकर चम्पा को उसने उतारा। दोनों ने भीतर पदार्पण किया था कि बाँसुरी और ढोल बजने लगे। पंक्तियों में कुसुम-भूषण से सजी वन-बालाएँ फूल उछालती हुई नाचने लगीं।
दीप-स्तम्भ की ऊपरी खिडक़ी से यह देखती हुई चम्पा ने जया से पूछा-”यह क्या है जया? इतनी बालिकाएँ कहाँ से बटोर लाईं?”
आज रानी का ब्याह है न?”-कह कर जया ने हँस दिया।
बुधगुप्त विस्तृत जलनिधि की ओर देख रहा था। उसे झकझोर कर चम्पा ने पूछा-”क्या यह सच है?”
यदि तुम्हारी इच्छा हो, तो यह सच भी हो सकता है, चम्पा! “कितने वर्षों से मैं ज्वालामुखी को अपनी छाती में दबाये हूँ।
चुप रहो, महानाविक ! क्या मुझे निस्सहाय और कंगाल जानकर तुमने आज सब प्रतिशोध लेना चाहा?”
मैं तुम्हारे पिता का घातक नहीं हूँ, चम्पा! वह एक दूसरे दस्यु के शस्त्र से मरे।”
यदि मैं इसका विश्वास कर सकती। बुधगुप्त, वह दिन कितना सुन्दर होता, वह क्षण कितना स्पृहणीय! आह! तुम इस निष्ठुरता में भी कितने महान होते।”
जया नीचे चली गई थी। स्तम्भ के संकीर्ण प्रकोष्ठ में बुधगुप्त और चम्पा एकान्त में एक दूसरे के सामने बैठे थे।
बुधगुप्त ने चम्पा के पैर पकड़ लिये। उच्छ्वसित शब्दों में वह कहने लगा-चम्पा, हम लोग जन्मभूमि-भारतवर्ष से कितनी दूर इन निरीह प्राणियों में इन्द्र और शची के समान पूजित हैं। पर न जाने कौन अभिशाप हम लोगों को अभी तक अलग किये है। स्मरण होता है वह दार्शनिकों का देश! वह महिमा की प्रतिमा! मुझे वह स्मृति नित्य आकर्षित करती है; परन्तु मैं क्यों नहीं जाता? जानती हो, इतना महत्त्व प्राप्त करने पर भी मैं कंगाल हूँ! मेरा पत्थर-सा हृदय एक दिन सहसा तुम्हारे स्पर्श से चन्द्रकान्तमणि की तरह द्रवित हुआ।
चम्पा! मैं ईश्वर को नहीं मानता, मैं पाप को नहीं मानता, मैं दया को नहीं समझ सकता, मैं उस लोक में विश्वास नहीं करता। पर मुझे अपने हृदय के एक दुर्बल अंश पर श्रद्धा हो चली है। तुम न जाने कैसे एक बहकी हुई तारिका के समान मेरे शून्य में उदित हो गई हो। आलोक की एक कोमल रेखा इस निविड़तम में मुस्कराने लगी। पशु-बल और धन के उपासक के मन में किसी शान्त और एकान्त कामना की हँसी खिलखिलाने लगी; पर मैं न हँस सका!
चलोगी चम्पा? पोतवाहिनी पर असंख्य धनराशि लाद कर राजरानी-सी जन्मभूमि के अंक में? आज हमारा परिणय हो, कल ही हम लोग भारत के लिए प्रस्थान करें। महानाविक बुधगुप्त की आज्ञा सिन्धु की लहरें मानती हैं। वे स्वयं उस पोत-पुञ्ज को दक्षिण पवन के समान भारत में पहुँचा देंगी। आह चम्पा! चलो।”
चम्पा ने उसके हाथ पकड़ लिये। किसी आकस्मिक झटके ने एक पलभर के लिऐ दोनों के अधरों को मिला दिया। सहसा चैतन्य होकर चम्पा ने कहा-”बुधगुप्त! मेरे लिए सब भूमि मिट्टी है; सब जल तरल है; सब पवन शीतल है। कोई विशेष आकांक्षा हृदय में अग्नि के समान प्रज्वलित नहीं। सब मिलाकर मेरे लिए एक शून्य है। प्रिय नाविक! तुम स्वदेश लौट जाओ, विभवों का सुख भोगने के लिए, और मुझे, छोड़ दो इन निरीह भोले-भाले प्राणियों के दु:ख की सहानुभूति और सेवा के लिए।”
तब मैं अवश्य चला जाऊँगा, चम्पा! यहाँ रहकर मैं अपने हृदय पर अधिकार रख सकूँ-इसमें सन्देह है। आह! उन लहरों में मेरा विनाश हो जाय।”- महानाविक के उच्छ्वास में विकलता थी। फिर उसने पूछा-”तुम अकेली यहाँ क्या करोगी?”
पहले विचार था कि कभी-कभी इस दीप-स्तम्भ पर से आलोक जला कर अपने पिता की समाधि का इस जल से अन्वेषण करूँगी। किन्तु देखती हूँ, मुझे भी इसी में जलना होगा, जैसे आकाश-दीप।”

7
एक दिन स्वर्ण-रहस्य के प्रभात में चम्पा ने अपने दीप-स्तम्भ पर से देखा-सामुद्रिक नावों की एक श्रेणी चम्पा का उपकूल छोड़कर पश्चिम-उत्तर की ओर महा जल-व्याल के समान सन्तरण कर रही है। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
यह कितनी ही शताब्दियों पहले की कथा है। चम्पा आजीवन उस दीप-स्तम्भ में आलोक जलाती रही। किन्तु उसके बाद भी बहुत दिन, दीपनिवासी, उस माया-ममता और स्नेह-सेवा की देवी की समाधि-सदृश पूजा करते थे।
एक दिन काल के कठोर हाथों ने उसे भी अपनी चञ्चलता से गिरा दिया।

 

पूस की रात : प्रेमचंद

 

पूस की रात  :  प्रेमचंद                                     

 

हल्कू ने आकर स्त्री से कहा—सहना आया है, लाओ, जो रुपए रखे हैं, उसे दे दूँ, किसी तरह गला तो छूटे।

मुन्नी झाड़ू लगा रही थी। पीछे फिरकर बोली—तीन ही तो रुपए हैं, दे दोगे तो कम्मल कहाँ से आवेगा? माघ-पूस की रात हार में कैसे कटेगी? उससे कह दो, फसल पर दे देंगे। अभी नहीं।

हल्कू एक क्षण अनिश्चित दशा में खड़ा रहा। पूस सिर पर आ गया, कम्मल के बिना हार में रात को वह किसी तरह नहीं जा सकता। मगर सहना मानेगा नहीं, घुड़कियाँ जमावेगा, गालियाँ देगा। बला से जाड़ों में मरेंगे, बला तो सिर से टल जाएगी। यह सोचता हुआ वह अपना भारी-भरकम डील लिए हुए (जो उसके नाम को झूठ सिद्ध करता था) स्त्री के समीप आ गया और ख़ुशामद करके बोला—ला दे दे, गला तो छूटे। कम्मल के लिए कोई दूसरा उपाय सोचूँगा।

मुन्नी उसके पास से दूर हट गई और आँखें तरेरती हुई बोली—कर चुके दूसरा उपाय! ज़रा सुनूँ तो कौन-सा उपाय करोगे? कोई खैरात दे देगा कम्मल? न जाने कितनी बाक़ी है, जों किसी तरह चुकने ही नहीं आती। मैं कहती हूँ, तुम क्यों नहीं खेती छोड़ देते? मर-मर काम करो, उपज हो तो बाक़ी दे दो, चलो छुट्टी हुई। बाक़ी चुकाने के लिए ही तो हमारा जनम हुआ है। पेट के लिए मजूरी करो। ऐसी खेती से बाज आए। मैं रुपए न दूँगी, न दूँगी।

हल्कू उदास होकर बोला—तो क्या गाली खाऊँ?

