सोमवार, 13 नवंबर 2023

रिपोर्ताज : परिभाषा, अर्थ

 

प्रश्न-1 रिपोर्ताज का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- जीवन की सूचनाओं की कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए रिपोर्ताज का जन्म हुआ। रिपोर्ताज पत्रकारिता के क्षेत्र की विधा है। इस शब्द का उद्भव फ्रांसीसी भाषा से माना जाता है। इस विधा को हम गद्य विधाओं में सबसे नया कह सकते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय यूरोप के रचनाकारों ने युद्ध के मोर्चे से साहित्यिक रिपोर्ट तैयार की। इन रिपोर्टों को ही बाद में रिपोर्ताज कहा गया। वस्तुतः यथार्थ घटनाओं को संवेदनशील साहित्यिक शैली में प्रस्तुत कर देने को ही रिपोर्ताज कहा जाता है।

प्रश्न-2 रिपोर्ताज के संबंध में किन्हीं दो विद्वानों की परिभाषा लिखिए।

उत्तर- डॉ. भगीरथ मिश्र ने रिपोर्ताज को परिभाषित करते हु लिखा है- "किसी घटना या दश्य का अत्यंत विवरणपूर्ण सूक्ष्म, रोचक वर्णन इसमें इस प्रकार किया जाता है कि वह हमारी आंखों के सामने प्रत्यक्ष हो जाए और हम उससे प्रभावित हो उठें।"

शिवदान सिंह चौहान के अनुसार- "आधुनिक जीवन की द्रुतगामी वास्तविकता में हस्तक्षेप करने के लिए मनुष्य को नई साहित्यिक रूप विधा को जनम देना पड़ा। रिपोर्ताज उन सबसे प्रभावशाली एवं महत्वपूर्ण विधा है।"

प्रश्न-3 हिन्दी का प्रथम रिपोर्ताज किसे माना जाता है?

उत्तर- माना जाता है कि हिन्दी का पहला रिपोर्ताज शिवदान सिंह चौहान ने 'लक्ष्मीपुर' नाम से लिखा था

 रिपोर्ताज के विषय में कुछ स्मरणीय बिन्दु-

  • Ø  रिपोर्ताज का उदय, द्वितीय महायुद्ध के समय युद्ध की घटनाओं के रिपोर्ट या विवरण प्रस्तुति के अंतर्गत एक साहित्यिक विधा के रूप में हुआ था।
  • Ø  रिपोर्ताज, समाचार पत्रों की देन है।
  • Ø  रिपोर्ताज, गद्य विधाओं में सबसे नया कह सकते हैं।
  • Ø  हिन्दी में रिपोर्ताज लेखन की परम्परा 1940 के आस-पास शुरू हुई।
  • Ø  माना जाता है कि हिन्दी का पहला रिपोर्ताज शिवदान सिंह चौहान ने 'लक्ष्मीपुर' नाम से लिखा था।
  • Ø  रिपोर्ताज साहित्य विधा के दो लेखकों के नाम 'रांगेय राघव' और 'कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर' हैं।


सोमवार, 19 जून 2023

अनुवाद : अर्थ, स्वरुप, प्रकृति, आवश्यकता





अनुवाद : अर्थ, स्वरुप, प्रकृति

· प्रश्न - अनुवाद का आशय स्पष्ट किजिए।

किसी भाषा में कही या लिखी गयी बात का किसी दूसरी भाषा में सार्थक परिवर्तन अनुवाद (Translation) कहलाता है। 'अनुवाद' का व्युत्पत्तिमूलक अर्थ है - पुनः कथन; एक बार कही हुई बात को दोबारा कहना। संस्कृत के ’वद्‘ धातु से ’अनुवाद‘ शब्द का निर्माण हुआ है। ’वद्‘ का अर्थ है बोलना। ’वद्‘ धातु में 'अ' प्रत्यय जोड़ देने पर भाववाचक संज्ञा में इसका परिवर्तित रूप है 'वाद' जिसका अर्थ है- 'कहने की क्रिया' या 'कही हुई बात'। 'वाद' में 'अनु' उपसर्ग जोड़कर 'अनुवाद' शब्द बना है, जिसका अर्थ है, प्राप्त कथन को पुनः कहना। इसका प्रयोग पहली बार मोनियर विलियम्स ने अँग्रेजी शब्द ट्रांसलेशन (translation) के पर्याय के रूप में किया। इसके बाद ही 'अनुवाद' शब्द का प्रयोग एक भाषा में किसी के द्वारा प्रस्तुत की गई सामग्री की दूसरी भाषा में पुनः प्रस्तुति के संदर्भ में किया गया।

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· प्रश्न - अनुवाद के स्वरूप पर प्रकाश डालिए ।

अनुवाद के स्वरूप के दो उल्लेखनीय पक्ष हैं - समन्वय और सन्तुलन। अनुवाद सिद्धान्त का बहुविद्यापरक आयाम इसका समन्वयशील पक्ष है। तदनुसार, यद्यपि अनुवाद सिद्धान्त का मूल उद्गम है अनुप्रयुक्त तुलनात्मक पाठसङ्केतविज्ञान, तथापि उसे कुछ अन्य शास्त्र भी स्पर्श करते हैं। 'तुलनात्मक' से अनुवाद का दो भाषाओं से सम्बन्धित होना स्पष्ट ही है, जिसमें भाषाओं की समानता-असमानता के प्रश्न उपस्थित होते हैं। पाठसंकेतविज्ञान के तीनों पक्ष - अर्थविचार, वाक्यविचार तथा सन्दर्भमीमांसा - अनुवाद सिद्धान्त के लिए प्रासंगिक हैं। अर्थविचार में भाषिक संकेत तथा भाषाबाह्य यथार्थ के बीच में सम्बन्ध का अध्ययन होता है। सन्दर्भमीमांसा के अन्तर्गत भाषाप्रयोग की स्थिति के सन्दर्भ के विभिन्न आयामों - वक्ता एवं श्रोता की सामाजिक पहचान, भाषाप्रयोग का उद्देश्य तथा सन्देश के प्रति वक्ता - श्रोता की अभिवृत्ति, भाषाप्रयोग की भौतिक परिस्थितियों की तथा अभिव्यक्ति, माध्यम आदि - की मीमांसा होती है। स्पष्ट है कि संकेतविज्ञान की परिधि भाषाविज्ञान की अपेक्षा व्यापकतर है तथा अनुवाद कार्य जैसे व्यापक सम्प्रेषण व्यापार के अध्ययन के उपयुक्त है।

समन्वय पक्ष

अनुवाद सिद्धान्त को स्पर्श करने वाले शास्त्रों में है सम्प्रेषण सिद्धान्त जिसकी मान्यताओं के अनुसार अनुवाद कार्य एक सम्प्रेषण व्यापार है, तथा तदनुसार उस पर वे सभी बातें लागू होती हैं, जो सम्प्रेषण व्यापार की प्रकृति में हैं, जैसे सम्प्रेषण का शत्प्रतिशत् यथातथ न होना, अपूर्णता, उद्रिक्तता (व्यतिरिक्तता), आंशिक कृत्रिमता आदि। इसी से अनुवाद कार्य में शब्द-प्रति-शब्द तथा अर्थ-प्रति-अर्थ समानता के स्थान पर सन्देशस्तरीय समानता का औचित्य भी साधा जा सकता है। संक्रियात्मक दृष्टि से एक पाठ या प्रोक्ति अनुवाद कार्य का प्रवर्तन बिन्दु होता है। एक पाठ की अपनी संरचना होती है, भाषिक संसक्ति तथा सन्देशगत सुबद्धता की सङ्कल्पनाओं द्वारा उसके सुगठित अथवा शिथिल होने की जाँच कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त एक पाठ को भाषाप्रकायों की एकीभूत समष्टि के रूप में देखते हुए, उसमें भाषा-प्रयोग शैलीओँ के भाषाप्रकार्यमूलक वितरण के विषय में अधिक निश्चित जानकारी प्राप्त होती हैं। इसी से सम्बन्धित शास्त्र है, समाजभाषाशास्त्र तथा शैलीविज्ञान, जिसमें सामाजिक बोलियों तथा प्रयुक्तियों के अध्ययन के साथ सन्दर्भानुकूल भाषाप्रयोग की शैलीओँ के वितरण की जानकारी अनुवाद सिद्धान्त के लिए वाञ्छनीय है।

भाषा से समन्धित होने के कारण तर्कशास्त्र तथा भाषादर्शन भी अनुवाद सिद्धान्त को पुष्ट करते हैं। तर्कशास्त्र के अनुसार अनूदित पाठ के सत्यमूल्य की परीक्षा अनुवाद की विशुद्धता को शुद्ध करने का आधार है। भाषादर्शन में होने वाले अर्थ सम्बन्धी चिन्तन से अनुवाद कार्य में अर्थ के अन्तरण या उसकी पुनरावृत्ति से सम्बन्धित समस्याओं को जानने में सहायता मिलती है। विटजेन्स्टीन की मान्यता 'भाषा में शब्द का 'प्रयोग' ही उसका अर्थ है'। अनुवाद सिद्धान्त के लिए इस कारण से विशेष प्रासंगिक है कि पाठ ही अनुवाद कार्य की इकाई है, जिसका सफल अर्थबोध अनुवाद की पहली आवश्यकता है। इस प्रकार वक्ता की विवक्षा में अर्थ का मूल खोजना, भाषिक अर्थ तथा भाषाबाह्य स्थिति (सन्दर्भ) अनुवाद सिद्धान्त के आवश्यक अंग हैं। अर्थ के अन्तरण में जहाँ उपर्युक्त मान्यताओं की एक भूमिका है, वहाँ अर्थगत द्विभाषिक समानता के निर्धारण में घटकीय विश्लेषण की पद्धति की विशेष उपयोगिता स्वीकार की गई है। यह बात विशेष रूप से ध्यान में ली जाती है कि जहाँ विविध शास्त्रों की प्रासङ्गिक मान्यताओं से अनुवाद सिद्धान्त का स्वरूप निर्मित है, वहाँ स्वयं अनुवाद सिद्धान्त उन शास्त्रों का एक विशिष्ट अंग है।

