शुक्रवार, 23 जुलाई 2021

रेखाचित्रकार महादेवी वर्मा

 रेखाचित्रकार महादेवी वर्मा :-  महादेवी वर्मा ‘छायावाद’ युग के प्रमुख आलोक स्तम्भों में से एक हैं। प्रसाद, निराला, पंत जैसे कवियों की इस काव्य त्रिवेणी के बीच महादेवी जी ने अपनी रचनाधर्मिता के बल पर न केवल स्त्री प्रतिभा का लोहा मनवाया, वरन् इन कवियों की काव्य सरिता को हिन्दी साहित्य सागर रूपी विविध विधाओं के साथ उनका समन्वय किया है।  हम देखते हैं कि गद्य में जहाँ नवीन विधाओं को अत्यधिक विकसित होने का अवसर प्राप्त हुआ, वहीं दूसरी ओर कविता के लिए भी अपार संभावनाओं के द्वार खुल गए। बहरहाल यहाँ मेरा मन्तव्य महादेवी जी के रेखाचित्रों में रचे-बसे उन तमाम अनुभूतियों में गुंफित कोमल, मधुर स्मृतियों को उजागर करना है, जिसके सहारे लेखिका की जीवन दृष्टि को समझते हुए, उन सामाजिक एवं मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा करना है, जहाँ पहुंच कर मनुष्य; मनुष्य के मध्य का भेद समाप्त हो जाता है। शेष रहती है तो असीम करूणा और चरम शांति।

‘रेखाचित्र’ हिन्दी साहित्य की नवीन किंतु आधुनिक गद्य विधाओं में से एक है। प्रत्येक साहित्यिक विधा ‘वस्तु’ और ‘शिल्प’ की दृष्टि से अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखती है। कोई भी विषय किसी विशेष शिल्प के अंतर्गत संप्रेषण की विशेष योग्यता प्राप्त कर लेता है। इस तरह देखा जाय तो कहा जा सकता है कि चित्रकार की चित्र कला को जो महत्व प्राप्त है वही महत्व रेखाचित्रकार की रचना रेखाचित्र का भी है।

वास्तव में रेखाचित्र ‘शब्दचित्र’ है। जिस प्रकार चित्रकार रंगों के अंकन और सौष्ठव द्वारा चित्र का निर्माण कर उसे प्रभावशाली और सजीव बना देता है, ठीक उसी प्रकार रेखाचित्रकार सौष्ठवपूर्ण शब्दों की सहायता से अपनी रचना को स्वरूप प्रदान करता है। इसकी सफलता रचनाकार के भाषागत वैशिष्ट्य तथा जीवनानुभूतियों की सशक्त अभिव्यक्ति पर आधारित है। हिन्दी साहित्य में जब इस विधा का पहलेपहल पदार्पण हुआ, तो इसकी परिभाषा भी स्वभावतः इसके साथ ही निर्मित हुई। “स्केच की तरह ही रेखाचित्र में भी कम से कम शब्दों में कलात्मक ढंग से किसी वस्तु, व्यक्ति या दृश्य का अंकन किया जाता है। इसमें साधन शब्द होते हैं रेखाएं नहीं”

रेखाचित्र में अनेक साहित्यिक विधाओं की तरंगे उठती रहती हैं। इसमें कहानी का कौतुहल है तो, निबंध की गहराई गद्यकाव्य की भावात्मक लयात्मकता है तो, डायरी में व्यक्त निश्छल मन की अभिव्यक्ति। संस्मरण की व्यक्तिकता है तो, साक्षात्कार का खुलापन। आत्मकथा और जीवनी जैसी आत्मीयता और बेबाकीपन है तो, यात्रावृत्तांत का सीमित विस्तार। व्यंग की छेड़छाड़ है तो, रिपोर्ताज की गुनगुनाहट। विभिन्न साहित्यिक रसों में सराबोर यह रेखाएं अंगड़ाई लेती हुई विशिष्ट शब्द चित्रों में ढल कर एक ऐसा संसार रचती हैं, जिसमें रहने वाले लोग हमारे इसी लोक के प्राणी हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो रेखाचित्र विभिन्न विधाओं की विशेषताओं का विचित्र समुच्चय है। लेकिन सबसे अधिक रेखाचित्र का साम्य संस्मरण के साथ माना जाता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि लगभग समस्त विधाओं की विशेषताओं को अपने में समेटे हुए रेखाचित्र की अपनी विशेषता औऱ अपनी पहचान है।

अतिशय संवेदना, विषय संबंधी एकात्मकता, अंतर्मुखी चारित्रिक विशेषता, विश्वसनीयता, सूक्ष्म परिवेक्षण शक्ति, संक्षिप्तता तथा प्रतीकात्मकता आदि इसकी विशेषताएं मानी जा सकती हैं। यद्यपि यह कथेत्तर गद्य विधाओं मे नवीन विधा है और हिन्दी साहित्य में विधा के रूप में प्रतिष्ठित भी हो चुकी है। लेकिन क्या कारण है कि विद्वानों की दृष्टि से रेखाचित्र का सैद्धान्तिक विवेचन ओझल ही रहा?

दूसरे शब्दों में कहें तो रचनात्मक रूप में तो इस विधा को जितनी महत्ता और स्वीकारोक्ति मिली, उतने ही इसके शास्त्रीय स्वरूप की अवहेलना हुई। अतः रेखाचित्र का स्वरूप निर्धारण सरल नहीं है। इसके स्वरूप एवं वैशिष्ट्य को प्रतिस्थापित करने के लिए हमारी दृष्टि में रेखाचित्र लेखकों की रचनाओं का आधार ग्रहण किया जाना अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है।


गोबिन्द कुमार यादव

बिरसा मुंडा कॉलेज

6294524332

शनिवार, 3 जुलाई 2021

भाषा और उसके अभिलक्षण

     मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इससे उनका एक दूसरे के संपर्क में आना स्वाभाविक है। संपर्क में आने पर विचार विनिमय अनिवार्य है। अतः जिस साधन से यह विचार विनिमय होता है, उसे ही भाषा की संज्ञा दी जाती है। अथवा यह कहा जा सकता है कि भावाभिव्यक्ति के साधन को सामान्य रूप से भाषा कह दिया जाता है। जब हम भाषा की परिभाषा वैज्ञानिक तरीके से दें तो यह याद रखें कि भाषा विज्ञान में भाषा की परिभाषा को पशु पक्षियों की बोली, इशारे इत्यादि को इस रूप में नहीं लेना चाहिए। सामान्यतः विचार विनिमय के दो साधन माने गए हैं-१)शब्दों एवं वाक्य द्वारा २)संकेतों द्वारा। रेल की हरी झंडी, चौराहे की सिग्नल, चुटकी, ताली आदि की सांकेतिक भाषा को भाषा विज्ञान के वैज्ञानिक एवं संशोधित भाषा के अंतर्गत नहीं देखा जाता। यदि हम भाषा को इशारे से भावा भी व्यक्ति करते हैं तो इसे संकेत अथवा इशारे की भाषा कहते हैं।

      भाषा की उत्पत्ति पर विचार करते हुए पाणिनि उसे भाष धातु से जोड़ा जिसका अर्थ है  ‘व्यक्त वाणी’। भाषा का संबंध व्यक्ति वाणी से है।

    भाषा को लेकर हिंदी और पाश्चात्य विद्वानों में अलग-अलग मत है।

                  पाश्चात्य के विद्वानों का मत

 प्लेटो के अनुसार – “विचार आत्मा की मूक अथवा अध्वन्यात्मक बातचीत है जो ध्वन्यात्मक बनकर होठों पर प्रकट होते ही भाषा कहलाती है।“

स्वीट के अनुसार – “ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा विचारों की अभिव्यक्ति का नाम भाषा है।“

क्रोचे के अनुसार – “भाषा उस स्पष्ट तथा सुगठित ध्वनि को कहते हैं जो अभिव्यंजना के लिए निर्धारित की जाती है।“

ब्लॉक तथा ट्रेजर के अनुसार – “भाषा व्यक्त ध्वनि चिन्हों की वह पद्धति है जिसके माध्यम से समाज के व्यक्ति परस्पर व्यवहार करते हैं।

गार्डनर के अनुसार-  “विचारों की अभिव्यक्ति के लिए जिन व्यक्त और स्पष्ट ध्वनि संकेतों का व्यवहार किया जाता है उसे भाषा कहते हैं।“

                हिंदी के विद्वानों का मत

कामताप्रसाद गुरु के अनुसार-  “भाषा वह साधन है जिसके माध्यम से मनुष्य अपने विचार दूसरों पर भली-भांति प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार स्पष्ट रूप से समझ सकता है।“

मंगल देव शास्त्री के अनुसार- “भाषा मनुष्य की उस चेष्टा या व्यापार को कहते हैं जिससे मनुष्य अपने उच्चारण उपयोगी शरीर अवयवों से उच्चारण किए गए वर्णात्मक या व्यक्त शब्दों द्वारा अपने विचारों को प्रकट करते हैं।

डॉ भोलानाथ तिवारी के अनुसार- “भाषा मानव के उच्चारण अवयवों द्वारा उच्चारित यादृच्छिक ध्वनि प्रतीकों की वह संरचनात्मक व्यवस्था है जिसके द्वारा समाज के  लोग आपस में विचार विनिमय करते हैं ।

 

 

 

भाषा के अभिलक्षण।

भाषा पर जब विचार किया जाता है तब उसका आशय मनुष्य की भाषा से होता है। यहाँ अभिलक्षण से तात्पर्य विशेषता से है अथवा मूलभूत लक्षण से है। क्योंकि किसी वस्तु या पदार्थ के लक्षण ही उसे दूसरे पदार्थ से अलग करते हैं। मानव भाषा के अभिलक्षण वे हैं जो उसे अन्य प्राणियों की भाषा से अलग करते हैं। मानव भाषा के अभिलक्षण निम्न है-

1)यदृच्छिकता- यदृच्छिकता का अर्थ है ‘जैसी इच्छा हो’ या ‘माना हुआ’। ऐसा शब्द जो मन मे चित्रित होता है। शब्दो के अंदर निहीत वह बिम्ब जिसको सुनकर हमारे मन में एक चित्र आ जाता है। भोलानाथ तिवारी ने यदृच्छिकता को पहले स्थान पर रखा है।

2)सृजनात्मकता- भाषा की दूसरी विशेषता सृजनात्मकता है। भाषा में शब्द और रूप प्रायः सिमित होते है उन्ही के आधार पर हम अपनी आवश्यकता के अनुसार अनेक वाक्यो का सृजन करते है। इस अभिलक्षण को उत्पादकता भी कहा जाता है।

3)अनुकरणग्रहिता- भाषा में अनुकरण की क्षमता होती है। मानव भाषा जन्मजात नही होती है। इसे हम अनुकरण कर के ही सीखते है। मानवेत्तर जिव जंतुओं की भाषा जन्मजात होती है। किंतु मनुष्य भाषा को अनुकरण कर के सीखता है।

4)परिवर्तनशीलता- मानव भाषा परिवर्तनशील है। मानवेत्तर जीवो की भाषा  परिवर्तित नहीं होती। जैसे कोई भी जानवर पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही प्रकार की अपरिवर्तित भाषा का प्रयोग करते आ रहे हैं किंतु मानव भाषा हमेशा परिवर्तित होती रहती है ।


गोबिंद कुमार यादव

बिरसा मुण्डा कॉलेज

6294524332 

 