मुन्नी ने तड़पकर कहा—गाली क्यों देगा, क्या उसका राज है?

मगर यह कहने के साथ ही उसकी तनी हुई भौहें ढीली पड़ गईं। हल्कू के उस वाक्य में जो कठोर सत्य था, वह मानो एक भीषण जंतु की भाँति उसे घूर रहा था।

उसने जाकर आले पर से रुपए निकाले और लाकर हल्कू के हाथ पर रख दिए। फिर बोली— तुम छोड़ दो अबकी से खेती। मजूरी में सुख से एक रोटी तो खाने को मिलेगी। किसी की धौंस तो न रहेगी। अच्छी खेती है! मजूरी करके लाओ, वह भी उसी में झोंक दो, उस पर धौंस।

हल्कू ने रुपए लिए और इस तरह बाहर चला मानो अपना हृदय निकालकर देने जा रहा हो। उसने मजूरी से एक-एक पैसा काट-कपटकर तीन रुपए कम्मल के लिए जमा किए थे। वह आज निकले जा रहे थे। एक-एक पग के साथ उसका मस्तक अपनी दीनता के भार से दबा जा रहा था।


2

पूस की अँधेरी रात! आकाश पर तारे भी ठिठुरते हुए मालूम होते थे। हल्कू अपने खेत के किनारे ऊख के पतों की एक छतरी के नीचे बाँस के खटोले पर अपनी पुरानी गाढ़े की चादर ओढ़े पड़ा काँप रहा था। खाट के नीचे उसका संगी कुत्ता जबरा पेट मे मुँह डाले सर्दी से कूँ-कूँ कर रहा था। दो में से एक को भी नींद न आती थी।

हल्कू ने घुटनियों कों गरदन में चिपकाते हुए कहा—क्यों जबरा, जाड़ा लगता है? कहता तो था, घर में पुआल पर लेट रह, तो यहाँ क्या लेने आए थे? अब खाओ ठंड, मैं क्या करूँ? जानते थे, मै यहाँ हलुवा-पूरी खाने आ रहा हूँ, दौड़े-दौड़े आगे-आगे चले आए। अब रोओ नानी के नाम को।

जबरा ने पड़े-पड़े दुम हिलायी और अपनी कूँ-कूँ को दीर्घ बनाता हुआ एक बार जम्हाई लेकर चुप हो गया। उसकी श्वान-बुद्धि ने शायद ताड़ लिया, स्वामी को मेरी कूँ-कूँ से नींद नहीं आ रही है।

हल्कू ने हाथ निकालकर जबरा की ठंडी पीठ सहलाते हुए कहा—कल से मत आना मेरे साथ, नहीं तो ठंडे हो जाओगे। यह राँड पछुआ न जाने कहाँ से बर्फ़ लिए आ रही है। उठूँ, फिर एक चिलम भरूँ। किसी तरह रात तो कटे! आठ चिलम तो पी चुका। यह खेती का मज़ा है! और एक-एक भगवान ऐसे पड़े हैं, जिनके पास जाड़ा जाए तो गर्मी से घबड़ाकर भागे। मोटे-मोटे गद्दे, लिहाफ़-कम्मल। मज़ाल है, जाड़े का गुज़र हो जाए। तकदीर की ख़ूबी! मजूरी हम करें, मज़ा दूसरे लूटें!

हल्कू उठा, गड्ढ़े में से ज़रा-सी आग निकालकर चिलम भरी। जबरा भी उठ बैठा।

हल्कू ने चिलम पीते हुए कहा—पिएगा चिलम, जाड़ा तो क्या जाता है, ज़रा मन बदल जाता है।

जबरा ने उसके मुँह की ओर प्रेम से छलकती हुई आँखों से देखा।

हल्कू—आज और जाड़ा खा ले। कल से मैं यहाँ पुआल बिछा दूँगा। उसी में घुसकर बैठना, तब जाड़ा न लगेगा।

जबरा ने अपने पंजे उसकी घुटनियों पर रख दिए और उसके मुँह के पास अपना मुँह ले गया। हल्कू को उसकी गर्म साँस लगी।

चिलम पीकर हल्कू फिर लेटा और निश्चय करके लेटा कि चाहे कुछ हो अबकी सो जाऊँगा, पर एक ही क्षण में उसके हृदय में कंपन होने लगा। कभी इस करवट लेटता, कभी उस करवट, पर जाड़ा किसी पिशाच की भाँति उसकी छाती को दबाए हुए था।

जब किसी तरह न रहा गया तो उसने जबरा को धीरे से उठाया और उसक सिर को थपथपाकर उसे अपनी गोद में सुला लिया। कुत्ते की देह से जाने कैसी दुर्गंध आ रही थी, पर वह उसे अपनी गोद में चिपटाए हुए ऐसे सुख का अनुभव कर रहा था, जो इधर महीनों से उसे न मिला था। जबरा शायद यह समझ रहा था कि स्वर्ग यहीं है, और हल्कू की पवित्र आत्मा में तो उस कुत्ते के प्रति घृणा की गंध तक न थी। अपने किसी अभिन्न मित्र या भाई को भी वह इतनी ही तत्परता से गले लगाता। वह अपनी दीनता से आहत न था, जिसने आज उसे इस दशा को पहुँचा दिया। नहीं, इस अनोखी मैत्री ने जैसे उसकी आत्मा के सब द्वार खोल दिए थे और उनका एक-एक अणु प्रकाश से चमक रहा था।

सहसा जबरा ने किसी जानवर की आहट पाई। इस विशेष आत्मीयता ने उसमे एक नई स्फूर्ति पैदा कर दी थी, जो हवा के ठंडें झोकों को तुच्छ समझती थी। वह झपटकर उठा और छपरी से बाहर आकर भूँकने लगा। हल्कू ने उसे कई बार चुमकारकर बुलाया, पर वह उसके पास न आया। हार में चारों तरफ़ दौड़-दौड़कर भूँकता रहा। एक क्षण के लिए आ भी जाता, तो तुरंत ही फिर दौड़ता। कर्तव्य उसके हृदय में अरमान की भाँति ही उछल रहा था।