सन्तुलन पक्ष

अनुवाद सिद्धान्त का 'सामान्य' पक्ष भी है और विशिष्ट पक्ष भी, और यह इसका सन्तुलनशील स्वरूप है - सामान्य और विशिष्ट का सन्तुलन। अनुवाद की परिभाषा के अनुसार कहा जाता है कि अनुवाद व्यवहारतः विशिष्ट भाषाभेद के स्तर पर तथा इसीलिए सिद्धान्ततः सामान्य भाषा के स्तर पर होता है - अंग्रेजी भाषा के एक भेद पत्रकारिता की अंग्रेजी से हिन्दी भाषा के सममूल्य भेद पत्रकारिता की हिन्दी में। तदनुसार, युगपद् रूप से अनुवाद सिद्धान्त का एक सामान्य पक्ष भी है और विशिष्ट पक्ष भी। हम जो बात सामान्य के स्तर पर कहते हैं, उसे व्यावहारिक रूप में भाषाभेद के विशिष्ट स्तर पर उदाहृत करते हैं।

· प्रश्न - अनुवाद की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए ।

बीसवीं शताब्दी में देशों के बीच की दूरियाँ कम होने के परिणामस्वरूप विभिन्न वैचारिक धरातलों और आर्थिक, औद्योगिक स्तरों पर पारस्परिक भाषिक विनिमय बढ़ा है और इस विनिमय के साथ-साथ अनुवाद का प्रयोग और अधिक किया जाने लगा है। आज के वैज्ञानिक युग में अनुवाद बहुत महत्त्वपूर्ण हो गया है। यदि हमें दूसरे देशों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना है तो हमें उनके यहाँ विज्ञान के क्षेत्र में, सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में हुई प्रगति की जानकारी होनी चाहिए और यह जानकारी हमें अनुवाद के माध्यम से मिलती है।

1. राष्ट्रीय एकता में अनुवाद की आवश्यकता

भारत जैसे विशाल राष्ट्र की एकता के प्रसंग मे अनुवाद की आवश्यकता असंदिग्ध है। भारत की भौगोलिक सीमाएँ न केवल कश्मीर से कन्याकुमारी तक बिखरी हुई हैं बल्कि इस विशाल भूखण्ड में विभिन्न विश्वासों एवं सम्प्रदायों के लोग रहते हैं जिनकी भाषाएँ एंव बोलियाँ एक दूसरे से भिन्न हैं। भारत की अनेकता में एकता इन्हीें अर्थों में है कि विभिन्न भाषाओं, विभिन्न जातियों, विभिन्न सम्प्रदायों एवं विभिन्न विश्वासों के देश में भावात्मक एवं राष्ट्रीय एकता कहीं भी बाधित नहीं होती। एक समय में महाराष्ट्र का जो व्यक्ति सोचता है वही हिमाचल का निवासी भी चिन्तन करता है।

भारत के हजारों वर्षों के अद्यतन इतिहास चिन्तन ने इस धारणा को पुष्ट किया है कि मध्ययुगीन भक्ति आन्दोलन से लेकर आज के प्रगतिशील आन्दोलन तक भारतीय साहित्य की दिशा एक रही है। यह बात अनुवाद के द्वारा ही सम्भव हो सकी कि जिस समय गोस्वामी तुलसीदास राम के चरित्र पर महाकाव्य लिख रहे थे, हिन्दी के समानान्तर ओड़िआ में बलराम, बांग्ला में कृत्तिवास, तेलुगु में पोतना, तमिल में कम्बन तथा हरियाणवी में अहमदबख्श अपने-अपने साहित्य में राम के चरित्र को नया रूप दे रहे थे।

स्वतंत्रता आन्दोलन में जिस साम्राज्यवाद और सामन्तवाद के विरोध की चिंगारी सुलगी थी उसका उत्कर्ष छायावादी दौर की विभिन्न भारतीय भाषाओं की कविता में मिलता है।



2. संस्कृति के विकास में अनुवाद की आवश्यकता

(प्रश्न – बौद्धिक-सांस्कृतिक आदान-प्रदान में अनुवाद कार्य की भुमिका पर प्रकाश डालिए ।)

दुनिया के जिन देशों में विभिन्न जातियों एवं संस्कृतियों का मिलन हुआ है वहाँ सामासिक संस्कृति के निर्माण में अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। अनुवाद की परम्परा के अध्ययन से पता चलता है कि ईसा के तीन सौ वर्ष पूर्व रोमन लोगों का ग्रीक के लोगों से सम्पर्क हुआ जिसके फलस्वरूप ग्रीक से लैटिन में अनुवाद हुए। इसी प्रकार ग्यारहवीं, बारहवीं शताब्दी में स्पेन के लोग इस्लाम के सम्पर्क में आए और बड़े पैमाने पर योरपीय भाषाओं में अरबी का अनुवाद हुआ। भारत में भी विभिन्न जातियों एवं विश्वासों के लोग आए।



आज की भारतीय संस्कृति जिसे हम सामासिक संस्कृति कहते हैं उसके निर्माण में हजारों वर्षों के विभिन्न धर्मों, मतों एवं विश्वासों की साधना छिपी हुई है।



इन सभी मतों एवं विश्वासों को आत्मसात कर जिस भारतीय संस्कृति का निर्माण हुआ है उसके पीछे अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका असंदिग्ध है।

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3. साहित्य के अध्ययन में अनुवाद की आवश्यकता

साहित्य के अध्ययन में अनुवाद का महत्व आज व्यापक हो गया है। साहित्य यदि जीवन और समाज के यथार्थ को प्रस्तुत करता है तो विभिन्न भाषाओं के साहित्य के सामूहिक अध्ययन से किसी भी समाज, देश या विश्व की चिन्तन-धारा एवं संस्कृति की जानकारी मिलती है। अनुवाद का महत्व निम्नलिखित साहित्यों के अध्ययन में सहायक है-

भारतीय साहित्य का अध्ययन।

अन्तर्राष्ट्रीय साहित्य का अध्ययन।

तुलनात्मक साहित्य का अध्ययन।

भारतीय साहित्य के अध्ययन से यह पता चलता है कि विभिन्न साहित्यक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक आन्दोलनों में हिन्दी एवं हिन्दीतर भाषा के साहित्यकारों का स्वर प्राय: एक जैसा रहा है। मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन, स्वतन्त्रता आन्दोलन तथा नक्सलबाड़ी आन्दोलनों को प्राय: सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य में अभिव्यक्ति मिली है।


अन्तर्राष्ट्रीय साहित्य के अनुवाद से ही यह तथ्य प्रकाश में आया कि दुनिया के विभिन्न भाषाओं में लिखे गए साहित्य में ज्ञान का विपुल भण्डार छिपा हुआ है। भारत में अन्तर्राष्ट्रीय साहित्य का अनुवाद तो भारत में सूफियों के दार्शनिक सिद्धान्तों के प्रचलन के साथ ही शुरू हो गया था; किन्तु इसे व्यवस्थित स्वरूप आधुनिक युग में ही प्राप्त हुआ। शेक्सपियर, डी.एच. लॉरेंस, मोपासाँ तथा सार्त्र जैसे चिन्तकों की रचनाओं के अनुवाद से भारतीय जनमानस का साक्षात्कार हुआ एवं कालिदास, रवीन्द्रनाथ टैगोर एवं प्रेमचन्द की रचनाओं से विश्व प्रभावित हुआ।

दुनिया के विभिन्न भाषाओं के अनुवाद द्वारा ही तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन में सहायता मिलती है। तुलनात्मक साहित्य द्वारा इस बात का पता लगाया जाता है कि देश, काल और समय की भिन्नता के बावजूद विभिन्न भाषाओं के रचनाकारों के साहित्य में साम्य और वैषम्य क्यों है ? अनुवाद के द्वारा ही जो तुलनीय है वह तुलनात्मक अध्ययन का विषय बनता है। प्रेमचन्द और गोर्की, निराला और इलियट तथा राजकमल चौधरी एवं मोपासाँ के साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन अनुवाद के फलस्वरूप ही सम्भव हो सका।



4. व्यवसाय के रूप में अनुवाद की आवश्यकता

वर्तमान युग में अनुवाद ज्ञान की ऐसी शाखा के रूप में विकसित हुआ है जहाँ इज्जत, शोहरत एवं पैसा तीनों हैं। आज अनुवादक दूसरे दर्जे का साहित्यकार नहीं बल्कि उसकी अपनी मौलिक पहचान है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तेजी से हुए विकास के साथ भारतीय परिदृश्य में कृषि, उद्योग, चिकित्सा, अभियान्त्रिकी और व्यापार के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ है। इन क्षेत्रों में प्रयुक्त तकनीकी शब्दावली का भारतीयकरण कर इन्हें लोकोन्मुख करने में अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

बीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध रोजगार के क्षेत्र में अनुवाद को महत्त्वपूर्ण पद पर आसीन करता है। संविधान में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिए जाने के पश्चात् केन्द्र सरकार के कार्यालयों, सार्वजनिक उपक्रमों, संस्थानों और प्रतिष्ठानों में राजभाषा प्रभाग की स्थापना हुई जहाँ अनुवाद कार्य में प्रशिक्षित हिन्दी अनुवादक एवं हिन्दी अधिकारी कार्य करते हैं। आज रोजगार के क्षेत्र में अनुवाद सबसे आगे है। प्रति सप्ताह अनुवाद से सम्बन्धित जितने पद यहाँ विज्ञापित होते हैं अन्य किसी भी क्षेत्र में नहीं।



5. नव्यतम ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों में अनुवाद की आवश्यकता

औद्योगीकरण एवं जनसंचार के माध्यमों में हुए अत्याधुनिक विकास ने विश्व की दिशा ही बदल दी है। औद्योगिक उत्पादन, वितरण तथा आर्थिक नियन्त्रण की विभिन्न प्रणालियों पर पूरे विश्व में अनुसंधान हो रहा है। नई खोज और नई तकनीक का विकास कर पूरे विश्व में औद्योगिक क्रान्ति मची हुई है। इस क्षेत्र में होने वाले अद्यतन विकास को विभिन्न भाषा-भाषी राष्ट्रों तक पहुँचाने में भाषा एवं अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

