रविवार, 10 मई 2026

आदिकाल की समय सीमा के संबंध में विभिन्न विद्वानों के मतों की समीक्षा कीजिए।

आदिकाल की समय सीमा के संबंध में विभिन्न विद्वानों के मतों की समीक्षा कीजिए।

साहित्य के इतिहास में 'आदिकाल' की काल-सीमा का निर्धारण एक अत्यंत जटिल और विवादास्पद विषय रहा है। विभिन्न विद्वानों ने भाषाई भाषाई प्रवृत्तियों, ऐतिहासिक साक्ष्यों और रचनाओं की उपलब्धता के आधार पर अलग-अलग समय सीमाएं सुझाई हैं।

​आदिकाल की समय सीमा: विभिन्न विद्वानों के मत

​हिंदी साहित्य का आरंभ कब से माना जाए, इस पर विद्वानों में एकमत का अभाव है। मुख्य मतभेद इस बात पर है कि 'अपभ्रंश' को हिंदी में शामिल किया जाए या नहीं।

​आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मत

​शुक्ल जी ने आदिकाल (वीरगाथा काल) की सीमा संवत 1050 से 1375 (993 ई. से 1318 ई.) तक मानी है। उनका तर्क है कि महाराजा भोज के समय से लेकर हम्मीरदेव के समय के कुछ पीछे तक हिंदी साहित्य का आविर्भाव हो चुका था। उन्होंने 'मुंज' और 'भोज' के समय से पुरानी हिंदी के प्रयोग को आधार माना है।

​डॉ. रामकुमार वर्मा का मत

​डॉ. वर्मा ने इस काल को 'संधिकाल' और 'चारणकाल' में विभाजित किया। उन्होंने इसकी शुरुआत संवत 750 (693 ई.) से मानी। वे अपभ्रंश की रचनाओं को भी हिंदी में शामिल करते हैं, जिसके कारण उनके द्वारा निर्धारित सीमा बहुत पीछे चली जाती है।

​राहुल सांकृत्यायन का मत

​राहुल जी ने सिद्ध साहित्य को हिंदी का प्रारंभिक रूप मानते हुए इसकी शुरुआत 760 ई. से स्वीकार की। उन्होंने 'सरहपा' (8वीं शताब्दी) को हिंदी का प्रथम कवि माना। भाषाई दृष्टि से यह मत महत्वपूर्ण है क्योंकि यहीं से अपभ्रंश से हिंदी की ओर झुकाव दिखने लगता है।

​डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी का मत

​द्विवेदी जी के अनुसार, 10वीं शताब्दी से पहले का साहित्य शुद्ध अपभ्रंश का है। अतः वे आदिकाल का वास्तविक प्रारंभ 1000 ई. से मानते हैं और इसकी समाप्ति 1400 ई. (14वीं शताब्दी के अंत) तक स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार, विद्यापति और अमीर खुसरो की रचनाएं इस काल की अंतिम सीमा को दर्शाती हैं।

​3. विवाद के मुख्य कारण

​अपभ्रंश और पुरानी हिंदी का द्वंद्व: अधिकांश विद्वान अपभ्रंश की अंतिम अवस्था को हिंदी का प्रारंभ मानते हैं। जहाँ शुक्ल जी 10वीं सदी को आधार बनाते हैं, वहीं सांकृत्यायन जी 8वीं सदी को।

​रचनाओं की प्रामाणिकता: 'पृथ्वीराज रासो' और 'बीसलदेव रासो' जैसी रचनाओं के समय को लेकर ऐतिहासिक मतभेद हैं।

​नामकरण: काल-सीमा का सीधा संबंध नामकरण से भी है (जैसे- वीरगाथा काल बनाम सिद्ध-सामंत काल)।

​निष्कर्ष

​उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि आदिकाल की प्रारंभिक सीमा के संबंध में आचार्य शुक्ल का मत (993 ई.) और अंतिम सीमा के संबंध में डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी का मत (1400 ई.) सर्वाधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है।

​अतः सामान्यतः 1000 ईस्वी से 1400 ईस्वी तक के समय को 'आदिकाल' की सर्वमान्य समय सीमा के रूप में स्वीकार किया जाता है, क्योंकि इस दौरान हिंदी अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने की प्रक्रिया में थी।

मीडिया सामग्री निर्माण की अवधारणा और प्रकार का वर्णन कीजिए।

 मीडिया सामग्री निर्माण की अवधारणा और प्रकार का वर्णन कीजिए।

मीडिया सामग्री निर्माण वर्तमान डिजिटल युग का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका अर्थ है किसी भी माध्यम (जैसे इंटरनेट, टीवी, या समाचार पत्र) के माध्यम से जानकारी, विचार या मनोरंजन को दर्शकों के सामने प्रस्तुत करने के लिए उसे तैयार करना।

​नीचे इसकी अवधारणा और प्रमुख प्रकारों का विस्तृत विवरण दिया गया है:

​1. अवधारणा (Concept)

​मीडिया सामग्री निर्माण की अवधारणा विचार को डिजिटल या भौतिक रूप में बदलने की प्रक्रिया पर आधारित है। यह केवल सूचना साझा करना नहीं है, बल्कि एक विशिष्ट दर्शकों (Target Audience) को ध्यान में रखते हुए संदेश को प्रभावी ढंग से तैयार करना है।