3

एक घंटा और गुज़र गया। रात ने शीत को हवा से धधकाना शुरु किया। हल्कू उठ बैठा और दोनों घुटनों को छाती से मिलाकर सिर को उसमें छिपा लिया, फिर भी ठंड कम न हुई। ऐसा जान पड़ता था, सारा रक्त जम गया है, धमनियों मे रक्त की जगह हिम बह रहा है। उसने झुककर आकाश की ओर देखा, अभी कितनी रात बाक़ी है! सप्तर्षि अभी आकाश में आधे भी नहीं चढ़े। ऊपर आ जायँगे तब कहीं सबेरा होगा। अभी पहर से ऊपर रात है।

हल्कू के खेत से कोई एक गोली के टप्पे पर आमों का एक बाग़ था। पतझड़ शुरु हो गई थी। बाग़ में पत्तियों को ढेर लगा हुआ था। हल्कू ने सोचा, चलकर पत्तियाँ बटोरूँ और उन्हें जलाकर ख़ूब तापूँ। रात को कोई मुझे पत्तियाँ बटोरते देख तो समझे कोई भूत है। कौन जाने, कोई जानवर ही छिपा बैठा हो, मगर अब तो बैठे नहीं रहा जाता।

उसने पास के अरहर के खेत में जाकर कई पौधे उखाड़ लिए और उनका एक झाड़ू बनाकर हाथ में सुलगता हुआ उपला लिए बग़ीचे की तरफ़ चला। जबरा ने उसे आते देखा तो पास आया और दुम हिलाने लगा।

हल्कू ने कहा—अब तो नहीं रहा जाता जबरू। चलो बग़ीचे में पत्तियाँ बटोरकर तापें। टाँठे हो जायेंगे, तो फिर आकर सोएँगें। अभी तो बहुत रात है।

जबरा ने कूँ-कूँ करके सहमति प्रकट की और आगे-आगे बग़ीचे की ओर चला।

बग़ीचे में ख़ूब अँधेरा छाया हुआ था और अंधकार में निर्दय पवन पत्तियों को कुचलता हुआ चला जाता था। वृक्षों से ओस की बूँदे टप-टप नीचे टपक रही थीं।

एकाएक एक झोंका मेहँदी के फूलों की खूशबू लिए हुए आया।

हल्कू ने कहा—कैसी अच्छी महक आई जबरू! तुम्हारी नाक में भी तो सुगंध आ रही है?

जबरा को कहीं ज़मीन पर एक हड्डी पड़ी मिल गई थी। उसे चिंचोड़ रहा था।

हल्कू ने आग ज़मीन पर रख दी और पत्तियाँ बटोरने लगा। ज़रा देर में पत्तियों का ढेर लग गया। हाथ ठिठुरे जाते थे। नंगे पाँव गले जाते थे। और वह पत्तियों का पहाड़ खड़ा कर रहा था। इसी अलाव में वह ठंड को जलाकर भस्म कर देगा।

थोड़ी देर में अलाव जल उठा। उसकी लौ ऊपर वाले वृक्ष की पत्तियों को छू-छूकर भागने लगी। उस अस्थिर प्रकाश में बग़ीचे के विशाल वृक्ष ऐसे मालूम होते थे, मानो उस अथाह अंधकार को अपने सिरों पर सँभाले हुए हों अंधकार के उस अनंत सागर मे यह प्रकाश एक नौका के समान हिलता, मचलता हुआ जान पड़ता था।

हल्कू अलाव के सामने बैठा आग ताप रहा था। एक क्षण में उसने दोहर उताकर बगल में दबा ली, दोनों पाँव फैला दिए, मानों ठंड को ललकार रहा हो, तेरे जी में जो आए सो कर। ठंड की असीम शक्ति पर विजय पाकर वह विजय-गर्व को हृदय में छिपा न सकता था।

उसने जबरा से कहा—क्यों जब्बर, अब ठंड नहीं लग रही है?

जब्बर ने कूँ-कूँ करके मानो कहा—अब क्या ठंड लगती ही रहेगी?

'पहले से यह उपाय न सूझा, नहीं इतनी ठंड क्यों खाते।'

जब्बर ने पूँछ हिलाई।

'अच्छा आओ, इस अलाव को कूदकर पार करें। देखें, कौन निकल जाता है। अगर जल गए बच्चा, तो मैं दवा न करूँगा।'

जब्बर ने उस अग्निराशि की ओर कातर नेत्रों से देखा!

मुन्नी से कल न कह देना, नहीं तो लड़ाई करेगी।

यह कहता हुआ वह उछला और उस अलाव के ऊपर से साफ़ निकल गया। पैरों में ज़रा लपट लगी, पर वह कोई बात न थी। जबरा आग के गिर्द घूमकर उसके पास आ खड़ा हुआ।

हल्कू ने कहा—चलो-चलो इसकी सही नहीं! ऊपर से कूदकर आओ। वह फिर कूदा और अलाव के इस पार आ गया।


4

पत्तियाँ जल चुकी थीं। बग़ीचे में फिर अँधेरा छा गया था। राख के नीचे कुछ-कुछ आग बाक़ी थी, जो हवा का झोंका आ जाने पर ज़रा जाग उठती थी, पर एक क्षण में फिर आँखें बंद कर लेती थी!

हल्कू ने फिर चादर ओढ़ ली और गर्म राख के पास बैठा हुआ एक गीत गुनगुनाने लगा। उसके बदन में गर्मी आ गई थी, पर ज्यों-ज्यों शीत बढ़ती जाती थी, उसे आलस्य दबाए लेता था।

जबरा ज़ोर से भूँककर खेत की ओर भागा। हल्कू को ऐसा मालूम हुआ कि जानवरों का एक झुंड खेत में आया है। शायद नीलगायों का झुंड था। उनके कूदने-दौड़ने की आवाज़ें साफ़ कान में आ रही थी। फिर ऐसा मालूम हुआ कि खेत में चर रहीं हैं। उनके चबाने की आवाज़ चर-चर सुनाई देने लगी।

उसने दिल में कहा- नहीं, जबरा के होते कोई जानवर खेत में नहीं आ सकता। नोच ही डाले। मुझे भ्रम हो रहा है। कहाँ! अब तो कुछ नहीं सुनाई देता। मुझे भी कैसा धोखा हुआ!

उसने ज़ोर से आवाज़ लगाई—जबरा, जबरा।

जबरा भूँकता रहा। उसके पास न आया।

फिर खेत के चरे जाने की आहट मिली। अब वह अपने को धोखा न दे सका। उसे अपनी जगह से हिलना जहर लग रहा था। कैसा दंदाया हुआ था। इस जाड़े-पाले में खेत में जाना, जानवरों के पीछे दौड़ना असह्य जान पड़ा। वह अपनी जगह से न हिला।

उसने ज़ोर से आवाज़ लगाई—लिहो-लिहो!लिहो!!