वैज्ञानिक अनुसंधानों को तीव्र गति से पूरे विश्व में पहुँचा देने का श्रेय नव्यतम विकसित जनसंचार के माध्यमों को है। आज विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, कृषि तथा व्यवसाय आदि सभी क्षेत्रों में जो कुछ भी नया होता है वह कुछ ही पलों में टेलीफोन, टेलेक्स तथा फैक्स जैसी तकनीकों के माध्यम से पूरे विश्व में प्रचारित एवं प्रसारित हो जाता है। आज जनसंचार के माध्यमों में होने वाले विकास ने हिन्दी भाषा के प्रयुक्ति-क्षेत्रों को विस्तृत कर दिया है। विज्ञान, व्यवसाय, खेलकूद एवं विज्ञापनों की अपनी अलग शब्दावली हैं।

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संचार माध्यमों में गतिशीलता बढ़ाने का कार्य अनुवाद द्वारा ही सम्भव हो सका है तथा गाँव से लेकर महानगरों तक जो भी अद्यतन सूचनाएँ हैं वे अनुवाद के माध्यम से एक साथ सबों तक पहुँच रही हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि अनुवाद ने आज पूरे विश्व को एक सूत्र में पिरो दिया है।



अनुवाद के प्रकार : शब्दानुवाद, भावानुवाद, छायानुवाद, सारानुवाद।

प्रश्न – अनुवाद के विभिन्न प्रकारों का वर्णन किजिए।



शब्दानुवाद ( टिप्पणी)

अनुवाद के क्षेत्र में शब्दानुवाद को उच्च कोटि की श्रेणी में नहीं कहा जाता किन्तु अनुवादक प्रक्रिया में ऐसे अनेक बिन्दु आते हैं जब शब्दानुवाद के सिवाय कोई पर्याय नहीं रह जाता। शब्दानुवाद वैसे भी भावानुवाद के लिए पूरक तत्त्व के रूप में काफी महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है। शब्दानुवाद में स्रोत भाषा के शब्दों तथा शब्दांशों को ज्यों-का-त्यों लक्ष्य भाषा में परिवर्तित या रूपांतरित करके अनुवाद कर लिया जाता है अर्थात इसमें मूल पाठ या सामग्री की प्रत्येक शब्दाभिव्यक्ति का अनुवाद प्रायः उसी क्रम में किया जाता है। इसीलिए अनुवाद के इस प्रकार को निकृष्ट कहा जाता है क्योंकि प्रकृति भिन्न होने के साथ ही प्रत्येक भाषा का शब्द क्रम भी भिन्न-भिन्न होता है । अंग्रेजी का एक शब्द है-Pay जिसका शब्दानुवाद भुगतान अथवा वेतन होगा किन्तु बैंकिंग क्षेत्र में उसे 'भुगतान करें' इस पूरे वाक्य के अर्थ में किया जाता है। इस प्रकार, शब्दानुवाद से कभी-कभी उलझनें भी पैदा प्रयुक्त हो सकती हैं। शब्दानुवाद में मूल बातों के यथातथ्य होने के कारण अनुवाद की भाषा प्रायः कृत्रिम एवं निष्प्राण हो जाती है तथा उसमें मूल पाठ या रचना का स्वाभाविक प्रवाह नहीं रह जाता या नहीं आ पाता। फलतः अनुवाद दुर्बोध्य, बोझिल और कभी-कभार हास्यास्पद भी हो जाता है। शब्दानुवाद के रोचक उदाहरण इस प्रकार दिए जा सकते हैं-

1. My head is eating circles.

मेरा सिर चक्कर खा रहा है।

2. He became water and water.

वह पानी-पानी हो गया।

3. Warm welcome.

गरमागरम स्वागत।

4. It was raining cats & dogs.

बिल्ली-कुत्तों की बरसात हो रही थी।



भावानुवाद ( टिप्पणी)

अनुवादक क्षेत्र में अन्य सभी अनुवादों की अपेक्षा भावानुवाद को उत्तम कोटि का अनुवाद माना जाता है। भावानुवाद में शब्दानुवाद की तरह केवल शब्द, वाक्यांश तथा वाक्य-प्रयोग आदि पर ध्यान न देकर स्रोत भाषा तथा लक्ष्य भाषा के मूल अर्थ, विचार और भावाभिव्यक्ति पर ही अधिक ध्यान दिया जाता है। भावानुवाद में मूल पाठ की आत्मा अर्थात मूल कथ्य की सामग्री को ही मुख्य रूप मानकर उसे लक्ष्य भाषा में यथायोग्य पद्धति से सम्प्रेषित किया जाता है। अनुवाद के क्षेत्र में कभी-कभी ऐसी स्थितियाँ पैदा होती हैं जब अनुवादक किसी भी पाठ या वाक्यांश का ठीक-ठीक शब्दानुवाद करने में असमर्थ होता है। तब ऐसी स्थिति में उस सामग्री के अनुवाद के लिए भावानुवाद का ही सहारा लेना पड़ता है। डॉ. भोलानाथ तिवारी की मान्यता है-"सामान्यतः मूल सामग्री यदि सूक्ष्म भावों वाली है तो उसका भावानुवाद करते हैं। और यदि वह तथ्यात्मक वैज्ञानिक या विचार प्रधान है तो उसका शब्दानुवाद करते है।" भावानुवाद को अनुवाद प्रक्रिया की महत्त्वपूर्ण पद्धति माना जाता है, क्योंकि भावानुवाद मूल भाषा पाठ के प्रमुख विचार भाव, अर्थ तथा संकल्पना को लक्ष्य भाषा में उनकी समस्त विशेषताओं के साथ सम्प्रेषित किया जाता है। भावानुवाद में अनुवादक का ध्यान कथ्य के भाव, विचार तथा अर्थ पर विशेष रूप से बना रहता है। वस्तुतः इसमें अनुवादक मूल भाषा (स्रोत भाषा) पाठ की सामग्री के अर्थ को सम्पूर्णतः एवं समुचित ढंग से लक्ष्य भाषा पाठ में लाने की चेष्टा करता है, फलतः इसमें स्रोत भाषा की मूल भाव-भंगिमा तथा रचनाधर्मिता प्रायः सुरक्षित बनी रहती है। अतः इस दृष्टि से भावानुवाद सर्वाधिक उपयोगी माना जा सकता है।

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छायानुवाद ( टिप्पणी)

छायानुवाद के सन्दर्भ में 'छाया' शब्द से तात्पर्य है धूसर तथा धुँधला प्रभाव।

छायानुवाद में मूल पाठ की अर्थच्छाया को ग्रहण कर अनुवाद किया जाता है। अर्थात इसमें स्रोत भाषा की मुख्य बातें, दृष्टिकोण तथा विचार या संकल्पना आदि को ग्रहण करके इन सबके संकलित प्रभाव को लक्ष्य भाषा में रूपांतरित किया जाता है। छायानुवाद शब्दानुवाद की तरह स्रोत भाषा अथवा मूल पाठ के शब्दों का अनुसरण न करके, या भावानुवाद की तरह मूल विचारों के भावार्थ का यथातथ्य अनुगमन न करके, इन दोनों से मुक्त होकर इनकी छाया मात्र लेकर स्वतन्त्र रूप से अनुवाद किया जाता है।



सारानुवाद ( टिप्पणी)

लम्बी रचनाओं, लम्बे भाषणों, बृहद प्रतिवेदनों तथा राजनीतिक वार्ताओं आदि को उसके कथ्य तथा मूल तत्त्व को पूर्णतः सुरक्षित रखते हुए प्रसंग अथवा सन्दर्भ की आवश्यकतानुसार संक्षेप में रूपांतरित करने की प्रक्रिया को सारानुवाद कहते हैं। ऐसे अनुवाद में स्रोत भाषा की सामग्री का सारांश मूल कथ्य को सुरक्षित रखते हुए लक्ष्य भाषा में अंतरित कर दिया जाता है। अनुवाद की इस पद्धति का सहारा मुख्यतः दुभाषिये, समाचार पत्रों के संवाददाता तथा संसद अथवा विधान मण्डलों की कार्यवाही के रिकार्ड कर्ता आदि लेते हैं।



· प्रश्न - नाइडा के अनुसार अनुवाद प्रक्रिया के कितने चरण हैं और कौन-कौन ?

नाइडा के अनुसार अनुवाद प्रक्रिया के वास्तव में तीन सोपान ( चरण) होते हैं- ( विश्लेषण , अंतरण, पुनर्गठन )

(१) अनुवादक सर्वप्रथम मूलभाषा के पाठ का विश्लेषण करता है; पाठ की व्याकरणिक संरचना तथा शब्दों एवं शब्द श्रृङ्खलाओं का अर्थगत विश्लेषण कर वह मूलपाठ के सन्देश को ग्रहण करता है । इसके लिए वह भाषा-सिद्धान्त पर आधारित भाषा-विश्लेषण की तकनीकों का उपयुक्त रीति से अनुप्रयोग करता है । विशेषतः असामान्य रूप से जटिल तथा दीर्घ और अनेकार्थ वाक्यों और वाक्यांशों/पदबन्धों के अर्थबोधन में हो सकने वाली कठिनाइयों का हल करने में मूलपाठ का विश्लेषण सहायक रहता है।

(२) अर्थबोध हो जाने के पश्चात् सन्देश का लक्ष्यभाषा में संक्रमण होता है । यह प्रक्रिया अनुवादक के मस्तिष्क में होती है । इसमें मूलपाठ के लक्ष्यभाषागत अनुवाद-पर्याय निर्धारित होते हैं तथा दोनों भाषाओं के मध्य विभिन्न स्तरों और श्रेणियों में सामञ्जस्य स्थापित होता है ।

(3) अन्त में अनुवादक मूलभाषा के सन्देश को लक्ष्य भाषा में उसकी संरचना एवं प्रयोग नियमों तथा विधागत रूढ़ियों के अनुसार इस प्रकार पुनर्गठित करता है कि वह लक्ष्यभाषा के पाठक को स्वाभाविक प्रतीत होता है या कम से कम अस्वाभाविक प्रतीत नहीं होता ।

