मंगलवार, 19 जनवरी 2021

हिंदी साहित्य का आदिकाल- हजारी प्रसाद द्विवेदी ( पुस्तक समीक्षा )

         आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित हिंदी साहित्य का आदिकाल सन 1952 ईस्वी में पहली बार प्रकाशित हुआ जो समय-समय पर दिए गए उनके व्याख्यानों का संग्रह है। साहित्य इतिहास संबंधी यह उनकी तीसरी पुस्तक है। इससे पहले ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ और ‘हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास’ प्रकाशित हो चुका था। इस पुस्तक में उन्होंने आदिकाल के नामाकरण और प्रारंभ से संबंधित विवादों से मुक्ति का मार्ग ढूंढने का प्रयास किया है। अपभ्रंश से हिंदी की उत्पत्ति और उसके विकास की विस्तृत चर्चा उन्होंने अपनी इस पुस्तक में की है। दरअसल हिंदी साहित्य का आदिकाल एक इतिहास ग्रंथ ना होकर व्याख्यानों का संग्रह है जिसमें पांच व्याख्यान संग्रहित है। यह पांचो व्याख्यान अपने में एक शोध ग्रंथ है जिसमें उन्होंने साहित्य के प्रारंभ का एवं उसके प्रवृत्तियों के मूल्यांकन का प्रयास किया है। इस पुस्तक में उन्होंने आदिकालीन साहित्य के काव्य-रूपों के उद्भव और विकास का विस्तृत विवेचन किया है। आदिकाल के नामाकरण, काव्य रूप और प्रवृत्ति को लेकर जो व्याख्या की जा रही थी उस पर द्विवेदी जी ने विराम चिन्ह लगाने का प्रयास किया है। 


     हिंदी साहित्य के इतिहास की पहली सुसंगत और क्रमबद्ध व्याख्या का श्रेय अवश्य आचार्य रामचंद्र शुक्ल को जाता है, मगर उसकी कई गुम और उलझी हुई महत्त्वपूर्ण कड़ियों को खोजने और सुलझाने का यश आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का है। अगर द्विवेदी न होते तो हिंदी साहित्य का इतिहास अभी तक अपनी व्याख्या संबंधी कई एकांगी धारणाओं का शिकार रहता और उसकी परंपरा में कई छिद्र रह जाते। इतिहास के प्रति एक अन्वेषक और प्रश्नाकुल मुद्रा, परंपरा से बेहद गहरे सरोकार तथा मौलिक दृष्टि के मणिकांचन योग से बना था। हजारी प्रसाद द्विवेदी का साहित्यिक व्यक्तित्व और उन्होंने साहित्येतिहास और आलोचना को जो भूमि प्रदान की, हिंदी की आलोचना आज भी वहीं से अपनी यात्रा शुरू करती दिखती है। खास तौर पर हिंदी साहित्य के आदिकाल की पूर्व व्याख्याएँ उन्हें शंकित बनाती रहीं और अपने व्यापक चिंतन से अपनी शंकाओं को उन्होंने साबित किया। हिंदी साहित्य के आदिकाल के मूल्यांकन से जुड़े उनके व्याख्यान आज भी हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं। जब भी हिंदी साहित्य के इतिहास और उनकी परंपरा की बात की जाएगी, ये व्याख्यान एक प्रकाश-स्तंभ की-सी भूमिका निभाते रहेंगे।

   आदिकाल हिंदी साहित्य का सबसे अधिक विवादित काल रहा है। द्विवेदी जी ने एक तरह से उन विवादों को समाप्त किया और आदिकालीन साहित्य के उद्धार का प्रयास किया। प्रथम संस्करण की भूमिका में शिवपूजन सहाय लिखते हैं- “हिंदी साहित्य का आदिकाल अब तक अंधकार के आवरण ढका सा रहा है। आवरण को हटाकर प्रायः अंधकार में प्रकाश फैलाने का प्रथम प्रयास संभवतः आचार्य द्विवेदी जी ने ही किया।“1 हिंदी साहित्य का प्रारंभ संवत 1050 अर्थात 1000 ई. के आसपास मानी जाती है। यह समय भारतीय राजनीति में उथल-पुथल का था। आचार्य द्विवेदी जी ने भी इसे भारत के सबसे ज्यादा विरोध और व्याघातों का समय माना है- “शायद ही भारतवर्ष के साहित्य के इतिहास में इतने विरोधी और व्याघातों का युग कभी आया होगा।“2 यह समय हिंदी साहित्य को भी अत्यंत प्रभावित करता है।

    आदिकाल के संदर्भ में यह पुस्तक अत्यंत व्यवस्थित और प्रमाणित है। आचार्य शुक्ल ने हिंदी साहित्य के इतिहास का जो ढांचा तैयार किया था उसका एक और आयाम है, हिंदी साहित्य का आरंभिक काल जिन शंकाओं, अनुमानों पर था, उससे मुक्ति का एक प्रयास है। इसमें द्विवेदीजी साहित्यिक कृतियों की भाषा की दृष्टि से और साहित्य की दृष्टि से व्याख्या करते हैं तथा उसके महत्व का प्रतिपादन करते हैं। उनका मानना है यह हिंदी साहित्य के उद्भव का काल है, इसलिए इस काल की कोई भी रचना अवज्ञा और उपेक्षा का पात्र नहीं हो सकती है- “इस काल की सभी पुस्तकें चाहे वे धार्मिक उपदेश की हो, वैद्दक की हो, महात्म्य की हो, वह कुछ न कुछ साहित्यिक रूप को स्पष्ट करने में अवश्य सहायता पहुचेगी। इस काल में साहित्य क्षेत्र को यथासंभव व्यापक बनाकर देखना चाहिए।“3 

   अपने प्रथम व्याख्यान में ही द्विवेदी जी आदिकालीन उलझी हुई गुत्थियों को सुलझाने का प्रयास करते है। शुक्ल जी ने व्यवस्थित इतिहास तो लिखा किन्तु कुछ शंकाए भी शेष रह गयी थी जिसे द्विवेदी जी ने अपने इस ग्रंथ में सुलझाया है। वे इस काल को ‘भारतीय विचारो के मंथन का काल’ मानते है। आचार्य शुक्ल ने अपने हिंदी साहित्य के इतिहास में जिन ग्रंथो को धार्मिक कहकर इतिहास की परिधि से बहार निकल दिया था द्विवेदीजी उन्हें आदिकालीन साहित्य में स्थान देते है क्योंकि उनका मानना है – “धार्मिक प्रेरणा या आध्यात्मिक उपदेश होना काव्यत्व का बाधक नही समझा जाना चाहिए।‘4 यही नही उनका स्पष्ट मन्ना है कि सम्पूर्ण आदिकाल के साहित्य में धार्मिक और आध्यात्मिक प्रभाव देखा जा सकता है और इस प्रकार अगर हम इन साहित्य को निकलते गये तो संपूर्ण आदिकालीन साहित्य को ही बहार करना पड़ेगा –“केवल नैतिक धार्मिक या आध्यात्मिक उपदेश देकर यदि हम ग्रंथों को साहित्य सीमा से निकालने लगेंगे तो हमें आदिकाल से भी हाथ धोना पड़ेगा, तुलसी रामायण से भी अलग होना पड़ेगा कबीर की रचनाओं को भी नमस्कार कर देना पड़ेगा और जायसी  को भी दूर से दंडवत करके विदा कर देना होगा।“5 

   हिंदी साहित्य के आदिकाल का सटीक मूल्यांकन वही कर सकता है जो भाषा का पारखी हो और द्विवेदीजी निश्चय ही भाषा के पारखी इतिहासकार थे। उन्हें अपभ्रंश भाषा का पूर्ण ज्ञान था। इस समय हिंदी धीरे-धीरे अपना रूप ग्रहण कर रही थी और अपभ्रंश अपना रूप खो रही थी अर्थात भाषा के स्तर पर यह संक्रमण का काल था। इसलिए आदिकाल के मूल्यांकन के लिए भाषा का ज्ञान आवश्यक था। हिंदी भाषा किस प्रकार अपना रूप ग्रहण कर रही थी इनका उल्लेख करते हुए लिखते है – “स्पष्ट ही दसवीं से तेरहवीं शताब्दी तक की बोलचाल कि भाषा में संस्कृत तत्सम शब्दों का प्रयोग बढ़ने लगा था।6 जिसे द्विवेदीजी इस काल की भाषा की प्रमुख प्रवृति मानते है –“इस काल की भाषा की प्रमुख प्रवृति थी- बोलचाल में तत्सम शब्दो का प्रचार।“7 जैसा की स्पष्ट है यह काल भाषा की दृष्टि से संक्रमण का काल है तो निश्चय ही इस काल में अपभ्रंश साहित्य भी प्रचुर लिखा गया । किन्तु 10वीं शताब्दी आते आते अपभ्रंश के रूप में परिवर्तन आने लगा था जिसे गुलेरी जी ने पुरानी हिंदी कहा है। द्विवेदीजी इसे अपभ्रंश का ही बढ़ावा मानते है –“दसवीं से चौदहवीं शताब्दी का काल, जिसे हिंदी का आदिकाल कहते है अपभ्रंश का ही बढ़ावा है। इसी अपभ्रंश के बढ़ाव को कुछ लोग उत्तरकालीन अपभ्रंश कहते है और कुछ लोग पुरानी हिंदी।“8 भाषा के साथ काव्य रूप की चर्चा इस ग्रंथ की एक बड़ी विशेषता है। इसमें आचार्य द्विवेदी किसी भी पुस्तक की भाषा और काव्य रूप का भी विस्तृत वर्णन करते है। आदिकाल के उपलब्ध प्रत्येक ग्रन्थ की भाषा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन करते हुए उसके महत्त्व पर प्रकाश डालते है। कीर्तिलता के संबंध में अपना मत व्यक्त करते हुए लिखते है –“भाषा के अध्ययन की दृष्टि से इस पुस्तक का महत्व है ही, काव्य रुप के अध्ययन की दृष्टि से भी यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी है।“9 यही स्थिति वर्ण रत्नाकर पुस्तक के साथ भी है जो आदिकालीन लोक साहित्य की प्रतिध्वनि था। द्विवेदीजी इस ग्रंथ के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए लिखते है-“प्राचीन मैथिली भाषा के अध्ययन की दृष्टि से तो यह पुस्तक अत्यंत उत्तम है ही, परंतु उस समय की सामाजिक, रीति-नीति, काव्य-रूढ़ि और काव्य-रूप के अध्ययन की दृष्टि से भी यह बहुत उपयोगी है।“10 


   आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने वीरगाथा काल का नामकरण करते हुए उनसे प्राप्त ग्रंथो को संदिग्ध मन है किंतु द्विवेदीजी आदिकाल के नामकरण में जिन ग्रंथों का उल्लेख करते है उसकी प्रमाणिकता के साथ उस ग्रन्थ के भाषागत ढांचा का भी उल्लेख करते है। इसी प्रकार काल प्रवृति का निर्धारण करते समय भी शुक्लजी जिन ग्रंथों का उल्लेख करते है उनमें से ज्यादातर अप्राप्य, अप्रामाणिक और परवर्ती काल की सिद्ध होती है। द्विवेदीजी काल प्रवृति का निर्धारण ग्रंथों के आधार पर न करके उस काल की प्रेरणादायक वस्तु को मानते है –“काल प्रवृति का निर्णय प्राप्य ग्रंथों की संख्या के आधार पर ही हो सकता है।“11 

  अपने प्रथम व्याख्यान में द्विवेदीजी अपभ्रंश के उपलब्ध साहित्य, उसके काव्य-रूप, नामकरण के आधार ग्रंथों एवं उसके नामकरण के आवश्यक अंगों पर चर्चा करते है। जैन ग्रंथों का उल्लेख वे हिंदी साहित्य आदिकाल की परंपरा को समझने के रूप में करते है। हिंदी साहित्य का प्रथम व्यवस्थित  इतिहास आचार्य शुक्ल ने लिखा था जिसमें उन्होंने प्रवृत्तियों के आधार पर वीरगाथा काल नाम दिया था।  जिसे द्विवेदीजी अपने अकाट्य तर्कों के आधार पर आदिकाल कहते है। आदिकालीन साहित्य को उसके काव्य रूपों के विकास की दृष्टि से अध्ययन करते हैं क्योंकि यह काल हिंदी भाषा के उद्भव का काल है हिंदी के कवियों के उद्गम का काल है



     द्वितीय व्याख्यान में आचार्य द्विवेदी जी अपभ्रंश और भाषा काव्य के रूप पर चर्चा करते हैं। पुराने रूपों में किस प्रकार की विकृतियां देखने को मिलती है इसका विस्तृत वर्णन उन्होंने किया है। मात्रा के प्रयोग की दृष्टि पर इस काल के कवियों की पूर्ण प्रवृत्तियों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करते हैं। अपभ्रंश के काव्य रूपों का विस्तृत वर्णन करते हुए उसका आगे की भाषा काव्य से किस प्रकार का संबंध है इसे स्पष्ट करते हैं। भाषा की दृष्टि से संपूर्ण अपभ्रंश काव्य एवं आदिकालीन प्रमाणित ग्रंथों की चर्चा करते हैं तथा उसकी प्रमाणिकता और अप्रमाणिकता एवं उसका भाषा शास्त्रीय अध्ययन करते हैं। अपभ्रंश काव्य के क्षेत्र का वर्णन करते हुए स्पष्ट करते है कि “ठीक मध्यदेश में बना कोई अपभ्रंश काव्य नही मिलता। अधिकांश पुस्तके किनारे पर स्थित प्रान्तों से ही प्राप्त हुई है।“12 और इस न मिलने के कारण को स्पष्ट करते हुए वे कहते है कि इसका ऐतिहासिक कारण है। इस काल में पुस्तकें तीन प्रकार से रचीत हुई  पहला राज्याश्रय में, दूसरा धर्माश्रय में और तीसरा लोक आश्रय में। इसमें भी सबसे प्रमुख है राज्याश्रय।  इस समय केंद्रीय सत्ता में गाहद्वारो का शासन था जिसे कुछ विद्वानों ने दक्षिण से आया माना है जो संस्कृत प्रेमी था यही कारण है कि भाषा काव्य मध्यदेश में काम देखने को मिलता है।

     अपने तृतीय व्याख्यान में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी आदिकाल के सबसे विवादित ग्रंथ पृथ्वीराज रासो को लेकर अपने मत व्यक्त करते हैं वह भी पूरी प्रमाणिकता के साथ अपने विचार प्रकट करते हैं अपने विचारों की प्रमाणिकता के लिए तत्कालीन समय के शिलालेखों और इतिहास की भी छानबीन करते हैं। रासो ग्रन्थ में जिस भाषा का प्रयोग किया गया है उसके आधार पर वे उसकी व्याख्या करते हैं। दरअसल रासो ग्रंथ अपभ्रंश भाषा में ही लिखा गया था क्योंकि रासो की भाषा दमोह वाली शिलालेख से मिलती जुलती है –“इस तथ्य से यह अनुमान पुष्ट होता है कि रासो में भी कुछ उसी प्रकार के अपभ्रंश में लिखा गया था जिस प्रकार के अपभ्रंश ग्यारहवीं सजाताब्दी वाला दमोह वाला शिलालेख लिखा गया था।“13  आचार्य शुक्ल रासो को एकदम जाली पुस्तक कहते है किंतु द्विवेदीजी ने उसके काव्यरूपो, एवं उसके लघुत्तम संस्करण के आधार पर उसे अर्धप्रमानिक माना है। “अब यह मान लेने में किसी को आपत्ति नही ही कि रासो एकदम जाली पुस्तक नही है।“14 द्विवेदीजी ने आदिकालीन कृतियों को साहित्यिक दृष्टि से देखने के पक्ष में है क्योंकि ऐतिहासिक दृष्टि से देखने पर एक व् कृति प्रामाणिक नही ठहरती-“सभी संस्करण परवर्ती है, सबमे क्षेपक की सम्भावना बानी हुई है।“15 रासो के सन्दर्भ में तो वे इतना भी कह देते है कि-“रासो में इतिहास की संगति खोजना ही बेकार है।“15

   हिंदी में कथा की परंपरा की व्याख्या अगर किसी इतिहास ग्रन्थ में मिलती है तो वह द्विवेदी जी द्वारा रचित हिंदी साहित्य का आदिकाल ही है। कादिकल में जितने भी चरित काव्य लिखे गए वे सभी कथा की परंपरा में ही आते है। किंतु यह कथा शब्द दो रूपो में में व्यक्त हुआ है “प्रायः सभी चरित काव्यो ने अपने को कथा कहा है। पुराने साहित्य में कथा शब्द का व्यवहार स्पष्टरूप से दो अर्थो में हुआ है। एक तो साधारण कहानी के अर्थ में और दूसरा अलंकृत काव्यरुप के अर्थ में।“16  आदिकालीन साहित्य में ऐतिहासिक काव्य किस प्रकार लिखे जाते थे इसका स्पष्टीकरण भी इस ग्रंथ में हुआ है –“ऐसा जान पड़ता है कि उन दिनों ऐतिहासिक व्यक्ति गुणानुवाद मूलक चरित-काव्य इसी ढंग (श्रोता वक्त परंपरा/पूर्व कथा योजना) से लिखे जाते थे।“17  पृथ्वीराज राजो आदिकाल का सबसे विवादित ग्रन्थ रहा है और इसपर द्विवेदीजी की व्याख्या सबसे महत्वपूर्ण बानी है। उन्होंने रासो शब्द की व्युत्पत्ति रासक से मानी है जो एक प्रकार का गेरूप है। साथ ही रासो को वे शुक और शुकी संवाद में लिखा हुआ मानते है। “ रासो के वर्तमान रूप को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि मूल रासो में भी शुक इर शुकी के संवाद की ऐसी ही योजना रही होगी। मेरा अनुमान है कि इस मामूली से इंगित को पकड़कर हम मूल रासो के कुछ रूप का अंदाजा लगा सकते है।“18 इसी प्रकार कीर्ति लाता भी भृंग भृंगी संवाद के रूप में लिखी गयी है। इससे स्पष्ट होता है कि आदिकालीन साहित्य में वक्त श्रोता परंपरा थी।