जबरा फिर भूँक उठा। जानवर खेत चर रहे थे। फसल तैयार है। कैसी अच्छी खेती थी, पर ये दुष्ट जानवर उसका सर्वनाश किए डालते हैं।

हल्कू पक्का इरादा करके उठा और दो-तीन क़दम चला, पर एकाएक हवा का ऐसा ठंडा, चुभने वाला, बिच्छू के डंक का-सा झोंका लगा कि वह फिर बुझते हुए अलाव के पास आ बैठा और राख को कुरेदकर अपनी ठंडी देह को गर्माने लगा।

जबरा अपना गला फाड़ डालता था, नीलगायें खेत का सफाया किए डालती थीं और हल्कू गर्म राख के पास शांत बैठा हुआ था। अकर्मण्यता ने रस्सियों की भाँति उसे चारों तरफ़ से जकड़ रखा था।

उसी राख के पास गर्म ज़मीन पर वह चादर ओढ़ कर सो गया।

सबेरे जब उसकी नींद खुली, तब चारों तरफ़ धूप फैल गई थी और मुन्नी कह रही थी—क्या आज सोते ही रहोगे? तुम यहाँ आकर रम गए और उधर सारा खेत चौपट हो गया।

हल्कू ने उठकर कहा—क्या तू खेत से होकर आ रही है?

मुन्नी बोली—हाँ, सारे खेत का सत्यानाश हो गया। भला, ऐसा भी कोई सोता है। तुम्हारे यहाँ मड़ैया डालने से क्या हुआ?

हल्कू ने बहाना किया—मैं मरते-मरते बचा, तुझे अपने खेत की पड़ी है। पेट में ऐसा दरद हुआ कि मै ही जानता हूँ!

दोनों फिर खेत के डाँड़ पर आए। देखा, सारा खेत रौंदा पड़ा हुआ है और जबरा मड़ैया के नीचे चित लेटा है, मानो प्राण ही न हों।

दोनों खेत की दशा देख रहे थे। मुन्नी के मुख पर उदासी छायी थी, पर हल्कू प्रसन्न था।

मुन्नी ने चिंतित होकर कहा—अब मजूरी करके मालगुजारी भरनी पड़ेगी।

हल्कू ने प्रसन्न मुख से कहा—रात को ठंड में यहाँ सोना तो न पड़ेगा।


                                                                 

                                                                                                            गोबिंद यादव
                                                                                                        बिरसा मुंडा कॉलेज 
                                                                                         ( हातिघिसा, दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल )
                                                                                                          मो. 6294524332



 

शुक्रवार, 1 जुलाई 2022

उसने कहा था - चंद्रधर शर्मा गुलेरी

 उसने कहा था 

                                                - चंद्रधर शर्मा गुलेरी


बड़े-बडे़ शहरों के इक्के-गाड़ी वालों की जबान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है और कान पक गए हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बू कार्ट वालों की बोली का मरहम लगाएं। जबकि बड़े शहरों की चौड़ी सड़कों पर घोड़े की पीठ को चाबुक से धुनते हुए इक्के वाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट यौन-संबंध स्थिर करते हैं, कभी उसके गुप्त गुह्य अंगों से डॉक्टर को लजाने वाला परिचय दिखाते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आंखों के न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरों की अंगुलियों के पोरों की चींथकर अपने ही को सताया हुआ बताते हैं और संसारभर की ग्लानि और क्षोभ के अवतार बने नाक की सीध चले जाते हैं, तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले तंग चक्करदार गलियों में हर एक लड्ढी वाले के लिए ठहर कर सब्र का समुद्र उमड़ा कर ‘बचो खालसाजी, हटो भाईजी, ठहरना भाई, आने दो लालाजी, हटो बाछा’ कहते हुए सफ़ेद फेटों, खच्चरों और बत्तकों, गन्ने और खोमचे और भारे वालों के जंगल से राह खेते हैं। क्या मजाल है कि जी और साहब बिना सुने किसी को हटना पड़े। यह बात नहीं कि उनकी जीभ चलती ही नहीं, चलती है पर मीठी छुरी की तरह महीन मार करती हुई। यदि कोई बुढ़िया बार-बार चितौनी देने पर भी लीक से नहीं हटती तो उनकी वचनावली के ये नमूने हैं,‘हट जा जीणे जोगिए, हट जा करमां वालिए, हट जा, पुत्तां प्यारिए। बच जा लम्बी वालिए।समष्टि में इसका अर्थ है,‘तू जीने योग्य है, तू भाग्योंवाली है, पुत्रों को प्यारी है, लम्बी उमर तेरे सामने है, तू क्यों मेरे पहियों के नीचे आना चाहती है? बच जा.’
ऐसे बम्बू कार्ट वालों के बीच में होकर एक लड़का और एक लड़की चौक की दुकान पर आ मिले। उसके बालों और इसके ढीले सुथने से जान पड़ता था कि दोनों सिख हैं। वह अपने मामा के केश धोने के लिए दही लेने आया था और यह रसोई के लिए बड़ियां। दुकानदार एक परदेशी से गुथ रहा था, जो सेर भर गीले पापड़ों की गड्डी गिने बिना हटता न था।
तेरा घर कहां है?’
मगरे में...और तेरा?’
मांझे में, यहां कहां रहती है?’
अतरसिंह की बैठक में, वह मेरे मामा होते हैं।’
मैं भी मामा के आया हूं, उनका घर गुरु बाज़ार में है।’
इतने में दुकानदार निबटा और इनका सौदा देने लगा। सौदा लेकर दोनों साथ-साथ चले।
कुछ दूर जाकर लड़के ने मुसकुरा कर पूछा,‘तेरी कुड़माई हो गई?’
इस पर लड़की कुछ आंखें चढ़ाकर ‘धत्’ कहकर दौड़ गई और लड़का मुंह देखता रह गया।  
दूसरे, तीसरे दिन सब्ज़ी वाले के यहां, या दूध वाले के यहां अकस्मात् दोनों मिल जाते। महीनाभर यही हाल रहा।
दो-तीन बार लड़के ने फिर पूछा, तेरे कुड़माई हो गई? और उत्तर में वही ‘धत्’ मिला।
एक दिन जब फिर लड़के ने वैसी ही हंसी में चिढ़ाने के लिए पूछा तो लड़की, लड़के की संभावना के विरुद्ध बोली,‘हां, हो गई।’
कब?’
कल, देखते नहीं यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू...’ लड़की भाग गई।
लड़के ने घर की सीध ली। रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया, एक छाबड़ी वाले की दिनभर की कमाई खोई, एक कुत्ते को पत्थर मारा और गोभी वाले ठेले में दूध उंडेल दिया। सामने नहा कर आती हुई किसी वैष्णवी से टकरा कर अंधे की उपाधि पाई। तब कहीं घर पहुंचा।


 

 