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विश्लेषण

अनुवाद प्रक्रिया के स्पष्टीकरण के सन्दर्भ में नाइडा ने मूलपाठ के विश्लेषण के लिए एक सुनिश्चित भाषा सिद्धान्त तथा विश्लेषण की रूपरेखा प्रस्तुत की है। उनके अनुसार भाषा के दो पक्षों का विश्लेषण अपेक्षित है - व्याकरण तथा शब्दार्थ । नाइडा व्याकरण को केवल वाक्य अथवा निम्नतर श्रेणियों - उपवाक्य, पदबन्ध आदि - के गठनात्मक विश्लेषण पर्यन्त सीमित नहीं मानते । उनके अनुसार व्याकरणिक गठन भी एक प्रकार से अर्थवान् होता है । उदाहरण के लिए, कर्तृवाच्य संरचना और कर्मवाच्य/भाववाच्य संरचना में केवल गठनात्मक अन्तर ही नहीं, अपितु अर्थ का अन्तर भी है । इस सम्बन्ध में उन्होंने अनेकार्थ संरचनाओं की ओर विशेष रूप से ध्यान खींचा है। उदाहरण के लिए, 'यह राम का चित्र है' इस वाक्य के निम्नलिखित तीन अर्थ हो सकते हैं :

(१) यह चित्र राम ने बनाया है।

(२) इस चित्र में राम अंकित है।

(३) यह चित्र राम की सम्पत्ति है।

ये तीनों वाक्य, नाइडा के अनुसार, बीजवाक्य या उपबीजवाक्य हैं, जिनका निर्धारण अनुवर्ति रूपान्तरण की विधि से किया गया है । बाह्यस्तरीय संरचना पर इन तीनों वाक्यों का प्रत्यक्षीकरण 'यह राम का चित्र है' इस एक ही वाक्य के रूप में होता है । नाइडा ने उपर्युक्त रूपान्तरण विधि का विस्तार से वर्णन किया है । उनकी रूपान्तरण विषयक धारणा चाम्स्की के रूपान्तरण-प्रजनक व्याकरण की धारणा के समान कठोर तथा गठनबद्ध नहीं, अपि तु अनुप्रयोग की प्रकृति तथा उसके उद्देश्य के अनुरूप लचीली तथा अन्तर्ज्ञानमलक है । इसी प्रकार उन्होंने शब्दार्थ की दो कोटियों - वाच्यार्थ और लक्ष्य-व्यंग्यार्थ- का वर्णनात्मक विश्लेषण किया है । यह ध्यान देने योग्य है कि, नाइडा ने विश्लेषण की उपर्युक्त प्रणाली को मूलभाषा पाठ के अर्थबोधन के साधन के रूप में प्रस्तुत किया है । उनका बल मूलपाठ के अर्थ का यथासम्भव पूर्ण और शुद्ध रीति से समझने पर रहा है । उनकी प्रणाली बाइबिल एवं उसके सदृश अन्य प्राचीन ग्रन्थों की भाषा के विश्लेषणात्मक अर्थबोधन के लिए उपयुक्त माना जाता है; यद्यपि उसका प्रयोग अन्य और आधुनिक भाषाभेदों के पाठों के अर्थबोधन के लिए भी किया जा सकता है ।



अंतरण

विश्लेषण की सहायता से हुए अर्थबोध का लक्ष्यभाषा में संक्रान्त अनुवाद-प्रक्रिया का केन्द्रस्थ सोपान है। अनुवादकार्य में अनुवादक को विश्लेषण और पुनर्गठन के दो ध्रुवों के मध्य गति करते रहना होता है, परन्तु यह गति संक्रमण मध्यवर्ती सोपान के मार्ग से होती है, जहाँ अनुवादक को (क्षण भर के लिए रुकते हुए) पुनर्गठन के सोपान के अंशो को और अधिक स्पष्टता से दर्शन होता है । संक्रमण की यह प्रक्रिया अनुवादक के मस्तिष्क में तथा अपनी प्रकृति से त्वरित तथा अन्तर्ज्ञानमूलक होती है । अनुवाद प्रक्रिया में अनुवादक के व्यक्तित्व की संगति इस सोपान पर है । विश्लेषण से प्राप्त भाषिक तथा सम्प्रेषण सम्बन्धी तथ्यों का, उपयुक्त अनुवाद-पर्याय स्थिर करने में, अनुवादक जैसा उपयोग करता है, उसी में उसकी कुशलता निहित होती है । विश्लेषण तथा पुनर्गठन के सोपानों पर एक अनुवादक अन्य व्यक्तियों से भी कभी कुछ सहायता ले सकता है, परन्तु संक्रमण के सोपान पर वह एकाकी ही होता है । संक्रमण के सोपान पर विचारणीय बातें दो हैं - अनुवादक का अपना व्यक्तित्व तथा मूलभाषा एवं लक्ष्यभाषा के बीच संक्रमणकालीन सामञ्जस्य । अनुवादक के व्यक्तित्व में उसका विषयज्ञान, भाषाज्ञान, प्रतिभा, तथा कल्पना इन चार की विशेष अपेक्षा होती है । तथापि प्रधानता की दृष्ट से प्रतिभा और कल्पना को विषयज्ञान तथा भाषाज्ञान से अधिक महत्त्व देना होता है, क्योंकि अनुवाद प्रधानतया एक व्यावहारिक और क्रियात्मक कार्य है । विषयज्ञान तथा भाषाज्ञान की कमी को अनुवादक दूसरों की सहायता से भी पूरा कर सकता है, परन्तु प्रतिभा और कल्पना की दृष्टि से अपने ऊपर ही निर्भर रहना होता है ।

मूलभाषा एवं लक्ष्यभाषा के मध्य सामञ्जस्य स्थापित होना अनुवाद-प्रक्रिया की अनिवार्य एवं आन्तरिक आवश्यकता है । भाषान्तरण में सन्देश का प्रतिकूल रूप से प्रभावित होना सम्भावित रहता है । इस प्रतिकूलता के प्रभाव को यथासम्भव कम करने के लिए अर्थपक्ष और व्याकरण दोनों की दृष्टि से दोनों भाषाओं के बीच सामंजस्य की स्थिति लानी होती है । मुहावरे एवं उनका लाक्षणिक प्रयोग, अनेकार्थकता, अर्थ की सामान्यता तथा विशिष्टता, आदि अनेक ऐसे मुद्दे हैं जिनका सामंजस्य करना होता है । व्याकरण की दृष्टि से प्रोक्ति-संरचना एवं प्रकार, वाक्य-संरचना एवं प्रकार तथा पद-संरचना एवं प्रकार सम्बन्धी अनेक ऐसी बातें हैं, जिनका समायोजन अपेक्षित होता है । उदाहरण के लिए, मूलपाठ में प्रयुक्त किसी विशेष अन्तरवाक्ययोजक के लिए लक्ष्यभाषा के पाठ में किसी अन्तरवाक्ययोजक का प्रयोग अपेक्षित न होना, मूलपाठ की कर्मवाच्य संरचना के लिए लक्ष्यभाषा में कर्तृवाच्य संरचना का उपयुक्त होना व्याकरणिक समायोजन के मुद्दे हैं ।

संक्रमण का सोपान अनुवाद कार्य की दृष्टि से जितना महत्त्वपूर्ण है, अनुवाद प्रक्रिया के स्पष्टीकरण में उसका अपेक्षाकृत स्वतन्त्र अस्तित्व शेष दो सोपानों की तुलना में उतना स्पष्ट नहीं । बहुधा संक्रमण तथा पुनर्गठन के सोपानों के अन्तर को प्रक्रिया के विशदीकरण में स्थापित करना कठिन हो जाता है । विश्लेषण और पुनर्गठन के सोपानों पर, अनुवादक का कर्तृत्व यदि अपेक्षाकृत स्वतन्त्र होता है, तो संक्रमण के सोपान पर वह कुछ अधीनता की स्थिति में रहता है । अधिक मुख्य बात यह है कि, अनुवादक को उन सब मुद्दों की चेतना हो जिनका ऊपर वर्णन किया गया है । यदि अनुवाद-प्रशिक्षणार्थी के लिए ये प्रत्यक्ष रूप से उपयोगी माने जाएँ, तो अभ्यस्त अनुवादक के अनुवाद-व्यवहार के ये स्वाभाविक अङ्ग माने जा सकते हैं।

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पुनर्गठन

मूलपाठ के सन्देश का अर्थबोध, संक्रमण के सोपान में से होते हुए लक्ष्यभाषा में पुनर्गठित होकर अनुवाद (अनुदित पाठ) का रूप धारण करता है । पुनर्गठन का सोपान लक्ष्यभाषा में मूर्त अभिव्यक्ति का सोपान है । अनुवाद प्रक्रिया की जानकारी के सम्बन्ध में अनुवादकों को पुनर्गठन के सोपान पर पाठ के जिन प्रमुख आयामों की उपयुक्तता पर ध्यान देना अभीष्ट है वे हैं -

१) व्याकरणिक संरचना तथा प्रकार,

२) शब्दक्रम,

३) सहप्रयोग,

४) भाषाभेद तथा शैलीगत प्रतिमान ।

लक्ष्यभाषागत उपयुक्तता तथा स्वाभाविकता ही इन सबकी आधारभूत कसौटी है। इन गुणों की निष्पत्ति के लिए कई बार दोनों भाषाओं में समानता की स्थिति सहायक होती है, कई बार असमानता की । उदाहरण के लिए, यह आवश्यक नहीं कि, मूलभाषा के पदबन्ध के लिए लक्ष्यभाषा का उपयुक्त अनुवाद-पर्याय एक पदबन्ध ही हो; यह संरचना एक समस्त पद भी हो सकती है; जैसे, Diploma in translation = अनुवाद डिप्लोमा । देखना यह होता है कि, लक्ष्यभाषा में सन्देश का पुनर्गठन उपर्युक्त घटकों की दृष्टि से उपयुक्तता तथा स्वाभाविकता की स्थिति की निष्पत्ति करें; वे घटक लक्ष्यभाषा की 'आत्मीयता' (जीनियस) तथा परम्परा के अनुरूप हों ।