​इसमें तीन मुख्य चरण शामिल होते हैं:

​योजना : क्या बनाना है और किसके लिए बनाना है।

​उत्पादन : सामग्री को रिकॉर्ड करना, लिखना या डिजाइन करना।

​प्रकाशन : सही प्लेटफॉर्म (जैसे YouTube, Blog, या Social Media) पर सामग्री को साझा करना।

​2. मीडिया सामग्री के प्रकार :

​आज के समय में सामग्री मुख्य रूप से चार रूपों में पाई जाती है:

​क. लिखित सामग्री 

​यह सबसे पुराना और आधारभूत प्रकार है। यह सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन (SEO) के लिए बहुत प्रभावी होता है।

​ब्लॉग पोस्ट और लेख: किसी विशेष विषय पर जानकारी साझा करना।

​ई-बुक्स: विस्तृत जानकारी के लिए डिजिटल किताबें।

​न्यूजलेटर: ईमेल के जरिए दी जाने वाली नियमित अपडेट।

​ख. दृश्य सामग्री 

​मानव मस्तिष्क छवियों को शब्दों की तुलना में तेजी से प्रोसेस करता है, इसलिए यह बहुत लोकप्रिय है।

​इन्फोग्राफिक्स: जटिल डेटा को आसान चित्रों के माध्यम से समझाना।

​फोटोग्राफी: उत्पादों या घटनाओं की उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें।

​मेम्स (Memes): मनोरंजन और सामाजिक संदेश के लिए उपयोग किए जाने वाले मजाकिया चित्र।

​ग. वीडियो सामग्री 

​वर्तमान में वीडियो सामग्री सबसे अधिक उपभोग की जाने वाली सामग्री है।

​लघु वीडियो (Short-form): जैसे Instagram Reels और YouTube Shorts।

​शैक्षिक वीडियो: ट्यूटोरियल या 'How-to' वीडियो।

​लाइव स्ट्रीमिंग: दर्शकों के साथ वास्तविक समय (Real-time) में संवाद।

​घ. ऑडियो सामग्री 

​यह उन लोगों के लिए बेहतरीन है जो चलते-फिरते या काम करते समय जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं।

​पॉडकास्ट: किसी विषय पर चर्चा या साक्षात्कार।

​ऑडियो बुक्स: किताबों का सुना जाने वाला संस्करण।

​निष्कर्ष

​मीडिया सामग्री निर्माण का मुख्य उद्देश्य जुड़ाव (Engagement) पैदा करना है। एक सफल कंटेंट क्रिएटर वही है जो अपने दर्शकों की जरूरतों को समझता है और उन्हें मूल्यवान जानकारी या मनोरंजन प्रदान करता है।


कहानी कला के आधार पर 'नमक का दरोगा' की समीक्षा

कहानी कला के आधार पर 'नमक का दरोगा' की समीक्षा

​भूमिका:

मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित 'नमक का दरोगा' आदर्शोन्मुख यथार्थवाद का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह कहानी धन के ऊपर धर्म की, और असत्य के ऊपर सत्य की विजय का शंखनाद करती है। कहानी कला के प्रमुख छह तत्वों के आधार पर इसकी समीक्षा निम्नवत् है:

​1. कथानक (

​कहानी का कथानक अत्यंत सुगठित और रोचक है। यह मुंशी वंशीधर की ईमानदारी और पंडित अलोपीदीन के भ्रष्टाचार के बीच संघर्ष को दिखाता है।

​वंशीधर का दरोगा बनना, रात के अंधेरे में नमक की गाड़ियाँ पकड़ना, अलोपीदीन की गिरफ्तारी, और अंततः वंशीधर की नौकरी का छूटना।

​कहानी का अंत पाठक को चौंकाता है, जब भ्रष्ट अलोपीदीन, वंशीधर की ईमानदारी का कायल होकर उसे अपनी सारी जायदाद का मैनेजर नियुक्त कर देता है।

​2. पात्र एवं चरित्र-चित्रण :

​प्रेमचंद ने पात्रों के माध्यम से दो विपरीत विचारधाराओं को प्रस्तुत किया है:

​मुंशी वंशीधर (नायक): वे एक कर्तव्यनिष्ठ और दृढ़ प्रतिज्ञ युवा हैं। वे अपने पिता की 'ऊपरी आय' वाली सलाह को दरकिनार कर ईमानदारी का मार्ग चुनते हैं।

​पंडित अलोपीदीन (प्रतिनायक): वे लक्ष्मी के अनन्य उपासक हैं और मानते हैं कि संसार का हर व्यक्ति खरीदा जा सकता है। उनका हृदय परिवर्तन कहानी को एक मनोवैज्ञानिक गरिमा प्रदान करता है।

​गौण पात्र: वंशीधर के पिता और वकील समाज के नैतिक पतन को रेखांकित करते हैं।

​3. संवाद योजना :

​कहानी के संवाद संक्षिप्त, पात्रों के अनुकूल और नाटकीय हैं। संवाद न केवल कथा को आगे बढ़ाते हैं, बल्कि सामाजिक विडंबनाओं पर चोट भी करते हैं।

