सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

बिहारी की काव्य भाषा पर प्रकाश डालें

 बिहारी की काव्य भाषा पर प्रकाश डालें

बिहारी की काव्य-भाषा हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट पहचान रखती है। उनकी भाषा रीतिकालीन काव्य-परंपरा के अनुरूप होते हुए भी अत्यंत प्रभावशाली, संक्षिप्त और अलंकारिक है। भाषा ही उनके काव्य की आत्मा है। बिहारी की काव्य-भाषा के प्रमुख पक्ष निम्नलिखित हैं—

1. ब्रजभाषा का प्रयोग

बिहारी की काव्य-भाषा ब्रजभाषा है, जो उस काल की प्रमुख साहित्यिक भाषा थी। ब्रजभाषा की कोमलता, माधुर्य और भावप्रवणता उनके दोहों में पूर्णतः विद्यमान है।

श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए ब्रजभाषा अत्यंत उपयुक्त सिद्ध हुई है।

2. संक्षिप्त और सटीक भाषा

बिहारी की भाषा अत्यंत संक्षिप्त, सटीक और अर्थगर्भित है। वे एक-एक शब्द को सोच-समझकर प्रयोग करते हैं।

उनके दोहों में कोई भी शब्द अनावश्यक नहीं लगता। भाषा में कसाव और गहराई स्पष्ट दिखाई देती है।

3. तत्सम, तद्भव और देशज शब्दों का संतुलन

बिहारी की भाषा में

तत्सम शब्दों की गरिमा

तद्भव शब्दों की सरलता

देशज शब्दों की आत्मीयता

तीनों का सुंदर संतुलन मिलता है।

इससे भाषा न तो अत्यधिक क्लिष्ट बनती है और न ही अत्यधिक साधारण।

4. अलंकारिक भाषा

बिहारी की भाषा अत्यंत अलंकारिक है। शब्दों के माध्यम से वे चित्र खींच देते हैं।

श्लेष, उपमा और रूपक का प्रयोग भाषा को बहुअर्थी और चमत्कारपूर्ण बना देता है।

एक ही शब्द से वे कई अर्थों की सृष्टि कर देते हैं।

5. लाक्षणिक और व्यंजक भाषा

बिहारी की भाषा में लक्षणा और व्यंजना शक्ति का उत्कृष्ट प्रयोग हुआ है।

अर्थ सीधे न कहकर संकेतों और प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त किए जाते हैं, जिससे पाठक को विचार और कल्पना की स्वतंत्रता मिलती है।

6. भावानुकूल शब्द-चयन

बिहारी का शब्द-चयन भावों के अनुरूप होता है।

श्रृंगार के प्रसंगों में कोमल, मधुर और सरस शब्दों का प्रयोग मिलता है, जबकि नीति संबंधी दोहों में भाषा गंभीर और प्रभावपूर्ण हो जाती है।

7. चित्रात्मकता

उनकी भाषा में चित्रात्मकता अत्यंत प्रबल है। पाठक के मन में दृश्य सजीव हो उठते हैं।

नेत्रों, भौंहों, अधरों, चंद्रमा, दीपक आदि के वर्णन में भाषा दृश्य-रचना का कार्य करती है।

8. छंदानुकूल भाषा

बिहारी ने दोहा छंद का प्रयोग किया है। उनकी भाषा दोहा छंद के अनुशासन में बँधी होने के बावजूद प्रवाहपूर्ण है। कहीं भी कृत्रिमता नहीं लगती।

निष्कर्ष

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि बिहारी की काव्य-भाषा उनकी काव्य-सफलता का मूल आधार है। ब्रजभाषा की माधुर्यपूर्ण अभिव्यक्ति, संक्षिप्तता, अलंकारिकता और व्यंजक शक्ति ने उनके काव्य को कालजयी बना दिया है। यही कारण है कि बिहारी की भाषा आज भी पाठकों को आकर्षित करती है और हिंदी साहित्य में उनका स्थान अटल है।