बुधवार, 30 जून 2021

रजिया रेखाचित्र के आधार पर रजिया का चरित्र चित्रण





रजिया रामबृक्ष बेनीपुरी के रेखाचित्र संग्रह 'माटी की मुर्ते' में संग्रहित है जिसमे उन्होंने ग्राम चरित्रों को बखूबी चित्रित किया है। रजिया रेखाचित्र को भी उन्होंने ज्यो का त्यों चित्रित कर दिया है यही इस रेखाचित्र की सुंदरता है। इसमें रजिया के समूचे जीवन का सरस और सलोना चित्र लेखक ने खिंचा है। उसका संपूर्ण जीवन एक सजीवता, मधुरता और मनोहरता में नृत्य करता हुआ प्रतीत होता है। लेखक ने रजिया के बाह्य वर्णन, वेशभूषा का सूक्ष्म वर्णन इतनी तल्लीनता के साथ किया है कि उसका वास्तविक रूप मूर्तिमान हो गया है। इस रेखा चित्र में लेखक ने रजिया के बालपन से लेकर बृद्धावस्था तक का वर्णन इतनी स्पष्टता एवं कलात्मक तरीके से किया है कि उसका संपूर्ण जीवन दृश्यमान हो जाता है। लेखक ने रजिया के वाह्य एवम आतंरिक सौंदर्य पूरी सफलता के साथ उभरा है। इस रेखाचित्र में रजिया की निम्न विशेषताएं देखने को मिलती है।
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1)बाह्य सौंदर्य- रेखाचित्र के प्रारंभ में ही लेखक रजिया के रूप सौंदर्य का चित्रण करता है। रजिया अपने बाल्यावस्था मे जितनी आकर्षक और सुन्दर दिखती है उम्र बढ़ने के साथ उसका सौंदर्य और भी निखारता जाता है। रजिया के नाल्यावस्था के सौंदर्य का चित्रण लेखन निम्न पंक्तियों में करता है-“ गोर चेहरे तो मिले है किन्तु इसकी आँखों में जो अजीब किस्म का नीलापन दीखता वह कहा, और समूचे चेहरे की काट भी कुछ निराली जरूर।“ रजिया का सौंदर्य किशोरावस्था में और निखरता गया और उसका एक स्वतंत्र अस्तित्व भी बनता गया। “ रजिया बढ़ती गई बच्ची से किशोरी हुई और अब जवानी के फूल उसपर खिलने लगे है। अब भी वह अपनी माँ के साथ आती है, कनितु पहले वह अपनी माँ की एक छाया मात्र लगती थी किन्तु अब उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी है और उसकी छाया बनने के लिए कितनो के दिलो में कसमसाहट है।“



2) संकोच एवं प्रेम भाव- लेखक का रजिया के साथ जो सम्बन्ध है उसे न दोस्ती कहा जा सकता है और न ही प्रेम। न सिर्फ लेखक ही रजिया भी सामान भाव से लेखक की तरफ आकर्षित थी। बाल्यावस्था में यह आम बात थी। जब भी लेखक गाँव अत रजिया सहज भाव से उसके पास आ जाती और ढेर सारी इधर-उधर की बाते करती। किन्तु उम्र के बढ़ने के साथ यह भाव भी बदलता गया। जब भी लेखक रजिया बाते करते गाँव के लोग उन्हें दूसरी निगाहों से देखने लगते, इस कारण रजिया में संकोच बढ़ता गया। “ फिर कुछ दिनों बाद पाया, वह अब सकुचा रही है। मेरे निकट आने के पहले वह इधर-उधर देखती है। और जब कुछ बाते करती तो ऐसी चौकन्नी से कि कोई देख न ले, सुन न ले।“

3) परिश्रमी- रजिया जन्मना परिश्रमी थी। उसके जन्म के बाद ही उसकी नियति अपने पारिवारिक कार्यक्षेत्र में जाना निश्चय था। बचपन से ही वह अपनी माँ के साथ चूड़ियां बेचने जाया करती थी और शीघ्र ही वह चूड़ियां बेचने और पहनने में पारंगत भी हो गयी। उसे चूडीहरिनो की सभी अदाएं आ गयी जो उसके पेशे के लिया आवश्यक है। “हा, रजिया अपने पेशे में भी निपुण होती जाती थी। चुड़िहारिन के पेशे के लिए सिर्फ यही नही चाहिए कि उसके पास रंग-विरंग की चूड़ियां हो- सस्ती, टिकाऊ....बल्कि यह पेशा चूड़ियों के साथ चूडीहरिनो में बनाव-श्रृंगार, रूप-रंग, नाजोअदा खोजता है।“ रजिया बहुत शीघ्र ही इसमें पारंगत हो गयी थी।

4) खुशहाल- रजिया का जीवन बेहद खुशहाल था। वह मेहनती थी। उसने प्रेम विवाह भी किया। उसके तीन पुत्र भी हुए । उनके भी बच्चे हुए। पुरे रेखाचित्र मे कही भी उसके जीवन की परेशानियों का चित्रण नही हुआ है। जीवन की स्वाभाविक उत्तर चढ़ाओ तो आते रहते है किंतु कही भी ऐसा चित्र नही उभरा है जहाँ यह दिखे कि राजियो के जीवन में किसी प्रकार की कोई परेशानी हो।
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5) ईमानदार- रजिया अपने जीवन और पेशे दोनों में ईमानदार है। अपने रिश्ते के प्रति भी वह पूर्ण ईमानदार है। वह लेखक और अपने बिच के दोस्ती को अपने पति से कभी नही छिपाती। रजिया का व्यक्तित्व एक ईमानदार युवती का है।

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते है कि रजिया रेखाचित्र में लेखक ने एक ऐसे ग्रामीण युवती का चित्र खिंचा है जो रूप सौंदर्य से लेकर उद्दात व्यक्तित्व के धनि है। उसका चरित्र एक आदर्श स्त्री का चरित्र है जिसने दोस्ती और पारिवारिक सम्बन्ध को ईमानदारी से निभाया है।









गोबिन्द कुमार यादव

बिरसा मुंडा कॉलेज



6294524332

महाकवि जयशंकर प्रसाद रेखाचित्र के आधार पर प्रसाद का चरित्र-चित्रण





'महाकवि जयशंकर प्रसाद' शीर्षक रेखाचित्र में शिवपूजन सहाय ने बताया कि प्रसाद महान् साहित्यकार एवं महाकवि थे। इसके अलावा वे विलक्षण स्मृति-शक्ति से सम्पन्न थे। वे स्वजातीय गुणों से युक्त और अनेक कलाओं के मर्मज्ञ थे। काशी की सभी विशेषताओं के भी विशेषज्ञ थे। वे काशी के पुराने, रईसों, पण्डितों, नर्तकों, लावनीबाजों एवं गायिकाओं आदि सभी की कहानियों के ज्ञाता थे। वे धर्मात्मा प्रवृत्ति के थे। व्यापारियों, मल्लाहों, सुनारों आदि की बोलियों और पशु- पक्षियों के लक्षणों के ज्ञाता भी थे।

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प्रसाद की वैदिक वाङ्गय और प्राचीन इतिहास में गहरी पैठ थी। संस्कृतसाहित्य के प्रमुख अंगों का अध्ययन-मनन करने में वे सदैव तत्पर रहते थे। शालिहोत्र एवं आयुर्वेदशास्त्र के महत्त्वपूर्ण प्रकरणों को लेकर सुन्दर प्रवचन देते थे। उन्हें मोती, हीरा आदि रत्नों के गुण-दोषों को पूरा ज्ञान था। इसी प्रकार किमाम-इत्र आदि के निर्माण में दक्ष थे। काठौषधियों और जड़ी-बूटियों के ज्ञान में वैद्यक-ग्रन्थों के श्लोक उपस्थित कर देते थे। इस प्रकार प्रसाद लोक-ज्ञान से सम्पन्न महापुरुष थे।

आचार्य शिवपूजन सहाय ने 'महाकवि जयशंकर प्रसाद' रेखाचित्र में प्रसादजी के व्यक्तित्व की अनेक विशेषताओं का वर्णन किया है। तदनुसार उनके व्यक्तित्व का निरूपण इस प्रकार है।

1. महान् साहित्यकार - प्रसाद महान् साहित्यकार एवं महाकवि थे। उन्होंने नाटक, उपन्यास, महाकाव्य आदि की रचना से हिन्दी साहित्य के भण्डार को समृद्ध किया। जब साहित्य के विविध पक्षो पर सभी साहित्यकार बाते करने लगते “तब प्रसाद जी की सरस्वती का मुखर होना देखकर चकित रह जाना पड़ता।“

2. प्रतिभासम्पन्न व्यक्तित्व - प्रसाद अनुपम प्रतिभासम्पन्न थे। उन्होंने अपनी रचनाओं तथा अन्य कार्यों में विशिष्ट प्रतिभा का परिचय दिया। साहित्य के सभी विधाओं पर प्रसाद का असाधारण अधिकार था। उनकी साहित्यिक प्रतिभाओं पर हिंदी जगत आज भी गर्व अनुभव करता है। “ हिंदी को प्रसाद जी कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध आदि के रूप में जो निधि दे गए है, उसका मूल्याङ्कन कर के आज गौरव का अनुभव किया जा रहा है।“

3. कला-मर्मज्ञ - प्रसाद अनेक कलाओं के मर्मज्ञ थे। वे काशी की विशेषताओं के विशेषज्ञ थे। पाककला के ज्ञाता और अपने व्यवसाय मे कुशल थे। उन्हें न सिर्फ साहित्य बल्कि विविध कलाओं में भी पारंगत थे।

4. सर्वशास्त्रज्ञ - प्रसाद की भारतीय शास्त्रों में, आयुर्वेद, शालिहोत्र, वेद, उपनिषद एवं संस्कृत साहित्य के सभी अंगों में गहन गति थी। उन्होंने शास्त्रों का गहन अध्ययन किया था। रेखाचित्र में लेखक लिखते हैं - "वैदिक ऋचाएं और उपनिषदों के लच्छेदार वाक्य तो उन्हें कण्ठस्थ थे ही,संस्कृत महाकवियों ने किस शब्द क कहा किस अर्थ में कैसा चमत्कार्पुर्ण प्रयोग किया है,इसको भी वे सोदाहरण उपस्थित करते चलते हैं। शालिहोत्र और आयुर्वेद-शस्त्रों के महत्वपुर्ण प्रकरणों पर उनके प्रवचन सुनने से उनके विस्तृत ज्ञान पर आश्चर्य होता था।" साहित्य अपने निबंधों में उनके शास्त्रों की गहन जानकारी को हम देख सकते है।

5. लोकज्ञान से सम्पन्न प्रसाद को विभिन्न व्यवसायों की पारिभाषिक शब्दावली और विविध बोलियों का गहन ज्ञान था। न सिर्फ हिंदी ब्रज भाषा का भी प्रसाद को अच्छा ज्ञान था। अपनी प्रारंभिक कविताएं वे ब्रज में ही किया करते थे।"खडीबोली हिंदी में ही काव्य रचना करते थे किंतु प्राचीन ब्रजभाषा काव्य में भी मर्मज्ञ थे। ब्रजभाषा सहित्य के बडे अनुरागी और प्रशंसक थे।" लोक को देखने एवं लोक संवेदना का चित्रण उनकी कविताओं में भी देखने को मिलता है।
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6. व्यवसाय में कुशल - प्रसाद अपने पैतृक व्यवसाय में कुशल थे तथा किमाम-इत्र आदि को बनाने में दक्ष थे। व्यवसाय उन्हें पारिवारिक विरासत में मिली थी। और उस व्ययसाय में वे कुशल और पारंगत थे।

7. स्वाध्यायशील - प्रसाद विद्याव्यसनी थे और रात्रि में स्वाध्याय में निरत रहते थे। स्वाध्याय से ही उन्होंने सभी शास्त्रों एवं कलाओं का ज्ञान प्राप्त किया था। स्वाध्याय से ही उन्होंने वेद, उपनिषद, लोकशास्त्र का गहन अध्ययन किया था।







गोबिंद कुमार यादव



बिरसा मुंडा कॉलेज

6294524332
1. 'अहुती' कहानी की समीक्षा


2. शुक्ल युगीन हिंदी आलोचना की प्रवृतियां


3. सागर कन्या और खग शावक यात्रा वृतांत की समीक्षा


4. चित्रलेखा उपन्यास मे व्यक्त पात्र-योजना


5. रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टी


6. आचार्य रामचंद्र शुक्ल की निबंध-कला


7. हिंदी साहित्य का आदिकाल : हजारी प्रसाद द्विवेदी ( पुस्तक समीक्षा )


8. 'वापसी' कहानी की समीक्षा


9. नाखुन क्यों बढते हैं ? निबंध की समीक्षा


10. जीवन की आशा : 'ध्वनि' कविता


12. श्रव्य और दृश्य माध्यमों की समाजिक जीवन में भूमिका

नाखून क्यों बढ़ते हैं? निबंध की समीक्षा

नाखून क्यों बढ़ते हैं? निबंध की समीक्षा

नाखून क्यों बढ़ते हैं? एक ललित निबंध है। जिसमें भारतीयता, उसकी महत्ता, यहां के लोगों की सामाजिक व्यवस्था, राजनीतिक चिंतन, रहन-सहन, भाषा ज्ञान, संस्कृति पर समान रूप से प्रकाश डालते हैं। इस निबंध में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का मानवतावादी दृष्टिकोण उभरकर सामने आया है। इसके माध्यम से बार-बार काटे जाने पर भी बढ़ जाने वाले नाखून के माध्यम से सहज शैली में सभ्यता और संस्कृति की विकासगाथा को उद्घाटित करते हैं। एक ओर नाखून का बढ़ना मनुष्य की आदिम पाशविक प्रवृत्ति और संघर्ष चेतना का प्रमाण है तो वहीं दूसरी ओर नाखून को बार-बार काटते रहना उसके मनुष्यता की निशानी है।