राम-राम, यह भी कोई लड़ाई है। दिन-रात खन्दकों में बैठे हड्डियां अकड़ गईं। लुधियाना से दस गुना जाड़ा और मेंह और बर्फ़ ऊपर से। पिंडलियों तक कीचड़ में धंसे हुए हैं। जमीन कहीं दिखती नहीं। घंटे-दो-घंटे में कान के परदे फाड़नेवाले धमाके के साथ सारी खन्दक हिल जाती है और सौ-सौ गज धरती उछल पड़ती है। इस गैबी गोले से बचे तो कोई लड़े। नगरकोट का जलजला सुना था, यहां दिन में पचीस जलजले होते हैं। जो कहीं खन्दक से बाहर साफा या कुहनी निकल गई तो चटाक से गोली लगती है। न मालूम बेईमान मिट्टी में लेटे हुए हैं या घास की पत्तियों में छिपे रहते हैं।’
लहना सिंह और तीन दिन हैं। चार तो खन्दक में बिता ही दिए। परसों ‘रिलीफ़’ आ जाएगी और फिर सात दिन की छुट्टी। अपने हाथों झटका करेंगे और पेट-भर खाकर सो रहेंगे। उसी फिरंगी मेम के बाग़ में। मखमल की सी हरी घास है। फल और दूध की वर्षा कर देती है. लाख कहते हैं, दाम नहीं लेती. कहती है, तुम राजा हो, मेरे मुल्क़ को बचाने आए हो।’
चार दिन तक पलक नहीं झपकी। बिना फेरे घोड़ा बिगड़ता है और बिना लड़े सिपाही। मुझे तो संगीन चढ़ा कर मार्च का हुक्म मिल जाए। फिर सात जर्मनों को अकेला मार कर न लौटूं तो मुझे दरबार साहब की देहली पर मत्था टेकना नसीब न हो। पाजी कहीं के, कलों के घोड़े, संगीन देखते ही मुंह फाड़ देते हैं और पैर पकड़ने लगते हैं। यों अंधेरे में तीस-तीस मन का गोला फेंकते हैं। उस दिन धावा किया था। चार मील तक एक जर्मन नहीं छोड़ा था। पीछे जनरल ने हट जाने का कमान दिया, नहीं तो...’
नहीं तो सीधे बर्लिन पहुंच जाते! क्यों?’ सूबेदार हजार सिंह ने मुस्कुराकर कहा,‘लड़ाई के मामले जमादार या नायक के चलाए नहीं चलते। बड़े अफ़सर दूर की सोचते हैं। तीन सौ मील का सामना है। एक तरफ बढ़ गए तो क्या होगा?’
सूबेदार जी, सच है,’ लहना सिंह बोला,‘पर करें क्या? हड्डियों-हड्डियों में तो जाड़ा धंस गया है। सूर्य निकलता नहीं और खाई में दोनों तरफ़ से चम्बे की बावलियों के से सोते झर रहे हैं। एक धावा हो जाए, तो गरमी आ जाए।’
"उदमी, उठ, सिगड़ी में कोले डाल। वजीरा, तुम चार जने बालटियां लेकर खाई का पानी बाहर फेंको। महा सिंह, शाम हो गई है, खाई के दरवाज़े का पहरा बदल ले।’ यह कहते हुए सूबेदार सारी खन्दक में चक्कर लगाने लगे।
वजीरा सिंह पलटन का विदूषक था। बाल्टी में गंदला पानी भर कर खाई के बाहर फेंकता हुआ बोला,‘मैं पाधा बन गया हूं। करो जर्मनी के बादशाह का तर्पण!’ इस पर सब खिलखिला पड़े और उदासी के बादल फट गए। लहना सिंह ने दूसरी बाल्टी भर कर उसके हाथ में देकर कहा,‘अपनी बाड़ी के खरबूजों में पानी दो। ऐसा खाद का पानी पंजाब-भर में नहीं मिलेगा। हां, देश क्या है, स्वर्ग है। मैं तो लड़ाई के बाद सरकार से दस धुमा ज़मीन यहां मांग लूंगा और फलों के बूटे लगाऊंगा।’
लाड़ी होरा को भी यहां बुला लोगे? या वही दूध पिलानेवाली फरंगी मेम...’
चुप कर. यहां वालों को शरम नहीं।’
देश-देश की चाल है। आज तक मैं उसे समझा न सका कि सिख तम्बाखू नहीं पीते। वह सिगरेट देने में हठ करती है, ओंठों में लगाना चाहती है और मैं पीछे हटता हूं तो समझती है कि राजा बुरा मान गया, अब मेरे मुल्क़ के लिए लड़ेगा नहीं।’
अच्छा, अब बोध सिंह कैसा है?’
अच्छा है।’
जैसे मैं जानता ही न होऊं! रातभर तुम अपने कम्बल उसे उढ़ाते हो और आप सिगड़ी के सहारे गुज़र करते हो। उसके पहरे पर आप पहरा दे आते हो। अपने सूखे लकड़ी के तख़्तों पर उसे सुलाते हो। आप कीचड़ में पड़े रहते हो. कहीं तुम न मांदे पड़ जाना। जाड़ा क्या है, मौत है और 'निमोनिया' से मरनेवालों को मुरब्बे नहीं मिला करते।’
मेरा डर मत करो। मैं तो बुलेल की खड्ड के किनारे मरूंगा। भाई कीरत सिंह की गोदी पर मेरा सिर होगा और मेरे हाथ के लगाए हुए आंगन के आम के पेड़ की छाया होगी।’
वजीरा सिंह ने त्योरी चढ़ाकर कहा,‘क्या मरने-मारने की बात लगाई है? मरें जर्मनी और तुरक! हां भाइयों, कैसे?’
दिल्ली शहर तें पिशोर नुं जांदिए,
कर लेणा लौंगां दा बपार मड़िए
कर लेणा नादेड़ा सौदा अड़िए
(ओय) लाणा चटाका कदुए नुं
क बणाया वे मजेदार गोरिये
हुण लाणा चटाका कदुए नुं
कौन जानता था कि दाढ़ियावाले घरबारी सिख ऐसा लुच्चों का गीत गाएंगे। पर सारी खन्दक इस गीत से गूंज उठी और सिपाही फिर ताज़े हो गए, मानों चार दिन से सोते और मौज ही करते रहे हों।


 

 