   अपने चतुर्थ व्याख्यान में कथानक  रूढ़ियों के आधार पर प्रिथीराज रासो एवं पध्मावत अदि सभी कृतियों का मूल्यांकन करते हैं। पृथ्वीराज रासो के प्रत्येक घटना को भारतीय  कथानक रूढ़ियों से जोड़कर देखते है। इस व्याख्यान में पृथ्वीराज रासो का विस्तृत विवेचन है तथा आदिकालीन काव्य रूढ़ियों के साथ इसका समंजन किया गया है। प्रारम्भ में जिस भारतीय काव्य के ऐतिहासिक चरितों की प्रवृत्तियो का वर्णन है उसके साथ पृथ्वीराज रासो की संगति की भी जाँच करते है।

     पंचम व्याख्यान आदिकालीन काव्यरूपो पर विस्तृत विवेचन है कादिकल और परवर्तीकाल साहित्य के काव्यरूपो की तुलना करके उसके रूप पर विस्तृत विवेचन हुआ है।

निश्चय ही आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित हिंदी साहित्य का आदिकाल हिंदी के प्रारंभ का व्यवस्थित इतिहास है। उन्होंने हिंदी के प्रारंभ उसके विकास एवं उसकी प्रवृत्तियो से संबंधित अनेक शंकाओं का समाधान किया है। हिंदी के उद्भव में किस प्रकार भाषागत ढांचा बदल रहा था साथ ही काव्य रूपो का किस प्रकार विकास हो रहा था इसका विस्तृत व्योरा देते है। हिंदी साजित्या का आदिकाल निश्चय ही मिल का पत्थर साबित हुआ है हिंदी साहित्य के इतिहास ग्रंथो में । यह ग्रन्थ आदिकाल का प्रामाणिक दस्तावेज है। इस पुस्तक के माध्यम से द्विवेदी जी ने अनेक ग्रंथो को भी साहित्य की कोटि में मान्यता दिलवाई जिसे धार्मिक या आध्यात्मिक कह कर साहित्य की कोटि से बाहर कर दिया गया था तथा अनेक नए ग्रंथो को भी प्रकाश में लाते है जो अबतक उपेक्षा का शिकार थे। साहित्य के जिज्ञासुओं एवम हिंदी भाषा के जिज्ञासुओं के लिए यह ग्रन्थ अत्यंत उपयोगी है।







                         

  गोबिन्द कुमार यादव 

 बिरसा मुंडा कॉलेज

दार्जीलिंग, पश्चिम बंगाल, 734427

मो.-6294524332

ईमेल – gobind9614@gmail.com



शनिवार, 5 दिसंबर 2020

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की निबन्ध-कला

          आचार्यरामचन्द्र शुक्ल (1884-1941 ई.) हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ निबन्धकार हैं। चिन्तामणि में संकलित निबन्धों में शुक्लजी की निबन्ध कला का पूर्ण उत्कर्ष दिखाई देता है। ये निबन्ध विचार प्रधान हैं या भाव प्रधान है इस विषय पर विचार करने से पूर्व हमें शुक्ल जी के इस कथन पर भी दृष्टिपात कर लेना चाहिए जो उन्होंने 'चिन्तामणि' की भूमिका में 'निवेदन' शीर्षक के अन्तर्गत लिखा है, "इस पुस्तक में मेरी अन्तर्यात्रा में पड़ने वाले कुछ प्रदेश हैं। यात्रा के लिए निकलती रही है बुद्धि पर हृदय को भी साथ लेकर।"

       शुक्ल जी के इस कथन का अभिप्राय यह है कि उनके निबन्धों में हृदय और बुद्धि का समन्वय किया गया है; यद्यपि उनके निबन्ध विचार-प्रधान ही अधिक है तथापि उनमें हृदय तत्व भी स्थान-स्थान पर उपलब्ध होता है।

     भाषा की पूर्ण-शक्ति का विकास निबन्ध में दिखाई पड़ता है। शुक्ल जी के अनुसार "शुद्ध विचारात्मक निबन्धों का चरम-उत्कर्ष वहीं होता है जहां एक-एक पैराग्राफ में विचार दबा-दबाकर ठूसे गए है और एक-एक वाक्य इसी सुसम्बद्ध विचार खण्ड के लिए हो।"

     विचारात्मक निबन्ध में केवल विचारों की झलक या बौद्धिक विवेचक ही पर्याप्त नहीं होता अपितु हृदय के भावों की झलक भी उसमें दिखाई पड़ती है। संक्षेप में शुक्ल जी की निबन्ध कला में हमें अग्रलिखित विशेषताओं का निदर्शन मिलता है-

1. विचारों की सम्पन्नता और सुसम्बद्धता- शुक्ल जी के निबन्ध मौलिक विचारों से सम्पन्न हैं। उनमें विचारों की गहनता और प्रौढ़ता के दर्शन होते हैं। उनका प्रत्येक वाक्य सुविचारित, सुचिन्तित तथा व्यंजक होता है। इस प्रकार उनके निबन्धों का प्रत्येक अनुच्छेद गम्भीर विचारों से ओत-प्रोत दिखाई देता है। यह भी उल्लेखनीय है कि शुक्ल जी के निबन्धों में वैचारिक सुसम्बद्धता उनके निबन्धों की प्रमुख विशेषताएं हैं। यथा-"श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है। जब पूज्य भाव की बुद्धि के साथ-साथ श्रद्धाभाजन के सामीप्य लाभ की प्रवृत्ति हो, उसकी सत्ता के कई रूपों के साक्षात्कार की वासना हो तब हृदय मे भक्ति का प्रादुर्भाव समझना चाहिए


2. मौलिक चिन्तन-शुक्ल जी एक मौलिक चिन्तक है। इसका पता उनके निबन्धों से चलता है। मनोविकार सम्बन्धी निबन्धों में वे जिस मनोविकार का वर्णन करते हैं उसके प्रत्येक पक्ष पर मौलिक ढंग से विचार करते हैं, उसका विश्लेषण इतने सूक्ष्म ढंग से करते हैं कि उस मनोविकार का प्रत्येक पक्ष उजागर हो जाता है। कभी-कभी तो ऐसा प्रतीत होता है कि मनोविकारों के विश्लेषण में वे मनोविज्ञान के पण्डितों को भी मात दे रहे है। इसी प्रकार काव्य समीक्षा सम्बन्धी निबन्धों में उनका मौलिक चिन्तन दिखाई देता है। उदाहरण के लिए 'कविता क्या है' निबन्ध में काव्य की परिभाषा उन्होंने मौलिक ढंग से की है। उनके अनुसार, "हृदय की इसी मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे कविता कहते हैं।"

3. विचार विश्लेषण एवं विषय विवेचन क्षमता- शुक्ल जी के निबन्ध विचार प्रधान हैं। विषय के अनुरूप विश्लेषण की अद्भुत क्षमता उनके निबन्धों की प्रमुख विशेषता कही जा सकती है। शुक्ल जी ने भारतीय काव्यशास्त्र और पाश्चात्य समीक्षा-शास्त्र के गहन अनुशीलन के उपरान्त सभीक्षा की एक नई पद्धति विकसित की जिसमें सभी विचारों की सम्यक परीक्षा करने के साथ-साथ वे अपना मौलिक चिन्तन भी योजना पूर्वक प्रस्तुत करते हैं। डॉ. देवीशंकर अवस्थी के अनुसार, "किसी भी मत, विचार या सिद्धान्त को उन्होंने बिना अपने विवेक की कसौटी पर कसे स्वीकार नहीं किया। यदि कोई विचार उनकी ट्ृष्टि को नहीं जंचा तो इसके प्रत्याख्यान में तनिक भी मोह नहीं दिखाया।"

4. भाषा की पूर्ण शक्ति का विकास-शुक्ल जी के निबन्धों की भाषा विषय के अनुरूप प्रौढ़, गम्भीर एवं साहित्यिकता का पुट लिए हुए है। वह परिष्कृत एवं संयत है उसमें भाव प्रकाशन की अद्भुत क्षमता है। प्रत्येक शब्द अपने स्थानों पर ऐसा जड़ा हुआ है कि उसे वहां से हटा पाना असम्भव है, इसी प्रकार उनकी वाक्य रचना निर्दोष व्याकरण-सम्मत और उपयुक्त है। भाषा की शक्ति का परिचय मनोविकारों की परिभाषा में दिखाई पड़ता है जहां सूत्रात्मक शैली का प्रयोग है और एक भी शब्द फालतू नहीं है यथा-"श्रद्धा महत्व की आनन्दपूर्ण स्वीकृति के साथ पूज्य बुद्धि का संचार है'"