मूलभाषा में व्याकरणिक संरचना के कतिपय तथ्यों का लक्ष्यभाषा में स्वरूप बदल सकता है, यद्यपि यह सदा आवश्यक नहीं होता । उदाहरण के लिए, आङ्ग्ल मूलपाठ की कर्मवाच्य संरचना "Steps have been taken by the Government to meet the situation" को हिन्दी में कर्मवाच्य संरचना में भी प्रस्तुत किया जा सकता है, कर्तृवाच्य संरचना में भी : " स्थिति का सामना करने के लिए सरकार द्वारा कार्यवाही की गई हैं/स्थिति का सामना करने के लिए सरकार ने कार्यवाही की हैं ।" परन्तु "The meeting was chaired by X" के लिए हिन्दी में कर्तृवाच्य संरचना "क्ष ने बैठक की अध्यक्षता की" उपयुक्त प्रतीत होता है। ऐसे निर्णय पुनर्गठन के स्तर पर किए जाते हैं । यही बात सहप्रयोग के लिए है । सहप्रयोग प्रत्येक भाषा के अपने-अपने होते हैं । अंग्रेजी में to take a step कहते हैं, तो हिन्दी में 'कार्यवाही करना' । इस उदाहरण में to take का अनुवाद 'उठाना' समझना भूल मानी जाएगी : ये दोनों अपनी-अपनी भाषा में ऐसे शाब्दिक इकाइयों के रूप में प्रयुक्त होते हैं, जिन्हें खण्डित नहीं किया जा सकता ।

भाषाभेद के अन्तर्गत, कालगत, स्थानगत और प्रयोजनमूलक भाषाभेदों की गणना होती है । तथापि एक सुगठित पाठ के स्तर पर ये सब शैलीभेद के रूप में देखे जाते हैं । उदाहरण के लिए, पुरानी अंग्रेजी की रचना का हिन्दी में अनुवाद करते समय, पुनर्गठन के सोपान पर अनुवादक को यह निर्णय करना होगा कि, लक्ष्यभाषा के किस भाषाभेद के शैलीगत प्रभाव मूलभाषापाठ के शैलीगत प्रभावों के समकक्ष हो सकते हैं । इस दृष्टि से पुरानी अंग्रेजी के पाठ का पुरानी हिन्दी में भी अनुवाद उपयुक्त हो सकता है, आधुनिक हिन्दी में भी । शैलीगत प्रतिमान को विहङ्ग दृष्टि से दो रूपों में समझाया जाता है : साहित्येतर शैली और साहित्यिक शैली ।
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साहित्येतर शैली में औपचारिक के विरुद्ध अनौपचारिक तथा तकनीकी के विरुद्ध गैर-तकनीकी, ये दो भेद प्रमुख रूप से मिलते हैं । साहित्यिक शैली में पाठ के विधागत भेदों - गद्य और पद्य, आदि का विशेष रूप से उल्लेख किया जाता है । इस दृष्टि से औपचारिक शैली के मूलपाठ को लक्ष्यभाषा में औपचारिक शैली में ही प्रस्तुत किया जाए, या मूल गद्य रचना को लक्ष्यभाषा में गद्य के रूप में ही प्रस्तुत किया जाए, यह निर्णय लक्ष्यभाषा की परम्परा पर आधारित उपयुक्तता के अनुसार करना होता है । उदाहरण के लिए, भारतीय भाषाओं में गद्य की तुलना में पद्य की परम्परा अधिक पुष्ट है; अतः उनमें मूल गद्य पाठ का यदि पद्यात्मक भाषान्तरण हो, तो वह भी उपयुक्त प्रतीत हो सकता है । सारांश यह कि लक्ष्यभाषा में जो स्वाभिक और उपयुक्त प्रतीत हो तथा जो लक्ष्यभाषा की परम्परा के अनुकूल हो – स्वाभाविकता, उपयुक्तता तथा परम्परानुवर्तिता, ये तीनों एक सीमा तक अन्योन्याश्रित हैं - उसके आधार पर लक्ष्यभाषा में सन्देश का पुनर्गठन होता है ।


गुरुवार, 16 मार्च 2023

सम्प्रेषण

 

सम्प्रेषण-

अर्थ- विचार अथवा सन्देश का एक स्थान से दूसरे स्थान तक प्रेषित होना सम्प्रेषण कहलाता है। इसमें एक सन्देश प्रेषित करने वाला एवम एक सन्देश प्राप्त करने वाला होता है।

     मन में आए विचारों का बच्चों से बातचीत करता है 3और उनसे कुछ प्रश्न पूछता है, उन की कमियों को दूर करता है, उनके जवाब सुनता है, यह सभी संप्रेषण के आग होते हैं। मनुष्य भी अपने दिन प्रतिदिन और दिनचर्या में संप्रेषण का सहारा लेता है। हम अपने दिन प्रतिदिन के कार्य में संप्रेषण के माध्यम से उन्हें आसान बनाते हैं।

अवधारणा-अलग अलग विद्वानों ने संप्रेषण की अलग अलग परिभाषाये दी है-

एइगर डेल-संप्रेषण ऐसी प्रक्रिया है जिसमे विचारों एवम भवनाओ का लाभ के लिए आदान प्रदान होता है।

बाले-सप्रेषण मनुष्य को उत्तेजित करने की विवेकी प्रक्रिया है। आदान प्रदान करना सप्रेषण कहलाता है। सप्रेषण शब्द की उत्पत्ति सेटिन भाषा के शब्द Communiesसे हुआ। संप्रेषण एक ऐसी प्रोसेस है जिसके अतर्गत मनुष्य अपने विचारों का आदान प्रदान करता है। शिक्षण में संप्रेषण का अत्यधिक महत्व है। अगर हम बात करे कि सप्रेषण और शिक्षा का वया संबंध है तो हम सीधे तौर पर बोल सकते हैं कि संप्रेषण के बिना शिक्षा और शिक्षण करना संभव ही नहीं है। अध्यापक शिक्षण के दौरान

अरस्तु-संप्रेषण ऐसा माध्यम है कि एक व्यक्ति दूसरे को इस प्रकार प्रभावित कर सके ताकि वांछित फल की प्राप्ति हो सके।

संप्रेषण के प्रकार 

1. अनौपचारिक सम्प्रेषण :- जब एक समूह में किसी को किसी से भी बात करने की आजादी हो तो उसे ग्रेपवाइन संप्रेषण कहते हैं। ग्रेपवाइन संप्रेषण में कोई अनौपचारिक वैज्ञानिक तरीके से बात नहीं की जाती है। इसमें सभी आजाद होते है कोई किसी से भी बात कर सकते है। उदाहरण – जब स्कूल में अवकाश होता है तो सभी बच्चे आजाद होते हैं। अतः अब आपस में किसी से भी बात कर सकते है।

2. औपचारिक संप्रेषण :- जब बात करने का तरीका एक विधिवत और वैज्ञानिक हो उसे औपचारिक संप्रेषण कहते हैं। औपचारिक संप्रेषण में काम करने का तरीका बहुत ही सुलझा हुआ होता है और सभी अपने अपने कामों पर ज्यादा ध्यान देते हैं। उदाहरण - किसी ऑफिस में जब कोई जूनियर अपने सीनियर से बात करता है।

3. एकल । एक तरफा / वन वे संप्रेषण  :- जब सदेश एक तरफ से ही होता है तो एकल या वन वे संप्रेषण होता है। इसमें भेजने वाला संदेश भेज टेता हैं और प्राप्तकता उसे ग्रहण कर लेता है। उदाहरण कक्षा में अध्यापक ने बच्चों को बोला कि वह खेड़े हो जाइए ती बच्चे खड़े हो जाते हैं तो बह वन वे स्प्रेषण हुआ।

4. द्वितरफा / टूवे संप्रेषण:- जब दो व्यक्ति आपस में बातचीत करते हैं तो उन में तर्क - वितर्क होता है अर्थात प्राप्तकर्ता और भेजने वाला दोनों ही सम्मिलित होते हैं। उदाहरण - अध्यापक कक्षा में बच्चों से प्रश्न करता है तो बच्चे उसका उत्तर देते हैं तो वे टू वे संप्रेशन हुआ।

5. अंतः बैयक्तिक संप्रेषण :- जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं के बारे में सोचता है तो उसे अंतः वैयक्तिक संप्रेषण कहते हैं। दूसरे शब्दों में जो व्यक्ति से प्रशन करता है तो अंत वैयक्तिक संप्रेषण कहलाता है। उदाहरण - परीक्षा कक्ष में जाने से पहले विद्यार्थी खुद से बात करता है।

6. अतर वैयक्तिक संप्रेषण :- जब दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच बातधीत होती है अर्थात जब हम दूसरों की इच्छाओं के बारे में बात करते हैं तो अंतर वैयक्तिक संप्रैषण कहलाता है। उदाहरण - मनोवैज्ञानिक और परामर्शदाता हमेशा दूसरों के बारे में बताते हैं अतः अंतर वैयक्तिक संप्रेषण हुआ।

7. शाब्दिक संप्रेषण:- शाब्दिक संप्रेषण में सदैव भाषा का प्रयोग किया जाता है। शाब्दिक संप्रेषण होता है जब मौखिक अभिव्यक्ति के दवारा अपने शब्दों को प्रस्तुत करते हैं। हम अपने दैनिक जीवन में सबसे ज्यादा शाब्दिक संप्रेषण का ही प्रयोग करते हैं।

8. अशाब्दिक संप्रेषण :- जब हम इशारो चिन्हों और कूट शाषा में बातचीत करते हैं तो वह अशाब्दिक संप्रेषण कहलाता है। उदाहरण - बहरे बच्चों से हम हाथों से इशारे करके बातचीत करते हैं।

संप्रेषण की आवश्यकता एवं महत्व

संस्था के उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक है यह उसके विकास और उत्तरोत्तर उन्नति की ओर ले जाने में सक्षम है अतः प्रबंधक और प्रशासन की दृष्टि से उपयोगी है और संगठन को प्रभावशाली बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करता है संप्रेषण को आवश्यकता एवं महत्व को हम निम्नलिखित रूप में व्यक्त कर सकते है।

(१) विचारों के आदान-प्रदान में सुविधा- संप्रेषण के माध्यम से प्रधानाध्यापक शिक्षक छात्र कर्मचारी एवं अन्य अधिकारीगण के मध्य विचारों का भावों का सूचनाओं में आदान-प्रदान सुगमता से हो जाता है। निर्धारित समय और उपयुक्त व्यक्ति को उपयुक्त सूचना मिलने से उस की प्रभावशीलता में वृद्धि होती है और विकास में उत्तरोत्तर उन्नति के शिखर पर पहुंचने का प्रयास संभव हो पाता है।