दोपहर, रात गई है। अन्धेरा है। सन्नाटा छाया हुआ है। बोधा सिंह ख़ाली बिसकुटों के तीन टिनों पर अपने दोनों कम्बल बिछा कर और लहना सिंह के दो कम्बल और एक बरानकोट ओढ़ कर सो रहा है। लहना सिंह पहरे पर खड़ा हुआ है। एक आंख खाई के मुंह पर है और एक बोधा सिंह के दुबले शरीर पर। बोधा सिंह कराहा।
क्यों बोधा भाई, क्या है?’
पानी पिला दो’
लहना सिंह ने कटोरा उसके मुंह से लगा कर पूछा,‘कहो कैसे हो?’ पानी पी कर बोधा बोला,‘कंपनी छूट रही है। रोम-रोम में तार दौड़ रहे हैं। दांत बज रहे हैं।’
अच्छा, मेरी जरसी पहन लो!’
और तुम?’
मेरे पास सिगड़ी है और मुझे गर्मी लगती है। पसीना आ रहा है।’
ना, मैं नहीं पहनता। चार दिन से तुम मेरे लिए...’
हां, याद आई। मेरे पास दूसरी गरम जरसी है। आज सबेरे ही आई है। विलायत से बुन-बुनकर भेज रही हैं मेमें, गुरु उनका भला करें।’ यों कह कर लहना अपना कोट उतार कर जरसी उतारने लगा।
सच कहते हो?’
और नहीं झूठ?’ यों कह कर नहीं करते बोधा को उसने ज़बरदस्ती जरसी पहना दी और आप खाकी कोट और जीन का कुरता भर पहन-कर पहरे पर आ खड़ा हुआ। मेम की जरसी की कथा केवल कथा थी।
आधा घण्टा बीता। इतने में खाई के मुंह से आवाज़ आई,‘सूबेदार हजारा सिंह।’
कौन लपटन साहब? हुक्म हुजूर!’ कह कर सूबेदार तन कर फ़ौजी सलाम करके सामने हुआ।
देखो, इसी समय धावा करना होगा। मील भर की दूरी पर पूरब के कोने में एक जर्मन खाई है। उसमें पचास से जियादा जर्मन नहीं हैं। इन पेड़ों के नीचे-नीचे दो खेत काट कर रास्ता है। तीन-चार घुमाव हैं। जहां मोड़ है, वहां पन्द्रह जवान खड़े कर आया हूं। तुम यहां दस आदमी छोड़ कर सब को साथ ले उनसे जा मिलो। खन्दक छीन कर वहीं, जब तक दूसरा हुक्म न मिले, डटे रहो. हम यहां रहेगा।’
जो हुक्म।’
चुपचाप सब तैयार हो गए। बोधा भी कम्बल उतार कर चलने लगा। तब लहना सिंह ने उसे रोका। लहना सिंह आगे हुआ तो बोधा के बाप सूबेदार ने उंगली से बोधा की ओर इशारा किया। लहना सिंह समझ कर चुप हो गया। पीछे दस आदमी कौन रहें. इस पर बड़ी हुज्जत हुई। कोई रहना न चाहता था. समझा-बुझाकर सूबेदार ने मार्च किया। लपटन साहब लहना की सिगड़ी के पास मुंह फेर कर खड़े हो गए और जेब से सिगरेट निकाल कर सुलगाने लगे। दस मिनट बाद उन्होंने लहना की ओर हाथ बढ़ा कर कहा,‘लो तुम भी पियो।’
आंख मारते-मारते लहना सिंह सब समझ गया। मुंह का भाव छिपा कर बोला,‘लाओ साहब।’ हाथ आगे करते ही उसने सिगड़ी के उजाले में साहब का मुंह देखा। बाल देखे। तब उसका माथा ठनका। लपटन साहब के पट्टियों वाले बाल एक दिन में ही कहां उड़ गए और उनकी जगह क़ैदियों से कटे बाल कहां से आ गए?’ शायद साहब शराब पिए हुए हैं और उन्हें बाल कटवाने का मौका मिल गया है? लहना सिंह ने जांचना चाहा. लपटन साहब पांच वर्ष से उसकी रेजिमेंट में थे।
क्यों साहब, हम लोग हिन्दुस्तान कब जाएंगे?’
लड़ाई ख़त्म होने पर। क्यों, क्या यह देश पसन्द नहीं?’
नहीं साहब, शिकार के वे मज़े यहां कहां? याद है, पारसाल नक़ली लड़ाई के पीछे हम आप जगाधरी ज़िले में शिकार करने गए थे?’
हां... हां...’
वहीं जब आप खोते पर सवार थे और, ...और आपका ख़ानसामा अब्दुल्ला रास्ते के एक मन्दिर में जल चढ़ाने को रह गया था? बेशक़ पाजी कहीं का। सामने से वह नील गाय निकली कि ऐसी बड़ी मैंने कभी न देखी थी। और आपकी एक गोली कन्धे में लगी और पुट्ठे में निकली। ऐसे अफ़सर के साथ शिकार खेलने में मज़ा है। क्यों साहब, शिमले से तैयार होकर उस नील गाय का सिर आ गया था न? आपने कहा था कि रेजमेंट की मैस में लगाएंगे।’  
हां, पर मैंने वह विलायत भेज दिया।’
ऐसे बड़े-बड़े सींग! दो-दो फ़ुट के तो होंगे?’
हां, लहनासिंह, दो फ़ुट चार इंच के थे। तुमने सिगरेट नहीं पिया?’
पीता हूं साहब, दियासलाई ले आता हूं,’ कह कर लहना सिंह खन्दक में घुसा। अब उसे संदेह नहीं रहा था। उसने झटपट निश्चय कर लिया कि क्या करना चाहिए। अंधेरे में किसी सोने वाले से वह टकराया।
कौन? वजीर सिंह?’
हां, क्यों लहना? क्या क़यामत आ गई? ज़रा तो आंख लगने दी होती?’
होश में आओ। क़यामत आई है और लपटन साहब की वर्दी पहन कर आई है।’
क्या? लपटन साहब या तो मारे गए हैं या क़ैद हो गए हैं। उनकी वर्दी पहन कर कोई जर्मन आया है। सूबेदार ने इसका मुंह नहीं देखा। मैंने देखा है, और बातें की हैं। सौहरा साफ़ उर्दू बोलता है, पर किताबी उर्दू। और मुझे पीने को सिगरेट दिया है।’
तो अब?’
अब मारे गए। धोखा है। सूबेदार कीचड़ में चक्कर काटते फिरेंगे और यहां खाई पर धावा होगा उधर उन पर खुले में धावा होगा। उठो, एक काम करो। पलटन के पैरों के निशान देखते-देखते दौड़ जाओ। अभी बहुत दूर न गए होंगे। सूबेदार से कहो कि एकदम लौट आवें। खंदक की बात झूठ है। चले जाओ, खंदक के पीछे से ही निकल जाओ। पत्ता तक न खड़के। देर मत करो।’
हुकुम तो यह है कि यहीं...’
ऐसी तैसी हुकुम की! मेरा हुकुम है... जमादार लहना सिंह जो इस वक़्त यहां सबसे बड़ा अफ़सर है, उसका हुकुम है। मैं लपटन साहब की ख़बर लेता हूं।’
पर यहां तो तुम आठ ही हो।’
आठ नहीं, दस लाख. एक-एक अकालिया सिख सवा लाख के बराबर होता है। चले जाओ।’


 

 


