सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

कबीर की सामाजिक / क्रांतिकारी चेतना पर प्रकाश डालिए

 कबीर की सामाजिक / क्रांतिकारी चेतना पर प्रकाश डालिए

कबीरदास केवल भक्त कवि ही नहीं, बल्कि एक महान समाज सुधारक और क्रांतिकारी चेतना के वाहक भी थे। उनका युग सामाजिक, धार्मिक और नैतिक विकृतियों से ग्रस्त था। समाज में जातिवाद, छुआछूत, धर्मांधता, पाखंड और शोषण व्याप्त था। कबीर ने इन सभी बुराइयों पर निर्भीक प्रहार किया।

कबीर की सामाजिक चेतना का सबसे प्रमुख पक्ष है—जाति व्यवस्था का विरोध। वे जन्म के आधार पर ऊँच-नीच को अस्वीकार करते हैं। उनके अनुसार सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान हैं।

“एक बूंद एक मलमूत्रा, एक चाम एक गात।

इस पंक्ति में कबीर सामाजिक समानता का सशक्त संदेश देते हैं।

कबीर ने धार्मिक पाखंड और कर्मकांड का तीव्र विरोध किया। उन्होंने हिंदू और मुस्लिम—दोनों धर्मों के बाहरी आडंबरों पर कटाक्ष किया। मंदिर-मस्जिद, मूर्ति-पूजा, रोज़ा-नमाज़ को उन्होंने ईश्वर प्राप्ति का मार्ग नहीं माना।

“पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहाड़।”

कबीर की क्रांतिकारी चेतना का एक महत्वपूर्ण पक्ष है—धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण। वे न तो स्वयं को हिंदू मानते हैं और न मुस्लिम। वे कहते हैं—

ना हम हिंदू, ना मुसलमान।

यह कथन उस युग में अत्यंत साहसिक और क्रांतिकारी था।

कबीर ने समाज में व्याप्त नारी अपमान और पारिवारिक विकृतियों पर भी प्रहार किया। वे नारी को भोग की वस्तु मानने वाली मानसिकता का विरोध करते हैं और संयमित जीवन पर बल देते हैं। साथ ही वे मानव के आंतरिक दोषों—काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार—को समाज के पतन का कारण मानते हैं।

कबीर की सामाजिक चेतना उनकी भाषा और शैली में भी दिखाई देती है। उन्होंने लोकभाषा में अपनी बात कही, जिससे सामान्य जन भी उनके विचारों को समझ सके। उनकी वाणी में व्यंग्य, कटाक्ष और तीखापन है, जो समाज को झकझोर देता है।

कबीर की क्रांतिकारी चेतना केवल आलोचना तक सीमित नहीं है, बल्कि वे नवीन समाज की कल्पना भी करते हैं—ऐसा समाज जो समानता, प्रेम, सत्य और मानवता पर आधारित हो। वे कहते हैं—

“साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय।

यह सामाजिक संतुलन और नैतिक जीवन का आदर्श प्रस्तुत करता है।

इस प्रकार कबीर की सामाजिक और क्रांतिकारी चेतना उन्हें केवल कवि नहीं, बल्कि युगद्रष्टा और समाज सुधारक सिद्ध करती है। उनके विचार आज भी सामाजिक न्याय और मानवता के लिए प्रेरणास्रोत हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

बिहारी की काव्य भाषा पर प्रकाश डालें

 बिहारी की काव्य भाषा पर प्रकाश डालें बिहारी की काव्य-भाषा हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट पहचान रखती है। उनकी भाषा रीतिकालीन काव्य-परंपरा के अ...