बिहारी की काव्यगत विशेषताओं का वर्णन

 बिहारी की काव्यगत विशेषताओं का वर्णन

रीतिकालीन हिंदी काव्यधारा में बिहारीलाल का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। वे रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं। उनकी एकमात्र प्रसिद्ध रचना ‘बिहारी सतसई’ है, जिसमें लगभग 700 दोहे संकलित हैं। सीमित काव्य-रचना के बावजूद बिहारी ने हिंदी साहित्य को जो ऊँचाई दी, वह उन्हें अमर कवियों की श्रेणी में स्थापित करती है। बिहारी की काव्यगत विशेषताओं को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है—

1. श्रृंगार रस की प्रधानता

बिहारी के काव्य में श्रृंगार रस का प्रमुख स्थान है। विशेष रूप से संयोग श्रृंगार का चित्रण अत्यंत सशक्त है। नायक-नायिका के प्रेम, सौंदर्य, हाव-भाव, नेत्रों की चपलता, मुस्कान, लज्जा आदि का अत्यंत सूक्ष्म और मनोवैज्ञानिक चित्रण बिहारी ने किया है।

उनका श्रृंगार कहीं भी अश्लील नहीं बनता, बल्कि शिष्ट और कलात्मक रूप में सामने आता है।

2. संक्षिप्तता में गहनता

बिहारी की सबसे बड़ी विशेषता है—कम शब्दों में अधिक अर्थ कहना। उनके दोहे छोटे होते हुए भी अर्थ की दृष्टि से अत्यंत गूढ़ हैं। प्रत्येक दोहे में भाव, अलंकार और रस का अद्भुत समन्वय मिलता है।

इसी कारण कहा गया है—

“गागर में सागर भरना”—यह उक्ति बिहारी पर पूर्णतः लागू होती है।

3. अलंकारों का प्रचुर प्रयोग

बिहारी के काव्य में अलंकारों का अत्यंत सशक्त और स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। विशेष रूप से—

उपमा

रूपक

उत्प्रेक्षा

श्लेष

विरोधाभास

का प्रयोग अत्यंत कुशलता से हुआ है।

उनके अलंकार काव्य को बोझिल नहीं बनाते, बल्कि सौंदर्य में वृद्धि करते हैं।

4. नायिका-भेद का सजीव चित्रण

बिहारी ने रीतिकालीन परंपरा के अनुसार नायिका-भेद का अत्यंत प्रभावी चित्रण किया है।

स्वकीया, परकीया, मुग्धा, प्रौढ़ा, खंडिता, अभिसारिका आदि नायिकाओं के विविध मनोभाव उनके दोहों में सजीव हो उठते हैं।

नायिका के मनोवैज्ञानिक पक्ष को पकड़ने में बिहारी अद्वितीय हैं।

5. प्रकृति-चित्रण

यद्यपि बिहारी का मुख्य विषय श्रृंगार है, फिर भी उनके काव्य में प्रकृति का सौंदर्यपूर्ण चित्रण मिलता है। प्रकृति को वे नायक-नायिका के भावों के अनुकूल प्रस्तुत करते हैं।

चाँदनी रात, बसंत ऋतु, सरोवर, कमल, कोयल आदि प्राकृतिक उपादान भाव-वृद्धि का कार्य करते हैं।

6. नीति और जीवन-बोध

बिहारी केवल श्रृंगार के कवि नहीं हैं। उनके अनेक दोहों में नीति, व्यवहारिक जीवन-दर्शन और नैतिक उपदेश भी मिलते हैं।

उन्होंने मानव स्वभाव, लोभ, अहंकार, प्रेम और व्यवहारिक बुद्धि को बड़ी सूक्ष्मता से व्यक्त किया है।

7. रस-सिद्ध कवि

बिहारी रस-सिद्ध कवि हैं। उनके दोहों में रस निष्पत्ति अत्यंत प्रभावशाली ढंग से होती है। श्रृंगार के साथ-साथ शांत और नीति रस का भी समावेश मिलता है।

8. संगीतात्मकता और लय

बिहारी के दोहे छंद, लय और ताल की दृष्टि से अत्यंत मधुर हैं। पाठ करते समय उनमें स्वाभाविक संगीतात्मकता अनुभव होती है।