​उदाहरण: "न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं, उन्हें वह जैसे चाहती है, नचाती है।" यह संवाद अलोपीदीन के अहंकार और तत्कालीन व्यवस्था की नग्न सच्चाई को दर्शाता है।

​4. देशकाल और वातावरण :

​प्रेमचंद ने ब्रिटिश कालीन भारत के प्रशासनिक तंत्र और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार का सजीव वर्णन किया है।

​नमक विभाग की नई व्यवस्था, कचहरी की गहमागहमी और समाज में 'ऊपरी कमाई' को मिलने वाली प्रतिष्ठा का चित्रण तत्कालीन यथार्थ को प्रस्तुत करता है।

​5. भाषा-शैली :

​कहानी की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और मुहावरेदार है।

​लेखक ने उर्दू-मिश्रित हिंदी (हिंदुस्तानी) का प्रयोग किया है, जो पात्रों के परिवेश के अनुसार स्वाभाविक लगती है।

​शैली वर्णनात्मक होने के साथ-साथ व्यंग्यात्मक भी है, विशेषकर जब वे समाज की विसंगतियों पर प्रहार करते हैं।

​6. उद्देश्य :

​स्नातक स्तर पर यह समझना महत्वपूर्ण है कि प्रेमचंद केवल मनोरंजन के लिए नहीं लिखते थे। इस कहानी का मुख्य उद्देश्य 'ईमानदारी का फल' दिखाना है।

​यद्यपि वंशीधर को अपनी ईमानदारी के लिए नौकरी गंवानी पड़ती है, लेकिन अंत में उनकी नैतिक विजय होती है। यह कहानी पाठकों में नैतिक मूल्यों के प्रति विश्वास जगाती है।

​निष्कर्ष:

निष्कर्षतः, 'नमक का दरोगा' कहानी कला के सभी प्रतिमानों (तत्वों) पर खरी उतरती है। यह कहानी आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी रचना काल के समय थी। प्रेमचंद की लेखनी ने एक साधारण घटना को मानवीय संवेदना और नैतिकता के उच्चतम स्तर तक पहुँचा दिया है। प्रेमचंद ने 'आदर्शोन्मुख यथार्थवाद' का पालन करते हुए इसे एक सुखद अंत दिया ताकि समाज में अच्छाई के प्रति विश्वास बना रहे।

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सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

बिहारी की काव्य भाषा पर प्रकाश डालें

 बिहारी की काव्य भाषा पर प्रकाश डालें

बिहारी की काव्य-भाषा हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट पहचान रखती है। उनकी भाषा रीतिकालीन काव्य-परंपरा के अनुरूप होते हुए भी अत्यंत प्रभावशाली, संक्षिप्त और अलंकारिक है। भाषा ही उनके काव्य की आत्मा है। बिहारी की काव्य-भाषा के प्रमुख पक्ष निम्नलिखित हैं—

1. ब्रजभाषा का प्रयोग

बिहारी की काव्य-भाषा ब्रजभाषा है, जो उस काल की प्रमुख साहित्यिक भाषा थी। ब्रजभाषा की कोमलता, माधुर्य और भावप्रवणता उनके दोहों में पूर्णतः विद्यमान है।

श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए ब्रजभाषा अत्यंत उपयुक्त सिद्ध हुई है।

2. संक्षिप्त और सटीक भाषा

बिहारी की भाषा अत्यंत संक्षिप्त, सटीक और अर्थगर्भित है। वे एक-एक शब्द को सोच-समझकर प्रयोग करते हैं।

उनके दोहों में कोई भी शब्द अनावश्यक नहीं लगता। भाषा में कसाव और गहराई स्पष्ट दिखाई देती है।

3. तत्सम, तद्भव और देशज शब्दों का संतुलन

बिहारी की भाषा में

तत्सम शब्दों की गरिमा

तद्भव शब्दों की सरलता

देशज शब्दों की आत्मीयता

तीनों का सुंदर संतुलन मिलता है।

इससे भाषा न तो अत्यधिक क्लिष्ट बनती है और न ही अत्यधिक साधारण।

4. अलंकारिक भाषा

बिहारी की भाषा अत्यंत अलंकारिक है। शब्दों के माध्यम से वे चित्र खींच देते हैं।

श्लेष, उपमा और रूपक का प्रयोग भाषा को बहुअर्थी और चमत्कारपूर्ण बना देता है।

एक ही शब्द से वे कई अर्थों की सृष्टि कर देते हैं।

5. लाक्षणिक और व्यंजक भाषा

बिहारी की भाषा में लक्षणा और व्यंजना शक्ति का उत्कृष्ट प्रयोग हुआ है।

अर्थ सीधे न कहकर संकेतों और प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त किए जाते हैं, जिससे पाठक को विचार और कल्पना की स्वतंत्रता मिलती है।

6. भावानुकूल शब्द-चयन

बिहारी का शब्द-चयन भावों के अनुरूप होता है।

श्रृंगार के प्रसंगों में कोमल, मधुर और सरस शब्दों का प्रयोग मिलता है, जबकि नीति संबंधी दोहों में भाषा गंभीर और प्रभावपूर्ण हो जाती है।

