बिहारी की काव्यगत विशेषताओं का वर्णन
रीतिकालीन हिंदी काव्यधारा में बिहारीलाल का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। वे रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं। उनकी एकमात्र प्रसिद्ध रचना ‘बिहारी सतसई’ है, जिसमें लगभग 700 दोहे संकलित हैं। सीमित काव्य-रचना के बावजूद बिहारी ने हिंदी साहित्य को जो ऊँचाई दी, वह उन्हें अमर कवियों की श्रेणी में स्थापित करती है। बिहारी की काव्यगत विशेषताओं को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है—
1. श्रृंगार रस की प्रधानता
बिहारी के काव्य में श्रृंगार रस का प्रमुख स्थान है। विशेष रूप से संयोग श्रृंगार का चित्रण अत्यंत सशक्त है। नायक-नायिका के प्रेम, सौंदर्य, हाव-भाव, नेत्रों की चपलता, मुस्कान, लज्जा आदि का अत्यंत सूक्ष्म और मनोवैज्ञानिक चित्रण बिहारी ने किया है।
उनका श्रृंगार कहीं भी अश्लील नहीं बनता, बल्कि शिष्ट और कलात्मक रूप में सामने आता है।
2. संक्षिप्तता में गहनता
बिहारी की सबसे बड़ी विशेषता है—कम शब्दों में अधिक अर्थ कहना। उनके दोहे छोटे होते हुए भी अर्थ की दृष्टि से अत्यंत गूढ़ हैं। प्रत्येक दोहे में भाव, अलंकार और रस का अद्भुत समन्वय मिलता है।
इसी कारण कहा गया है—
“गागर में सागर भरना”—यह उक्ति बिहारी पर पूर्णतः लागू होती है।
3. अलंकारों का प्रचुर प्रयोग
बिहारी के काव्य में अलंकारों का अत्यंत सशक्त और स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। विशेष रूप से—
उपमा
रूपक
उत्प्रेक्षा
श्लेष
विरोधाभास
का प्रयोग अत्यंत कुशलता से हुआ है।
उनके अलंकार काव्य को बोझिल नहीं बनाते, बल्कि सौंदर्य में वृद्धि करते हैं।
4. नायिका-भेद का सजीव चित्रण
बिहारी ने रीतिकालीन परंपरा के अनुसार नायिका-भेद का अत्यंत प्रभावी चित्रण किया है।
स्वकीया, परकीया, मुग्धा, प्रौढ़ा, खंडिता, अभिसारिका आदि नायिकाओं के विविध मनोभाव उनके दोहों में सजीव हो उठते हैं।
नायिका के मनोवैज्ञानिक पक्ष को पकड़ने में बिहारी अद्वितीय हैं।
5. प्रकृति-चित्रण
यद्यपि बिहारी का मुख्य विषय श्रृंगार है, फिर भी उनके काव्य में प्रकृति का सौंदर्यपूर्ण चित्रण मिलता है। प्रकृति को वे नायक-नायिका के भावों के अनुकूल प्रस्तुत करते हैं।
चाँदनी रात, बसंत ऋतु, सरोवर, कमल, कोयल आदि प्राकृतिक उपादान भाव-वृद्धि का कार्य करते हैं।
6. नीति और जीवन-बोध
बिहारी केवल श्रृंगार के कवि नहीं हैं। उनके अनेक दोहों में नीति, व्यवहारिक जीवन-दर्शन और नैतिक उपदेश भी मिलते हैं।
उन्होंने मानव स्वभाव, लोभ, अहंकार, प्रेम और व्यवहारिक बुद्धि को बड़ी सूक्ष्मता से व्यक्त किया है।
7. रस-सिद्ध कवि
बिहारी रस-सिद्ध कवि हैं। उनके दोहों में रस निष्पत्ति अत्यंत प्रभावशाली ढंग से होती है। श्रृंगार के साथ-साथ शांत और नीति रस का भी समावेश मिलता है।
8. संगीतात्मकता और लय
बिहारी के दोहे छंद, लय और ताल की दृष्टि से अत्यंत मधुर हैं। पाठ करते समय उनमें स्वाभाविक संगीतात्मकता अनुभव होती है।
निष्कर्ष
इस प्रकार कहा जा सकता है कि बिहारी रीतिकाल के ऐसे कवि हैं, जिन्होंने सीमित रचना में भी असीम काव्य-वैभव प्रस्तुत किया। उनकी काव्यगत विशेषताएँ—संक्षिप्तता, श्रृंगार-प्रधानता, अलंकार-सौंदर्य और मनोवैज्ञानिक गहराई—उन्हें हिंदी साहित्य में अद्वितीय स्थान प्रदान करती हैं।
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