लौटकर खाई के मुहाने पर लहना सिंह दीवार से चिपक गया। उसने देखा कि लपटन साहब ने जेब से बेल के बराबर तीन गोले निकाले। तीनों को जगह-जगह खंदक की दीवारों में घुसेड़ दिया और तीनों में एक तार-सा बांध दिया। तार के आगे सूत की गुत्थी थी, जिसे सिगड़ी के पास रखा। बाहर की तरफ़ जाकर एक दियासलाई जलाकर गुत्थी रखने... बिजली की तरह दोनों हाथों से उलटी बन्दूक को उठाकर लहना सिंह ने साहब की कुहनी पर तानकर दे मारा। धमाके के साथ साहब के हाथ से दियासलाई गिर पड़ी। लहना सिंह ने एक कुन्दा साहब की गर्दन पर मारा और साहब ‘आंख! मीन गाट्ट’ कहते हुए चित हो गए। लहना सिंह ने तीनों गोले बीनकर खंदक के बाहर फेंके और साहब को घसीटकर सिगड़ी के पास लिटाया। जेबों की तलाशी ली। तीन-चार लिफ़ाफ़े और एक डायरी निकाल कर उन्हें अपनी जेब के हवाले किया।  
साहब की मूर्च्छा हटी। लहना सिंह हंसकर बोला,‘क्यों, लपटन साहब, मिज़ाज कैसा है? आज मैंने बहुत बातें सीखीं। यह सीखा कि सिख सिगरेट पीते हैं। यह सीखा कि जगाधरी के ज़िले में नीलगायें होती हैं और उनके दो फ़ुट चार इंच के सींग होते हैं। यह सीखा कि मुसलमान ख़ानसामा मूर्तियों पर जल चढ़ाते हैं और लपटन साहब खोते पर चढ़ते हैं। पर यह तो कहो, ऐसी साफ़ उर्दू कहां से सीख आए? हमारे लपटन साहब तो बिना 'डैम' के पांच लफ़्ज़ भी नहीं बोला करते थे।’
लहना सिंह ने पतलून की जेबों की तलाशी नहीं ली थी. साहब ने मानो जाड़े से बचने के लिए दोनों हाथ जेबों में डाले। लहना सिंह कहता गया,‘चालाक तो बड़े हो, पर मांझे का लहना इतने बरस लपटन साहब के साथ रहा है। उसे चकमा देने के लिए चार आंखें चाहिए। तीन महीने हुए एक तुर्की मौलवी मेरे गांव में आया था। औरतों को बच्चे होने का ताबीज बांटता था और बच्चों को दवाई देता था। चौधरी के बड़ के नीचे मंजा बिछाकर हुक्का पीता रहता था और कहता था कि जर्मनी वाले बड़े पंडित हैं। वेद पढ़-पढ़ कर उसमें से विमान चलाने की विद्या जान गए हैं। गौ को नहीं मारते। हिन्दुस्तान में आ जाएंगे तो गोहत्या बन्द कर देगे। मंडी के बनियों को बहकाता था कि डाकखाने से रुपए निकाल लो, सरकार का राज्य जाने वाला है। डाक बाबू पोल्हू राम भी डर गया था। मैंने मुल्ला की दाढ़ी मूंड़ दी थी और गांव से बाहर निकालकर कहा था कि जो मेरे गांव में अब पैर रखा तो...’
इतने में साहब की जेब में से पिस्तौल चली और लहना की जांघ में गोली लगी। इधर लहना की हेनरी मार्टिन के दो फ़ायरों ने साहब की कपाल-क्रिया कर दी।  
धड़ाका सुनकर सब दौड़ आए।
बोधा चिल्लाया,‘क्या है?’
लहना सिंह ने उसे तो यह कह कर सुला दिया कि,‘एक हड़का कुत्ता आया था, मार दिया’ और औरों से सब हाल कह दिया। बंदूकें लेकर सब तैयार हो गए। लहना ने साफा फाड़ कर घाव के दोनों तरफ़ पट्टियां कसकर बांधी. घाव मांस में ही था। पट्टियों के कसने से लहू बंद हो गया।
इतने में सत्तर जर्मन चिल्लाकर खाई में घुस पड़े। सिखों की बंदूकों की बाढ़ ने पहले धावे को रोका. दूसरे को रोका। पर यहां थे आठ (लहना सिंह तक-तक कर मार रहा था. वह खड़ा था और बाक़ी लेटे हुए थे) और वे सत्तर। अपने मुर्दा भाईयों के शरीर पर चढ़कर जर्मन आगे घुसे आते थे। थोड़े मिनटों में वे... अचानक आवाज आई,‘वाहे गुरुजी की फतह! वाहेगुरु दी का खालसा!’ और धड़ाधड़ बंदूकों के फ़ायर जर्मनों की पीठ पर पड़ने लगे। ऐन मौक़े पर जर्मन दो चक्कों के पाटों के बीच में आ गए। पीछे से सूबेदार हजारा सिंह के जवान आग बरसाते थे और सामने से लहना सिंह के साथियों के संगीन चल रहे थे। पास आने पर पीछे वालों ने भी संगीन पिरोना शुरू कर दिया।
एक किलकारी और ‘अकाल सिक्खां दी फौज आई। वाहे गुरु जी दी फतह! वाहे गुरु जी दी खालसा! सत्त सिरी अकाल पुरुष!’ और लड़ाई ख़तम हो गई। तिरसठ जर्मन या तो खेत रहे थे या कराह रहे थे। सिक्खों में पन्द्रह के प्राण गए। सूबेदार के दाहिने कन्धे में से गोली आर पार निकल गई। लहना सिंह की पसली में एक गोली लगी। उसने घाव को खंदक की गीली मिट्टी से पूर लिया और बाक़ी का साफा कसकर कमर बन्द की तरह लपेट लिया। किसी को ख़बर नहीं हुई कि लहना को दूसरा घाव, भारी घाव लगा है।
लड़ाई के समय चांद निकल आया था। ऐसा चांद जिसके प्रकाश से संस्कृत कवियों का दिया हुआ ‘क्षयी’ नाम सार्थक होता है और हवा ऐसी चल रही थी जैसी कि बाणभट्ट की भाषा में ‘दंतवीणो पदेशाचार्य’ कहलाती। वजीरा सिंह कह रहा था कि कैसे मन-मनभर फ्रांस की भूमि मेरे बूटों से चिपक रही थी, जब मैं दौड़ा-दौड़ा सूबेदार के पीछे गया था। सूबेदार लहना सिंह से सारा हाल सुन और काग़ज़ात पाकर उसकी तुरंत बुद्धि को सराह रहे थे और कर रहे थे कि तू न होता तो आज सब मारे जाते। इस लड़ाई की आवाज़ तीन मील दाहिनी ओर की खाई वालों ने सुन ली थी। उन्होंने पीछे टेलीफ़ोन कर दिया था। वहां से झटपट दो डॉक्टर और दो बीमार ढोने की गाड़ियां चलीं, जो कोई डेढ़ घंटे के अंदर-अंदर आ पहुंचीं। फ़ील्ड अस्पताल नज़दीक था। सुबह होते-होते वहां पहुंच जाएंगे, इसलिए मामूली पट्टी बांधकर एक गाड़ी में घायल लिटाए गए और दूसरी में लाशें रखी गईं। सूबेदार ने लहना सिंह की जांघ में पट्टी बंधवानी चाही। बोध सिंह ज्वर से बर्रा रहा था। पर उसने यह कह कर टाल दिया कि थोड़ा घाव है, सवेरे देखा जाएगा। वह गाड़ी में लिटाया गया। लहना को छोड़कर सूबेदार जाते नहीं थे। यह देख लहना ने कहा,‘तुम्हें बोधा की क़सम है और सूबेदारनी जी की सौगंध है तो इस गाड़ी में न चले जाओ।’
और तुम?’
मेरे लिए वहां पहुंचकर गाड़ी भेज देना। और जर्मन मुर्दों के लिए भी तो गाड़ियां आती होगीं। मेरा हाल बुरा नहीं है। देखते नहीं मैं खड़ा हूं? वजीरा सिंह मेरे पास है ही।’
अच्छा, पर...’
बोधा गाड़ी पर लेट गया। भला, आप भी चढ़ आओ। सुनिए तो, सूबेदारनी होरां को चिट्ठी लिखो तो मेरा मत्था टेकना लिख देना।’  
और जब घर जाओ तो कह देना कि मुझसे जो उन्होंने कहा था, वह मैंने कर दिया।’
गाड़ियां चल पड़ी थीं। सूबेदार ने चढ़ते-चढ़ते लहना का हाथ पकड़कर कहा,‘तूने मेरे और बोधा के प्राण बचाए हैं। लिखना कैसा? साथ ही घर चलेंगे। अपनी सूबेदारनी से तू ही कह देना। उसने क्या कहा था?’  
अब आप गाड़ी पर चढ़ जाओ। मैंने जो कहा, वह लिख देना और कह भी देना।’
गाड़ी के जाते ही लहना लेट गया,‘वजीरा, पानी पिला दे और मेरा कमरबन्द खोल दे। तर हो रहा है।’


