कहानी कला के आधार पर 'नमक का दरोगा' की समीक्षा
भूमिका:
मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित 'नमक का दरोगा' आदर्शोन्मुख यथार्थवाद का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह कहानी धन के ऊपर धर्म की, और असत्य के ऊपर सत्य की विजय का शंखनाद करती है। कहानी कला के प्रमुख छह तत्वों के आधार पर इसकी समीक्षा निम्नवत् है:
1. कथानक (
कहानी का कथानक अत्यंत सुगठित और रोचक है। यह मुंशी वंशीधर की ईमानदारी और पंडित अलोपीदीन के भ्रष्टाचार के बीच संघर्ष को दिखाता है।
वंशीधर का दरोगा बनना, रात के अंधेरे में नमक की गाड़ियाँ पकड़ना, अलोपीदीन की गिरफ्तारी, और अंततः वंशीधर की नौकरी का छूटना।
कहानी का अंत पाठक को चौंकाता है, जब भ्रष्ट अलोपीदीन, वंशीधर की ईमानदारी का कायल होकर उसे अपनी सारी जायदाद का मैनेजर नियुक्त कर देता है।
2. पात्र एवं चरित्र-चित्रण :
प्रेमचंद ने पात्रों के माध्यम से दो विपरीत विचारधाराओं को प्रस्तुत किया है:
मुंशी वंशीधर (नायक): वे एक कर्तव्यनिष्ठ और दृढ़ प्रतिज्ञ युवा हैं। वे अपने पिता की 'ऊपरी आय' वाली सलाह को दरकिनार कर ईमानदारी का मार्ग चुनते हैं।
पंडित अलोपीदीन (प्रतिनायक): वे लक्ष्मी के अनन्य उपासक हैं और मानते हैं कि संसार का हर व्यक्ति खरीदा जा सकता है। उनका हृदय परिवर्तन कहानी को एक मनोवैज्ञानिक गरिमा प्रदान करता है।
गौण पात्र: वंशीधर के पिता और वकील समाज के नैतिक पतन को रेखांकित करते हैं।
3. संवाद योजना :
कहानी के संवाद संक्षिप्त, पात्रों के अनुकूल और नाटकीय हैं। संवाद न केवल कथा को आगे बढ़ाते हैं, बल्कि सामाजिक विडंबनाओं पर चोट भी करते हैं।
उदाहरण: "न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं, उन्हें वह जैसे चाहती है, नचाती है।" यह संवाद अलोपीदीन के अहंकार और तत्कालीन व्यवस्था की नग्न सच्चाई को दर्शाता है।
4. देशकाल और वातावरण :
प्रेमचंद ने ब्रिटिश कालीन भारत के प्रशासनिक तंत्र और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार का सजीव वर्णन किया है।
नमक विभाग की नई व्यवस्था, कचहरी की गहमागहमी और समाज में 'ऊपरी कमाई' को मिलने वाली प्रतिष्ठा का चित्रण तत्कालीन यथार्थ को प्रस्तुत करता है।
5. भाषा-शैली :
कहानी की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और मुहावरेदार है।
लेखक ने उर्दू-मिश्रित हिंदी (हिंदुस्तानी) का प्रयोग किया है, जो पात्रों के परिवेश के अनुसार स्वाभाविक लगती है।
शैली वर्णनात्मक होने के साथ-साथ व्यंग्यात्मक भी है, विशेषकर जब वे समाज की विसंगतियों पर प्रहार करते हैं।
6. उद्देश्य :
स्नातक स्तर पर यह समझना महत्वपूर्ण है कि प्रेमचंद केवल मनोरंजन के लिए नहीं लिखते थे। इस कहानी का मुख्य उद्देश्य 'ईमानदारी का फल' दिखाना है।
यद्यपि वंशीधर को अपनी ईमानदारी के लिए नौकरी गंवानी पड़ती है, लेकिन अंत में उनकी नैतिक विजय होती है। यह कहानी पाठकों में नैतिक मूल्यों के प्रति विश्वास जगाती है।
निष्कर्ष:
निष्कर्षतः, 'नमक का दरोगा' कहानी कला के सभी प्रतिमानों (तत्वों) पर खरी उतरती है। यह कहानी आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी रचना काल के समय थी। प्रेमचंद की लेखनी ने एक साधारण घटना को मानवीय संवेदना और नैतिकता के उच्चतम स्तर तक पहुँचा दिया है। प्रेमचंद ने 'आदर्शोन्मुख यथार्थवाद' का पालन करते हुए इसे एक सुखद अंत दिया ताकि समाज में अच्छाई के प्रति विश्वास बना रहे।
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