सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

तुलसीदास की भक्ति-भावना पर प्रकाश डालिए।

 तुलसीदास की भक्ति-भावना पर प्रकाश डालिए।

गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य के भक्ति काल के सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक प्रभावशाली कवि माने जाते हैं। उनकी भक्ति भावना केवल व्यक्तिगत आस्था तक सीमित न होकर लोकमंगल, सामाजिक समरसता और नैतिक आदर्शों से गहराई से जुड़ी हुई है। तुलसीदास की भक्ति रामभक्ति है, जो सगुण, साकार और मर्यादित रूप में प्रकट होती है। उन्होंने भगवान राम को केवल ईश्वर ही नहीं, बल्कि आदर्श मनुष्य, आदर्श राजा, पुत्र, पति और मित्र के रूप में प्रस्तुत किया है। उनकी भक्ति भावना में दास्य, वात्सल्य और सख्य भाव का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।

(क) सगुण भक्ति की प्रधानता

तुलसीदास सगुण भक्ति के प्रमुख कवि हैं। वे निर्गुण निराकार ब्रह्म की अपेक्षा साकार, गुणयुक्त ईश्वर की उपासना को अधिक महत्व देते हैं। उनके लिए राम सगुण, साकार और करुणा के सागर हैं। रामचरितमानस में राम को “रघुकुल रीति सदा चली आई” जैसे आदर्श वाक्यों के माध्यम से मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रस्तुत किया गया है। तुलसीदास की भक्ति भावना लोक के लिए सरल और ग्राह्य है, क्योंकि साकार राम से सामान्य जन आत्मीय संबंध स्थापित कर सकता है।

(ख) दास्य भाव की प्रधानता

तुलसीदास की भक्ति का मूल स्वर दास्य भाव है। वे स्वयं को राम का दास मानते हैं और इसी भाव से उनकी उपासना करते हैं। उनके अनुसार भक्त और भगवान का संबंध स्वामी-सेवक का है। विनय पत्रिका में तुलसीदास की दास्य भक्ति अत्यंत मार्मिक रूप में व्यक्त हुई है। वे अपने पापों, दुर्बलताओं और अज्ञान को स्वीकार करते हुए प्रभु राम से कृपा की याचना करते हैं। यह विनय और आत्मसमर्पण उनकी भक्ति भावना की विशेषता है।

(ग) प्रेम और करुणा पर आधारित भक्ति

तुलसीदास की भक्ति भय या कर्मकांड पर आधारित नहीं है, बल्कि प्रेम और करुणा पर आधारित है। उनके राम करुणामय हैं, जो दीन-दुखियों पर सहज ही कृपा करते हैं। शबरी, केवट, निषादराज और अहल्या जैसे पात्रों के माध्यम से तुलसीदास यह स्पष्ट करते हैं कि प्रभु की भक्ति में जाति, कुल या विद्या का कोई महत्व नहीं, बल्कि निष्कलुष प्रेम ही सबसे बड़ा साधन है।

(घ) लोकमंगल की भावना

तुलसीदास की भक्ति भावना का प्रमुख लक्ष्य लोकमंगल है। वे भक्ति को केवल मोक्ष का साधन नहीं मानते, बल्कि समाज सुधार का माध्यम भी मानते हैं। रामचरितमानस में आदर्श शासन, पारिवारिक मर्यादा, सामाजिक कर्तव्य और नैतिक मूल्यों का सुंदर चित्रण है। उनके राम ‘राजा’ होकर भी लोककल्याण को सर्वोपरि रखते हैं। इस प्रकार तुलसीदास की भक्ति भावना समाज को दिशा देने वाली है।

(ङ) वैराग्य और संसार-दृष्टि

यद्यपि तुलसीदास गृहस्थ जीवन और सामाजिक कर्तव्यों को महत्व देते हैं, फिर भी उनकी भक्ति भावना में वैराग्य का तत्व भी विद्यमान है। वे संसार को नश्वर और मायामय मानते हैं तथा ईश्वर भक्ति को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य बताते हैं। किंतु उनका वैराग्य पलायनवादी नहीं है, बल्कि कर्तव्य के साथ जुड़ा हुआ है।

(च) शरणागति और आत्मसमर्पण

तुलसीदास की भक्ति का चरम रूप शरणागति है। वे राम को ही एकमात्र आश्रय मानते हैं। भक्त का कर्तव्य है कि वह पूर्ण विश्वास के साथ प्रभु की शरण में जाए। यह शरणागति भाव तुलसीदास की भक्ति भावना को अत्यंत ऊँचाई प्रदान करता है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि तुलसीदास की भक्ति भावना सरल, सहज, लोकमंगलकारी और प्रेममयी है। उनकी रामभक्ति ने हिंदी साहित्य ही नहीं, बल्कि भारतीय जनमानस को भी गहराई से प्रभावित किया है। तुलसीदास की भक्ति भावना आज भी जीवन मूल्यों, नैतिकता और मानवीय संवेदनाओं का सशक्त स्रोत बनी हुई है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

बिहारी की काव्य भाषा पर प्रकाश डालें

 बिहारी की काव्य भाषा पर प्रकाश डालें बिहारी की काव्य-भाषा हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट पहचान रखती है। उनकी भाषा रीतिकालीन काव्य-परंपरा के अ...