 

 


मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ़ हो जाती है। जन्मभर की घटनाएं एक-एक करके सामने आती हैं। सारे दृश्यों के रंग साफ़ होते हैं, समय की धुंध बिल्कुल उन पर से हट जाती है। लहना सिंह बारह वर्ष का है। अमृतसर में मामा के यहां आया हुआ है। दहीवाले के यहां, सब्ज़ीवाले के यहां, हर कहीं उसे आठ साल की लड़की मिल जाती है। जब वह पूछता है कि तेरी कुड़माई हो गई? तब वह ‘धत्’ कहकर भाग जाती है। एक दिन उसने वैसे ही पूछा तो उसने कहा,‘हां, कल हो गई, देखते नहीं, यह रेशम के फूलों वाला सालू?’ यह सुनते ही लहना सिंह को दुख हुआ। क्रोध हुआ। क्यों हुआ?
वजीरा सिंह पानी पिला दे।’
पच्चीस वर्ष बीत गए। अब लहना सिंह नंबर 77 राइफ़ल्स में जमादार हो गया है। उस आठ वर्ष की कन्या का ध्यान ही न रहा, न मालूम वह कभी मिली थी या नहीं। सात दिन की छुट्टी लेकर ज़मीन के मुक़दमे की पैरवी करने वह घर गया। वहां रेजीमेंट के अफ़सर की चिट्ठी मिली। फ़ौरन चले आओ। साथ ही सूबेदार हजारा सिंह की चिट्ठी मिली कि मैं और बोधा सिंह भी लाम पर जाते हैं, लौटते हुए हमारे घर होते आना। साथ चलेंगे।
सूबेदार का घर रास्ते में पड़ता था और सूबेदार उसे बहुत चाहता था। लहना सिंह सूबेदार के यहां पहुंचा। जब चलने लगे तब सूबेदार बेडे़ में निकल कर आया। बोला,‘लहना सिंह, सूबेदारनी तुमको जानती है। बुलाती है। जा मिल आ।’  
लहना सिंह भीतर पहुंचा। ‘सूबेदारनी मुझे जानती है? कब से? रेजीमेंट के क्वॉर्टरों में तो कभी सूबेदार के घर के लोग रहे नहीं।’ दरवाज़े पर जाकर ‘मत्था टेकना’ कहा। असीस सुनी। लहनासिंह चुप‍।  
मुझे पहचाना?’
नहीं।’  
‘...तेरी कुड़माई हो गई? ...धत् ...कल हो गई ...देखते नहीं, रेशमी बूटों वाला सालू ...अमृतसर में!’
भावों की टकराहट से मूर्च्छा खुली। करवट बदली। पसली का घाव बह निकला।
वजीरा सिंह, पानी पिला,’ उसने कहा था।
स्वप्न चल रहा है। सूबेदारनी कह रही है,‘मैंने तेरे को आते ही पहचान लिया। एक काम कहती हूं। मेरे तो भाग फूट गए। सरकार ने बहादुरी का ख़िताब दिया है, लायलपुर में ज़मीन दी है, आज नमक हलाली का मौक़ा आया है। पर सरकार ने हम तीमियों की एक घघरिया पलटन क्यों न बना दी, जो मैं भी सूबेदारजी के साथ चली जाती? एक बेटा है। फ़ौज में भरती हुए उसे एक ही वर्ष हुआ। उसके पीछे चार और हुए, पर एक भी नही जिया।’
सूबेदारनी रोने लगी,‘अब दोनों जाते हैं। मेरे भाग! तुम्हें याद है, एक दिन तांगे वाले का घोड़ा दहीवाले की दुकान के पास बिगड़ गया था। तुमने उस दिन मेरे प्राण बचाए थे। आप घोड़ों की लातों पर चले गए थे और मुझे उठाकर दुकान के तख़्त के पास खड़ा कर दिया था। ऐसे ही इन दोनों को बचाना। यह मेरी भिक्षा है। तुम्हारे आगे मैं आंचल पसारती हूं।’
रोती-रोती सूबेदारनी ओबरी में चली गई। लहना सिंह भी आंसू पोंछता हुआ बाहर आया।  
वजीरा सिंह, पानी पिला,’ उसने कहा था।
लहना का सिर अपनी गोद में रखे वजीरा सिंह बैठा है। जब मांगता है, तब पानी पिला देता है। आधे घंटे तक लहना फिर चुप रहा, फिर बोला,‘कौन? कीरतसिंह?’
वजीरा ने कुछ समझकर कहा,‘हां।’  
भइया, मुझे और ऊंचा कर ले। अपने पट्ट पर मेरा सिर रख ले।’
वजीरा ने वैसा ही किया।  
हां, अब ठीक है। पानी पिला दे बस। अब के हाड़ में यह आम ख़ूब फलेगा। चाचा-भतीजा दोनों यहीं बैठकर आम खाना। जितना बड़ा तेरा भतीजा है उतना ही बड़ा यह आम, जिस महीने उसका जन्म हुआ था उसी महीने मैंने इसे लगाया था।’  
वजीरा सिंह के आंसू टप-टप टपक रहे थे। कुछ दिन पीछे लोगों ने अख़बारों में पढ़ा...
फ्रांस और बेल्जियम, 67वीं सूची, मैदान में घावों से मरा नंबर 77 सिख राइफ़ल्स जमादार लहना सिंह।

 

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आदिकाल की समय सीमा के संबंध में विभिन्न विद्वानों के मतों की समीक्षा कीजिए। साहित्य के इतिहास में 'आदिकाल' की काल-सीमा का निर्धारण ...