5. प्रकृति प्रेम-शुक्ल जी के निबन्धों में प्रकृति प्रेम का परिचय अनेक स्थानों पर प्राप्त होता है। ऐसे स्थलों पर हृदय का उल्लास देखते ही बनता है। उदाहरण के लिए, निम्न पंक्तियों में उनके प्रकृति प्रेम की व्यंजना हुई हैं; यथा "आंखे खोलकर देखो खेत कैसे लहलहा रहे हैं, नाले झाड़ियों के बीच बह रहे हैं, टेसू के फूल से बनस्थली कैसी लाल हो रही है, चौपायों के झुण्ड चरते हैं, चरवाहे तान लड़ा रहे है और अमराइयों के बीका में गांव झांक रहे हैं।"

6. हास्य एवं व्यंग्य की प्रधानता- यद्यपि शुक्ल जी हे निबन्ध विचार-प्रधान हैं तथापि भावाकर्षक स्थलों पर उनका हृदय पक्ष प्रबल हो गया है। यही कारण है कि विषय निरूपण करते समय जहां-तहां शुक्ल जी ने अपने निबन्धों में हास्य-व्यंग्य का पुट भी दिया है। उदाहरण के लिए, लोभी व्यक्तियों पर व्यंग करते हुए वे कहते हैं, "मोटे आदमियो तुम जरा से दुबले हो जाते अपने अन्देशे से ही सही, तो न जाने कितनी ठठरियों पर मांस चढ़ जाता।"

7. देश प्रेम एवं मानव प्रेम-शुक्ल जी के निबन्धों में देश प्रेम और मानव प्रेम की अनेक स्थलो पर व्यंजना हुई है। उनका यह देश प्रेम दिखावा मात्र नहीं है अपितु उसके हृदय का सच्चा भाव झलकता दिखाई देता है। वे यह मानते हैं कि जिसे अपने देश से प्रेम होगा वह अपने देश के मनुष्य, पशु, पक्षी, लता, पौधे आदि सबसे प्रेम करेगा। यथा-'यदि किसी को अपने देश ी से प्रेम है तो उसे अपने देश के मनुष्य, पशु-पक्षी, लता-पेड़-त्ते बन-पर्वत-नदी ब निर्झर सबसे प्रेम होगा। जो यह भी नहीं जानते कि कोयल किस चिड़िया का नाम है, जो यह भी नहीं जानते कि किसानों की झोपड़ी के अन्दर क्या हो रहा है वे यदि दस बने-उने मित्रों के बीच प्रत्येक भारतवासी की औसत आमदनी का पता कर देश-प्रेम का दाबा करें तो उनसे पूछना चाहिए कि बिना परिचय का यह प्रेम कैसा?" 

     शुक्ल जी का दृष्टिकोण मानवतावादी था। 'मानस की धर्म भूमि’ निबन्ध में उन्होंने मानवतावाद की सुन्दर व्याख्या की है। भा जो अत्याचार का विरोध और न्याय का समर्थन नहीं करता उसकी मानवता मर चुकी है।

        उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि यद्यपि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबन्ध विचार प्रधान हैं किन्तु उनमें हृदय भी अपना प्रवृत्ति के अनुरूप भावात्मक और सरल स्थलों पर रमता रहा जिससे उनके निबन्ध सरस और रोचक हो गए हैं। हिन्दी साहित्य म आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबन्ध वस्तुतः मानदण्ड बन गए अन्य निबन्धकारों के निबन्धों की आलोचना हम शुक्ल जा फा कसौटी मानकर किया करते हैं। यह इस बात का प्रमाण है।व शुक्ल जी की निबन्ध कला अप्रतिम है, अद्वितीय है आर सर्वश्रेष्ठ है।

 - गोबिंद कुमार यादव

                                                      बिरसा मुंडा कॉलेज

                                                         6294524332




रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि

                 रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि  

                                                    -  गोबिंद कुमार यादव            

        मार्क्सवादी समीक्षकों में डॉ. रामविलास शर्मा का नाम अग्रगण्य है। मार्क्सवादी समीक्षा का तात्पर्य उस समीक्षा से है जिसमें 'मार्क्सवाद' को आधार बना कर साहित्य की समीक्षा की जाती है। ऐसे आलोचकों को हिन्दी में प्रगतिवादी समीक्षक भी कहा जाता है। प्रगतिवाद का हिन्दी में प्रारम्भ 1936 ई. के आसपास हुआ अतः प्रगतिवादी समीक्षा का प्रारम्भ भी तभी से माना जा सकता है। मार्क्सवादी समीक्षकों में प्रमुख है-शिवदान सिंह चौहान, प्रकाश चन्द्र गुप्त, अमृतराय, नामवर सिंह और डॉ. रामविलास शर्मा इनमें से डॉ. रामविलास शर्मा की दृष्टि सर्वाधिक पैनी, स्वच्छ एवं विश्लेषणात्मक है।

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       कार्ल मार्क्स ने समाज को दो वर्गों में विभक्त किया- शोषक और शोषित। पूंजीवादी अपनी पूंजी के बल पर श्रमिकों का शोषण करता है अतः समाज में वर्ग संघर्ष प्रारम्भ हो जाता है। मार्क्सवादी समीक्षा में वर्ग संघर्ष, सामाजिक समरसता, समाजोत्थान, शोषितों के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए साहित्य को सामाजिक परिवर्तन के साधन के रूप में देखा गया।

       डॉ. रामविलास शर्मा की आलोचनात्मक कृतियों में प्रमुख हैं-प्रगति-प्रगति और परम्परा, प्रगतिशील साहित्य की समस्याएं, आस्था और सौन्दर्य, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना, मार्क्सवाद और प्राचीन साहित्य का मूल्यांकन, निराला की साहित्य साधना, भाषा और समाज, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण।

       डॉ. रामविलास शर्मा की समीक्षा पद्धति की सामान्य विशेषताओं का निरूपण निम्न बिन्दुओं में किया जा सकता है:

1. डॉ. शर्मा ने मार्क्सवादी सिद्धान्तों के अनुरूप वर्ग संघर्ष एवं समाज में मानव की आर्थिक स्थिति को विशेष महत्व दिया है तथा यही तत्व मार्क्सवादी समीक्षा के मूल आधार हैं।

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2. डॉ. शर्मा यह मानते हैं कि साहित्यकार को वर्गभेद पर आधारित समाज की पहचान होनी चाहिए। वैचारिक स्तर पर वे मार्क्सवाद को नहीं छोड़ सकते और कहते हैं-"पार्टीजन साहित्यकार बनकर ही हम ऐसे साहित्य का निर्माण कर सकेंगे जो अगली पीढ़ियों के लिए मूल्यवान हो।|"

3. 'निराला की साहित्य साधना' में उन्होंने एक ओर तो निराला के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों का प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत किया है तो दूसरी ओर निराला की काव्य प्रतिभा, रचना प्रक्रिया, भाषा एवं काव्य सौन्दर्य को भी उद्घाटित किया है।

4. डॉ. रामविलास शर्मा की एक अन्य महत्वपूर्ण कृति है-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना। इसमें उन्होंने शुक्ल जी की लोकहृदय में लीन होने की कसौटी पर जोर देते हुए उनके अन्तर्विरोधों को भी उजागर किया है।

5. रामविलास जी के प्रारम्भिक समीक्षा ग्रन्थों में इनका तेवर आक्रामक रहा है, किन्तु परवर्ती काल में लिखे गए ग्रन्थों में वह आक्रोश नहीं झलकता। इनमें संयम, विवेक एवं सन्तुलन विद्यमान है।

6. नई कविता के प्रति डॉ. रामविलास शर्मा का रुख कुछ-कुछ उसी प्रकार का है जैसा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का छायावाद के प्रति था। इस नकारात्मक रुख के कारण वे नयी कविता के प्रति न्याय नहीं कर पाए है।

7. जो विचार डॉ. शर्मा की मान्यताओं के उन्हें वे स्वीकार करते हैं, किन्तु जो विचार उनकी मान्यताओं के प्रतिकूल हैं, उन्हें वे किसी स्थिति में स्वीकार नहीं करते। वे समझौतावादी समीक्षक नहीं हैं।

8. 'तुलसी के सामन्त विरोधी मूल्य' नामक रचना में उन्होंने तुलसी के वर्ग चरित्र को प्रस्तुत किया। उन्होंने विद्वत्तापूर्वक, यह सिद्ध किया कि तुलसी शोषितों के साथ हैं तथा शोषण के विरोधी हैं, क्योंकि तुलसी ने स्वयं शोषण को झेला था।

9. भाषा के प्रति अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट करते डॉ. शर्मा लिखते हैं-"भाषा एक हथियार है जिससे हम प्रतिगामी शक्तियों पर प्रहार कर सकते हैं। क्रान्ति के लिए आवश्यक है। अपनी शत्रु रूपी प्रतिगामी शक्तियों को पहचानना।"

10. डॉ. शर्मा अपनी समीक्षा पद्धति में न तो की तरह शालीन हैं और न ही द्विवेदी जी की भांति व्यंग्यात्मक अपितु वे आक्रामक अधिक हैं। प्रतिकूल विचारों पर वे निर्मम प्रहार करते हैं।