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द्विवेदीजी के इस निबंध की शुरुआत बच्चे की जिज्ञासा या एक प्रश्न से होती है। "नाखून क्यों बढ़ते हैं?" यह प्रश्न बच्चे द्वारा पूछा गया सामान्य सा प्रश्न नहीं रहता, जब लेखक इस प्रश्न में अंतर्निहित उसके व्यापक अर्थ को खोलता है । हम सभी जानते हैं कि नाखूनों का आज ऐसा कोई उपयोग नहीं है जो उसके होने की आवश्यकता को सिद्ध करे। लेकिन मानव इतिहास में एक समय ऐसा भी रहा होगा जब मनुष्यों को इन नाखूनों की जरूरत थी। अपनी बर्बर अवस्था में जब मनुष्य बनमानुस की तरह रहा होगा, तब अपनी रक्षा और शिकार के लिए दांतों और नाखूनों का इस्तेमाल भी करता होगा। लेकिन आज नाखूनों का ऐसा कोई उपयोग बाकी नहीं रहा है। फिर भी, नाखून बढ़ते जाते हैं। आज नाखून को बढ़ाना अच्छा नहीं माना जाता, इसलिए मनुष्य बढ़े हुए नाखूनों को काटता है। शायद इसलिए कि बढ़े हुए नाखून असभ्यता और जंगलीपन की निशानी है।

द्विवेदीजी इस निबंध मे एक नया प्रश्न उठाते हैं। अगर मनुष्य सचमुच बर्बरता के चिह्नों से छुटकारा पाना चाहता है तो फिर वह हथियारों का निर्माण क्यों कर रहा है? किसी जमाने में मनुष्य अपनी रक्षा के लिए नख और दांत का प्रयोग करता था। फिर, पत्थर, लकड़ी और हड्डियों का इस्तेमाल करने लगा। लोहे के हथियार बने, बारूद का आविष्कार हुआ और अब एटम बम का युग है। हथियारों के इस विकास को देखें तो हम समझ सकते हैं कि मनुष्य अधिक से अधिक विध्वंसक हथियार बनाने की ओर बढ़ रहा है। हिरोशिमा और नागासाकी का उदाहरण हमारे सामने हैं जहां एटम बमों ने लगभग दो लाख लोगों को कुछ ही मिनटों में लाश में बदल दिया था। तब कैसे कह सकते है कि मनुष्य सचमुच बर्बरता से मुक्त होना चाहता है? उसकी बर्बरता लगातार बढ़ रही है –“मनुष्य की बर्बरता घाटी कहा है, वह तो बढ़ती जा रही है। मनुष्य के इतिहास में हिरोशिमा का हत्याकांड बार-बार थोड़े ही हुआ है। यह तो उसका नवीनतम रूप है।”

द्विवेदीजी निबंध में हमें यह जानकारी देते हैं कि आज सें दो हजार साल पहले भारत में नाखूनों को सजाने संवारने की कला का विकास भी हुआ थ.स्पष्ट है कि नाखूनों के जिस उपयोग का यहां संकेत दिया गया है उसका संबंध मनुष्य की विलास वृत्ति से रहा है। लेकिन द्विवेदीजी इस तरह की प्रवृत्ति के सकारात्मक पक्ष को भी हमारे सामने रखते हैं, जब वे कहते हैं कि “'समस्त अधोगामिनी वृत्तियों को और नीचे खींचने वाली वस्तुओं को भारतवर्ष ने मनुष्योचित बनाया है।“ द्विवेदीजी के कहने का तात्पर्य यह है कि वे वस्तुएं जो मनुष्य को पतन की ओर ढकेलती हैं उनको भी भारतीय परंपरा ने कला का रूप देकर मनुष्यत्व के अनुकूल बनाने का प्रयास किया है।

उन्होंने इस निबंध में मुख्य प्रश्न यह उठाया है कि मनुष्य पशुता से मुक्त क्यों नहीं हो पा रहा है? नाखून के बढ़ने को वे पशुता मानते हैं और हथियारों के निर्माण को भी- “जानते हो नाख़ून क्यों बढ़ते है? यह हमारी पशुता के अवशेष है। जानते हो ये अस्त्र-शस्त्र क्यों बढ़ रहे है? ये हमारी पशुता की निशानी है।“ नाखून का बढ़ना ऐसी ही सहजात वृत्ति है जो उस अवस्था की द्योतक है जब मनुष्य बर्बर अवस्था में रहता था । मनुष्य इस बात को आज भूल गया है कि नाखूनों का बढ़ना उसी पशुत्व का प्रमाण है। बाहरी तौर पर वह पशुत्व को छोड़ चुका है लेकिन पशुत्व का चिह्न अब भी विद्यमान है जिसे वह बढ़ने पर काट देता है। लेकिन क्या मनुष्य ने सचमुच मनुष्यता को अपना लिया है? इस प्रश्न का उत्तर है "नहीं"। क्योंकि मनुष्य नाखून भले ही काट रहा हो लेकिन हथियारों को तो लगातार बढ़ा ही रहा है।

समस्या की ही तरह वे समाधान के प्रश्न को भी सीधे रूप में नहीं रखते। वे अपनी चर्चा की शुरुआत अंग्रेजी के एक शब्द "इंडिपेंडेंस के भारतीय पर्याय से करते हैं। "इंडिपेंडेंस" का अर्थ है अनधीनता। अनधीनता का आशय है "किसी की अधीनता का अभाव' । लेकिन भारतीय पर्याय यह नहीं है। भारतीय पर्याय है, स्वाधीनता या स्वतंत्रता अर्थात स्व की अधीनता या स्व का तंत्र। इस प्रकार इसमें किसी की अधीनता का अभाव नहीं बल्कि 'स्व' की अधीनता का भाव निहित है। इसे दिवेदीजी भारतीय संस्कृति की विशेषता मानते हैं।

यहां एक शंका खड़ी हो सकती है कि क्या दिवेदीजी भारतीय परंपरा का महिमा मंडन कर रहे हैं? निश्चय ही नहीं । द्विवेदीजी कालिदास के मत का उल्लेख करते हुए स्पष्ट कर देते हैं कि उनकी दृष्टि पुरातनपंथियों जैसी नहीं है। लेकिन उनका मानना है कि अगर हमारे अतीत के कोष में मानव जाति की भलाई की कोई बात हो तो हमें उसे अवश्य स्वीकार करना चाहिए।

आचार्य द्विवेदी इसके बाद मानव जाति के लिए सामान्य धर्म की बात को उठाते हैं। आखिर मनुष्य और पशु में मुल अंतर क्या है? भारतीय परंपरा में आहार, निद्रा, भय और मैथुन ये चार बातें ऐसी मानी गयी हैं जो मनुष्य और पशु में एक समान है। स्पष्ट ही इन चार बातों के होने मात्र से कोई मनुष्य, मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं बन जाता। तब वह क्या चीज है जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है? यहाँ दिवेदीजी उस सामान्य धर्म की बात करते हैं जिसे स्वयं मनुष्य ने खोजा है और जिसे मनुष्य अपने ऊपर बंधन के तौर पर स्वीकार किया है। संयम, श्रद्धा, तप, त्याग और दूसरों के दुख- सुख के प्रति संवेदना । निश्चय ही ये ऐसे धर्म हैं जिन्हें स्वीकार करने के लिए मनुष्य बाध्य नहीं है लेकिन जिन्हें स्वीकार करके मनुष्य, मनुष्य कहलाने का अधिकारी बनता है।

भौतिक उन्नति इस बात की गारंटी नहीं है कि मनुष्य पशुत्व से मुक्त हो जाएगा। हथियार इसी भौतिक उन्नति का अंग है जिससे केवल विध्वंस और विनाश ही हो सकता है। लेकिन क्या मनुष्य का लक्ष्य विनाश है? महात्मा गांधी ने सावधान किया था कि सिर्फ भौतिक उन्नति से सुख और शांति नहीं मिलेगी। अपने मन को भी बदलना होगा मन से हिंसा, क्रोध, द्वेष और असत्य को दूर करना और दूसरों के लिए जीना सीखना होगा, दूसरों के लिए कष्ट सहन करना होगा।

द्विवेदीजी कहते हैं कि हो सकता है किसी दिन नाखून बढ़ना बंद हो जाएं क्योंकि जो हमारे लिए गैरे जरूरी है प्रकृति उसे हमसे अलग कर देती है - जैसे पूंछ । हो सकता है किसी दिन मनुष्य विध्वंसकारी अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण बंद कर दे। लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता है तब तक हमें बच्चों को सिखाना होगा कि नाखून का बढ़ना पशुता की निशानी है और उसको बढ़ने देना मनुष्य का आदर्श नहीं है। इसी तरह हथियारों की बढ़ोतरी हमारी पशुता की निशानी है। और उनको कम करने की इच्छा रखना हमारी मनुष्यता का प्रमाण है। हमें अपने मनुष्य होने की पहचान को नहीं भूलना चाहिए।

मानव जाति की सार्थकता विनाशकारी हथियारों का ढेर लगाने में नहीं है। मनुष्य जीवन की सार्थकता इस बात नें है कि वह प्रेम, मैत्री और त्याग के मार्ग पर चले तथा सब के कल्याण के लिए अपने को समर्पित कर दे। नाखून के बढ़ने की तरह हिंसक वृत्ति भले ही मनुष्य की सहज वृत्ति का परिणाम हो, लेकिन उससे मुक्त होने की कोशिश करना भी मनुष्यत्व की पहचान है।

इस प्रकार द्विवेदीजी नाखून बढ़ने के सवाल से मनुष्य की हिसक वृत्ति को जोड़ते हैं और हिंसक वृत्ति के सवाल को हथियारों की बढ़ोतरी से। हथियारों में वृद्धि होने से मानवजाति के संपूर्ण

विनाश का खतरा उत्पन्न हो गया है। प्रश्न यह है कि इससे मुक्त कैसे हों? द्विवेदीजी इसके लिए आत्मनियंत्रण का मार्ग सुझाते हैं जो भारतीय परंपरा की देन है और जिसके द्वारा ही मनुष्य अपने अंदर की पशुता से मुक्त हो सकता है। अतः हम कह सकते हैं कि यह निबंध हमें विश्व- शांति के महत्त्व पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है ।

निष्कर्ष रूप म हम कह सकते है कि इस निबंध में आचार्य द्विवेदीजी का मानवतावादी दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। मनुष्य ने कुछ ऐसी भावनाओं और धारणाओं को भी अंगीकार किया है जिनसे वह अपनी पाशविकता पर विजय प्राप्त कर सके । दूसरों के सुख-दुख के प्रति संवेदना का भाव. भाव, दूसरों के लिए कष्ट उठाना वृत्तियों पर विजय पा सकता है। प्रेम का ये ऐसी चीजें हैं जिनसे व्यक्ति घृणा, क्रोध, हिंसा जैसी इस प्रकार हम देखते हैं कि इस निबंध में बस्तुत: दो भिन्न तरह की भावधाराओं का संघर् दिखाया गया है जिन्हें आज की हमारी सभ्यता के मूल में निहित माना जा सकता है।













गोबिंद कुमार यादव

बिरसा मुंडा कॉलेज
6294524332

सोमवार, 10 मई 2021

वापसी कहानी की समीक्षा

 पसी कहानी उषा प्रियंवदा की प्रमुख कहानियों में से एक है जिसमे उन्होंने दो पीढियो के द्वंद को दिखाया गया है । पीढियो के द्वंद से उपजी त्रासदी एवं इसमे पुरानी पीढ़ी के हासिये पर जाने को कहानी का मूल कथ्य बनाया गया है। कहानी आधुनिकता के उस द्वंद को सामने रखती है जिसमे नई पीढ़ी अपने व्यक्तिगत जीवन मे किसी प्रकार का हस्तक्षेप बर्दास्त नही करती । कहानी का लक्ष्य विभिन्न समस्यायों एवं संवेदनाओ को व्यक्त करना है । कहानी कला के प्रमुख 6 तत्व माने गये है इन तत्वो की कसौटी पर वापसी कहानी का मूल्यांकन निम्न प्रकार से किया जा सकता है –