(२) प्रदीपप्रदीप विचारधाराओं की समाप्ति- संप्रेषण के द्वारा एक दूसरे व्यक्ति के मन में बैठी विरोधी विचारधारा समाप्त हो जाती है जो व्यक्ति एक दूसरे के प्रति मन में कट्ता बनाए रखते है सम्प्रेषण उस कट्ता को दूर करता है इस प्रकार विकास का एक सौदर्य पूर्ण वातावरण बनता है इससे संप्रेषण की उपयोगिता में वृद्धि होती है।

(३) संस्था के उद्देश्यों की प्राप्ति में आपसी सहयोग-सप्रेषण अधिकारी और कर्मचारी के मध्य फैली गलतफहमियों को दूर करता है दोनों आपस में बातें करके अथवा सूचना के आदान प्रदान से एक दूसरे के साथ सहयोग करने को तत्पर हो जाते हैं और अधिकारी भी कर्मचारी हित पर ध्यान देने लगते हैं इस प्रकार संस्था का विकास संभव हो पाता है और संप्रेषण की सार्थकता सिद्ध हो जाती है।

(४) प्रबंध को शक्तिशाली बनाना--संप्रेषण से प्रबंधन और प्रशासन शक्तिशाली बनते हैं। आपसी विचार-विमर्श से उचित सुझाव से विविध समस्याओं एवं कठिनाइयों का समाधान खोज लिया जाता है समस्या का समाधान खोजना प्रबंध को शक्तिशाली बनाने में सहायता करता है। इसे संप्रेषण की उपयोगिता में वृद्धि होती है।

(५) नेतृत्व क्षमता का विकास-सप्रेषण के माध्यम से नेतृत्व क्षमता विकसित होती है एक दूसरे के हितों का ज्ञान होने से संगठन बनता है यह संगठन किसी एक व्यक्ति द्वारा संचालित होता है यह व्यक्ति संप्रेषण के द्वारा अधिकांश को उसके हित को सामने रखते अनुयायी तैयार करता है इस प्रकार नेतृत्व क्षमता का विकास होता है इससे संप्रेषण की उपयोगिता में और अधिक वृद्धि होती है।

सप्रेषण की विशेषता-

1. परस्पर विचारों एवं भावनाओं का आदान-प्रदान किया जाता है।

2. संप्रेषण एक पारस्परिक संबंध स्थापित करने की एक प्रक्रिया है।

3. यह दविवाही प्रक्रिया है। इसमें दो पक्ष होते हैं- एक सदेश देने वाला तथा दूसरा संदेश ग्रहण करने वाला|

4. संप्रेषण प्रक्रिया एक उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया होती है।

5. विचारों एवं भावनाओं के आदान-प्रदान को प्रोत्साहन दिया जाता है।

6. संप्रेषण की प्रक्रिया में अनुभव की साझेदारी होती है।

7. संप्रेषण की प्रक्रिया में परस्पर अंतः प्रक्रिया पृष्ठपोषण होना आवश्यक होता है।

8. इसमें आदान-प्रदान की प्रक्रिया को पृष्ठपोषण दिया जाता है।

9. सप्रेषण में प्रत्यक्षीकरण समावेशित होता है।

10. सप्रेषण सदैव गत्यात्मक प्रक्रिया होती है।



संक्षेपण

 

संक्षेपण

संक्षेपण अथवा सार-लेखन का आशय है किसी अनुच्छेद, परिच्छेद, विस्तृत टिप्पणी अथवा प्रतिवेदन को सक्षिप्त कर देना। किसी बड़े पाठ (निबन्ध, लेख, शोध प्रबन्ध आदि) में मुख्य विचारों, तर्कों आदि को लघुतर आकार में प्रस्तुत करना सक्षेपण (critical precis writing) कहलाता है। इसकी संरचना भी नि्बन्ध जैसी ही होती है। सार लेखन की आवश्यकता कार्यालय, वाणिज्य, पत्रकारिता, शिक्षा आदि कई क्षेत्रों में पड़ती है। संक्षेपण को अंग्रजी में 'समराईजिंग' 'प्रेसी राइटिंग' अथवा प्रेसी भी कहते हैं। परिचय

संक्षेपण की प्रक्रिया

संक्षेपण की प्रक्रिया में कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं का ध्यान रखा जाना चाहिए। मूल पाठ से संक्षेपण में अ्थ का संप्रेषण भिन्न नहीं होना चाहिए। दंगल झाल्टे ने इसकी प्रक्रिया को निम्नवत रूप से समझाया है :

1. संक्षेपण करते समय सबसे पहले मूल अनुच्छेद या विषय-वस्तु को एकांधिक बार ध्यान पूर्वक पढ़ लेना चाहिए। इससे मूल अनुच्छेद का भावार्थ समझ में आ जाएगा तब तक सार-लेखन की शुरूआत नहीं करनी चाहिए जब तक कि मूल विषय का भावार्थ समझ में न आ जाए।

2. मूल अनुच्छेद को पढ़ने के बाद महत्त्वपूर्ण तथ्यों, बातों तथा विचारों को रेखांकित कर लिया जाना चाहिए। रेखांकन करते समय मूल विषय से संबंधित कोई भी महत्त्वपूर्ण अंश नहीं छूटना चाहिए।

3. इसके बाद मूल में व्यक्त किए गए विचारों, भावों तथा तथ्यों को क्रमबद्ध कर लेना चाहिए।

4. मूल अनुच्छेद का एक तिहाई में संक्षेपण करना चाहिए। इसमें संक्षेपक को अपनी ओर से कोई भी तर्क-वितर्क करने तथा किसी अतिरिक्त अंश को जोड़ने की अनुमति या छूट नहीं होती।

5. संक्षेपण को अंतिम रूप दिए जाने से पूर्व उसका पहले कच्चा रूप तैयार कर लेना चाहिए और अच्छी तरह देख लिया जाना चाहिए कि सभी महत्त्वपूर्ण भावों का अंतर्भाव उसमें हो चुका है या नहीं।

6. संक्षेपण तैयार करते समय मूल अनुच्छेद में बर्णित या उल्लिखित कहावतें, मुहावरे, वाक् प्रचार तथा अलंकारआदि को हटा देना चाहिए।

7. संक्षेपण तैयार करने के बाद उसके लिए सुरयोग्य शीर्षक का चयन किया जाना चाहिए।



पल्लवन

 

पल्लवन

किसी निर्धारित विषय जैसे सुत्र-वाक्य, उक्ति या विवेच्य-बिन्दु को उदाहरण, तर्क आदि से पुष्ट करते देना पल्लवन (expansion) कहलाता है। इसे विस्तारण, भाव-विस्तारण, भाव-पल्लवन आदि प्रवाहमयी, सहज अभिव्यक्ति-शैली में मॉलिक, सारगर्भित विस्तार भी कहा जाता है। सूत्र रूप में लिखी या कही गई बात के गर्भ में भाव और विचारों का एक पूंज छिपा होता है। विदवान जन एक पंक्ति पर घंटों बोल लेते हैं और कई बार तो एक पूरी पुस्तक ही रच डालते हैं। यही कला 'पल्लवन' कहलाती है।

कुछ सामान्य नियम:- (1) पल्लवन के लिए मूल अवतरण के वाक्य, सुक्ति, लोकोक्ति अथवा कहावत को ध्यानपूर्वक पढिए, ताकि मूल के सम्पूर्ण भाव अच्छी तरह पल्लवन के समझ में आ जायें।

(2) मूल विचार अथवा भाव के नीचे दबे अन्य सहायक विचारों को समझने की चेष्टा कीजिए।

(3) मूल और गौण विचारों को समझ लेने के बाद एक-एक कर सभी निहित विचारों को एक-एक अनुच्छेद में लिखना आरम्भ कीजिए, ताकि कोई भी भाव अथवा विचार छूटने न पाय।

(4) अर्थ अथवा विचार का विस्तार करते समय उसकी पुष्टि में जहाँ-तहाँ ऊपर से उदाहरण और तथ्य भी दिये जा सकते हैं।

(5) भाव और भाषा की अभिव्यक्ति में पूरी स्पष्टता, मौलिकता और सरलता होनी चाहिए। वाक्य छोटे-छोटे और भाषा अत्यन्त सरल होनी चाहिए। अलंकृत भाषा लिखने की चेष्टा न करना ही श्रेयस्कर है।

(6) पल्लवन के लेखन में अप्रासगिक बातों का अनावश्यक विस्तार या उल्लेख बिलकूल नहीं होना चाहिए।

(7) पल्लवन में लेखक को मूल तथा गौण भाव या विचार की टीका-टिप्पणी और आलोचना नहीं करनी चाहिए। इसमे मूल लेखक के मनोभावो का ही चिस्तार और विश्लेषण होना चाहिए।

() पल्लवन की रचना हर हालत में अन्यपूरुष में होनी चाहिए।



मुहावरा और लोकोक्ति

 

मुहावरा- मुहावरा अरबी भाषा का शब्द है । हिन्दी में मुहावरा को ’वाग्धारा’ कहते हैं, किन्तु यह अधिक प्रचलित नहीं है ।जब कोई वाक्यांश अपने सामान्य अर्थ को छोड़ कर विशेष अर्थ में रूढ़ हो जाता है, तो मुहावरा कहलाता है। उदाहरण : 'श्री गणेश करना का अर्थ है 'शुरू करना'; 'ईद का चाँद होना का अर्थ है 'बहुत दिनों बाद दिखाई देना'; 'चार चाँद लगाना' का अर्थ है 'प्रतिष्ठा बढ़ाना' आदि।

लोकोक्ति- 'लोकोक्ति' का अर्थ है 'लोक में प्रचलित '। जब कोई पूरा कथन किसी प्रसंग विशेष में उद्धृत किया जाता है तो लोकोक्ति कहलाता है। उदाहरण उस दिन बात-ही बात में राम ने कहा, हाँ, मैं अकेला ही कुँआ खोद लँगा। इस पर सबों ने हँसकर कहा, व्यर्थ बकबक करते हो, अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता' । यहाँ 'अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता' लोकोक्ति का प्रयोग किया गया है, जिसका अर्थ है 'एक व्यक्ति के करने से कोई कठिन काम पूरा नही होता'।