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11. विवादास्पद होते हुए भी डॉ. शर्मा मार्क्सवादी समीक्षा एवं मार्क्सवादी चिन्तन के प्रकाश स्तम्भ रहे हैं।

12. डॉ. नगेन्द्र ने रामविलास शर्मा के योगदान पर प्रकाश डालते हुए तथा उनकी कृतियों का महत्व प्रतिपादित करते लिखा है : "पुनर्मूल्यांकन यदि आलोचना के प्रमुख कार्यों में से एक है, तो रामविलास शर्मा ने निश्चय ही हिन्दी साहित्य के अनेक लेखकों-भारतेन्दु, प्रेमचन्द, शुक्ल जी एवं निराला का पुनर्मूल्यांकन कर एक तरह से हिन्दी साहित्य का क्रमबद्ध आलोचनात्मक इतिहास प्रस्तुत करने का काम किया है।"

13. डॉ. शर्मा की मान्यता है कि जिस समाज में वर्गभेद कायम है उसमें वर्गों से परे होकर किसी शाश्वत साहित्य की रचना नहीं की जा सकती।

14. डॉ. शर्मा ने मार्क्सवादी दृष्टि से समूचे हिन्दी साहित्य की परम्परा की नवीन व्याख्या की और इस प्रकार मार्सवादी समीक्षा की शक्ति एवं सामर्थ्य का परिचय दिया।

15. डॉ. रामविलास शर्मा की मान्यता है कि साहित्य का प्रभाव अपने भावमूलक स्वभाव के कारण दर्शन एवं विज्ञान की अपेक्षा अधिक पड़ता है। वह मनुष्य को श्रेष्ठ विचार देता है और उन्हें कार्यरूप में परिणत करने की प्रेरणा देकर वह हमारे मनोबल को दृढ़ करता है। यही नहीं अपितु साहित्य हमारे चरित्र का भी निर्माण करता है।

16. डॉ. शर्मा प्रयोगवाद एवं नयी कविता के हैं यद्यपि अज्ञेय द्वारा प्रकाशित 'तार सप्तक' के सात कवियां में उन्हें भी स्थान मिला है। वे लिखते हैं- 'विषयवस्तु मे निकम्मापन, निर्थकता, निरुद्देश्यता... लिए जनजीवन या तो है नहीं या है तो उन्हीं जैसा विकृत और निरुद्देश्य।"

17. डॉ. शर्मा ने साहित्य में सामाजिक यथार्थ के चित्रण पर बल दिया। इसी कारण वे प्रेमचन्द के प्रशंसक थे। उनका स्पष्ट धारणा थी कि प्रगतिशील साहित्य युग की मांग को पूरा करने वाला साहित्य है।

18. डॉ. रामविलास शर्मा ने लेनिन की भाषा को आदर्श मानते हुए अपनी भाषा सम्बन्धी दृष्टिकोण का परिचय इन शब्दों में दिया है-"शैली की स्पष्टता, शब्दों का सधा प्रयोग, हास्य-विनोद व व्यंग्य के छीटे, क्रोधावेश में जलते वाक्य, कहावते, मुहावरे, पुराने लेखकों की रचनाओं के उदाहरण लेनिन की शैली की वस्तु है जो बताती है कि इस महान क्रान्तिकारी बिचारक ने भाषा व शब्दों से अपनी व्यंजना के माध्यम पर साहित्य के रूप पर किस प्रकार अधिकार कर लिया था।"

      उक्त विवेचन के आधार पर हम कह सकते है कि डॉ. रामविलास शर्मा हिन्दी साहित्य के समर्थ आलोचक हैं तथा उनकी समीक्षा पद्धति प्रगतिशील चेतना से प्रभावित है। माक्क्सवादी सिद्धान्तों पर आधृत उनकी कृतियों ने हिन्दी समीक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान किया है।


गोबिंद कुमार यादव
बिरसा मुंडा कॉलेज
6294524332


    



मंगलवार, 25 अगस्त 2020

चित्रलेखा उपन्यास में व्यक्त पात्र-योजना

      चित्रलेखा उपन्यास में व्यक्त पात्र-योजना

कोई भी साहित्यिक रचना हो, उसमें पात्रों का महत्त्व सर्वाधिक होता है। पात्र ही रचना को मानवों की कथा बताते हैं। प्रत्येक रचनाकार पात्रों की कल्पना के साथ-साथ उनके चरित्र एवं विशेषताओं पर सबसे अधिक ध्यान देता है। भगवतीचरण वर्मा ने भी अपने दार्शनिक उपन्यास चित्रलेखा में पात्रों की योजना अपने कौशल और अपनी कल्पनाशीलता का परिचय दिया है। ‘चित्रलेखा’ के सभी पात्र व्यक्ति पात्र हैं, वे समूह के प्रतिनिधि नहीं हैं। भगवतीचरण वर्मा ने अपने उपन्यास 'चित्रलेखा' में जिन पात्रों की कल्पना की है, वे समाज में देखने को नहीं मिलते हैं।


     चित्रलेखा उपन्यास शिष्यों की जिज्ञासा से प्रारम्भ होता है। महाप्रभु रत्नाम्बर के दोनों शिष्य-श्वेतांक और विशालदेव अपनी शिक्षा की समाप्ति पर यह जानना चाहते हैं कि पाप क्या है? जब शिक्षा पूरी हो चुकी है और जब शिष्य विद्यालय छोड़कर समाज में प्रवेश करने वाले हों, उस समय 'पाप क्या है?' की जिज्ञासा विचित्र है। दोनों शिष्य-श्वेतांक और विशालदेव पापं को जानना चाहते हैं । पाप को जानने का उद्देश्य यही हो सकता है कि वे पाप से बचें। फिर भी यह प्रश्न सामान्य नहीं है। भारतीय साहित्य में वेद., उपनिषद, पराण, नाटक, महाकाव्य आदि में किसी पात्र ने भी किसी के सामने पाप को जानने की इच्छा प्रकट नहीं की है ।

    शिष्यों के ही समान अद्वितीय हैं, उनके आचार्य महाप्रभू रत्नाम्बर। वे इस प्रश्न का उत्तर दन के लिए अपने दोनी शिष्यों को ऐसे दो व्यक्तियों के यहाँ स्थापित करते हैं, जिनमें प्रत्यक्ष रूप से एक पापी है। बीजगुप्त विवाह किये बिना नर्तकी चित्रलेखा को पत्नी के रूप में रखे पाप क्या है? का उत्तर जहाँ मिल सकता है, ऐसे दूसरे व्यक्ति योगी कुमारगिरि का है रत्नाम्बर का पहला शिष्य श्वेतांक बीजगुप्त के यहाँ जाता है तो दूसरा शिष्य विशालदेव यागा कमारगिरि से देक्षा ग्रहण करता है। भगवतीचरण वर्मा ने भहाप्रभ रत्नाम्बर के कथन के द्वारा शिक्षा का अपेक्षा अनुभव की श्रेष्ठता की है। उन्होंने महाप्रभु रत्नाम्बर द्वारा श्वेतांक और विशालदेव से कहलवायां है-"जो बात अध्ययन से नहीं जानी जा सकती है. उसको अनुभव से जानने का प्रयत्न करने के लिए मैं तुम दोनों को संसार में भेज रहा हूँ ।'

      का कथन और कार्य उसके चरित्र को रेखांकित करता है। महाप्रभु रत्नाम्बर ने अपने शिष्यों से जो कहा, उससे स्पष्ट है कि वे स्पष्टवादी हैं और अपनी कमी तथा असफलता की भी घोषणा कर सकते हैं। ऐसे व्यक्ति शुद्ध और स्पष्ट चरित्र वाले होते हैं। बीजगुप्त और कुमारगिरि के मध्य की कड़ी है-चित्रलेखा। चित्रलेखा का चरित्र भी अधिकांश रूप में उसके कथनों से प्रतीत हो जाता है। चित्रलेखा ने कुमारगिरि को अनेक बार गुरुदेव कहा और उनसे दीक्षा लेने की प्रार्थना की, पर उसने अपने कुछ स्पष्ट कथनों से भी अपने चरित्र को पर्याप्त ऊपर उठा दिया है। चित्रलेखा कुमारगिरि को बार-बार गुरुदेव कह रही थी और स्वयं को उनकी दासी बता रही थी, पर कुमारगिरि की कुटी में जाने का जो उद्देश्य था, उसे भी उसने स्पष्ट कर दिया--"अपनी विजय पराजय की अवहेलना करके एक बार तुम मुझसे सत्य बोले थे, मैं भी तुम से सच ही कहूँगी। मैं तुमसे प्रेम करने आयी हूँ।"

    चित्रलेखा ने अपने एक संवाद के द्वारा नारी का स्वभाव भी स्पष्ट किया है। नारी उस व्यक्ति से प्रेम नहीं कर सकती जो उसके आगे समर्पण कर दे । नारी अपने ऊपर शासन करने वाले पुरुष से प्रेम करती है। कुमारगिरि ने चित्रलेखा से कहा “तुम मेरी शिष्या हो । तुम्हारा कर्त्तव्य है कि तुम मेरी बात मानो।“