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      कथावस्तु के बिना कहानी की कल्पना भी नही की जा सकती है यह उसका अनिवार्य अंग है । कथावस्तु में अनेक घटनाये हो सकती है या एक घटना भी हो सकती है वापसी कहानी में लेखिका ने गजाधर बाबू के माध्यम से पीढियो के द्वंद को कथावस्तु के केंद्र में रखा है । इस कहानी में गजाधर बाबू एक रेलवे कर्मचारी होते है जो अपनी नौकरी से रिटायर होकर अपने घर जा रहे थे । रेलवे क्वार्टर को खाली करना जितना कष्टदायी था उससे अधिक खुशी इस बात की थी कि वे अपने पत्नी और बच्चो के साथ रहने रहने जा रहे है । 35 साल की नौकरी में अधिकांश समय उन्होंने अकेला काटा था वे एक सफल ब्यक्ति थे उन्होंने शहर में एक मकान बनवाया था एक लड़के और एक लड़की की शादी कर दी थी दो बच्चे ऊंची कक्षाओं में पड़ रहे थे उनका एक भरा पूरा परिवार था किंतु उनके जीवन मे विक्षोभ अधिक था नॉकरी के दौरान उन्हें अपना परिवार बहुत याद आता रहा अब उनके चेहरे में खुशी की आभा दिखाई दे रही थी – अब कितने वर्षों बाद वह अवसर आया था जब वह फिर उसी स्नेह और आदर के मध्य रहने जा रहे थे ।


जब वे अपने परिवार के बीच रहने जाते है तो परिवार में सब अपने मर्जी के थे बेटे बहु अपने हिसाब से चल रहे थे। बड़ा बेटा अमर घर का मालिक था बसंती और नरेंद्र कॉलेज में पढ़ने वाले युवा थे परिवार बढ़ जाने से घर छोटा मालूम पड़ता था अपनी पत्नी और बच्चो से उन्हें कोई सहानुभूति नही मिलती । बच्चे किसी भी काम मे उनकी दखल अंदाजी पसंद नही करते । वे चाहते थे घर मे सभी अनुशाशन में रहे किन्तु अब देर हो गयी थी । उनका अनुशासन घर मे किसी को पसंद न था अमर तो अलग होने को भी सोचता है उनकी चारपाई बैठक में ही थी घर के मामले में उनके बढ़ते दखल से किचकिच बढ़ रही थी जिससे उनकी पत्नी कहती है –“ ठीक ही है आप बीच मे न पड़ा कीजिये । बच्चे बड़े हो गए है हमारा जो कर्तब्य था कर रहे है पड़ा रहे है शादी कर देंगे ।“ गजाधर बाबू का मन इससे बहुत आहत होता है उनके दखल से अमर भून भुना कर कहता है –“ बूढ़े आदमी हो चुपचाप पड़े रहो हर चीज़ में दखल क्यो देते हो”। परिवार के सभी सदस्यों का गजाधर बाबू से किसी न किसी प्रकार की शिकायत थी जिससे आहत होकर वे दूसरी नॉकरी करने को सोचते है और जाते समय पत्नी को भी ले जाना चाहते है लेकिन वह मना कर देती है उनके जाते ही घर मे सभी खुश हो जाते है उनकी पत्नी उनकी चारपाई भी घर से निकलवा देती है और यही कहानी का अंत हो जाता है ।

     कहानी में कोई एक ब्यक्ति या एक से अधिक ब्यक्ति भी हो सकते है यह ब्यक्ति ही कहानी में पात्र या पात्र चरित्र कहलाता है । कहानी में इनकी संख्या कम होनी चाहिए तभी कहानीकार एक चरित्र के बाहरी और आंतरिक पक्षो का अधिक से अधिक मनोविश्लेषण कर सकता है साथ ही उसका मूल घटना से गहरा संबंध होना चाहिए वापसी कहानी में प्रमुख पात्र गजाधर बाबू है । साथ ही उनके पत्नी और बच्चे और रेलवे क्वार्टर में उनके साथ रहने वाला नॉकर गनेशी सहायक पात्र है । गजाधर बाबू रिटायर रेलवे कर्मचारी है जो अब बूढ़े हो चुके है जो पारिवारिक दृष्टि से सफल भी है – “ संसार की दृष्टि में उनका जीवन सफल कहा जा सकता था।“  उनका स्वभाव एकदम स्नेहशील था – “गजाधर बाबू स्वभाव से बहुत स्नेही ब्यक्ति थे और स्नेह के आकांक्षि भी।

वे अपने जीवन के तमाम जिम्मेदारियां को अच्छी तरह से निभाते है किंतु पीढियो के द्वंद से बिखर जाते है । कहानी के दूसरे प्रमुख पात्रो में अमर,नरेंद्र,बसंती उनकी पत्नी आदि आते है और इन पात्रो के माध्यम से लेखिका ने पीढियो के द्वंद का चित्रण किया है और इस द्वंद में पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी के आगे हार जाती है गजाधर बाबू अपना ही घर छोड़कर चले जाते है।

      पहले संवाद कहानी का अभिन्न अंग माना जाता था लेकिन अब उसकी अनिवार्यता समाप्त हो गयी है। ऐसे अनेक कहानिया लिखी जा रही है जिसमे संवाद का एकदम आभाव रहता है इस दृष्टि से देखे तो वापसी कहानी में भी संवाद की कमी है । कही कही सिर्फ ब्यवहारिक संवाद ही देखने को मिलते है – बिट्टी चाय तो फीकी है लाइये और चीनी ढाल दु । बसंती बोली।

रहने दो तुम्हारी अम्मा जब आयंगी तभी पी लूंगा।

ऐसे ही छिक फुक संवाद पूरे कहानी में कही कही देखने को मिलती है।

        कहानी देशकाल की उपज है इसलिए हर देश की कहानी दूसरे देश से अलग होती है इन कहानियों का अपना एक वातावरण होता है। जिसकी संस्कृति सभ्यता संस्कार का प्रभाव उनपर स्वाभाविक रूप से पड़ता है । वापसी कहानी में देशकाल की दृष्टि से भारतीय पृष्टभूमि की कहानी है । जिसमे आधुनिकता के आगमन से पीढ़ीगत अंतर को बड़ा दिया है जो इस कहानी में स्पस्ट रूप से देखी जा सकती है । गजाधर बाबू पुरानी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते है तो अमर , नरेंद्र, बसंती उनकी बहू नई पीढ़ी का एक ओर जहां पुरानी पीढ़ी में संस्कार और परिवार भाव है । वही नई पीढ़ी स्वार्थी ओर सिर्फ स्वयं के बारे में सोचने वाली है ।

     भाषा कहानी को आकर्षक बनाती है और शैली कहानी को सुसज्जित करने वाला कलात्मक आवरण होती है। भाषा जितनी सहज होगी उतनी ही आकर्षक होगी । उसमे इतनी शक्ति होनी चाहिए । जो साधारण पाठको को भी अपनी ओर आकृष्ट कर ले । कहानीकार कहानी को अपने ढ़ंग से कहना चाहता है वह उसे वर्णात्मक , संवादात्मक , आत्मकथात्मक , विवरणात्मक किसी भी शैली में लिख सकता है । वापसी कहानी में उषा प्रियंवदा ने एकदम सहज भाषा का प्रयोग किया है कही से भी उसमे न तो लाक्षणिकता है और न ही मुहावरेदार एकदम सीधा-सपाट और सरल है । शब्दचयन की दृष्टि से ही कहानीकार बेहद सजग है , ढोलची , बाल्टी जैसे ग्रामीण शब्द का प्रयोग हुआ है तो क्वार्टर , रिटायर , स्टेशन जैसे अंग्रेजी शब्दो का भी किन्तु संख्या की दृष्टि से यह बेहद कम है । लेखिका ने ज्यादातर साफ खड़ी बोली का प्रयोग किया है । शैली की दृष्टि से यह कहानी वर्णात्मक और विवरणात्मक रूप में लिखी गयी है संवादात्मकता का आभाव है ।

      उद्देश्य को भी कहानी का एक तत्व माना गया है बिना उद्देश्य के जीवन का कोई कार्य नही होता । कहानी की रचना भी बिना उद्देश्य के नही होती ।कहानियों में यह उद्देश्य उसके आवरण में छिपा रहता है यही उसका सौंदर्य है । वापसी कहानी का मूल उद्देश्य पीढ़ियों के द्वंद को रेखंकित करना है जिसमे पुरानी ओर नई पीढ़ी के बीच एक खड़ी खाई बनती जा रही है पुरानी पीढ़ी जहाँ अपने पुराने संस्कारो से चिपकी हुई है वही नई पीढ़ी पूरी तरह आधुनिक होती जा रही है इस नए और पुराने का द्वंद ही इस कहानी का मूल उद्देश्य है।

निष्कर्ष रूप मे कहा जा सकता है कि कहानी कला एक उत्कृष्ट कला है और इस दृष्टि से देखे तो उषा प्रियंवदा की यह कहानी कहानीकला के सभी विशेषताओ का सफल निर्वाहन करती है। इस कहानी में एक उत्कृष्ट कथानक है। पात्र कम किन्तु प्रभावशाली है देशकाल की दृष्टि से तेजी से आधुनिक हो रहे भारतीय पृष्ठ भूमि की कहानी है । संवादों की कमी है । जिसमे कहानी पर कोई प्रभाव नही पड़ता , भाषा शैली सहज और आकर्षक है जो पाठक को बांधे रखने में सक्षम है । कहानी आधुनिक होते भारत मे दो पीढ़ियों के बीच पनप रही खाई का चित्रण है । कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह कहानी – कहानी कला के तत्वो पर पूरी तरह से खड़ी उतरती है ।
























गोबिन्द यादव
बिरसा मुंडा कॉलेज
6294524332

शनिवार, 24 अप्रैल 2021

नाटक के प्रकार -एब्सर्ड, नुक्कड़, समस्या, रेडियो नाटक

 एब्सर्ड नाटक

एब्सर्ड नाटक का शाब्दिक अर्थ असंगत, बेतुका, अनर्गल, निरर्थक आदि होता है। पश्चिम में बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों में ही इसका प्रयोग ऐसे नाटकों, कहानियों आदि के लिए होने लगा था जिनकी एक सामान्य स्थापना थी कि मनुष्य की दशा निरर्थक, व्यर्थ अथवा एब्सर्ड हो चुकी है। उसका कोई अर्थ ही नहीं रहा गया है। एब्सर्ड नाटकों के लेखन में यूजीन लानेस्को, सैमुअल बैकेट, हेरोल्ड प्रिंटर आदि का विशेष योगदान है। पहले और दूसरे विश्व युद्ध के बाद समाज में फैली घोर निराशा, भय, अनास्था जीवन की निस्सारता आदि इसके मूल में है।

     एब्सर्ड नाटक कारों के अनुसार व्यक्ति जन्म से लेकर मृत्यु तक के कालखंड को जबरदस्ती जी रहा है। उसका कोई सुनियोजित लक्ष्य नहीं है। व्यक्ति निरर्थक मेहनत कर रहा है, उसके ऊपर नीरस और एक रस जिंदगी लादी गई है। मशीनी विकास ने उसको बिल्कुल पराधीन कर दिया है। व्यक्ति का जीवन अनिश्चित और संकटग्रस्त है। विनाश के आतंक ने उसमें निराशा, कुंठा और संत्रास भर दिया है। एब्सर्ड नाटकों में व्यक्ति का भीतरी यथार्थ अधिक व्यक्त हुआ है। इनमें परंपरागत मूल्यों के प्रति आस्था नहीं है। 

      एब्सर्ड नाटक प्रतीकों के माध्यम से जीवन की विसंगतियों और विडंबना को चित्रित करते हैं। एब्सर्ड नाटकों के चरित्र और सामान्य प्रतीत होते हैं इनमें बीमार, आवारा, ऊबे, थके-हारे, उचक्के लंपट और विक्षिप्त चरित्रों को विशेष महत्व दिया जाता है। इनके चरित्र समाज से बहिष्कृत या उससे अपना नाता तोड़े हुए होते हैं और वे पूरी तरह निराशा के शिकार होते हैं। एब्सर्ड नाटकों का मंचन अतार्किक लगता है। इनकी मंच सज्जा बिल्कुल साधारण तथा बेतरतीब होती है। दर्शकों और पात्रों के बीच कोई विशेष दूरी नहीं रखी जाती। इनमें प्रतीकात्मक मंच को अधिक महत्व दिया जाता है।

       एब्सर्ड नाटक हिंदी में सीधे इसी रूप में ले लिया है। कुछ लोग इसके लिए असंगत नाटक शब्द का प्रयोग करते हैं किंतु इसका प्रचलन कम है। हिंदी में एब्सर्ड नाटकों के प्रथम प्रयोगकर्ता भुवनेश्वर हैं। इनका ‘तांबे के कीड़े’ हिंदी का प्रथम एब्सर्ड नाटक है। भुवनेश्वर पश्चिम के नए नाटकों के विकास क्रम से भलीभांति परिचित थे और द्वितीय विश्वयुद्ध के विश्वव्यापी प्रभाव को गहराई से महसूस कर रहे थे। यही कारण है कि जिस समय पाश्चात्य देशों में नाटकों का लेखन प्रारंभ हुआ उसी समय भुवनेश्वर ने अपना तांबे के कीड़े नाटक लिखा। इसे विश्व के असंगत नाटकों के विकास क्रम में रखकर देखा जा सकता है।




