सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

बिहारी की काव्य भाषा पर प्रकाश डालें

 बिहारी की काव्य भाषा पर प्रकाश डालें

बिहारी की काव्य-भाषा हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट पहचान रखती है। उनकी भाषा रीतिकालीन काव्य-परंपरा के अनुरूप होते हुए भी अत्यंत प्रभावशाली, संक्षिप्त और अलंकारिक है। भाषा ही उनके काव्य की आत्मा है। बिहारी की काव्य-भाषा के प्रमुख पक्ष निम्नलिखित हैं—

1. ब्रजभाषा का प्रयोग

बिहारी की काव्य-भाषा ब्रजभाषा है, जो उस काल की प्रमुख साहित्यिक भाषा थी। ब्रजभाषा की कोमलता, माधुर्य और भावप्रवणता उनके दोहों में पूर्णतः विद्यमान है।

श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए ब्रजभाषा अत्यंत उपयुक्त सिद्ध हुई है।

2. संक्षिप्त और सटीक भाषा

बिहारी की भाषा अत्यंत संक्षिप्त, सटीक और अर्थगर्भित है। वे एक-एक शब्द को सोच-समझकर प्रयोग करते हैं।

उनके दोहों में कोई भी शब्द अनावश्यक नहीं लगता। भाषा में कसाव और गहराई स्पष्ट दिखाई देती है।

3. तत्सम, तद्भव और देशज शब्दों का संतुलन

बिहारी की भाषा में

तत्सम शब्दों की गरिमा

तद्भव शब्दों की सरलता

देशज शब्दों की आत्मीयता

तीनों का सुंदर संतुलन मिलता है।

इससे भाषा न तो अत्यधिक क्लिष्ट बनती है और न ही अत्यधिक साधारण।

4. अलंकारिक भाषा

बिहारी की भाषा अत्यंत अलंकारिक है। शब्दों के माध्यम से वे चित्र खींच देते हैं।

श्लेष, उपमा और रूपक का प्रयोग भाषा को बहुअर्थी और चमत्कारपूर्ण बना देता है।

एक ही शब्द से वे कई अर्थों की सृष्टि कर देते हैं।

5. लाक्षणिक और व्यंजक भाषा

बिहारी की भाषा में लक्षणा और व्यंजना शक्ति का उत्कृष्ट प्रयोग हुआ है।

अर्थ सीधे न कहकर संकेतों और प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त किए जाते हैं, जिससे पाठक को विचार और कल्पना की स्वतंत्रता मिलती है।

6. भावानुकूल शब्द-चयन

बिहारी का शब्द-चयन भावों के अनुरूप होता है।

श्रृंगार के प्रसंगों में कोमल, मधुर और सरस शब्दों का प्रयोग मिलता है, जबकि नीति संबंधी दोहों में भाषा गंभीर और प्रभावपूर्ण हो जाती है।

7. चित्रात्मकता

उनकी भाषा में चित्रात्मकता अत्यंत प्रबल है। पाठक के मन में दृश्य सजीव हो उठते हैं।

नेत्रों, भौंहों, अधरों, चंद्रमा, दीपक आदि के वर्णन में भाषा दृश्य-रचना का कार्य करती है।

8. छंदानुकूल भाषा

बिहारी ने दोहा छंद का प्रयोग किया है। उनकी भाषा दोहा छंद के अनुशासन में बँधी होने के बावजूद प्रवाहपूर्ण है। कहीं भी कृत्रिमता नहीं लगती।

निष्कर्ष

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि बिहारी की काव्य-भाषा उनकी काव्य-सफलता का मूल आधार है। ब्रजभाषा की माधुर्यपूर्ण अभिव्यक्ति, संक्षिप्तता, अलंकारिकता और व्यंजक शक्ति ने उनके काव्य को कालजयी बना दिया है। यही कारण है कि बिहारी की भाषा आज भी पाठकों को आकर्षित करती है और हिंदी साहित्य में उनका स्थान अटल है।

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