    इसे सुनकर चित्रलेखा ने जो कहा, वह उसके दृढ़ निश्चय को रेखांकित करता है। उसने कुमारगिरि को उत्तर दिया-"योगी! अपने को भूलो मत। तुम्हारे सामने जो स्त्री खड़ी है, वह इतनी असहाय नहीं है कि उस पर शासन कर सको। तुम समझते हो कि तुमने मुझे ही दीक्षा दी है, यह तुम्हारा भ्रम है, नहीं, यहाँ पर तुम अपने को ही धोखा दे रहे हो। तुम जिसे आज्ञा दे रहे हो? क्या तुम यह नहीं जानते हो कि जिस पर तुम शासन करना चाहते हो, तुमने अपने को उसका दास बना लिया है।"

    चित्रलेखा के निर्भीक और दबंग चरित्र का ज्ञान उसके उस कथन से भी होता है जो उसने महासामन्त मृत्युंजय के प्रीतिभोज में अपने ऊपर व्यंग्य करने वाली उच्च कुल की नारी ने किया था । उसने चित्रलेखा पर व्यंग्य करते हुए कहा था- "आज नर्तकी चित्रलेखा को हमारी समता करके हमारे समाज में आने के उपलक्ष्य में बधाई है।"

      चित्रलेखा ने यह सुनकर जो कहा, वह उसके दृढ़ चरित्र और किसी से प्रभावित न होने का प्रमाण है। चित्रलेखा ने उत्तर दिया- "अपने सौन्दर्य के बल से, अपना स्वागत कराने के लिए अभिमानिनी स्त्रियों को बाध्य करने वाली को बधाई की कोई आवश्यकता नही “

     चित्रलेखा उपन्यास में पात्र योजना जीवंत एवं आकर्षक है। 











                                         गोबिंद यादव

                                     बिरसा मुंडा कॉलेज

                                     मो. 6294524332

                   

     

शनिवार, 16 मई 2020

"मजदुर"

                   
                      "मजदुर" 

           मुफ़लिसी का दर्द ए बयां यह था कि अपनों से, अपने गाँव से, अपनी जड़ों से उखड़ कर कही और जा बसा। किसी की जड़े जमाने के लिए दिन-रात लोहे पिघलाएं, सीमेंट की होली खेली, पत्थरो पर हथौड़े मारे, अलकतरे गलाये, सड़के चमकायी और चमकाया पूरा शहर। दुनिया देखने आयी, दुनिया में ढिंढोरा पीटा गया। मेरा नही ,मेरे बनाये शहर का। किन्तु उसमे मेरा जिक्र कही नही था। मैं खुश था फिर भी, क्योंकि मैं था उसमें भले जिक्र न हो। वैसेभी मेरे होने न होने से किसे फर्क पड़ता है। 
       एकदिन आपदा आयी पूरी दुनिया से होते हुए मेरे शहर। देश और शहर दोनों बंद कर दिए गए। जिस शहर को मैंने बनाया, चमकाया, पहचान दी, वह मुझसे मेरा पता पूछने लगा। कुछ दिन गुजार लिए, एकदिन निकल पड़ा अपनी जड़ों की ओर पैदल। आदमी को अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ चाहिए, मै नही था। प्रवाशी था अपने देश में। सवाल एक ही था जिन्दा पहूंच जाना। पैरों के छाले गवाह है ये देखिये। पोस्टमार्टम झूठ है सरकार। मेरी आंत नही सुखी थी। मेरी मुस्कराहट देखिये, भूखा कही मुस्कुराता है। 
                                  "भारत"
जब नयी सुबह हुई तब जोश और हौशला से भरा भारत काफी रफ़्तार से बढ़ने लगा। उसे लगा वह अपने सपनो की उड़ान से अपनी नई पहचान यथा शीघ्र बना लेगा । सबकुछ सही दिशा में बढ़ रहा था। किंतु नियति को उसकी परीक्षा लेनी थी।
    एक आपदा आयी। सब उससे जूझने लगे। भारत भी जूझ रहा था किंतु उसकी दुर्घटना हो गयी। हाथ, पैर टूट चुके थे पर वह मुस्कुरा रहा था।। 
                                                               

                                                       - गोबिंद यादव  

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

सागर-कन्या और खग-शावक यात्रा वृतांत की समीक्षा

          सागर‌‌‌‌‌‌-कन्या और खग-शावक अज्ञेय द्वारा लिखित एक यात्रा वृतांत है जिसमे उन्होंने ने डेनमार्क की संस्कृति के माध्यम से भारतीय संस्कृति के मेल एवं वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को व्यक्त किया है। अपनी इस यात्रा वृतांत का प्रारम्भ वे भारतमाता के रूप वर्णन से करते है। साथ ही विविध देशों की देशमता का रूप भी सामने रखते है। जिसमे सभी कही न कही शक्ति और तेजश्विता का प्रतिक है। किन्तु डेनमार्क का प्रतिक इससे नितांत भिन्न है। उसका प्रतिक स्वप्न देखने वाली जलपरी है।
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       इस रेखाचित्र में मुख्य रूप से सांस्कृतिक मिलान को रेखांकित किया गया है। जिसमे उन्होंने डेनमार्क की संस्कृति के माध्यम से भारतीय संस्कृति को भी रेखांकित करने का प्रयास किया है। जिस प्रकार- “डेनी चरित्र की कल्पनाशीलता उसका प्रधान नही तो उसका महत्वपूर्ण गुण अवश्य है।“ उसी प्रकार भारतीय लोग भी अत्यधिक कल्पनाशील होते है और इसका चित्रण अज्ञेय ने संकेतों मे ही कर के छोर दिया है- “ हम आदिकवि बाल्मीकि पर गर्व करते है, यूनान के लोग होमर पर.......डेनमार्क को गर्व है परियों की कहानियां लिखने वाले होन्स एंडरसन पर।“ जहा अन्य देशों ने महायुद्धों की गाथा लिखने वालों पर गर्व किया वही डेनमार्क के लोगों ने परियों की कथा लिखने वाले पर गर्व किया। और यही से पूरे विश्व को एक सन्देश जाता है- शांति और खुशहाली का यही शांति, खुशहाली से भरने का प्रयास अज्ञेय करते है। इसलिए संपूर्ण विश्व का छोटा-छोटा चित्रण कर के संपूर्ण विश्व को डेनमार्क की तरह खुशतबियत और मिलनसार होने का संदेश देते है।
       डेनी जाती प्राचीन जनजातियों में से एक है और भारत प्राचीन सभ्यताओं का देश। भारत की अनेक ऐसी मान्यताएं है जो डेनमार्क से मिलती-जुलती है। जैसे- “इसके एक तलघर में पौराणिक डेनी महारथी हलगार डेन सोता है जो डेनमार्क के संकट के समय जागेगा और उसकी रक्षा करेगा।“ ऐसी पौराणिक कथाएं भारत में जाने कितनी भरी पड़ी है।
       डेनमार्क समुद्र के किनारे बसा हुआ देश है। भारत भी तीन तरफ से समुद्र से घिरा हुआ है। अज्ञेय लिखते भी है-“ पूर्वी बंगाल में जो हॉउर पाए जाते है, हॉउर सागर का ही अपभ्रंश है वैसा ही जलप्रसार यहाँ भी है। अंतर इतना ही है कि इसकी स्वच्छ पारदर्शी नीलिमा हमें तल की चट्टानें देख लेने देती है।“ यह पारदर्शिता ही डेनमार्क की सबसे बड़ी विशेषता है। लेखक डेनमार्क, स्वीडन, नाॉर्वे इन सब का आपसी भाईचारे का वर्णन करते हुए यह स्पष्ट दिखा देना चाहते है कि विश्व को एक मैत्रीपूर्ण व्यवहार के साथ जीना चाहिए। देश का राजा अथवा प्रधान देश के आम-जन से पूर्ण रूप से जुड़ा हुआ होना चाहिए तथा जनता के सुख-दुखों में उसके साथ खड़ा होना चाहिए। जैसा डेनमार्क का इतिहास व्यक्त करते हुए अज्ञेय लिखते है- "राज परिवार के लोग इस पूर्णता के साथ अपने को जन-जीवन में मीला देते है कि अचरज होता है।"