7. चित्रात्मकता

उनकी भाषा में चित्रात्मकता अत्यंत प्रबल है। पाठक के मन में दृश्य सजीव हो उठते हैं।

नेत्रों, भौंहों, अधरों, चंद्रमा, दीपक आदि के वर्णन में भाषा दृश्य-रचना का कार्य करती है।

8. छंदानुकूल भाषा

बिहारी ने दोहा छंद का प्रयोग किया है। उनकी भाषा दोहा छंद के अनुशासन में बँधी होने के बावजूद प्रवाहपूर्ण है। कहीं भी कृत्रिमता नहीं लगती।

निष्कर्ष

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि बिहारी की काव्य-भाषा उनकी काव्य-सफलता का मूल आधार है। ब्रजभाषा की माधुर्यपूर्ण अभिव्यक्ति, संक्षिप्तता, अलंकारिकता और व्यंजक शक्ति ने उनके काव्य को कालजयी बना दिया है। यही कारण है कि बिहारी की भाषा आज भी पाठकों को आकर्षित करती है और हिंदी साहित्य में उनका स्थान अटल है।

बिहारी की काव्यगत विशेषताओं का वर्णन

 बिहारी की काव्यगत विशेषताओं का वर्णन

रीतिकालीन हिंदी काव्यधारा में बिहारीलाल का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। वे रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं। उनकी एकमात्र प्रसिद्ध रचना ‘बिहारी सतसई’ है, जिसमें लगभग 700 दोहे संकलित हैं। सीमित काव्य-रचना के बावजूद बिहारी ने हिंदी साहित्य को जो ऊँचाई दी, वह उन्हें अमर कवियों की श्रेणी में स्थापित करती है। बिहारी की काव्यगत विशेषताओं को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है—

1. श्रृंगार रस की प्रधानता

बिहारी के काव्य में श्रृंगार रस का प्रमुख स्थान है। विशेष रूप से संयोग श्रृंगार का चित्रण अत्यंत सशक्त है। नायक-नायिका के प्रेम, सौंदर्य, हाव-भाव, नेत्रों की चपलता, मुस्कान, लज्जा आदि का अत्यंत सूक्ष्म और मनोवैज्ञानिक चित्रण बिहारी ने किया है।

उनका श्रृंगार कहीं भी अश्लील नहीं बनता, बल्कि शिष्ट और कलात्मक रूप में सामने आता है।

2. संक्षिप्तता में गहनता

बिहारी की सबसे बड़ी विशेषता है—कम शब्दों में अधिक अर्थ कहना। उनके दोहे छोटे होते हुए भी अर्थ की दृष्टि से अत्यंत गूढ़ हैं। प्रत्येक दोहे में भाव, अलंकार और रस का अद्भुत समन्वय मिलता है।

इसी कारण कहा गया है—

“गागर में सागर भरना”—यह उक्ति बिहारी पर पूर्णतः लागू होती है।

3. अलंकारों का प्रचुर प्रयोग

बिहारी के काव्य में अलंकारों का अत्यंत सशक्त और स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। विशेष रूप से—

उपमा

रूपक

उत्प्रेक्षा

श्लेष

विरोधाभास

का प्रयोग अत्यंत कुशलता से हुआ है।

उनके अलंकार काव्य को बोझिल नहीं बनाते, बल्कि सौंदर्य में वृद्धि करते हैं।

4. नायिका-भेद का सजीव चित्रण

बिहारी ने रीतिकालीन परंपरा के अनुसार नायिका-भेद का अत्यंत प्रभावी चित्रण किया है।

स्वकीया, परकीया, मुग्धा, प्रौढ़ा, खंडिता, अभिसारिका आदि नायिकाओं के विविध मनोभाव उनके दोहों में सजीव हो उठते हैं।

नायिका के मनोवैज्ञानिक पक्ष को पकड़ने में बिहारी अद्वितीय हैं।

5. प्रकृति-चित्रण

यद्यपि बिहारी का मुख्य विषय श्रृंगार है, फिर भी उनके काव्य में प्रकृति का सौंदर्यपूर्ण चित्रण मिलता है। प्रकृति को वे नायक-नायिका के भावों के अनुकूल प्रस्तुत करते हैं।

चाँदनी रात, बसंत ऋतु, सरोवर, कमल, कोयल आदि प्राकृतिक उपादान भाव-वृद्धि का कार्य करते हैं।

6. नीति और जीवन-बोध

बिहारी केवल श्रृंगार के कवि नहीं हैं। उनके अनेक दोहों में नीति, व्यवहारिक जीवन-दर्शन और नैतिक उपदेश भी मिलते हैं।

उन्होंने मानव स्वभाव, लोभ, अहंकार, प्रेम और व्यवहारिक बुद्धि को बड़ी सूक्ष्मता से व्यक्त किया है।

7. रस-सिद्ध कवि

बिहारी रस-सिद्ध कवि हैं। उनके दोहों में रस निष्पत्ति अत्यंत प्रभावशाली ढंग से होती है। श्रृंगार के साथ-साथ शांत और नीति रस का भी समावेश मिलता है।