निष्कर्ष

इस प्रकार कहा जा सकता है कि बिहारी रीतिकाल के ऐसे कवि हैं, जिन्होंने सीमित रचना में भी असीम काव्य-वैभव प्रस्तुत किया। उनकी काव्यगत विशेषताएँ—संक्षिप्तता, श्रृंगार-प्रधानता, अलंकार-सौंदर्य और मनोवैज्ञानिक गहराई—उन्हें हिंदी साहित्य में अद्वितीय स्थान प्रदान करती हैं।

तुलसीदास के काव्य में भाव पक्ष और शैली पक्ष का वर्णन कीजिए

 तुलसीदास के काव्य में भाव पक्ष और शैली पक्ष का वर्णन कीजिए।

गोस्वामी तुलसीदास का काव्य हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। उनके काव्य की महानता का आधार उनका सशक्त भाव पक्ष और सरल, प्रभावशाली शैली पक्ष है। भाव और शैली का ऐसा संतुलित और लोकग्राह्य रूप हिंदी साहित्य में विरल है। तुलसीदास ने अपने काव्य के माध्यम से भक्ति, प्रेम, करुणा, आदर्श और लोकमंगल को कलात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की है।

(क) तुलसीदास के काव्य का भाव पक्ष

1. भक्ति भावना

तुलसीदास के काव्य का मूल भाव भक्ति है। उनकी भक्ति राम के प्रति अनन्य और निष्काम है। रामचरितमानस, विनय पत्रिका और गीतावली में भक्ति विविध रूपों में प्रकट होती है—दास्य, वात्सल्य और सख्य भाव। यह भक्ति भावना हृदय को स्पर्श करने वाली है।

2. करुणा और प्रेम

तुलसीदास के काव्य में करुणा का अत्यंत मार्मिक रूप देखने को मिलता है। सीता हरण, वनवास, भरत की विरह-व्यथा और राम-सीता मिलन जैसे प्रसंग पाठक के हृदय को द्रवित कर देते हैं। प्रेम यहाँ केवल दांपत्य तक सीमित नहीं, बल्कि मानवीय करुणा का व्यापक रूप है।

3. आदर्शवाद

तुलसीदास का काव्य आदर्शों का काव्य है। राम आदर्श पुत्र, पति, भाई और राजा हैं; सीता आदर्श नारी हैं; भरत त्याग और भ्रातृ प्रेम के प्रतीक हैं। ये आदर्श समाज को नैतिक दिशा प्रदान करते हैं।

4. लोकमंगल और सामाजिक चेतना

तुलसीदास का भाव पक्ष लोकमंगल से जुड़ा हुआ है। वे समाज में व्याप्त कुरीतियों, अहंकार और अधर्म का विरोध करते हैं तथा सदाचार, सत्य और धर्म का समर्थन करते हैं।

(ख) तुलसीदास के काव्य का शैली पक्ष

1. भाषा शैली

तुलसीदास ने अवधी और ब्रजभाषा को काव्य की भाषा बनाया। उनकी भाषा सरल, मधुर और भावानुकूल है। जनसाधारण भी उनके काव्य को सहज ही समझ सकता है। यही उनकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण है।

2. वर्णन शैली

उनकी वर्णन शैली अत्यंत सजीव और चित्रात्मक है। वन, नगर, युद्ध, सभा और प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन आँखों के सामने सजीव हो उठता है।

3. संवाद शैली

रामचरितमानस में संवाद शैली अत्यंत प्रभावशाली है। पात्रों के संवाद उनके चरित्र और भावनाओं को स्पष्ट करते हैं। राम-भरत संवाद इसका श्रेष्ठ उदाहरण है।

4. अलंकार और छंद

तुलसीदास के काव्य में उपमा, रूपक, अनुप्रास जैसे अलंकार सहज रूप से प्रयुक्त हुए हैं। दोहा, चौपाई, सोरठा और छप्पय छंदों का सुंदर प्रयोग उनकी शैली को संगीतात्मक बनाता है।

5. सरलता और प्रवाह

तुलसीदास की शैली की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सरलता और प्रवाह है। भाव और भाषा में कोई कृत्रिमता नहीं दिखाई देती। यही कारण है कि उनका काव्य सदियों बाद भी उतना ही प्रभावी है।


निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि तुलसीदास के काव्य में भाव पक्ष और शैली पक्ष का अद्भुत समन्वय है। उनके भाव गहरे, लोकमंगलकारी और मानवीय हैं, जबकि उनकी शैली सरल, सरस और प्रभावशाली है। यही कारण है कि तुलसीदास हिंदी साहित्य के अमर कवि हैं और उनका काव्य आज भी जन-जन के हृदय में जीवित है।

तुलसीदास की भक्ति-भावना पर प्रकाश डालिए।

 तुलसीदास की भक्ति-भावना पर प्रकाश डालिए।

गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य के भक्ति काल के सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक प्रभावशाली कवि माने जाते हैं। उनकी भक्ति भावना केवल व्यक्तिगत आस्था तक सीमित न होकर लोकमंगल, सामाजिक समरसता और नैतिक आदर्शों से गहराई से जुड़ी हुई है। तुलसीदास की भक्ति रामभक्ति है, जो सगुण, साकार और मर्यादित रूप में प्रकट होती है। उन्होंने भगवान राम को केवल ईश्वर ही नहीं, बल्कि आदर्श मनुष्य, आदर्श राजा, पुत्र, पति और मित्र के रूप में प्रस्तुत किया है। उनकी भक्ति भावना में दास्य, वात्सल्य और सख्य भाव का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।

(क) सगुण भक्ति की प्रधानता

तुलसीदास सगुण भक्ति के प्रमुख कवि हैं। वे निर्गुण निराकार ब्रह्म की अपेक्षा साकार, गुणयुक्त ईश्वर की उपासना को अधिक महत्व देते हैं। उनके लिए राम सगुण, साकार और करुणा के सागर हैं। रामचरितमानस में राम को “रघुकुल रीति सदा चली आई” जैसे आदर्श वाक्यों के माध्यम से मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रस्तुत किया गया है। तुलसीदास की भक्ति भावना लोक के लिए सरल और ग्राह्य है, क्योंकि साकार राम से सामान्य जन आत्मीय संबंध स्थापित कर सकता है।

(ख) दास्य भाव की प्रधानता

तुलसीदास की भक्ति का मूल स्वर दास्य भाव है। वे स्वयं को राम का दास मानते हैं और इसी भाव से उनकी उपासना करते हैं। उनके अनुसार भक्त और भगवान का संबंध स्वामी-सेवक का है। विनय पत्रिका में तुलसीदास की दास्य भक्ति अत्यंत मार्मिक रूप में व्यक्त हुई है। वे अपने पापों, दुर्बलताओं और अज्ञान को स्वीकार करते हुए प्रभु राम से कृपा की याचना करते हैं। यह विनय और आत्मसमर्पण उनकी भक्ति भावना की विशेषता है।

(ग) प्रेम और करुणा पर आधारित भक्ति

तुलसीदास की भक्ति भय या कर्मकांड पर आधारित नहीं है, बल्कि प्रेम और करुणा पर आधारित है। उनके राम करुणामय हैं, जो दीन-दुखियों पर सहज ही कृपा करते हैं। शबरी, केवट, निषादराज और अहल्या जैसे पात्रों के माध्यम से तुलसीदास यह स्पष्ट करते हैं कि प्रभु की भक्ति में जाति, कुल या विद्या का कोई महत्व नहीं, बल्कि निष्कलुष प्रेम ही सबसे बड़ा साधन है।

(घ) लोकमंगल की भावना

तुलसीदास की भक्ति भावना का प्रमुख लक्ष्य लोकमंगल है। वे भक्ति को केवल मोक्ष का साधन नहीं मानते, बल्कि समाज सुधार का माध्यम भी मानते हैं। रामचरितमानस में आदर्श शासन, पारिवारिक मर्यादा, सामाजिक कर्तव्य और नैतिक मूल्यों का सुंदर चित्रण है। उनके राम ‘राजा’ होकर भी लोककल्याण को सर्वोपरि रखते हैं। इस प्रकार तुलसीदास की भक्ति भावना समाज को दिशा देने वाली है।

(ङ) वैराग्य और संसार-दृष्टि

यद्यपि तुलसीदास गृहस्थ जीवन और सामाजिक कर्तव्यों को महत्व देते हैं, फिर भी उनकी भक्ति भावना में वैराग्य का तत्व भी विद्यमान है। वे संसार को नश्वर और मायामय मानते हैं तथा ईश्वर भक्ति को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य बताते हैं। किंतु उनका वैराग्य पलायनवादी नहीं है, बल्कि कर्तव्य के साथ जुड़ा हुआ है।