नुक्कड़ नाटक

  नुक्कड़ नाटक, नाटक के क्षेत्र में अपेक्षाकृत एक नया प्रयोग है। आरंभ में साहित्य और नाटक के विद्वानों ने इसे नाट्य विधा ही मानने से इनकार कर दिया था लेकिन आठवें दशक में यह नाटक रूप काफी लोकप्रिय हुआ है और इससे कई प्रख्यात नाटककार और रंगकर्मी जुड़े हैं साथ ही इसने रंगमंच व नाटकों को प्रभावित भी किया है। नुक्कड़ नाटक को अंग्रेजी में स्ट्रीट प्ले के नाम से जाना जाता है। यह ऐसी नाट्य विधा है जिससे किसी सड़क पर, गली चौराहे पर, किसी फैक्ट्री के गेट पर खेला जा सकता है। आमतौर पर इसको उसी रूप में पेश किया जाता है जैसे सड़क पर मदारी अपना खेल दिखाने के लिए मजमा लगाते हैं। नाट्य प्रस्तुति का यह रूप जनता से सीधे संवाद स्थापित करने में मदद करता है। नाटक में न अंक परिवर्तन होते हैं और न  दृश्य परिवर्तन। कथानक में परिवर्तन को ऐसे रंग संकेतों के माध्यम से पेश किया जाता है जिसे दर्शक आसानी से ग्रहण कर सकें। वेशभूषा भी बार-बार नहीं बदली जा सकती और ना ही नाटक को इतना लंबा किया जा सकता है कि सड़क पर खड़े और बैठे दर्शकों के लिए धैर्य रखना मुश्किल हो जाए इसलिए नुक्कड़ नाटक बहुत लंबे नहीं होते।

      अपने लेख नुक्कड़ नाटक का महत्व और कार्यप्रणाली में सफदर हाशमी ने इस तथ्य की पुष्टि की है-“ हमारा अनुभव बताता है कि अलग-अलग क्षेत्रों में कार्यरत नाट्य मंडलियों को अंततः अपने नाटक खुद ही रचने पड़ते हैं।“ आठवें दशक में एक और यदि जन नाट्य मंच द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे नुक्कड़ नाटक को राष्ट्रीय स्तर पर जनसाधारण के बीच व्यापक स्वीकृति और ख्याति मिल रही थी तो दूसरी ओर स्थापित और परंपरा वादी रंग कर्मियों ने समीक्षकों और अभिजात कला मंडलियों में नुक्कड़ नाटकों रंगकर्म मानने से इनकार करने वालों की भरमार थी।

    नुक्कड़ नाटक में दर्शकों और नाट्य मंडली के बीच कोई दूरी नहीं होती बल्कि सारे अभिनेता दर्शक समुदाय के बीच गोलाकार रंगस्थल बनाकर अपना नाट्य खेलते हैं। नुक्कड़ नाटक में अनेक बार एक ही अभिनेता को टोप, छड़ी, वेशभूषा में थोड़ा परिवर्तन करके अनेक प्रकार के चरित्रों की भूमिका निभानी होती है। सफदर हाशमी की यह स्पष्ट समझ थी कि “रंगमंच अपनी चारों ओर के रंगीन पर्दो और तामझाम पर निर्भर नहीं होता। किसी भी खाली जगह पर चाहे वह गोल हो या चौकोर या वर्गाकार नाटक अपनी पूरी ताकत और खूबसूरती के साथ प्रकट हो सकता है।“ कुछ लोगों ने इसे चौराहा नाटक भी कहा है किंतु यह नाम प्रचलित नहीं हो सका। नुक्कड़ नाटकों में लोक शैली के तत्वों का व्यापक प्रयोग किया जाता है इससे नाटकों में रोचकता पैदा होती है। लोक शैली के गीतों का भी इसमें भरपूर प्रयोग होता है खासतौर पर आरंभ में दर्शकों को लुभा कर इकट्ठा करने के लिए।

     नुक्कड़ नाटक में सफदर हाशमी एक बहुत बड़ा नाम है। जन नाट्य मंच के मशीन, हत्यारे, औरत, राजा का बाजा, पुलिस चरित्रम और काला कानून जैसे नाटक इसी प्रक्रिया में रचे गए थे।


समस्या-नाटक

यूरोप में समस्या नाटकों का प्रचलन रोमांटिक नाटकों की प्रतिक्रिया के फल-स्वरूप हुआ। १६ वीं शताब्दी इश्वी के उत्तरार्ध में इब्सन ने नाटकों के क्षेत्र में जो प्रवर्तन किया उससे शेक्सपियर की रोमानी भावनाओं के स्थान पर एक बौद्धिक चेतना उत्पन्न हुई । उससे प्रेरणा ग्रहण करके शॉ ने पिटी हुई परंपराओं और रोमानी धारणाओं पर गहरा प्रहार किया। फिर तो शॉ का प्रभाव इतना विश्व-व्यापी हुआ कि उसके नाटकों की गुँज देश-देशान्तर में फैल गई। हिन्दी समस्या-नाटकों में भी उसकी क्षीण प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है।

      बीसवीं शताब्दी में स्त्री शिक्षा के प्रचार और राष्ट्रीय आंदोलन में स्त्री समाज के भी भाग लेने से भारत में पश्चिमी पद्धति पर नव समाज निर्मित हो रहा था किंतु विवाह संबंधी नैतिक विधान अभी तक पुरातन रूप में ही चल रहे थे। अतएव इस काल में उन्मुक्त प्रेम और दांपत्य के होड़ में नई समस्या खड़ी हो गई। समस्या नाटक लिखने के लिए उत्सुक नाटककारों का सर्वप्रथम ध्यान इसी ओर गया। उन्होंने इब्सन और शॉ के नाटकों में इस समस्या की खोज की और उन्हें इब्सन के ‘डॉल्स हाउस’ में यह विचार मिला कि पुरुष स्त्री को किस मात्रा में स्वतंत्रता दे सकता है जिससे नारी का व्यक्तिगत विकास और ना हो सकें।

    समस्या नाटक के आधुनिक जन्मदाता मिश्रजी माने जाते हैं। इस पद्धति का समस्या-नाटक के आधुनिक पहला नाटक 'संन्यासी' 1927 ई० में लिखा गया है । इस नाटक की प्रेरणा के विषय में मिश्रजी कहते हैं,'-'पहले महायुद्ध की समाप्ति पर कैथराइन की 'मदर इण्डिया' निकल चुकी थी। यूरोप और अमेरिका के कितने ही लेखक काले, भूरे और पीलों से गोरों को सावधान रहने की चेतावनी दे रहे थे । रंगीन जातियों को सब ओर से हीन कहने की चेष्टा की जा रही थी । हिंडमन ब्लांड, पुटनमवील, डालाथ्रास्नोदार आदि कितने ही राजनीतिक लेखक इस बात की घोषणा कर रहे थे कि भविष्य में गोरों का संकट रंगीन जातियों से बढ़ेगा । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में इस तरह का साहित्य बराबर बढ़ रहा था, जिसके पढ़ने का सुयोग मुझे विद्यार्थी-जीवन में वहीं मिल गया । इस प्रचार की जो प्रतिक्रिया हुई, उसी ने हिन्दी के प्रथम समस्या नाटक 'संन्यासी' को जन्म दिया।“

     

   

रेडियो नाटक

रेडियो पर प्रसारित होने वाले नाटकों को रेडियो नाटक कहते हैं। एकांकी और रेडियो नाटक की मुख्य विभाजन-रेखा यही है कि पहला दृश्य है और दूसरा श्रव्य। फिर भी रेडियो नाटक श्रव्य होकर भी नाटक ही है। जहां एकांकी का माध्यम रंगमंच है वहां रेडियो नाटक का माध्यम ध्वनि है। इस माध्यम की भिन्नता के कारण दोनों की अपनी अलग-अलग सुविधाएं और सुविधाएं हैं। रेडियो नाटक का आधार ध्वनि है। ध्वनि भावभीव्यक्ति का बहुत बड़ा साधन है। हम एक ही शब्द को भिन्न-भिन्न प्रकार से उच्चारित करके प्रेम, घृणा, क्रोध आदि विभिन्न भावनाओं की अभिव्यक्ति दिन प्रतिदिन अपने दैनिक जीवन में करते हैं। रेडियो नाटक में इसी ध्वनि का मुख्यतः सहारा लिया जाता है। मुख्यतः जिन रूपो में ध्वनि का सहारा लिया जाता है वे है भाषा, ध्वनि प्रभाव और संगीत। रेडियो नाटक में ध्वनि के सहारे वाचिक अभिनय को इतना सजीव बनाया जाता है कि आंगिक अभिनय भी साकार हो उठता है।

    बच्चन सिंह के शब्दों में “विषय की दृष्टि से जितने व्यापक विषय को रेडियो नाटकों में प्रस्तुत किया जा सकता है उतनी व्यापक विषय को एकांकी में नहीं उपस्थित किया जा सकता है इकाइयों के बंधन रेडियो नाटकों को स्वीकार्य नहीं है।“ 1936 ईस्वी में पहला हिंदी रेडियो नाटक ऑल इंडिया रेडियो से प्रसारित हुआ था जिसमें रंग संकेत, दृश्यांतर, अंतराल सब के सब रंगमंच के थे। इंग्लैंड में जो पहला नाटक रेडियो पर प्रसारित हुआ था वह शेक्सपियर का जुलियस सीजर का एक दृश्य था शेक्सपियर का जिसका प्रसारण 28 मई 1923 को हुआ था।

    हिंदी में चतुरसेन शास्त्री का राधा-कृष्ण रेडियो के लिए लिखा गया पहला नाटक माना जाता है। रेडियो नाटक के आरंभिक लेखकों में रामकुमार वर्मा, उदय शंकर भट्ट, लक्ष्मीनारायण मिश्र, जगदीश चंद्र माथुर आदि प्रमुख हैं जिन्होंने रेडियो पर प्रसारित होने के लिए नाटकों की रचना की है। बाद में फैंटेसी, मोनोलॉग गीतिनाट्य रेडियो पर खूब प्रसारित हुए। इस समय टेलीविजन के व्यापक प्रसार से रेडियो नाटकों के लेखन में कमी आई है और उसका भविष्य उज्ज्वल दिखाई नहीं दे रहा है।



गोबिन्द कुमार यादव
बिरसा मुंडा कॉलेज

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मंगलवार, 19 जनवरी 2021

हिंदी साहित्य का आदिकाल- हजारी प्रसाद द्विवेदी ( पुस्तक समीक्षा )

         आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित हिंदी साहित्य का आदिकाल सन 1952 ईस्वी में पहली बार प्रकाशित हुआ जो समय-समय पर दिए गए उनके व्याख्यानों का संग्रह है। साहित्य इतिहास संबंधी यह उनकी तीसरी पुस्तक है। इससे पहले ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ और ‘हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास’ प्रकाशित हो चुका था। इस पुस्तक में उन्होंने आदिकाल के नामाकरण और प्रारंभ से संबंधित विवादों से मुक्ति का मार्ग ढूंढने का प्रयास किया है। अपभ्रंश से हिंदी की उत्पत्ति और उसके विकास की विस्तृत चर्चा उन्होंने अपनी इस पुस्तक में की है। दरअसल हिंदी साहित्य का आदिकाल एक इतिहास ग्रंथ ना होकर व्याख्यानों का संग्रह है जिसमें पांच व्याख्यान संग्रहित है। यह पांचो व्याख्यान अपने में एक शोध ग्रंथ है जिसमें उन्होंने साहित्य के प्रारंभ का एवं उसके प्रवृत्तियों के मूल्यांकन का प्रयास किया है। इस पुस्तक में उन्होंने आदिकालीन साहित्य के काव्य-रूपों के उद्भव और विकास का विस्तृत विवेचन किया है। आदिकाल के नामाकरण, काव्य रूप और प्रवृत्ति को लेकर जो व्याख्या की जा रही थी उस पर द्विवेदी जी ने विराम चिन्ह लगाने का प्रयास किया है। 