8. संगीतात्मकता और लय

बिहारी के दोहे छंद, लय और ताल की दृष्टि से अत्यंत मधुर हैं। पाठ करते समय उनमें स्वाभाविक संगीतात्मकता अनुभव होती है।

निष्कर्ष

इस प्रकार कहा जा सकता है कि बिहारी रीतिकाल के ऐसे कवि हैं, जिन्होंने सीमित रचना में भी असीम काव्य-वैभव प्रस्तुत किया। उनकी काव्यगत विशेषताएँ—संक्षिप्तता, श्रृंगार-प्रधानता, अलंकार-सौंदर्य और मनोवैज्ञानिक गहराई—उन्हें हिंदी साहित्य में अद्वितीय स्थान प्रदान करती हैं।

तुलसीदास के काव्य में भाव पक्ष और शैली पक्ष का वर्णन कीजिए

 तुलसीदास के काव्य में भाव पक्ष और शैली पक्ष का वर्णन कीजिए।

गोस्वामी तुलसीदास का काव्य हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। उनके काव्य की महानता का आधार उनका सशक्त भाव पक्ष और सरल, प्रभावशाली शैली पक्ष है। भाव और शैली का ऐसा संतुलित और लोकग्राह्य रूप हिंदी साहित्य में विरल है। तुलसीदास ने अपने काव्य के माध्यम से भक्ति, प्रेम, करुणा, आदर्श और लोकमंगल को कलात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की है।

(क) तुलसीदास के काव्य का भाव पक्ष

1. भक्ति भावना

तुलसीदास के काव्य का मूल भाव भक्ति है। उनकी भक्ति राम के प्रति अनन्य और निष्काम है। रामचरितमानस, विनय पत्रिका और गीतावली में भक्ति विविध रूपों में प्रकट होती है—दास्य, वात्सल्य और सख्य भाव। यह भक्ति भावना हृदय को स्पर्श करने वाली है।

2. करुणा और प्रेम

तुलसीदास के काव्य में करुणा का अत्यंत मार्मिक रूप देखने को मिलता है। सीता हरण, वनवास, भरत की विरह-व्यथा और राम-सीता मिलन जैसे प्रसंग पाठक के हृदय को द्रवित कर देते हैं। प्रेम यहाँ केवल दांपत्य तक सीमित नहीं, बल्कि मानवीय करुणा का व्यापक रूप है।

3. आदर्शवाद

तुलसीदास का काव्य आदर्शों का काव्य है। राम आदर्श पुत्र, पति, भाई और राजा हैं; सीता आदर्श नारी हैं; भरत त्याग और भ्रातृ प्रेम के प्रतीक हैं। ये आदर्श समाज को नैतिक दिशा प्रदान करते हैं।

4. लोकमंगल और सामाजिक चेतना

तुलसीदास का भाव पक्ष लोकमंगल से जुड़ा हुआ है। वे समाज में व्याप्त कुरीतियों, अहंकार और अधर्म का विरोध करते हैं तथा सदाचार, सत्य और धर्म का समर्थन करते हैं।

(ख) तुलसीदास के काव्य का शैली पक्ष

1. भाषा शैली

तुलसीदास ने अवधी और ब्रजभाषा को काव्य की भाषा बनाया। उनकी भाषा सरल, मधुर और भावानुकूल है। जनसाधारण भी उनके काव्य को सहज ही समझ सकता है। यही उनकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण है।

2. वर्णन शैली

उनकी वर्णन शैली अत्यंत सजीव और चित्रात्मक है। वन, नगर, युद्ध, सभा और प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन आँखों के सामने सजीव हो उठता है।

3. संवाद शैली

रामचरितमानस में संवाद शैली अत्यंत प्रभावशाली है। पात्रों के संवाद उनके चरित्र और भावनाओं को स्पष्ट करते हैं। राम-भरत संवाद इसका श्रेष्ठ उदाहरण है।

4. अलंकार और छंद

तुलसीदास के काव्य में उपमा, रूपक, अनुप्रास जैसे अलंकार सहज रूप से प्रयुक्त हुए हैं। दोहा, चौपाई, सोरठा और छप्पय छंदों का सुंदर प्रयोग उनकी शैली को संगीतात्मक बनाता है।

5. सरलता और प्रवाह

तुलसीदास की शैली की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सरलता और प्रवाह है। भाव और भाषा में कोई कृत्रिमता नहीं दिखाई देती। यही कारण है कि उनका काव्य सदियों बाद भी उतना ही प्रभावी है।


निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि तुलसीदास के काव्य में भाव पक्ष और शैली पक्ष का अद्भुत समन्वय है। उनके भाव गहरे, लोकमंगलकारी और मानवीय हैं, जबकि उनकी शैली सरल, सरस और प्रभावशाली है। यही कारण है कि तुलसीदास हिंदी साहित्य के अमर कवि हैं और उनका काव्य आज भी जन-जन के हृदय में जीवित है।