(च) शरणागति और आत्मसमर्पण

तुलसीदास की भक्ति का चरम रूप शरणागति है। वे राम को ही एकमात्र आश्रय मानते हैं। भक्त का कर्तव्य है कि वह पूर्ण विश्वास के साथ प्रभु की शरण में जाए। यह शरणागति भाव तुलसीदास की भक्ति भावना को अत्यंत ऊँचाई प्रदान करता है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि तुलसीदास की भक्ति भावना सरल, सहज, लोकमंगलकारी और प्रेममयी है। उनकी रामभक्ति ने हिंदी साहित्य ही नहीं, बल्कि भारतीय जनमानस को भी गहराई से प्रभावित किया है। तुलसीदास की भक्ति भावना आज भी जीवन मूल्यों, नैतिकता और मानवीय संवेदनाओं का सशक्त स्रोत बनी हुई है।

कबीर की सामाजिक / क्रांतिकारी चेतना पर प्रकाश डालिए

 कबीर की सामाजिक / क्रांतिकारी चेतना पर प्रकाश डालिए

कबीरदास केवल भक्त कवि ही नहीं, बल्कि एक महान समाज सुधारक और क्रांतिकारी चेतना के वाहक भी थे। उनका युग सामाजिक, धार्मिक और नैतिक विकृतियों से ग्रस्त था। समाज में जातिवाद, छुआछूत, धर्मांधता, पाखंड और शोषण व्याप्त था। कबीर ने इन सभी बुराइयों पर निर्भीक प्रहार किया।

कबीर की सामाजिक चेतना का सबसे प्रमुख पक्ष है—जाति व्यवस्था का विरोध। वे जन्म के आधार पर ऊँच-नीच को अस्वीकार करते हैं। उनके अनुसार सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान हैं।

“एक बूंद एक मलमूत्रा, एक चाम एक गात।

इस पंक्ति में कबीर सामाजिक समानता का सशक्त संदेश देते हैं।

कबीर ने धार्मिक पाखंड और कर्मकांड का तीव्र विरोध किया। उन्होंने हिंदू और मुस्लिम—दोनों धर्मों के बाहरी आडंबरों पर कटाक्ष किया। मंदिर-मस्जिद, मूर्ति-पूजा, रोज़ा-नमाज़ को उन्होंने ईश्वर प्राप्ति का मार्ग नहीं माना।

“पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहाड़।”

कबीर की क्रांतिकारी चेतना का एक महत्वपूर्ण पक्ष है—धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण। वे न तो स्वयं को हिंदू मानते हैं और न मुस्लिम। वे कहते हैं—

ना हम हिंदू, ना मुसलमान।

यह कथन उस युग में अत्यंत साहसिक और क्रांतिकारी था।

कबीर ने समाज में व्याप्त नारी अपमान और पारिवारिक विकृतियों पर भी प्रहार किया। वे नारी को भोग की वस्तु मानने वाली मानसिकता का विरोध करते हैं और संयमित जीवन पर बल देते हैं। साथ ही वे मानव के आंतरिक दोषों—काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार—को समाज के पतन का कारण मानते हैं।

कबीर की सामाजिक चेतना उनकी भाषा और शैली में भी दिखाई देती है। उन्होंने लोकभाषा में अपनी बात कही, जिससे सामान्य जन भी उनके विचारों को समझ सके। उनकी वाणी में व्यंग्य, कटाक्ष और तीखापन है, जो समाज को झकझोर देता है।

कबीर की क्रांतिकारी चेतना केवल आलोचना तक सीमित नहीं है, बल्कि वे नवीन समाज की कल्पना भी करते हैं—ऐसा समाज जो समानता, प्रेम, सत्य और मानवता पर आधारित हो। वे कहते हैं—

“साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय।

यह सामाजिक संतुलन और नैतिक जीवन का आदर्श प्रस्तुत करता है।

इस प्रकार कबीर की सामाजिक और क्रांतिकारी चेतना उन्हें केवल कवि नहीं, बल्कि युगद्रष्टा और समाज सुधारक सिद्ध करती है। उनके विचार आज भी सामाजिक न्याय और मानवता के लिए प्रेरणास्रोत हैं।

