आदिकाल की समय सीमा के संबंध में विभिन्न विद्वानों के मतों की समीक्षा कीजिए।
साहित्य के इतिहास में 'आदिकाल' की काल-सीमा का निर्धारण एक अत्यंत जटिल और विवादास्पद विषय रहा है। विभिन्न विद्वानों ने भाषाई भाषाई प्रवृत्तियों, ऐतिहासिक साक्ष्यों और रचनाओं की उपलब्धता के आधार पर अलग-अलग समय सीमाएं सुझाई हैं।
आदिकाल की समय सीमा: विभिन्न विद्वानों के मत
हिंदी साहित्य का आरंभ कब से माना जाए, इस पर विद्वानों में एकमत का अभाव है। मुख्य मतभेद इस बात पर है कि 'अपभ्रंश' को हिंदी में शामिल किया जाए या नहीं।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मत
शुक्ल जी ने आदिकाल (वीरगाथा काल) की सीमा संवत 1050 से 1375 (993 ई. से 1318 ई.) तक मानी है। उनका तर्क है कि महाराजा भोज के समय से लेकर हम्मीरदेव के समय के कुछ पीछे तक हिंदी साहित्य का आविर्भाव हो चुका था। उन्होंने 'मुंज' और 'भोज' के समय से पुरानी हिंदी के प्रयोग को आधार माना है।
डॉ. रामकुमार वर्मा का मत
डॉ. वर्मा ने इस काल को 'संधिकाल' और 'चारणकाल' में विभाजित किया। उन्होंने इसकी शुरुआत संवत 750 (693 ई.) से मानी। वे अपभ्रंश की रचनाओं को भी हिंदी में शामिल करते हैं, जिसके कारण उनके द्वारा निर्धारित सीमा बहुत पीछे चली जाती है।
राहुल सांकृत्यायन का मत
राहुल जी ने सिद्ध साहित्य को हिंदी का प्रारंभिक रूप मानते हुए इसकी शुरुआत 760 ई. से स्वीकार की। उन्होंने 'सरहपा' (8वीं शताब्दी) को हिंदी का प्रथम कवि माना। भाषाई दृष्टि से यह मत महत्वपूर्ण है क्योंकि यहीं से अपभ्रंश से हिंदी की ओर झुकाव दिखने लगता है।
डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी का मत
द्विवेदी जी के अनुसार, 10वीं शताब्दी से पहले का साहित्य शुद्ध अपभ्रंश का है। अतः वे आदिकाल का वास्तविक प्रारंभ 1000 ई. से मानते हैं और इसकी समाप्ति 1400 ई. (14वीं शताब्दी के अंत) तक स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार, विद्यापति और अमीर खुसरो की रचनाएं इस काल की अंतिम सीमा को दर्शाती हैं।
3. विवाद के मुख्य कारण
अपभ्रंश और पुरानी हिंदी का द्वंद्व: अधिकांश विद्वान अपभ्रंश की अंतिम अवस्था को हिंदी का प्रारंभ मानते हैं। जहाँ शुक्ल जी 10वीं सदी को आधार बनाते हैं, वहीं सांकृत्यायन जी 8वीं सदी को।
रचनाओं की प्रामाणिकता: 'पृथ्वीराज रासो' और 'बीसलदेव रासो' जैसी रचनाओं के समय को लेकर ऐतिहासिक मतभेद हैं।
नामकरण: काल-सीमा का सीधा संबंध नामकरण से भी है (जैसे- वीरगाथा काल बनाम सिद्ध-सामंत काल)।
निष्कर्ष
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि आदिकाल की प्रारंभिक सीमा के संबंध में आचार्य शुक्ल का मत (993 ई.) और अंतिम सीमा के संबंध में डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी का मत (1400 ई.) सर्वाधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है।
अतः सामान्यतः 1000 ईस्वी से 1400 ईस्वी तक के समय को 'आदिकाल' की सर्वमान्य समय सीमा के रूप में स्वीकार किया जाता है, क्योंकि इस दौरान हिंदी अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने की प्रक्रिया में थी।