मुहावरा और लोकोक्ति में अंतर-

1. मुहावरा शब्दों के ऐसे समूह (वाक्यांश) को कहते हैं,जो अपने प्रचलित अर्थ को छोड़कर किसी दूसरे अर्थ(लाक्षणिक अर्थ) को व्यक्त करता है। जबकि लोकोक्ति जन साधारण में प्रचलित उस कथन या उक्ति को कहते हैं,जिसका प्रयोग उपालम्भ देने ,व्यंग्य करने,चुटकी लेने आदि के लिए किया जाता है।

2. मुहावरा वाक्यांश है, जबकि लोकोक्ति संपूर्ण वाक्य है।

3. मुहावरा वाक्य के आदि,मध्य या अंत में से कहीं भी आ सकता है,जबकि लोकोक्ति वाक्य के अंत में ही आती है।

4. मुहावरे में वाक्य के अनुसार परिवर्तन करना आवश्यक है, जबकि लोकोक्ति ज्यों की त्यों ही वाक्य में प्रयुक्त होती है।

5. मुहावरे का प्रयोग स्वतंत्र रूप से नहीं किया जा सकता है,जबकि लोकोक्ति का प्रयोग स्वतंत्र रूप में होता है ।

6. मुहावरे के अंत में प्रायः 'ना' होता है, जबकि लोकोक्ति के अंत में अपवाद स्वरूप ही 'ना' आता है ।

7. मुहावरा वाक्य में चमत्कार उत्पन्न करने हेतु प्रयुक्त होता है, तो लोकोक्ति वाक्य में अभिव्यक्ति को प्रभावी बनाने




श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यमो की सामाजिक जीवन में भूमिका

  

श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यमो की सामाजिक जीवन में भूमिका:-

श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यमों की उपयोगिता अलग-अलग स्थितियों तथा अलग-अलग सन्दर्भो में अलग-अलग है। किन्तु इसके बावजूद इन सभी माध्यमों का उद्देश्य तथा लक्ष्य एक ही है। समाज की शैक्षिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक धरोहर को वृद्धिगत करने तथा व्यक्ति के 'जानने' एवं 'अभिव्यक्ति' के मूलभूत अधिकार को अक्षुण्ण रखने की दिशा में श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यमों की उपयोगिता को मुख्यतः पाँच प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है।

(1) सूचना :-श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यमों के द्वारा विश्व की विभिन्न घटनाओं, सामाजिक तथा राजनीतिक स्थितियों की सूचना जन-सामान्य को यथाशीघ्र उपलब्ध हो जाती है । इसी के साथ, देश-विदेश की प्रगति तथा वैज्ञानिक आविष्कारों की गति की सूचना भी जनता तक पहुँचाते है।

(2) अभिव्यक्ति :- इन माध्यमों द्वारा व्यक्ति अपने विचार तथा भावों को स्वतन्त्र रूप से अभिव्यक्त करता है। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता सरकारी माध्यमों की अपेक्षा श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यमो में अधिक खुले रूप से रहती है। इसीलिए इनकी महत्ता अन्यों की तुलना में बढ़ जाती है।

(3) विचार तथा घटनाओं का विश्लेषण- श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यम देश-विदेश की घटनाओं की सूचना देने के साथ ही साथ उनके अर्थ का विश्लेषण भी करते हैं तथा सही मुद्दों तथा विचारों के लिए जन-सामान्य का मत-परिवर्तन करने में अहम् भूमिका अदा करते हैं।

(4) प्रगति एवं विकास-श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यम जन-सामान्य की सामाजिक तथा राजनीतिक प्रगति, आर्थिक विकास आदि के लिए सघन अभियान चलाते हैं तथा मिशन के रूप में कार्य करते हैं ।

(5) मनोरंजन -रेडियो, दूरदर्शन तथा फिल्म आदि श्रव्य और श्रव्य-दृश्य  माध्यम जनता के लिए रोचकता तथा मनोरंजन के प्रभावी साधन बनते हैं। इसके साथ, देश-विदेश की कला एवं संस्कृति के समुचित विकास के लिए भी अपना महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान करते हैं।



नाट्य तत्वो के आधार पर बकरी नाटक की समीक्षा





1 . नाट्य तत्वो के आधार पर बकरी नाटक की समीक्षा कीजिये ?

उत्तर- बकरी नाटक स्वतंत्र भारत के राजनीतिक क्षेत्र के चुनावी योजनाओ छलाओ ओर हथकंडो को सामने लाती है। राजनेता अपने कुकर्मो को किस प्रकार गांधी जी के सिद्धांतों की आढ़ में छुपाते है इसका यथार्थ चित्रण इस नाटक में हुआ है।

इस नाटक में बकरी गरीब जनता का प्रतीक है । इनके नाम पर विभिन्न संस्थाएं सेवा संघ शांति प्रतिस्थानो का निर्माण किया जाता है जिसका लक्ष्य लोगो के जमीन पर अवैध कब्जा अधिक होता है । इन संस्थानों के तले राजनेता अपनी रोटी सेकते है तथा इनके माध्यम से गरीब जनता का शोषण करते है। यह नाटक जनवादी चेतना का नाटक है जो आम आदमी की ब्यथा को कहता है जिसे नाटककार ने व्यंग्य शैली में लिखा है। इस नाटक का प्रकाशन सन 1974 ईस्वी में हुआ। जिसमें तत्कालीन राजनीति की कुरूपता को स्पष्ट रूप से खोलकर हमारे सामने रख दिया है, नाटक न सिर्फ सामहिक समस्यायों को उठाता है बल्कि एक बड़े भ्रष्ट्राचार का पर्दाफाश करने और लोगो को जागरूक करने का प्रयास करता है । यह इस नाटक की विशेषता रही है। नाट्य तत्वो के आधार पर इस नाटक का मूल्यांकन निम्न बिन्दुओ में किया जा सकता है -----


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1 . कथानक या कथावस्तु - नाटक की कथावस्तु दो अंको में विभाजित है प्रत्येक अंक में तीन- तीन दृश्य है प्रत्येक दृश्य के बाद नाट्य गायन की योजना है जिसके माध्यम से आसन्न स्थिति का विश्लेषण किया गया है । नाटक की कथावस्तु के माध्यम से साधारण ब्यक्ति के शोषण की कथा को लक्ष्य किया गया है राजनीति मे कैसे गांधी जी के विचारो और उनके नामो का दुरुपयोग किया जा रहा है। इसका स्पस्ट चित्रण इस नाटक में हुआ है । गांववासियों की दायनिय स्थिति और उनकी मजबूरी का राजनेता किस प्रकार दुरुपयोग कर रहे हैं यह इस नाटक की केंद्रीय कथावस्तु है । कथा में तीन डाकू एक सिपाही मिलकर गांव की एक गरीब औरत की बकरी हड़प लेते है और इन्ही के माध्यम से सारी विडंबना प्रस्तुत की गई है । उनके संवाद उनकी मुद्राये उनके गीत अभिनय इस क्रूर सत्य को कहती चलती है ब्यवस्था की योजनाएं ओर उनके बीच गरीब औरत की बेबस पुकार ग्रामीणों की चिंता ब्यथा नाटकीय व्यंग्य ओर करुणा को समेटे हुए है । देश की वर्तमान स्थिति को नट इस प्रकार प्रकट करता है –

नेकी सच्चाई सरासत घर के सब कुछ ताक पर

थोरे नपटे भी यहाँ इतरा रहे है नाक पर

एक नारा ढलता है हर नई बर्बादी के बाद

आश्रम ही आश्रम खुल गए आजादी के बाद

बकरी नाटक में में बकरी संस्थान, बकरी स्मारक निधि , बकरी सेवा संघ जैसी संस्थाओ के नाम का उपयोग कर हमारे ब्यवस्था और सरकारी संस्थाएं आम आदमी के साथ किस प्रकार शोषण कर रही है इसका प्रतीकात्मक ढंग से पर्दाफास किया गया है । डाकुओं का आगे चलकर नेताओ में बदल जाना अपने आप व्यंग्य हो जाता है। नाटक में एक युवक द्वारा इस सारे भ्रस्टाचार ओर बिसंगतयो को तोड़ने और जनचेतना को जागृत करने की कोशिश करता दिखाया गया है। सर्वेश्वर की आस्था और विश्वास युवा शक्ति, युवा आक्रोश के प्रति थी । उन्होंने आम आदमी को बिना किसी सहानुभूति और भावुकता के उसके स्वाभाविक रूप में प्रस्तुत किया है यह युवक अंत मे नारे लगाकर नाटक को एक समाधान के संकेत पर पहुचाता है । युवक ग्रामीणों से कहता है – “बोलते क्यों नही ? आप इन्हें लुटेरा मानते है या नही इनके कहे में आकर आपने आपने गलती की या नही इनके लिए अपना सब कुछ गवा कर आपने पाप किया या नही ?” नाटक का अंत भविष्य की आशाओं से होता है । जिसमे युवक गरज कर कहता है “ अब यह मैं – मैं नही होगी बांधो इन लुटेरो को इंकलाब जिंदा – बाद “ आम जन को जागने के लिए और इन्हें लड़ने के लिए तैयार करता हुआ कहता है –

बहुत हो चुका अब हमारी है बारी

बदल के रहेंगे ये दुनिया तुम्हारी ।

2. पात्र योजना – पात्र योजना की दृष्टि से बकरी नाटक में मंत्री नेता पुलिस आदि सत्ताधारि सुबिधा भोगी पात्रो का चरित्र प्रस्तुत किया गया है जो सोषक का प्रतीक है विपति, युवक आदि शोषित लोगो का प्रतीक है सारे पात्र ब्यवस्था के विकृत रूप को दिखाने का प्रयत्न करते है सभी पात्र वर्गीय है । ये पात्र अपने नामो के अनुरूप सत्य अहिंसा और लोकतंत्र आदि की बड़ी बड़ी बातें करके भी ठीक इसके विपरीत आचरण करते है एक वर्ग उन पात्रो का भी है जो ब्यवस्था के प्रति आक्रोश ब्यक्त कर अपनी जनवादी चेतना का स्वरूप सामने रखता है। युवक इस जनवादी चेतना का सशक्त प्रतिनिधित्व करता है ।

3. संवाद – संवाद की दृष्टि से यह नाटक गायन के संवाद में है क्योंकि यह एक गीति नाट्य है। एक ओर जहां डाकुओ के संवाद में शोषण का चित्र है – दुर्जन कर्मवीर अब इनके पास अब कुछ नही है ।