कबीर की भक्ति भावना पर प्रकाश डालिए।

 कबीर की भक्ति भावना पर प्रकाश डालिए।

कबीरदास हिंदी साहित्य के ऐसे महान संत कवि हैं जिनकी भक्ति भावना भारतीय भक्ति आंदोलन में एक विशिष्ट स्थान रखती है। उनकी भक्ति न तो कर्मकांड प्रधान है और न ही बाह्य आडंबरों से जुड़ी हुई। कबीर की भक्ति मूलतः निर्गुण, निराकार, निरंजन ब्रह्म की उपासना है। वे ईश्वर को किसी मूर्ति, मंदिर, मस्जिद या धर्मग्रंथ तक सीमित नहीं मानते, बल्कि उसे मनुष्य के अंतरात्मा में निवास करने वाला सत्य मानते हैं।

कबीर की भक्ति भावना का मूल आधार ज्ञान, प्रेम और अनुभव है। उन्होंने गुरु को ईश्वर से भी बड़ा माना है, क्योंकि गुरु ही शिष्य को ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाता है। कबीर कहते हैं—

“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।

बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय।”

इस दोहे से स्पष्ट है कि कबीर की भक्ति में गुरु का स्थान सर्वोपरि है।

कबीर की भक्ति भावना में राम का विशेष महत्व है, परंतु उनका राम दशरथ पुत्र नहीं, बल्कि सर्वव्यापक ब्रह्म है। कबीर का राम निर्गुण है—जिसका कोई रूप, रंग, आकार नहीं। वे कहते हैं—

दशरथ सुत तिहुं लोक बखाना, राम नाम को मरम न जाना।

यहाँ कबीर स्पष्ट करते हैं कि वे सगुण राम की नहीं, बल्कि निर्गुण राम की भक्ति करते हैं।

कबीर की भक्ति में प्रेम तत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार ईश्वर को तर्क या शास्त्रज्ञान से नहीं, बल्कि प्रेम से पाया जा सकता है। वे कहते हैं—

प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो न समाय।”

अर्थात ईश्वर की प्राप्ति के मार्ग में अहंकार के लिए कोई स्थान नहीं है।

कबीर की भक्ति भावना में समर्पण और वैराग्य भी दिखाई देता है। संसार की नश्वरता को समझकर वे ईश्वर की शरण में जाने का संदेश देते हैं। वे मानते हैं कि सांसारिक मोह-माया मनुष्य को ईश्वर से दूर करती है।

“माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।

कबीर की भक्ति भावना सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने भक्ति को केवल व्यक्तिगत साधना न मानकर, समाज सुधार का माध्यम बनाया। उनकी भक्ति सर्वजन हिताय है, जिसमें जाति, वर्ग, धर्म का कोई भेद नहीं। वे कहते हैं—

“जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।

इस प्रकार कबीर की भक्ति भावना सरल, सहज, निर्गुण, प्रेममय और अनुभवजन्य है। उनकी भक्ति आडंबरों का विरोध करती है और मनुष्य को आत्मज्ञान तथा मानवता की ओर प्रेरित करती है। यही कारण है कि कबीर की भक्ति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उनके समय में थी।

आधुनिक कवि - संक्षिप्त प्रश्न - उत्तर

 भारतेंदु हरिश्चंद्र

37. जन्म और मृत्यु

→ जन्म – 1850 ई., वाराणसी

→ मृत्यु – 1885 ई.

38. नाटक/रचनाएँ

→ अंधेर नगरी, भारत दुर्दशा, सत्य हरिश्चंद्र, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति

39. संपादित पत्रिकाएँ

→ कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र चंद्रिका, हरिश्चंद्र मैगजीन

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

40. जन्म और मृत्यु

→ जन्म – 1896 ई., महिषादल (बंगाल)

→ मृत्यु – 1961 ई.