        इस यात्रा वृतांत में अज्ञेय ने डेनमार्क, स्वीडन, नाॉर्वे की जिस आत्मीयता और भाईचारे का चित्रण किया है वह कहीं न कहीं विश्व के तमाम देशों को आवश्यक है-“क्या उस आत्मीयता के वृत्त को इतना और विकसीत नही किया जा सकता कि भारत और स्केंडनेविया में परस्पर अनुकूलता बढ़ाई जा सके।“ यह आत्मीयता सांस्कृतिक धरातल पर ही संभव है। डेनमार्क के लोगो का खुशमिजाज और आत्मीयतापूर्ण व्यवहार कहीं न कहीं संपूर्ण विश्व को एकसूत्र मे बांधे रखने की क्षमता रखता है।
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       निष्कर्ष रूप मे कहा जा सकता है कि सागर कन्या खग शावक यात्रा वृतांत मनुष्य के कल्पनाशील व्यक्तित्व उसकी सांस्कृतिक विराटता की ओर संकेत करता है। सागर की तरह शांत और पारदर्शी होना डेनमार्क के लोगो के व्यक्तित्व की विशेषता है और यह विशेषता भारतीय लोगो मे भी कही न कही पायी जाती है। वशुधैव कुटुम्बकम का भाव इसका प्रमाण है। इसी सांस्कृतिक धरातल पर आत्मीयता के प्रसार का प्रयास अज्ञेय ने किया है।














                                               

गोबिंद कुमार यदव, बिरसा मुंडा कॉलेज, 6294524332
                                     


'काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था' निबंध की समीक्षा।

   काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा लिखित एक वैचारिक निबंध है। यह निबंध विचार प्रधान होते हुए भी भावुकता और बुद्धि का समन्वय है। चिंतामणि में आचार्य शुक्ल लिखते है ‘यात्रा के लिए निकली है बुद्धि पर ह्रदय को साथ लेकर।‘ अर्थात शुक्ल बुद्धि पक्ष और ह्रदय पक्ष दोनों का समन्वय अपने निबंधों में करते है। काव्य मे लोकमंगल की साधनावस्था उनका एक ऐसा ही निबंध है। काव्य में जिस लोक के मंगल का विधान होता है वह कही न कही बुद्धि और ह्रदय के समन्वय का ही परिणाम है।
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    काव्य में लोकमंगल की स्थापना तभी संभव है जब वह साधनावस्था में हो क्योंकि सिद्धावस्था में भोगपक्ष प्रधान हो जाता है ऐसी अवस्था में उच्च कोटि का साहित्य नही लिखा जा सकता। साधनावस्था प्रयत्न का काव्य है, संघर्ष का काव्य है इसीलिए इसके आदर्श उच्च होते है। आचार्य शुक्ल साधनावस्था को विशेष महत्त्व देते हैं इसिलए रामायण, रामचरित मानस, पद्मावत, पृथ्वीराज रासो उन्हें विशेष प्रिय है क्योंकि इसे वे साधनावस्था का काव्य मानते हैं। इसे वे कर्म क्षेत्र का सौंदर्य मानते हैं और कहते हैं- “लोक में फैली दुःख की छाया को हटाने मे ब्रह्म की अनंदकला जो शक्तिमय रूप धारण करती है, उसकी भीषणता में भी अद्भुत मनोहरता, कटुता में भी अपूर्व मधुरता, प्रचंडता में भी गहरी आर्द्रता साथ लगी रहती है।“ इस निबंध में शुक्ल ने लोकधर्म की ओर भी संकेत किया है। और उनके अनुसार लोकधर्म विरुद्धों का सामंजस्य है। निबंध मे वे लिखते हैं- “भीषणता और सरसता, कोमलता और कठोरता, प्रचंडता और मृदुता का सामंजस्य ही लोकधर्म है।“ यह लोकधर्म का सौंदर्य है।


      आदिकवि वाल्मीकि से लेकर अब तक के कवियों ने धर्म की स्थापना पर ही काव्य-कला का सौंदर्य मन है। धर्म के विषय मे आचार्य शुक्ल भी लिखते है- “वह व्यवस्था या वृत्ति जिससे लोक मे मंगल का विधान होता है । अभ्युदय की सिद्धि होती है, धर्म है।“ साधनावस्था का काव्य प्रयत्न और संघर्ष पर आश्रित है। इसिलए इसकी सफलता और विफलता दोनों में सौन्दर्य है। इसके लिए वे पाश्चात्य से लेकर भारतीय कवियों तक का उदाहरण देते है।
     साधनावस्था को ग्रहण करने वाले कवियों को ही शुक्ल पूर्ण कवि मानते है। क्योंकि उनका मन उपभोग पक्ष अर्थात सिद्धावस्था की ओर नही जाता। ये कवि- “जिस प्रकाश को फैला हुआ देखकर मुग्ध होते है उसी प्रकार फैलने के पूर्व उसका अंधकार को हटाया जाना देखकर भी।“ कवि-कर्म के सौंदर्य पर विचार करते हुए आचार्य शुक्ल कहते है कि जो कवि प्रत्येक अवसर पर सत-पात्र को सफल और दुष्ट पात्र को असफल दिखाते है वे सच्चे कवि नही होते है। इस जगत में प्रायः धर्म की शक्ति उठ उठकर व्यर्थ होती है। कवि-कर्म के सौंदर्य के विधाय में शुक्ल लिखते है- “कवि कर्म के सौंदर्य के प्रभाव के द्वारा प्रवृति या निवृति अन्तः प्रकृति में उत्पन्न करता है, उसका उपदेश नही देता। "
     मनुष्य सबसे अधिक कर्म सौन्दर्य के प्रति मुग्ध हित है और यह कर्म सौन्दर्य का विधान प्राचीन काल से ही होता आ रहा है। कर्म सौन्दर्य कही न कही ह्रदय से सम्बंधित है और वह भावो द्वारा नियंत्रित होती है। और भाव भी दो प्रकार के होते है पक्ष और प्रतिपक्ष-“मनुष्य के शरीर मे जैसे वाम और दक्षिण दो पक्ष है वैसे ही उसके ह्रदय में भी कोमल और कठोर, मधुर और तीक्ष्ण दो पक्ष है, बराबर रहेंगे। काव्यकला की पूरी रमणीयता इन दोनों पक्षो के समन्वय के बीच मंगल या सौन्दर्य के विकास मे दिखाई पड़ती है।“ 
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     निष्कर्ष रूप में हम कह सकते है कि काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था आचार्य रामचंद्र शुक्ल का एक विचारात्मक निबंध है।जिसमे उन्होंने काव्य के उद्देश्य पर विचार किया है। काव्य का मुख्य लक्ष्य लोकमंगल को मन गया है और यह लोकमंगल साधनावस्था में ही संभव है। अर्थात जब प्रयत्न और संघर्ष पक्ष चल रहे होते है तब उत्कृष्ट कोटि के काव्य का निर्माण होता है एवं उससे लोक में मंगल का विधान होता है। सिद्धावस्था का काव्य भोग पक्ष को लेकर चलता है इअलिये उसमें लोक उपेक्षित हो जाता है। काव्य और कवि कर्म सौन्दर्य पर भी इस निबंध में विचार किया गया है। कुल मिलाकर हम कह सकते है कि इस निबंध में काव्य सौन्दर्य, कविकर्म सौन्दर्य, काव्य रचना का मूल उद्देश्य आदि पर विचार किया गया है।














                                               
             
                                     
                                                                                                            गोबिंद यादव
                                                                                                        बिरसा मुंडा कॉलेज 
                                                                                         ( हातिघिसा, दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल )
                                                                                                          मो. 6294524332

शुक्ल युगीन हिंदी आलोचना की प्रवृतियां।

      हिंदी में विशुद्ध आलोचना का प्रारंभ शुक्ल युग से माना जाता है। शुक्ल पूर्व हिंदी आलोचना में ना कोई आदर्श था ना कोई सिद्धांत। शुक्ल के आगमन के पश्चात हिंदी आलोचना में एक विराट परिवर्तन देखने को मिलता है। शुक्ल ने साहित्य के वस्तु वादी दृष्टिकोण का विकास किया और सामाजिक विकास के समानांतर साहित्य को देखने और परखने पर बल दिया। शुक्ल युगीन आलोचना आचार्य रामचंद्र शुक्ल को केंद्र में रखकर चलती है। उन्होंने आलोचना के नवीन मानदंडों की स्थापना की और समीक्षा पद्धति का सुनिश्चित आधार दिया। शुक्ल युगीन आलोचना युग की परिस्थिति के परिपेक्ष में कृति के मूल्यांकन पर बल दिया।