कर्मवीर- फिर भी काफी चढ़ावा आ गया । इसके ठीक विपरीत युवक अपने संवाद से प्रगतिशील का परिचय देता है। डाकुओं के चुनाव जीतने पर ग्रामीणों से कहता है –

युकक- कहो काका जीता दिया

एक ग्रामीण – सब राम जी की माया है तुम जेहल से छूट कर आ गए बचवा ।

युवक – हाँ एक और जेहल में ,

दूसरा ग्रामीण – और को जेहल बच्चा ,

युवक- आप लोगो का अज्ञान जेहल भी है, अब ये जीत के और लूटेंगे । पहले बकरी का नाम लेकर लूटते थे अब आप का ही नाम लेकर लूटेंगे ।

4. देशकाल और वातावरण - देशकाल एवं वातावरण की दृष्टि से यह नाटक सन 1974 का है जब राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई थी । देश और समाज राजनीतिक दुश्चक्रों में फसा हुआ था । उसी राजनीतिक दुष्चक्र का चित्रण इस नाटक में हुआ है । देश मे राजनीतिक भ्रस्टाचार और डाकुओं और गुंडो का नेताओं में बदलना देश की राजनीति की एक बहुत बड़ी विसंगति थी जिसका चित्रण नाटककार ने किया है ।

5. भाषा शैली - भाषा की दृष्टि से बकरी नाटक की भाषा सरल और ब्यवहारिक जन- भाषा है। भाषा मे कोई जटिलता नही है । नाटक की भाषा मंच पर अभिनय करने में सामर्थ्य है सर्वेश्वर ने नाटक की भाषा खड़ी बोली रखी है मगर पात्र के स्तर के अनुसार ज्ञानी पात्रो की भाषा मे अवधि मिश्रित है । नाट्य भाषा मे चलते – चलते मुहावरे , लोकक्ति साफ सुथरे सब्दो के प्रयोग से अत्यंत प्रभावी बन गए है साथ ही लोक गीतों का प्रयोग भी किया गया है ।

6. अभिनियता - अभिनियता नाटक का प्रांतत है कोई भी नाटक मंच पर अभिनय के लिए लिखे जाते है। अभिनियता कि दृष्टि से बकरी नाटक सर्वेस्वर के नाटकों में सरवत्कृष्ट है । खुले मंच अभिनय की दृष्टि से लिखा गया बकरी नाटक आम आदमी से जोड़ता है नाटक का हर एक प्रसंग अत्यंत आसानी से प्रकट हुआ है। इसी कारण से यह नाटक देश के अनेक भागों में अन्य भाषओं में सफलता पूर्वक रंगमंच पर खेला जा चुका है । इस नाटक की प्रस्तुति से लोग आज की ब्यवस्था पर सोचने समझने और कुछ करने को ततपर होते है यही इस नाटक की सफलता का कारण है ।
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7. उद्देश्य - बकरी नाटक समकालीन भारतीय राजनीति के भ्रष्टतंत्र को उजागर करने के उद्देश्य से लिखी गयी है । ग्रामीणों के भोलेपन और मजबूरी को राजनेता किस प्रकार दुरुपयोग कर रहे है इसका स्पस्ट चित्रण यह नाटक करती है। दरअसल यह नाटक शोषण का दस्तावेज है जो समकालीन राजनीति के कुरूपता पर प्रहार करता है इस नाटक में जनचेतना को लोकभाषा और लोकरूपो के माध्यम से सामाजिक अन्याय के साथ जोड़ने का प्रयास करती है । जिस गांधी जी का नाम लेकर राजनेता अपने स्वार्थ के रोटियां सेक रहे है वे उनके सिद्धांतो को थोड़ा भी नही मानते यह नाटक वीरो ओर क्रांतिकारियों के नाम पर अपनी राजनीति चमकाने वाले पर व्यंग्य करता है ।

डॉक्टर अखिलेश गोस्वामी लिखते है – “ आज गांधी जी और गांधीवाद के नाम पर हर एक का रोजगार चमक रहा है ।“

निष्कर्ष रूप मे कहा जा सकता है कि बकरी नाटक राजनीति के दुश्चक्रों और उसमें फसे आम आदमी की व्यथा की कथा है । यह नाटक नाट्य तत्वो के कसौटियों पर पूरी तरह खड़ा उतरता है। इस नाटक में नाटक के सभी तत्व अपने सभी प्रभावशिलता के साथ मौजूद है । नाटक रंगमंच पर प्रदर्शन के लिए लिखे जाते है । बकरी नाटक प्रदर्शन की दृष्टि से अत्यंत लोकप्रिय नाटक रहा है । इसका प्रमाण यह है कि अपने प्रकाशन के तीन वर्षों में यह नाटक तीन सौ से अधिक बार प्रदर्शित हो चुका था यह नाटक देश की वर्तमान राजनीतिक स्थिति में और अधिक सार्थक हो उठा है।



वापसी कहानी के आधार पर गजाधर बाबू का चरित्र चित्रण

 


वापसी कहानी के आधार पर गजाधर बाबू का चरित्र चित्रण कीजिये ।

उत्तर-  वापसी उषा प्रियंवदा द्वारा लिखी गयी एक महत्वपूर्ण कहानी है । गजाधर बाबू इस कहानी के सबसे प्रमुख पात्र है वे इस कहानी के वह केंद्रीय बिंदु है जिसकी परिधि में यह पूरी कहानी घूमती है । उनका कर्तब्य परायण ब्यक्तित्व पाठक को अपनीं ओर सहज ही आकर्षित कर लेता है । कहानी का कारुणिक अंत जिसमे गजाधर बाबू को अपने घर से जिस घर को उन्होंने अपने त्याग और समर्पण से सजोया था, छोर कर जाना पड़ता है। रेलवे की नॉकरी से सेवनिर्वित होकर अपने घर जाने और अपने ही घर मे उपेक्षा का शिकार होकर उसे भी छोर कर दूसरी नॉकरी में जाने तक उनके चरित्र की अनेक विशेषताए उभर कर सामने आती है जो निम्नलिखित है---------

1.कर्तब्यनिष्ट गजधारबाबू कर्तब्यनिष्ट ब्यक्ति है । उन्होंने अपने जीवन के सभी कर्तब्यों का निर्वाह किया है, उन्होंने 35 वर्ष नॉकरी की, बच्चो की अच्छी शिक्षा के लिए उन्हें अपने से दूर शहर में रखकर पढ़ाया । एक बेटे और बेटी की शादी की । शहर मे मकान बनवाया । उन्होंने कभी भी अपने कर्तब्यों से मुह नही मोरा । अपने जीवन के सभी कर्तब्यों का भली-भांति निर्वाह उन्होंने किया है।

2. स्नेही ब्यक्तित्व गजधारबाबू का ब्यक्तित्व बेहद स्नेही था। उनके ब्यक्तित्व का उल्लेख लेखिका ने भी इस कहानी में किया है “गजाधर बाबू स्वभाव से बहुत सही ब्यक्ति थे और स्नेह के आकांक्षी भी ।“ अपने परिवार की सुविधा और बच्चो की पढ़ाई के लिये जब उन्हें अकेला रहना पढ़ा तो उन्हें पत्नी और बच्चो के स्नेह पूर्ण बाते याद आती रहती जब वे सेवनिव्रित होकर घर जाने वाले थे टैब उन्हें लगता फिर से स्नेह के मध्य रहने जा रहे है।

3. सह्रदय-  गजाधर बाबू सह्रदय ब्यक्ति थे । अपने परिवार के साथ-साथ अपने नोकर गणेश के लिये उनके हृदय में विशाल प्रेम है। वे उसे अपने परिवार के सदस्य से कम नही मानते कभी कुछ जरूरत हो तो लिखना गणेश इस अगहन तक बिटिया की शादी कर दो।“ उनका बिशाल हृदय सबकी खुशहाली की कामना करता रहता है।

4. त्याग की भावना -  त्याग की भावना गजाधर बाबू के चरित्र के एक बहुत बड़ी विशेषता है उन्होंने अपने जीवन मे बिशाल त्याग किया था । पत्नी और बच्चो को अपनो से दूर रख कर ओर वह भी सिर्फ उनके अच्छे परिवेश के लिये। यह एक बहुत ही बिशाल निर्णय था उनके जीवन का जो कि आपने त्याग की भावना से उन्होंने पूरा किया।

5. अकेलापन- सभी तरफ से सम्पन्न गजाधर बाबू अपने जीवन मे नितांत अकेले है अपने परिवार से दूर गांव के एक छोटे से स्टेशन में नॉकरी करते हुए अकेले जीवन यापन करते है लेखिका कहानी में लिखती भी है – “ इन वर्षों में अधिकांश समय उन्होंने अकेले रहकर काटा था।“

6. उपेक्षित गजाधर बाबू के जीवन के अंतिम समय मे इतने प्यार और समर्पण के बाद भी बेहद ही उपेक्षित अनुभव करते है उनके पत्नी बच्चे सब उनके साथ परायो जैसा ब्यवहार करते है। इतने सालों बाद अपने घर वापस आने पर उन्होंने जो सपना देखा था सब टूट जाता है। बच्चो को उनकी किसी भी बात पर टोकना अच्छा नही लगता । उनका बेटा अमर तो यहां तक कह देता है बुड्ढे आदमी हो । चुपचाप पढ़े रहो हर चीज़ में दखल क्यों देते हो।“ अपनो द्वारा उपेक्षित ओर तिरस्कृत गजाधर बाबू अपने को नितांत ही उपेक्षित अनुभव करने लगता है इसलिए अपना घर छोर कर फिर से दूसरी नॉकरी करने चले जाते है।

निष्कर्ष रूप मे कह सकते है कि गजाधर बाबू इस कहानी के प्रमुख पात्र है, जिनके चरित्र में त्याग और समर्पण जैसे गुण है लेकिन पीढियो के बड़े अंतर ने उन्हें जीवन के अंतिम क्षणों में भी अकेल रहने पर उपेक्षित महसूस करा दिया। बदलते हुए सामाजिक परिवेश में गजाधर बाबू का चरित्र एक आदर्श चरित्र है किंतु इसी जमाने मे प्रत्येक गजाधर बाबू कही न कही यही कहानी है।

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