तुलसीदास की भक्ति-भावना पर प्रकाश डालिए।

 तुलसीदास की भक्ति-भावना पर प्रकाश डालिए।

गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य के भक्ति काल के सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक प्रभावशाली कवि माने जाते हैं। उनकी भक्ति भावना केवल व्यक्तिगत आस्था तक सीमित न होकर लोकमंगल, सामाजिक समरसता और नैतिक आदर्शों से गहराई से जुड़ी हुई है। तुलसीदास की भक्ति रामभक्ति है, जो सगुण, साकार और मर्यादित रूप में प्रकट होती है। उन्होंने भगवान राम को केवल ईश्वर ही नहीं, बल्कि आदर्श मनुष्य, आदर्श राजा, पुत्र, पति और मित्र के रूप में प्रस्तुत किया है। उनकी भक्ति भावना में दास्य, वात्सल्य और सख्य भाव का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।

(क) सगुण भक्ति की प्रधानता

तुलसीदास सगुण भक्ति के प्रमुख कवि हैं। वे निर्गुण निराकार ब्रह्म की अपेक्षा साकार, गुणयुक्त ईश्वर की उपासना को अधिक महत्व देते हैं। उनके लिए राम सगुण, साकार और करुणा के सागर हैं। रामचरितमानस में राम को “रघुकुल रीति सदा चली आई” जैसे आदर्श वाक्यों के माध्यम से मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रस्तुत किया गया है। तुलसीदास की भक्ति भावना लोक के लिए सरल और ग्राह्य है, क्योंकि साकार राम से सामान्य जन आत्मीय संबंध स्थापित कर सकता है।

(ख) दास्य भाव की प्रधानता

तुलसीदास की भक्ति का मूल स्वर दास्य भाव है। वे स्वयं को राम का दास मानते हैं और इसी भाव से उनकी उपासना करते हैं। उनके अनुसार भक्त और भगवान का संबंध स्वामी-सेवक का है। विनय पत्रिका में तुलसीदास की दास्य भक्ति अत्यंत मार्मिक रूप में व्यक्त हुई है। वे अपने पापों, दुर्बलताओं और अज्ञान को स्वीकार करते हुए प्रभु राम से कृपा की याचना करते हैं। यह विनय और आत्मसमर्पण उनकी भक्ति भावना की विशेषता है।

(ग) प्रेम और करुणा पर आधारित भक्ति

तुलसीदास की भक्ति भय या कर्मकांड पर आधारित नहीं है, बल्कि प्रेम और करुणा पर आधारित है। उनके राम करुणामय हैं, जो दीन-दुखियों पर सहज ही कृपा करते हैं। शबरी, केवट, निषादराज और अहल्या जैसे पात्रों के माध्यम से तुलसीदास यह स्पष्ट करते हैं कि प्रभु की भक्ति में जाति, कुल या विद्या का कोई महत्व नहीं, बल्कि निष्कलुष प्रेम ही सबसे बड़ा साधन है।

(घ) लोकमंगल की भावना

तुलसीदास की भक्ति भावना का प्रमुख लक्ष्य लोकमंगल है। वे भक्ति को केवल मोक्ष का साधन नहीं मानते, बल्कि समाज सुधार का माध्यम भी मानते हैं। रामचरितमानस में आदर्श शासन, पारिवारिक मर्यादा, सामाजिक कर्तव्य और नैतिक मूल्यों का सुंदर चित्रण है। उनके राम ‘राजा’ होकर भी लोककल्याण को सर्वोपरि रखते हैं। इस प्रकार तुलसीदास की भक्ति भावना समाज को दिशा देने वाली है।

(ङ) वैराग्य और संसार-दृष्टि

यद्यपि तुलसीदास गृहस्थ जीवन और सामाजिक कर्तव्यों को महत्व देते हैं, फिर भी उनकी भक्ति भावना में वैराग्य का तत्व भी विद्यमान है। वे संसार को नश्वर और मायामय मानते हैं तथा ईश्वर भक्ति को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य बताते हैं। किंतु उनका वैराग्य पलायनवादी नहीं है, बल्कि कर्तव्य के साथ जुड़ा हुआ है।

(च) शरणागति और आत्मसमर्पण

तुलसीदास की भक्ति का चरम रूप शरणागति है। वे राम को ही एकमात्र आश्रय मानते हैं। भक्त का कर्तव्य है कि वह पूर्ण विश्वास के साथ प्रभु की शरण में जाए। यह शरणागति भाव तुलसीदास की भक्ति भावना को अत्यंत ऊँचाई प्रदान करता है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि तुलसीदास की भक्ति भावना सरल, सहज, लोकमंगलकारी और प्रेममयी है। उनकी रामभक्ति ने हिंदी साहित्य ही नहीं, बल्कि भारतीय जनमानस को भी गहराई से प्रभावित किया है। तुलसीदास की भक्ति भावना आज भी जीवन मूल्यों, नैतिकता और मानवीय संवेदनाओं का सशक्त स्रोत बनी हुई है।

कबीर की सामाजिक / क्रांतिकारी चेतना पर प्रकाश डालिए

 कबीर की सामाजिक / क्रांतिकारी चेतना पर प्रकाश डालिए।

कबीरदास केवल भक्त कवि ही नहीं, बल्कि एक महान समाज सुधारक और क्रांतिकारी चेतना के वाहक भी थे। उनका युग सामाजिक, धार्मिक और नैतिक विकृतियों से ग्रस्त था। समाज में जातिवाद, छुआछूत, धर्मांधता, पाखंड और शोषण व्याप्त था। कबीर ने इन सभी बुराइयों पर निर्भीक प्रहार किया।