41. बचपन का नाम

→ सूर्यकांत

42. काव्य संग्रह (वर्ष सहित)

अनामिका – 1923

परिमल – 1930

गीतिका – 1936

तुलसीदास – 1938

43. पहली रचना

→ जन्मभूमि

44. एक प्रगतिवादी रचना

→ राम की शक्ति पूजा

45. काव्य धारा

→ छायावाद

प्रयोगवाद / अज्ञेय

46. प्रयोगवाद का जनक

→ अज्ञेय

47. ‘तार सप्तक’ का प्रकाशन वर्ष

→ 1943 ई.

48. ‘दूसरा सप्तक’ का प्रकाशन वर्ष

→ 1951 ई.

49. अज्ञेय का जन्म और मृत्यु

→ जन्म – 1911 ई.

→ मृत्यु – 1987 ई.

50. अज्ञेय की प्रमुख रचनाएँ (वर्ष सहित)

शेखर: एक जीवनी – 1941

नदी के द्वीप – 1952

हरी घास पर क्षण भर – 1949

51. संपादित पत्रिकाएँ

→ प्रतीक (1947), दिनमान (1965)

52. प्रमुख पुरस्कार

→ ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार

रघुवीर सहाय

53. जन्म और मृत्यु

→ जन्म – 1929 ई.

→ मृत्यु – 1990 ई.

54. रचनाएँ (वर्ष सहित)

लोग भूल गए हैं – 1962

सीढ़ियों पर धूप में – 1970

55. काव्य धारा

→ नई कविता / प्रगतिवाद

घनानंद - संक्षिप्त प्रश्न - उत्तर

 घनानंद से संबंधित प्रश्न

31. घनानंद के माता-पिता और गुरु

→ माता-पिता – ज्ञात नहीं

→ गुरु – देव

32. घनानंद की रचनाएँ

→ सुजानहित, वियोग शतक, प्रेम सुधा, रसखंड

33. घनानंद की प्रेमिका का नाम

→ सुजान

34. घनानंद किस राजा के दरबारी कवि थे?

→ निजामशाह

35. घनानंद की मृत्यु कब हुई?

→ सन् 1760 ई.

36. घनानंद का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

→ सन् 1689 ई., दिल्ली

बिहारी - संक्षिप्त प्रश्न - उत्तर

 बिहारी से संबंधित प्रश्न

24. बिहारी का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

→ सन् 1595 ई., ग्वालियर

25. बिहारी के माता-पिता और गुरु

→ माता-पिता – ज्ञात नहीं

→ गुरु – केशवदास

26. बिहारी की रचना का नाम

→ बिहारी सतसई

27. बिहारी सतसई में दोहों की संख्या

→ 713 दोहे

28. सतसई का अर्थ

→ सात सौ दोहों का संग्रह

29. बिहारी किस राजा के दरबारी कवि थे?

→ राजा जयसिंह (आमेर)

30. बिहारी की मृत्यु कब हुई?

→ सन् 1663 ई.

तुलसीदास- संक्षिप्त प्रश्न - उत्तर

 14. तुलसीदास का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

→ सन् 1532 ई. (संवत 1589) में राजापुर (जिला बाँदा, उत्तर प्रदेश) में।

15. तुलसीदास के माता-पिता का नाम क्या था?

→ पिता – आत्माराम दुबे

→ माता – हुलसी देवी

16. तुलसीदास के गुरु का नाम क्या था?

→ नरहरिदास

17. तुलसीदास के बचपन का नाम क्या था?

→ रामबोला

18. तुलसीदास की पत्नी का नाम क्या था?

→ रत्नावली

19. तुलसीदास की कृतियाँ (प्रकाशन वर्ष सहित)

रामचरितमानस – 1574 ई.

विनय पत्रिका – 1582 ई.

कवितावली – 1582 ई.

गीतावली – 1583 ई.

दोहावली – 1583 ई.

20. ब्रज भाषा में रचनाएँ

→ कवितावली, गीतावली

21. अवधी भाषा में रचनाएँ

→ रामचरितमानस

22. तुलसीदास की मृत्यु कब और कहाँ हुई?

→ सन् 1623 ई., वाराणसी (काशी)

23. तुलसीदास पर लिखी गई आलोचनात्मक पुस्तकें

तुलसीदास – रामचंद्र शुक्ल

तुलसीदास का काव्य – हजारीप्रसाद द्विवेदी

बिहारी की काव्य भाषा पर प्रकाश डालें

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