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         शुक्ल युगीन आलोचना का प्रारंभ आचार्य रामचंद्र शुक्ल के महान आलोचनात्मक दृष्टि से प्रारंभ होता है। शुक्ल युगीन आलोचना की प्रमुख प्रवृतियां निम्नलिखित है-
1 तुलनात्मक आलोचना- शुक्ल की आलोचना के पूर्व जिस तुलनात्मक आलोचना का प्रारंभ हुआ था उसने आलोचक अपनी व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों के कारण किसी भी कवि या लेखक को श्रेष्ठ या हिन् सिद्ध करने की कोशिश करते थे। निश्चित रूप से आलोचना के शुद्ध प्रतिमान का निर्धारण तब तक नहीं हो सका था। निश्चित रूप से तुलनात्मक आलोचना के स्वस्थ एवं शुद्ध रूप का प्रारंभ शुक्ल युग से हुआ। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने आलोचना के नवीन मानदंडों की स्थापना की और समीक्षा पद्धति का सुनिश्चित पथ निश्चित किया।
2 विश्लेषणात्मक आलोचना- शुक्ल युग ने आलोचना की विश्लेषणात्मक पद्धति अधिक प्रचलित थी। स्वयं आचार्य रामचंद्र शुक्ल की आलोचना पद्धति विश्लेषणात्मक पद्धति थी। इसीलिए वे रचना के गुण दोष तक सीमित न रहकर रचनाकार के विशेषताओं एवं उसकी अंतर प्रवृत्ति की छानबीन करते हैं। हिंदी के अन्य आलोचकों में जहां एकांगी दृष्टिकोण का आरोप लगाया जा सकता है वहीं शुक्ला इन आरोपों से परे है। शुक्ल की आलोचना दृष्टि कुछ मूल्यों पर आधारित है। लोकमंगल की साधना, रस सिद्धांत आदि मूल्यों पर आधारित आलोचनात्मक निबंध है।
3 शास्त्रीय आलोचना- आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने शास्त्रीय आलोचना का विवेचन मौलिक ढंग से किया है। शुक्ल का रस मीमांसा शास्त्रीय विवेचन का ग्रंथ है। जायसी ग्रंथावली, भ्रमरगीत सार, गोस्वामी तुलसीदास आदि ग्रंथों में इन कवियों का मूल्यांकन वे शास्त्रीय विवेचन के आधार पर करते हैं।
4 कवि के व्यक्तित्व का अध्ययन- शुक्ल युगीन आलोचकों ने कवियों के रचनाओं के अध्ययन के साथ-साथ कवि के व्यक्तित्व को भी समझने का प्रयास किया। कवियों की सामान्य प्रवृत्तियों को उद्घाटित करना इस युग के आलोचकों का प्रमुख उद्देश्य हो गया। इसके अतिरिक्त उनकी कृतियों के आधार पर उनकी चिंतन धारा का अध्ययन भी किया। जैसे डॉ रामकुमार वर्मा द्वारा लिखित कबीर, पितांबर दत्त द्वारा लिखित निर्गुण संप्रदाय आदि व्यक्तिगत अध्ययन संबंधी आलोचना है।



5 देश काल की समीक्षा- साहित्य को उसके युगीन परिस्थितियों में रखकर आंकने की प्रवृत्ति का प्रारंभ आचार्य शुक्ल ने ही किया। उन्होंने तुलसी आदि महान कवियों के महत्व को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रखकर आका। हिंदी शब्द सागर की भूमिका में हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा। इतना ही नहीं कवियों एवं काव्य धारा के देशकाल पर विचार किया। इस युग के अन्य आलोचकों ने भी इस ऐतिहासिक प्रवृत्ति का उपयोग किया। पंडित विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने भूषण की कविता को देश काल की परिस्थितियों में रखकर उस पर विचार किया।
      निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि शुक्ल युगीन आलोचना शास्त्रीय विवेचन, तुलनात्मक विश्लेषणात्मक आदि प्रवृत्तियों को अपने में समेटे हुए हैं। शुक्ल का महान व्यक्तित्व  इस आलोचना को एक नवीन दिशा प्रदान करता है। आलोचना के तृतीय उत्थान से ही हिंदी में विशुद्ध आलोचना का प्रारंभ होता है।


                                                  
         
                                                                                                                                                     गोबिंद यादव
                                                                                                        बिरसा मुंडा कॉलेज 
                                                                                         ( हातिघिसा, दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल )
                                                                                                          मो. 6294524332




शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

'आहुति' कहानी की समीक्षा।

                    प्रेमचंद की कहानी 'आहुती'  
                                                                - गोबिंद कुमार यादव  

   'आहुति' कहानी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में प्रेमचंद द्वारा लिखी गयी एक महत्वपूर्ण कहानी है। 'आहुति' का अर्थ होता है हवन में डालने की सामग्री। जब यह कहानी लिखी गयी थी तब देश में स्वतंत्रता आंदोलन का विशाल हवनकुंड जल चूका था, जरूरत थी प्रत्येग वर्ग के आहुति की। प्रेमचंद ने इस कहानी के माध्यम से देश के एक बहुत बड़े वर्ग- छात्र वर्ग  को प्रेरित किया है, इस आजादी के हवन में अपने तन,मन,धन की आहुति देने के लिए।

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    कहानी की कथावस्तु अत्यंत सुगठित है। इस कहानी में विश्वविद्यालय मे पढ़ने वाले तीन छात्रों-आनंद,विशम्भर, रूपमणि के माध्यम से कहानी का कथानक गढ़ा गया है। आनंद पैसे और बुद्धि से संपन्न था। विशम्भर इस मामले में पिछड़ा हुआ था। रूपमणि अपने स्वास्थ्य के कारण कॉलेज छोड़ चुकी है। इस बिच विशम्भर कांग्रेस का वोलेंटियर बन जाता है। आनंद उत्क्व इस निर्णय से आहत होता है और उसे समझने की कोसिस भी करता है, पर वह नही मानता।रूपमणि से भी वह उसके विषय में भला-बुरा कहता है।रूपमणि भी विशम्भर को समझने की कोसिस करती है, लेकिन असफल हो जाती है। विशम्भर के दृढ़ निश्चय का रूपमणि पर गहरा प्रभाव पड़ता है और उसके सामने गांधी की सजीव मूर्ति घूमने लगती है। विशम्भर का त्याग रूपमणि को पूरी तरह अपनी ओर खींच लेता है और वह रोज स्वराज भवन जाने लगती है। एकदिन विशम्भर आंदोलन करते हुए पकड़ा जाता है और उसे दो साल की सजा हो जाती है। इस पर आनंद और रूपमणि मे बहस होती है जिसपर रूपमणि कहती है- "विशम्भर ने जो दीपक जलाया है वह मेरे जीते जी बुझ न पाएगा।" यहाँ कहानी समाप्त हो जाती है। 


      आहुति कहानी में संवाद बेहद सुगठित और कही-कही व्यंग्य की पैनि धार भी देखने को मिलती है। जहाँ रूपमणि और विशम्भर का संवाद है वहा सहजता और आकर्षण है। रूपमणि और आनंद के संवाद में व्यंग्य की धार भी देखने को मिलती है। आनंद-रूपमणि का एक संवाद यह द्रष्टव्य है- 
अनंद- यह तुम्हारी निज की कल्पना होगी।
रूपमणि- तुमने अभी इस आंदोलन का साहित्य पढ़ा ही नही।
आनंद- न पढ़ा है , न पढ़ना चाहता हु।
रूपमणि- इससे राष्ट्र की कोई बड़ी हानि न होगी।
  ऐसे संवाद कहानी मे रोचकता का सृजन करते है।
   देश काल और वातावरण मि दृष्टि से यह कहानी आजादी के दौर की कहानी है। विभिन्न प्रकार के आंदोलन और बिचारो मे भी क्रन्तिकारी वातावरण है। शहरो से लेकर देहातो तक आंदोलन की गतिविधियां तेजी से बढ़ रही थी-" विशम्भर ने देहातो में ऐसी जाग्रति फैला दी है कि विलायत का एक सूत भी बिकने नही पाता।"

     चरित्र-चित्रण की दृष्टि से इस कहानी में मुख्य रूप से तीन पात्र है-आनंद, विशम्भर, रूपमणि। तीनो पत्रों का चरित्र प्रेमचंद ने इस प्रकार गढा है की यह कहानी के मूल भाव का वहन करने में पूर्ण रूप से सक्षम है।

       भाषा शैली की दृष्टि से यह  कहानी उत्कृष्ट रचना है। भाषा की दृष्टि से इसमें सहज प्रवाह है और पाठक को बांधे रखने की क्षमता भी।इसमें उर्दू और अंग्रेजी के शब्दों का खुलकर प्रयोग हुआ है। वोलेंटीयर, यूनिवर्सिटी, प्रोफ़ेसर जैसे अंग्रेजी शब्द आये है तो वज़ीफ़ा,इम्तिहान जैसे फ़ारसी शब्द भी।

      इस कहानी का उद्देश्य तीस के दसक में तेजी से फैल रहे स्वतंत्रता संग्राम को समाज के हर तबके तक पहचान था। पूर्ण स्वराज्य के अर्थ को भी प्रेमचंद ने परिभाषित किया जो आजतक अधूरी ही है- "जिन बुराइयों को दूर करने के लिए आज हम प्राणों को हथेलियों पर लिए हुए है उन्ही बुराइयों को प्रजा इसीलिए सर चढ़ाएगी कि वे विदेशी नही स्वदेशी है? कम से कम मेरे लिये तो स्वराज का यह अर्थ नही है कि जॉन की जगह गोविन्द बैठ जाए।" 


    कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि यह कहानी स्वतंत्रता आंदोलन की समीक्षा करती है, स्वतंत्र आंदोलन के हवनकुंड में भारत के सभी वर्गों को अपनी आहुति देने के लिए प्रेरित करती है।












                                                     - गोबिंद यादव
                                                बिरसा मुंडा कॉलेज
                                                    6294524332

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