कबीर की भक्ति भावना पर प्रकाश डालिए।
कबीरदास हिंदी साहित्य के ऐसे महान संत कवि हैं जिनकी भक्ति भावना भारतीय भक्ति आंदोलन में एक विशिष्ट स्थान रखती है। उनकी भक्ति न तो कर्मकांड प्रधान है और न ही बाह्य आडंबरों से जुड़ी हुई। कबीर की भक्ति मूलतः निर्गुण, निराकार, निरंजन ब्रह्म की उपासना है। वे ईश्वर को किसी मूर्ति, मंदिर, मस्जिद या धर्मग्रंथ तक सीमित नहीं मानते, बल्कि उसे मनुष्य के अंतरात्मा में निवास करने वाला सत्य मानते हैं।
कबीर की भक्ति भावना का मूल आधार ज्ञान, प्रेम और अनुभव है। उन्होंने गुरु को ईश्वर से भी बड़ा माना है, क्योंकि गुरु ही शिष्य को ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाता है। कबीर कहते हैं—
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय।”
इस दोहे से स्पष्ट है कि कबीर की भक्ति में गुरु का स्थान सर्वोपरि है।
कबीर की भक्ति भावना में राम का विशेष महत्व है, परंतु उनका राम दशरथ पुत्र नहीं, बल्कि सर्वव्यापक ब्रह्म है। कबीर का राम निर्गुण है—जिसका कोई रूप, रंग, आकार नहीं। वे कहते हैं—
“दशरथ सुत तिहुं लोक बखाना, राम नाम को मरम न जाना।”
यहाँ कबीर स्पष्ट करते हैं कि वे सगुण राम की नहीं, बल्कि निर्गुण राम की भक्ति करते हैं।
कबीर की भक्ति में प्रेम तत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार ईश्वर को तर्क या शास्त्रज्ञान से नहीं, बल्कि प्रेम से पाया जा सकता है। वे कहते हैं—
“प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो न समाय।”
अर्थात ईश्वर की प्राप्ति के मार्ग में अहंकार के लिए कोई स्थान नहीं है।
कबीर की भक्ति भावना में समर्पण और वैराग्य भी दिखाई देता है। संसार की नश्वरता को समझकर वे ईश्वर की शरण में जाने का संदेश देते हैं। वे मानते हैं कि सांसारिक मोह-माया मनुष्य को ईश्वर से दूर करती है।
“माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।”
कबीर की भक्ति भावना सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने भक्ति को केवल व्यक्तिगत साधना न मानकर, समाज सुधार का माध्यम बनाया। उनकी भक्ति सर्वजन हिताय है, जिसमें जाति, वर्ग, धर्म का कोई भेद नहीं। वे कहते हैं—
“जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।”
इस प्रकार कबीर की भक्ति भावना सरल, सहज, निर्गुण, प्रेममय और अनुभवजन्य है। उनकी भक्ति आडंबरों का विरोध करती है और मनुष्य को आत्मज्ञान तथा मानवता की ओर प्रेरित करती है। यही कारण है कि कबीर की भक्ति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उनके समय में थी।
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