     हिंदी साहित्य के इतिहास की पहली सुसंगत और क्रमबद्ध व्याख्या का श्रेय अवश्य आचार्य रामचंद्र शुक्ल को जाता है, मगर उसकी कई गुम और उलझी हुई महत्त्वपूर्ण कड़ियों को खोजने और सुलझाने का यश आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का है। अगर द्विवेदी न होते तो हिंदी साहित्य का इतिहास अभी तक अपनी व्याख्या संबंधी कई एकांगी धारणाओं का शिकार रहता और उसकी परंपरा में कई छिद्र रह जाते। इतिहास के प्रति एक अन्वेषक और प्रश्नाकुल मुद्रा, परंपरा से बेहद गहरे सरोकार तथा मौलिक दृष्टि के मणिकांचन योग से बना था। हजारी प्रसाद द्विवेदी का साहित्यिक व्यक्तित्व और उन्होंने साहित्येतिहास और आलोचना को जो भूमि प्रदान की, हिंदी की आलोचना आज भी वहीं से अपनी यात्रा शुरू करती दिखती है। खास तौर पर हिंदी साहित्य के आदिकाल की पूर्व व्याख्याएँ उन्हें शंकित बनाती रहीं और अपने व्यापक चिंतन से अपनी शंकाओं को उन्होंने साबित किया। हिंदी साहित्य के आदिकाल के मूल्यांकन से जुड़े उनके व्याख्यान आज भी हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं। जब भी हिंदी साहित्य के इतिहास और उनकी परंपरा की बात की जाएगी, ये व्याख्यान एक प्रकाश-स्तंभ की-सी भूमिका निभाते रहेंगे।

   आदिकाल हिंदी साहित्य का सबसे अधिक विवादित काल रहा है। द्विवेदी जी ने एक तरह से उन विवादों को समाप्त किया और आदिकालीन साहित्य के उद्धार का प्रयास किया। प्रथम संस्करण की भूमिका में शिवपूजन सहाय लिखते हैं- “हिंदी साहित्य का आदिकाल अब तक अंधकार के आवरण ढका सा रहा है। आवरण को हटाकर प्रायः अंधकार में प्रकाश फैलाने का प्रथम प्रयास संभवतः आचार्य द्विवेदी जी ने ही किया।“1 हिंदी साहित्य का प्रारंभ संवत 1050 अर्थात 1000 ई. के आसपास मानी जाती है। यह समय भारतीय राजनीति में उथल-पुथल का था। आचार्य द्विवेदी जी ने भी इसे भारत के सबसे ज्यादा विरोध और व्याघातों का समय माना है- “शायद ही भारतवर्ष के साहित्य के इतिहास में इतने विरोधी और व्याघातों का युग कभी आया होगा।“2 यह समय हिंदी साहित्य को भी अत्यंत प्रभावित करता है।

    आदिकाल के संदर्भ में यह पुस्तक अत्यंत व्यवस्थित और प्रमाणित है। आचार्य शुक्ल ने हिंदी साहित्य के इतिहास का जो ढांचा तैयार किया था उसका एक और आयाम है, हिंदी साहित्य का आरंभिक काल जिन शंकाओं, अनुमानों पर था, उससे मुक्ति का एक प्रयास है। इसमें द्विवेदीजी साहित्यिक कृतियों की भाषा की दृष्टि से और साहित्य की दृष्टि से व्याख्या करते हैं तथा उसके महत्व का प्रतिपादन करते हैं। उनका मानना है यह हिंदी साहित्य के उद्भव का काल है, इसलिए इस काल की कोई भी रचना अवज्ञा और उपेक्षा का पात्र नहीं हो सकती है- “इस काल की सभी पुस्तकें चाहे वे धार्मिक उपदेश की हो, वैद्दक की हो, महात्म्य की हो, वह कुछ न कुछ साहित्यिक रूप को स्पष्ट करने में अवश्य सहायता पहुचेगी। इस काल में साहित्य क्षेत्र को यथासंभव व्यापक बनाकर देखना चाहिए।“3 

   अपने प्रथम व्याख्यान में ही द्विवेदी जी आदिकालीन उलझी हुई गुत्थियों को सुलझाने का प्रयास करते है। शुक्ल जी ने व्यवस्थित इतिहास तो लिखा किन्तु कुछ शंकाए भी शेष रह गयी थी जिसे द्विवेदी जी ने अपने इस ग्रंथ में सुलझाया है। वे इस काल को ‘भारतीय विचारो के मंथन का काल’ मानते है। आचार्य शुक्ल ने अपने हिंदी साहित्य के इतिहास में जिन ग्रंथो को धार्मिक कहकर इतिहास की परिधि से बहार निकल दिया था द्विवेदीजी उन्हें आदिकालीन साहित्य में स्थान देते है क्योंकि उनका मानना है – “धार्मिक प्रेरणा या आध्यात्मिक उपदेश होना काव्यत्व का बाधक नही समझा जाना चाहिए।‘4 यही नही उनका स्पष्ट मन्ना है कि सम्पूर्ण आदिकाल के साहित्य में धार्मिक और आध्यात्मिक प्रभाव देखा जा सकता है और इस प्रकार अगर हम इन साहित्य को निकलते गये तो संपूर्ण आदिकालीन साहित्य को ही बहार करना पड़ेगा –“केवल नैतिक धार्मिक या आध्यात्मिक उपदेश देकर यदि हम ग्रंथों को साहित्य सीमा से निकालने लगेंगे तो हमें आदिकाल से भी हाथ धोना पड़ेगा, तुलसी रामायण से भी अलग होना पड़ेगा कबीर की रचनाओं को भी नमस्कार कर देना पड़ेगा और जायसी  को भी दूर से दंडवत करके विदा कर देना होगा।“5 

   हिंदी साहित्य के आदिकाल का सटीक मूल्यांकन वही कर सकता है जो भाषा का पारखी हो और द्विवेदीजी निश्चय ही भाषा के पारखी इतिहासकार थे। उन्हें अपभ्रंश भाषा का पूर्ण ज्ञान था। इस समय हिंदी धीरे-धीरे अपना रूप ग्रहण कर रही थी और अपभ्रंश अपना रूप खो रही थी अर्थात भाषा के स्तर पर यह संक्रमण का काल था। इसलिए आदिकाल के मूल्यांकन के लिए भाषा का ज्ञान आवश्यक था। हिंदी भाषा किस प्रकार अपना रूप ग्रहण कर रही थी इनका उल्लेख करते हुए लिखते है – “स्पष्ट ही दसवीं से तेरहवीं शताब्दी तक की बोलचाल कि भाषा में संस्कृत तत्सम शब्दों का प्रयोग बढ़ने लगा था।6 जिसे द्विवेदीजी इस काल की भाषा की प्रमुख प्रवृति मानते है –“इस काल की भाषा की प्रमुख प्रवृति थी- बोलचाल में तत्सम शब्दो का प्रचार।“7 जैसा की स्पष्ट है यह काल भाषा की दृष्टि से संक्रमण का काल है तो निश्चय ही इस काल में अपभ्रंश साहित्य भी प्रचुर लिखा गया । किन्तु 10वीं शताब्दी आते आते अपभ्रंश के रूप में परिवर्तन आने लगा था जिसे गुलेरी जी ने पुरानी हिंदी कहा है। द्विवेदीजी इसे अपभ्रंश का ही बढ़ावा मानते है –“दसवीं से चौदहवीं शताब्दी का काल, जिसे हिंदी का आदिकाल कहते है अपभ्रंश का ही बढ़ावा है। इसी अपभ्रंश के बढ़ाव को कुछ लोग उत्तरकालीन अपभ्रंश कहते है और कुछ लोग पुरानी हिंदी।“8 भाषा के साथ काव्य रूप की चर्चा इस ग्रंथ की एक बड़ी विशेषता है। इसमें आचार्य द्विवेदी किसी भी पुस्तक की भाषा और काव्य रूप का भी विस्तृत वर्णन करते है। आदिकाल के उपलब्ध प्रत्येक ग्रन्थ की भाषा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन करते हुए उसके महत्त्व पर प्रकाश डालते है। कीर्तिलता के संबंध में अपना मत व्यक्त करते हुए लिखते है –“भाषा के अध्ययन की दृष्टि से इस पुस्तक का महत्व है ही, काव्य रुप के अध्ययन की दृष्टि से भी यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी है।“9 यही स्थिति वर्ण रत्नाकर पुस्तक के साथ भी है जो आदिकालीन लोक साहित्य की प्रतिध्वनि था। द्विवेदीजी इस ग्रंथ के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए लिखते है-“प्राचीन मैथिली भाषा के अध्ययन की दृष्टि से तो यह पुस्तक अत्यंत उत्तम है ही, परंतु उस समय की सामाजिक, रीति-नीति, काव्य-रूढ़ि और काव्य-रूप के अध्ययन की दृष्टि से भी यह बहुत उपयोगी है।“10 


   आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने वीरगाथा काल का नामकरण करते हुए उनसे प्राप्त ग्रंथो को संदिग्ध मन है किंतु द्विवेदीजी आदिकाल के नामकरण में जिन ग्रंथों का उल्लेख करते है उसकी प्रमाणिकता के साथ उस ग्रन्थ के भाषागत ढांचा का भी उल्लेख करते है। इसी प्रकार काल प्रवृति का निर्धारण करते समय भी शुक्लजी जिन ग्रंथों का उल्लेख करते है उनमें से ज्यादातर अप्राप्य, अप्रामाणिक और परवर्ती काल की सिद्ध होती है। द्विवेदीजी काल प्रवृति का निर्धारण ग्रंथों के आधार पर न करके उस काल की प्रेरणादायक वस्तु को मानते है –“काल प्रवृति का निर्णय प्राप्य ग्रंथों की संख्या के आधार पर ही हो सकता है।“11 

  अपने प्रथम व्याख्यान में द्विवेदीजी अपभ्रंश के उपलब्ध साहित्य, उसके काव्य-रूप, नामकरण के आधार ग्रंथों एवं उसके नामकरण के आवश्यक अंगों पर चर्चा करते है। जैन ग्रंथों का उल्लेख वे हिंदी साहित्य आदिकाल की परंपरा को समझने के रूप में करते है। हिंदी साहित्य का प्रथम व्यवस्थित  इतिहास आचार्य शुक्ल ने लिखा था जिसमें उन्होंने प्रवृत्तियों के आधार पर वीरगाथा काल नाम दिया था।  जिसे द्विवेदीजी अपने अकाट्य तर्कों के आधार पर आदिकाल कहते है। आदिकालीन साहित्य को उसके काव्य रूपों के विकास की दृष्टि से अध्ययन करते हैं क्योंकि यह काल हिंदी भाषा के उद्भव का काल है हिंदी के कवियों के उद्गम का काल है



     द्वितीय व्याख्यान में आचार्य द्विवेदी जी अपभ्रंश और भाषा काव्य के रूप पर चर्चा करते हैं। पुराने रूपों में किस प्रकार की विकृतियां देखने को मिलती है इसका विस्तृत वर्णन उन्होंने किया है। मात्रा के प्रयोग की दृष्टि पर इस काल के कवियों की पूर्ण प्रवृत्तियों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करते हैं। अपभ्रंश के काव्य रूपों का विस्तृत वर्णन करते हुए उसका आगे की भाषा काव्य से किस प्रकार का संबंध है इसे स्पष्ट करते हैं। भाषा की दृष्टि से संपूर्ण अपभ्रंश काव्य एवं आदिकालीन प्रमाणित ग्रंथों की चर्चा करते हैं तथा उसकी प्रमाणिकता और अप्रमाणिकता एवं उसका भाषा शास्त्रीय अध्ययन करते हैं। अपभ्रंश काव्य के क्षेत्र का वर्णन करते हुए स्पष्ट करते है कि “ठीक मध्यदेश में बना कोई अपभ्रंश काव्य नही मिलता। अधिकांश पुस्तके किनारे पर स्थित प्रान्तों से ही प्राप्त हुई है।“12 और इस न मिलने के कारण को स्पष्ट करते हुए वे कहते है कि इसका ऐतिहासिक कारण है। इस काल में पुस्तकें तीन प्रकार से रचीत हुई  पहला राज्याश्रय में, दूसरा धर्माश्रय में और तीसरा लोक आश्रय में। इसमें भी सबसे प्रमुख है राज्याश्रय।  इस समय केंद्रीय सत्ता में गाहद्वारो का शासन था जिसे कुछ विद्वानों ने दक्षिण से आया माना है जो संस्कृत प्रेमी था यही कारण है कि भाषा काव्य मध्यदेश में काम देखने को मिलता है।

     अपने तृतीय व्याख्यान में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी आदिकाल के सबसे विवादित ग्रंथ पृथ्वीराज रासो को लेकर अपने मत व्यक्त करते हैं वह भी पूरी प्रमाणिकता के साथ अपने विचार प्रकट करते हैं अपने विचारों की प्रमाणिकता के लिए तत्कालीन समय के शिलालेखों और इतिहास की भी छानबीन करते हैं। रासो ग्रन्थ में जिस भाषा का प्रयोग किया गया है उसके आधार पर वे उसकी व्याख्या करते हैं। दरअसल रासो ग्रंथ अपभ्रंश भाषा में ही लिखा गया था क्योंकि रासो की भाषा दमोह वाली शिलालेख से मिलती जुलती है –“इस तथ्य से यह अनुमान पुष्ट होता है कि रासो में भी कुछ उसी प्रकार के अपभ्रंश में लिखा गया था जिस प्रकार के अपभ्रंश ग्यारहवीं सजाताब्दी वाला दमोह वाला शिलालेख लिखा गया था।“13  आचार्य शुक्ल रासो को एकदम जाली पुस्तक कहते है किंतु द्विवेदीजी ने उसके काव्यरूपो, एवं उसके लघुत्तम संस्करण के आधार पर उसे अर्धप्रमानिक माना है। “अब यह मान लेने में किसी को आपत्ति नही ही कि रासो एकदम जाली पुस्तक नही है।“14 द्विवेदीजी ने आदिकालीन कृतियों को साहित्यिक दृष्टि से देखने के पक्ष में है क्योंकि ऐतिहासिक दृष्टि से देखने पर एक व् कृति प्रामाणिक नही ठहरती-“सभी संस्करण परवर्ती है, सबमे क्षेपक की सम्भावना बानी हुई है।“15 रासो के सन्दर्भ में तो वे इतना भी कह देते है कि-“रासो में इतिहास की संगति खोजना ही बेकार है।“15

   हिंदी में कथा की परंपरा की व्याख्या अगर किसी इतिहास ग्रन्थ में मिलती है तो वह द्विवेदी जी द्वारा रचित हिंदी साहित्य का आदिकाल ही है। कादिकल में जितने भी चरित काव्य लिखे गए वे सभी कथा की परंपरा में ही आते है। किंतु यह कथा शब्द दो रूपो में में व्यक्त हुआ है “प्रायः सभी चरित काव्यो ने अपने को कथा कहा है। पुराने साहित्य में कथा शब्द का व्यवहार स्पष्टरूप से दो अर्थो में हुआ है। एक तो साधारण कहानी के अर्थ में और दूसरा अलंकृत काव्यरुप के अर्थ में।“16  आदिकालीन साहित्य में ऐतिहासिक काव्य किस प्रकार लिखे जाते थे इसका स्पष्टीकरण भी इस ग्रंथ में हुआ है –“ऐसा जान पड़ता है कि उन दिनों ऐतिहासिक व्यक्ति गुणानुवाद मूलक चरित-काव्य इसी ढंग (श्रोता वक्त परंपरा/पूर्व कथा योजना) से लिखे जाते थे।“17  पृथ्वीराज राजो आदिकाल का सबसे विवादित ग्रन्थ रहा है और इसपर द्विवेदीजी की व्याख्या सबसे महत्वपूर्ण बानी है। उन्होंने रासो शब्द की व्युत्पत्ति रासक से मानी है जो एक प्रकार का गेरूप है। साथ ही रासो को वे शुक और शुकी संवाद में लिखा हुआ मानते है। “ रासो के वर्तमान रूप को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि मूल रासो में भी शुक इर शुकी के संवाद की ऐसी ही योजना रही होगी। मेरा अनुमान है कि इस मामूली से इंगित को पकड़कर हम मूल रासो के कुछ रूप का अंदाजा लगा सकते है।“18 इसी प्रकार कीर्ति लाता भी भृंग भृंगी संवाद के रूप में लिखी गयी है। इससे स्पष्ट होता है कि आदिकालीन साहित्य में वक्त श्रोता परंपरा थी।

   अपने चतुर्थ व्याख्यान में कथानक  रूढ़ियों के आधार पर प्रिथीराज रासो एवं पध्मावत अदि सभी कृतियों का मूल्यांकन करते हैं। पृथ्वीराज रासो के प्रत्येक घटना को भारतीय  कथानक रूढ़ियों से जोड़कर देखते है। इस व्याख्यान में पृथ्वीराज रासो का विस्तृत विवेचन है तथा आदिकालीन काव्य रूढ़ियों के साथ इसका समंजन किया गया है। प्रारम्भ में जिस भारतीय काव्य के ऐतिहासिक चरितों की प्रवृत्तियो का वर्णन है उसके साथ पृथ्वीराज रासो की संगति की भी जाँच करते है।

     पंचम व्याख्यान आदिकालीन काव्यरूपो पर विस्तृत विवेचन है कादिकल और परवर्तीकाल साहित्य के काव्यरूपो की तुलना करके उसके रूप पर विस्तृत विवेचन हुआ है।

निश्चय ही आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित हिंदी साहित्य का आदिकाल हिंदी के प्रारंभ का व्यवस्थित इतिहास है। उन्होंने हिंदी के प्रारंभ उसके विकास एवं उसकी प्रवृत्तियो से संबंधित अनेक शंकाओं का समाधान किया है। हिंदी के उद्भव में किस प्रकार भाषागत ढांचा बदल रहा था साथ ही काव्य रूपो का किस प्रकार विकास हो रहा था इसका विस्तृत व्योरा देते है। हिंदी साजित्या का आदिकाल निश्चय ही मिल का पत्थर साबित हुआ है हिंदी साहित्य के इतिहास ग्रंथो में । यह ग्रन्थ आदिकाल का प्रामाणिक दस्तावेज है। इस पुस्तक के माध्यम से द्विवेदी जी ने अनेक ग्रंथो को भी साहित्य की कोटि में मान्यता दिलवाई जिसे धार्मिक या आध्यात्मिक कह कर साहित्य की कोटि से बाहर कर दिया गया था तथा अनेक नए ग्रंथो को भी प्रकाश में लाते है जो अबतक उपेक्षा का शिकार थे। साहित्य के जिज्ञासुओं एवम हिंदी भाषा के जिज्ञासुओं के लिए यह ग्रन्थ अत्यंत उपयोगी है।







                         

  गोबिन्द कुमार यादव 

 बिरसा मुंडा कॉलेज

दार्जीलिंग, पश्चिम बंगाल, 734427

मो.-6294524332

ईमेल – gobind9614@gmail.com



शनिवार, 5 दिसंबर 2020

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की निबन्ध-कला

          आचार्यरामचन्द्र शुक्ल (1884-1941 ई.) हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ निबन्धकार हैं। चिन्तामणि में संकलित निबन्धों में शुक्लजी की निबन्ध कला का पूर्ण उत्कर्ष दिखाई देता है। ये निबन्ध विचार प्रधान हैं या भाव प्रधान है इस विषय पर विचार करने से पूर्व हमें शुक्ल जी के इस कथन पर भी दृष्टिपात कर लेना चाहिए जो उन्होंने 'चिन्तामणि' की भूमिका में 'निवेदन' शीर्षक के अन्तर्गत लिखा है, "इस पुस्तक में मेरी अन्तर्यात्रा में पड़ने वाले कुछ प्रदेश हैं। यात्रा के लिए निकलती रही है बुद्धि पर हृदय को भी साथ लेकर।"

       शुक्ल जी के इस कथन का अभिप्राय यह है कि उनके निबन्धों में हृदय और बुद्धि का समन्वय किया गया है; यद्यपि उनके निबन्ध विचार-प्रधान ही अधिक है तथापि उनमें हृदय तत्व भी स्थान-स्थान पर उपलब्ध होता है।

     भाषा की पूर्ण-शक्ति का विकास निबन्ध में दिखाई पड़ता है। शुक्ल जी के अनुसार "शुद्ध विचारात्मक निबन्धों का चरम-उत्कर्ष वहीं होता है जहां एक-एक पैराग्राफ में विचार दबा-दबाकर ठूसे गए है और एक-एक वाक्य इसी सुसम्बद्ध विचार खण्ड के लिए हो।"

     विचारात्मक निबन्ध में केवल विचारों की झलक या बौद्धिक विवेचक ही पर्याप्त नहीं होता अपितु हृदय के भावों की झलक भी उसमें दिखाई पड़ती है। संक्षेप में शुक्ल जी की निबन्ध कला में हमें अग्रलिखित विशेषताओं का निदर्शन मिलता है-

1. विचारों की सम्पन्नता और सुसम्बद्धता- शुक्ल जी के निबन्ध मौलिक विचारों से सम्पन्न हैं। उनमें विचारों की गहनता और प्रौढ़ता के दर्शन होते हैं। उनका प्रत्येक वाक्य सुविचारित, सुचिन्तित तथा व्यंजक होता है। इस प्रकार उनके निबन्धों का प्रत्येक अनुच्छेद गम्भीर विचारों से ओत-प्रोत दिखाई देता है। यह भी उल्लेखनीय है कि शुक्ल जी के निबन्धों में वैचारिक सुसम्बद्धता उनके निबन्धों की प्रमुख विशेषताएं हैं। यथा-"श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है। जब पूज्य भाव की बुद्धि के साथ-साथ श्रद्धाभाजन के सामीप्य लाभ की प्रवृत्ति हो, उसकी सत्ता के कई रूपों के साक्षात्कार की वासना हो तब हृदय मे भक्ति का प्रादुर्भाव समझना चाहिए


2. मौलिक चिन्तन-शुक्ल जी एक मौलिक चिन्तक है। इसका पता उनके निबन्धों से चलता है। मनोविकार सम्बन्धी निबन्धों में वे जिस मनोविकार का वर्णन करते हैं उसके प्रत्येक पक्ष पर मौलिक ढंग से विचार करते हैं, उसका विश्लेषण इतने सूक्ष्म ढंग से करते हैं कि उस मनोविकार का प्रत्येक पक्ष उजागर हो जाता है। कभी-कभी तो ऐसा प्रतीत होता है कि मनोविकारों के विश्लेषण में वे मनोविज्ञान के पण्डितों को भी मात दे रहे है। इसी प्रकार काव्य समीक्षा सम्बन्धी निबन्धों में उनका मौलिक चिन्तन दिखाई देता है। उदाहरण के लिए 'कविता क्या है' निबन्ध में काव्य की परिभाषा उन्होंने मौलिक ढंग से की है। उनके अनुसार, "हृदय की इसी मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे कविता कहते हैं।"

3. विचार विश्लेषण एवं विषय विवेचन क्षमता- शुक्ल जी के निबन्ध विचार प्रधान हैं। विषय के अनुरूप विश्लेषण की अद्भुत क्षमता उनके निबन्धों की प्रमुख विशेषता कही जा सकती है। शुक्ल जी ने भारतीय काव्यशास्त्र और पाश्चात्य समीक्षा-शास्त्र के गहन अनुशीलन के उपरान्त सभीक्षा की एक नई पद्धति विकसित की जिसमें सभी विचारों की सम्यक परीक्षा करने के साथ-साथ वे अपना मौलिक चिन्तन भी योजना पूर्वक प्रस्तुत करते हैं। डॉ. देवीशंकर अवस्थी के अनुसार, "किसी भी मत, विचार या सिद्धान्त को उन्होंने बिना अपने विवेक की कसौटी पर कसे स्वीकार नहीं किया। यदि कोई विचार उनकी ट्ृष्टि को नहीं जंचा तो इसके प्रत्याख्यान में तनिक भी मोह नहीं दिखाया।"

4. भाषा की पूर्ण शक्ति का विकास-शुक्ल जी के निबन्धों की भाषा विषय के अनुरूप प्रौढ़, गम्भीर एवं साहित्यिकता का पुट लिए हुए है। वह परिष्कृत एवं संयत है उसमें भाव प्रकाशन की अद्भुत क्षमता है। प्रत्येक शब्द अपने स्थानों पर ऐसा जड़ा हुआ है कि उसे वहां से हटा पाना असम्भव है, इसी प्रकार उनकी वाक्य रचना निर्दोष व्याकरण-सम्मत और उपयुक्त है। भाषा की शक्ति का परिचय मनोविकारों की परिभाषा में दिखाई पड़ता है जहां सूत्रात्मक शैली का प्रयोग है और एक भी शब्द फालतू नहीं है यथा-"श्रद्धा महत्व की आनन्दपूर्ण स्वीकृति के साथ पूज्य बुद्धि का संचार है'"

5. प्रकृति प्रेम-शुक्ल जी के निबन्धों में प्रकृति प्रेम का परिचय अनेक स्थानों पर प्राप्त होता है। ऐसे स्थलों पर हृदय का उल्लास देखते ही बनता है। उदाहरण के लिए, निम्न पंक्तियों में उनके प्रकृति प्रेम की व्यंजना हुई हैं; यथा "आंखे खोलकर देखो खेत कैसे लहलहा रहे हैं, नाले झाड़ियों के बीच बह रहे हैं, टेसू के फूल से बनस्थली कैसी लाल हो रही है, चौपायों के झुण्ड चरते हैं, चरवाहे तान लड़ा रहे है और अमराइयों के बीका में गांव झांक रहे हैं।"

6. हास्य एवं व्यंग्य की प्रधानता- यद्यपि शुक्ल जी हे निबन्ध विचार-प्रधान हैं तथापि भावाकर्षक स्थलों पर उनका हृदय पक्ष प्रबल हो गया है। यही कारण है कि विषय निरूपण करते समय जहां-तहां शुक्ल जी ने अपने निबन्धों में हास्य-व्यंग्य का पुट भी दिया है। उदाहरण के लिए, लोभी व्यक्तियों पर व्यंग करते हुए वे कहते हैं, "मोटे आदमियो तुम जरा से दुबले हो जाते अपने अन्देशे से ही सही, तो न जाने कितनी ठठरियों पर मांस चढ़ जाता।"

7. देश प्रेम एवं मानव प्रेम-शुक्ल जी के निबन्धों में देश प्रेम और मानव प्रेम की अनेक स्थलो पर व्यंजना हुई है। उनका यह देश प्रेम दिखावा मात्र नहीं है अपितु उसके हृदय का सच्चा भाव झलकता दिखाई देता है। वे यह मानते हैं कि जिसे अपने देश से प्रेम होगा वह अपने देश के मनुष्य, पशु, पक्षी, लता, पौधे आदि सबसे प्रेम करेगा। यथा-'यदि किसी को अपने देश ी से प्रेम है तो उसे अपने देश के मनुष्य, पशु-पक्षी, लता-पेड़-त्ते बन-पर्वत-नदी ब निर्झर सबसे प्रेम होगा। जो यह भी नहीं जानते कि कोयल किस चिड़िया का नाम है, जो यह भी नहीं जानते कि किसानों की झोपड़ी के अन्दर क्या हो रहा है वे यदि दस बने-उने मित्रों के बीच प्रत्येक भारतवासी की औसत आमदनी का पता कर देश-प्रेम का दाबा करें तो उनसे पूछना चाहिए कि बिना परिचय का यह प्रेम कैसा?" 

     शुक्ल जी का दृष्टिकोण मानवतावादी था। 'मानस की धर्म भूमि’ निबन्ध में उन्होंने मानवतावाद की सुन्दर व्याख्या की है। भा जो अत्याचार का विरोध और न्याय का समर्थन नहीं करता उसकी मानवता मर चुकी है।

        उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि यद्यपि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबन्ध विचार प्रधान हैं किन्तु उनमें हृदय भी अपना प्रवृत्ति के अनुरूप भावात्मक और सरल स्थलों पर रमता रहा जिससे उनके निबन्ध सरस और रोचक हो गए हैं। हिन्दी साहित्य म आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबन्ध वस्तुतः मानदण्ड बन गए अन्य निबन्धकारों के निबन्धों की आलोचना हम शुक्ल जा फा कसौटी मानकर किया करते हैं। यह इस बात का प्रमाण है।व शुक्ल जी की निबन्ध कला अप्रतिम है, अद्वितीय है आर सर्वश्रेष्ठ है।

 - गोबिंद कुमार यादव

                                                      बिरसा मुंडा कॉलेज

                                                         6294524332




रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि

                 रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि  

                                                    -  गोबिंद कुमार यादव            

        मार्क्सवादी समीक्षकों में डॉ. रामविलास शर्मा का नाम अग्रगण्य है। मार्क्सवादी समीक्षा का तात्पर्य उस समीक्षा से है जिसमें 'मार्क्सवाद' को आधार बना कर साहित्य की समीक्षा की जाती है। ऐसे आलोचकों को हिन्दी में प्रगतिवादी समीक्षक भी कहा जाता है। प्रगतिवाद का हिन्दी में प्रारम्भ 1936 ई. के आसपास हुआ अतः प्रगतिवादी समीक्षा का प्रारम्भ भी तभी से माना जा सकता है। मार्क्सवादी समीक्षकों में प्रमुख है-शिवदान सिंह चौहान, प्रकाश चन्द्र गुप्त, अमृतराय, नामवर सिंह और डॉ. रामविलास शर्मा इनमें से डॉ. रामविलास शर्मा की दृष्टि सर्वाधिक पैनी, स्वच्छ एवं विश्लेषणात्मक है।

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       कार्ल मार्क्स ने समाज को दो वर्गों में विभक्त किया- शोषक और शोषित। पूंजीवादी अपनी पूंजी के बल पर श्रमिकों का शोषण करता है अतः समाज में वर्ग संघर्ष प्रारम्भ हो जाता है। मार्क्सवादी समीक्षा में वर्ग संघर्ष, सामाजिक समरसता, समाजोत्थान, शोषितों के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए साहित्य को सामाजिक परिवर्तन के साधन के रूप में देखा गया।

       डॉ. रामविलास शर्मा की आलोचनात्मक कृतियों में प्रमुख हैं-प्रगति-प्रगति और परम्परा, प्रगतिशील साहित्य की समस्याएं, आस्था और सौन्दर्य, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना, मार्क्सवाद और प्राचीन साहित्य का मूल्यांकन, निराला की साहित्य साधना, भाषा और समाज, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण।

       डॉ. रामविलास शर्मा की समीक्षा पद्धति की सामान्य विशेषताओं का निरूपण निम्न बिन्दुओं में किया जा सकता है:

1. डॉ. शर्मा ने मार्क्सवादी सिद्धान्तों के अनुरूप वर्ग संघर्ष एवं समाज में मानव की आर्थिक स्थिति को विशेष महत्व दिया है तथा यही तत्व मार्क्सवादी समीक्षा के मूल आधार हैं।

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2. डॉ. शर्मा यह मानते हैं कि साहित्यकार को वर्गभेद पर आधारित समाज की पहचान होनी चाहिए। वैचारिक स्तर पर वे मार्क्सवाद को नहीं छोड़ सकते और कहते हैं-"पार्टीजन साहित्यकार बनकर ही हम ऐसे साहित्य का निर्माण कर सकेंगे जो अगली पीढ़ियों के लिए मूल्यवान हो।|"

3. 'निराला की साहित्य साधना' में उन्होंने एक ओर तो निराला के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों का प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत किया है तो दूसरी ओर निराला की काव्य प्रतिभा, रचना प्रक्रिया, भाषा एवं काव्य सौन्दर्य को भी उद्घाटित किया है।

4. डॉ. रामविलास शर्मा की एक अन्य महत्वपूर्ण कृति है-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना। इसमें उन्होंने शुक्ल जी की लोकहृदय में लीन होने की कसौटी पर जोर देते हुए उनके अन्तर्विरोधों को भी उजागर किया है।

5. रामविलास जी के प्रारम्भिक समीक्षा ग्रन्थों में इनका तेवर आक्रामक रहा है, किन्तु परवर्ती काल में लिखे गए ग्रन्थों में वह आक्रोश नहीं झलकता। इनमें संयम, विवेक एवं सन्तुलन विद्यमान है।

6. नई कविता के प्रति डॉ. रामविलास शर्मा का रुख कुछ-कुछ उसी प्रकार का है जैसा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का छायावाद के प्रति था। इस नकारात्मक रुख के कारण वे नयी कविता के प्रति न्याय नहीं कर पाए है।

7. जो विचार डॉ. शर्मा की मान्यताओं के उन्हें वे स्वीकार करते हैं, किन्तु जो विचार उनकी मान्यताओं के प्रतिकूल हैं, उन्हें वे किसी स्थिति में स्वीकार नहीं करते। वे समझौतावादी समीक्षक नहीं हैं।

8. 'तुलसी के सामन्त विरोधी मूल्य' नामक रचना में उन्होंने तुलसी के वर्ग चरित्र को प्रस्तुत किया। उन्होंने विद्वत्तापूर्वक, यह सिद्ध किया कि तुलसी शोषितों के साथ हैं तथा शोषण के विरोधी हैं, क्योंकि तुलसी ने स्वयं शोषण को झेला था।

9. भाषा के प्रति अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट करते डॉ. शर्मा लिखते हैं-"भाषा एक हथियार है जिससे हम प्रतिगामी शक्तियों पर प्रहार कर सकते हैं। क्रान्ति के लिए आवश्यक है। अपनी शत्रु रूपी प्रतिगामी शक्तियों को पहचानना।"

10. डॉ. शर्मा अपनी समीक्षा पद्धति में न तो की तरह शालीन हैं और न ही द्विवेदी जी की भांति व्यंग्यात्मक अपितु वे आक्रामक अधिक हैं। प्रतिकूल विचारों पर वे निर्मम प्रहार करते हैं।

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11. विवादास्पद होते हुए भी डॉ. शर्मा मार्क्सवादी समीक्षा एवं मार्क्सवादी चिन्तन के प्रकाश स्तम्भ रहे हैं।

12. डॉ. नगेन्द्र ने रामविलास शर्मा के योगदान पर प्रकाश डालते हुए तथा उनकी कृतियों का महत्व प्रतिपादित करते लिखा है : "पुनर्मूल्यांकन यदि आलोचना के प्रमुख कार्यों में से एक है, तो रामविलास शर्मा ने निश्चय ही हिन्दी साहित्य के अनेक लेखकों-भारतेन्दु, प्रेमचन्द, शुक्ल जी एवं निराला का पुनर्मूल्यांकन कर एक तरह से हिन्दी साहित्य का क्रमबद्ध आलोचनात्मक इतिहास प्रस्तुत करने का काम किया है।"

13. डॉ. शर्मा की मान्यता है कि जिस समाज में वर्गभेद कायम है उसमें वर्गों से परे होकर किसी शाश्वत साहित्य की रचना नहीं की जा सकती।

14. डॉ. शर्मा ने मार्क्सवादी दृष्टि से समूचे हिन्दी साहित्य की परम्परा की नवीन व्याख्या की और इस प्रकार मार्सवादी समीक्षा की शक्ति एवं सामर्थ्य का परिचय दिया।

15. डॉ. रामविलास शर्मा की मान्यता है कि साहित्य का प्रभाव अपने भावमूलक स्वभाव के कारण दर्शन एवं विज्ञान की अपेक्षा अधिक पड़ता है। वह मनुष्य को श्रेष्ठ विचार देता है और उन्हें कार्यरूप में परिणत करने की प्रेरणा देकर वह हमारे मनोबल को दृढ़ करता है। यही नहीं अपितु साहित्य हमारे चरित्र का भी निर्माण करता है।

16. डॉ. शर्मा प्रयोगवाद एवं नयी कविता के हैं यद्यपि अज्ञेय द्वारा प्रकाशित 'तार सप्तक' के सात कवियां में उन्हें भी स्थान मिला है। वे लिखते हैं- 'विषयवस्तु मे निकम्मापन, निर्थकता, निरुद्देश्यता... लिए जनजीवन या तो है नहीं या है तो उन्हीं जैसा विकृत और निरुद्देश्य।"

17. डॉ. शर्मा ने साहित्य में सामाजिक यथार्थ के चित्रण पर बल दिया। इसी कारण वे प्रेमचन्द के प्रशंसक थे। उनका स्पष्ट धारणा थी कि प्रगतिशील साहित्य युग की मांग को पूरा करने वाला साहित्य है।

18. डॉ. रामविलास शर्मा ने लेनिन की भाषा को आदर्श मानते हुए अपनी भाषा सम्बन्धी दृष्टिकोण का परिचय इन शब्दों में दिया है-"शैली की स्पष्टता, शब्दों का सधा प्रयोग, हास्य-विनोद व व्यंग्य के छीटे, क्रोधावेश में जलते वाक्य, कहावते, मुहावरे, पुराने लेखकों की रचनाओं के उदाहरण लेनिन की शैली की वस्तु है जो बताती है कि इस महान क्रान्तिकारी बिचारक ने भाषा व शब्दों से अपनी व्यंजना के माध्यम पर साहित्य के रूप पर किस प्रकार अधिकार कर लिया था।"

      उक्त विवेचन के आधार पर हम कह सकते है कि डॉ. रामविलास शर्मा हिन्दी साहित्य के समर्थ आलोचक हैं तथा उनकी समीक्षा पद्धति प्रगतिशील चेतना से प्रभावित है। माक्क्सवादी सिद्धान्तों पर आधृत उनकी कृतियों ने हिन्दी समीक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान किया है।


गोबिंद कुमार यादव
बिरसा मुंडा कॉलेज
6294524332


    



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