कबीर की सामाजिक चेतना का सबसे प्रमुख पक्ष है—जाति व्यवस्था का विरोध। वे जन्म के आधार पर ऊँच-नीच को अस्वीकार करते हैं। उनके अनुसार सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान हैं।

“एक बूंद एक मलमूत्रा, एक चाम एक गात।”

इस पंक्ति में कबीर सामाजिक समानता का सशक्त संदेश देते हैं।

कबीर ने धार्मिक पाखंड और कर्मकांड का तीव्र विरोध किया। उन्होंने हिंदू और मुस्लिम—दोनों धर्मों के बाहरी आडंबरों पर कटाक्ष किया। मंदिर-मस्जिद, मूर्ति-पूजा, रोज़ा-नमाज़ को उन्होंने ईश्वर प्राप्ति का मार्ग नहीं माना।

“पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहाड़।”

कबीर की क्रांतिकारी चेतना का एक महत्वपूर्ण पक्ष है—धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण। वे न तो स्वयं को हिंदू मानते हैं और न मुस्लिम। वे कहते हैं—

“ना हम हिंदू, ना मुसलमान।”

यह कथन उस युग में अत्यंत साहसिक और क्रांतिकारी था।

कबीर ने समाज में व्याप्त नारी अपमान और पारिवारिक विकृतियों पर भी प्रहार किया। वे नारी को भोग की वस्तु मानने वाली मानसिकता का विरोध करते हैं और संयमित जीवन पर बल देते हैं। साथ ही वे मानव के आंतरिक दोषों—काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार—को समाज के पतन का कारण मानते हैं।

कबीर की सामाजिक चेतना उनकी भाषा और शैली में भी दिखाई देती है। उन्होंने लोकभाषा में अपनी बात कही, जिससे सामान्य जन भी उनके विचारों को समझ सके। उनकी वाणी में व्यंग्य, कटाक्ष और तीखापन है, जो समाज को झकझोर देता है।

कबीर की क्रांतिकारी चेतना केवल आलोचना तक सीमित नहीं है, बल्कि वे नवीन समाज की कल्पना भी करते हैं—ऐसा समाज जो समानता, प्रेम, सत्य और मानवता पर आधारित हो। वे कहते हैं—

“साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय।”

यह सामाजिक संतुलन और नैतिक जीवन का आदर्श प्रस्तुत करता है।

इस प्रकार कबीर की सामाजिक और क्रांतिकारी चेतना उन्हें केवल कवि नहीं, बल्कि युगद्रष्टा और समाज सुधारक सिद्ध करती है। उनके विचार आज भी सामाजिक न्याय और मानवता के लिए प्रेरणास्रोत हैं।

कबीर की भक्ति भावना पर प्रकाश डालिए।

 कबीर की भक्ति भावना पर प्रकाश डालिए।

कबीरदास हिंदी साहित्य के ऐसे महान संत कवि हैं जिनकी भक्ति भावना भारतीय भक्ति आंदोलन में एक विशिष्ट स्थान रखती है। उनकी भक्ति न तो कर्मकांड प्रधान है और न ही बाह्य आडंबरों से जुड़ी हुई। कबीर की भक्ति मूलतः निर्गुण, निराकार, निरंजन ब्रह्म की उपासना है। वे ईश्वर को किसी मूर्ति, मंदिर, मस्जिद या धर्मग्रंथ तक सीमित नहीं मानते, बल्कि उसे मनुष्य के अंतरात्मा में निवास करने वाला सत्य मानते हैं।

कबीर की भक्ति भावना का मूल आधार ज्ञान, प्रेम और अनुभव है। उन्होंने गुरु को ईश्वर से भी बड़ा माना है, क्योंकि गुरु ही शिष्य को ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाता है। कबीर कहते हैं—

“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।

बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय।”

इस दोहे से स्पष्ट है कि कबीर की भक्ति में गुरु का स्थान सर्वोपरि है।

कबीर की भक्ति भावना में राम का विशेष महत्व है, परंतु उनका राम दशरथ पुत्र नहीं, बल्कि सर्वव्यापक ब्रह्म है। कबीर का राम निर्गुण है—जिसका कोई रूप, रंग, आकार नहीं। वे कहते हैं—

“दशरथ सुत तिहुं लोक बखाना, राम नाम को मरम न जाना।”

यहाँ कबीर स्पष्ट करते हैं कि वे सगुण राम की नहीं, बल्कि निर्गुण राम की भक्ति करते हैं।

कबीर की भक्ति में प्रेम तत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार ईश्वर को तर्क या शास्त्रज्ञान से नहीं, बल्कि प्रेम से पाया जा सकता है। वे कहते हैं—

“प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो न समाय।”

अर्थात ईश्वर की प्राप्ति के मार्ग में अहंकार के लिए कोई स्थान नहीं है।

कबीर की भक्ति भावना में समर्पण और वैराग्य भी दिखाई देता है। संसार की नश्वरता को समझकर वे ईश्वर की शरण में जाने का संदेश देते हैं। वे मानते हैं कि सांसारिक मोह-माया मनुष्य को ईश्वर से दूर करती है।

“माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।”

कबीर की भक्ति भावना सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने भक्ति को केवल व्यक्तिगत साधना न मानकर, समाज सुधार का माध्यम बनाया। उनकी भक्ति सर्वजन हिताय है, जिसमें जाति, वर्ग, धर्म का कोई भेद नहीं। वे कहते हैं—

“जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।”

इस प्रकार कबीर की भक्ति भावना सरल, सहज, निर्गुण, प्रेममय और अनुभवजन्य है। उनकी भक्ति आडंबरों का विरोध करती है और मनुष्य को आत्मज्ञान तथा मानवता की ओर प्रेरित करती है। यही कारण है कि कबीर की भक्ति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उनके समय में थी।

आधुनिक कवि - संक्षिप्त प्रश्न - उत्तर

 भारतेंदु हरिश्चंद्र

37. जन्म और मृत्यु

→ जन्म – 1850 ई., वाराणसी

→ मृत्यु – 1885 ई.

38. नाटक/रचनाएँ

→ अंधेर नगरी, भारत दुर्दशा, सत्य हरिश्चंद्र, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति

39. संपादित पत्रिकाएँ

→ कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र चंद्रिका, हरिश्चंद्र मैगजीन

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

40. जन्म और मृत्यु

→ जन्म – 1896 ई., महिषादल (बंगाल)

→ मृत्यु – 1961 ई.

41. बचपन का नाम

→ सूर्यकांत

42. काव्य संग्रह (वर्ष सहित)

अनामिका – 1923

परिमल – 1930

गीतिका – 1936

तुलसीदास – 1938

43. पहली रचना

→ जन्मभूमि

44. एक प्रगतिवादी रचना

→ राम की शक्ति पूजा

45. काव्य धारा

→ छायावाद

प्रयोगवाद / अज्ञेय

46. प्रयोगवाद का जनक

→ अज्ञेय

47. ‘तार सप्तक’ का प्रकाशन वर्ष

→ 1943 ई.

48. ‘दूसरा सप्तक’ का प्रकाशन वर्ष

→ 1951 ई.

49. अज्ञेय का जन्म और मृत्यु

→ जन्म – 1911 ई.

→ मृत्यु – 1987 ई.

50. अज्ञेय की प्रमुख रचनाएँ (वर्ष सहित)

शेखर: एक जीवनी – 1941

नदी के द्वीप – 1952

हरी घास पर क्षण भर – 1949

51. संपादित पत्रिकाएँ

→ प्रतीक (1947), दिनमान (1965)

52. प्रमुख पुरस्कार

→ ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार

रघुवीर सहाय

53. जन्म और मृत्यु

→ जन्म – 1929 ई.

→ मृत्यु – 1990 ई.

54. रचनाएँ (वर्ष सहित)

लोग भूल गए हैं – 1962

सीढ़ियों पर धूप में – 1970

55. काव्य धारा

→ नई कविता / प्रगतिवाद

घनानंद - संक्षिप्त प्रश्न - उत्तर

 घनानंद से संबंधित प्रश्न

31. घनानंद के माता-पिता और गुरु

→ माता-पिता – ज्ञात नहीं

→ गुरु – देव

32. घनानंद की रचनाएँ

→ सुजानहित, वियोग शतक, प्रेम सुधा, रसखंड

33. घनानंद की प्रेमिका का नाम

→ सुजान

34. घनानंद किस राजा के दरबारी कवि थे?

→ निजामशाह

35. घनानंद की मृत्यु कब हुई?

→ सन् 1760 ई.

36. घनानंद का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

→ सन् 1689 ई., दिल्ली

बिहारी - संक्षिप्त प्रश्न - उत्तर

 बिहारी से संबंधित प्रश्न

24. बिहारी का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

→ सन् 1595 ई., ग्वालियर

25. बिहारी के माता-पिता और गुरु

→ माता-पिता – ज्ञात नहीं

→ गुरु – केशवदास

26. बिहारी की रचना का नाम

→ बिहारी सतसई

27. बिहारी सतसई में दोहों की संख्या

→ 713 दोहे

28. सतसई का अर्थ

→ सात सौ दोहों का संग्रह

29. बिहारी किस राजा के दरबारी कवि थे?

→ राजा जयसिंह (आमेर)

30. बिहारी की मृत्यु कब हुई?

→ सन् 1663 ई.

तुलसीदास- संक्षिप्त प्रश्न - उत्तर

 14. तुलसीदास का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

→ सन् 1532 ई. (संवत 1589) में राजापुर (जिला बाँदा, उत्तर प्रदेश) में।

15. तुलसीदास के माता-पिता का नाम क्या था?

→ पिता – आत्माराम दुबे

→ माता – हुलसी देवी

16. तुलसीदास के गुरु का नाम क्या था?

→ नरहरिदास

17. तुलसीदास के बचपन का नाम क्या था?

→ रामबोला

18. तुलसीदास की पत्नी का नाम क्या था?

→ रत्नावली

19. तुलसीदास की कृतियाँ (प्रकाशन वर्ष सहित)

रामचरितमानस – 1574 ई.

विनय पत्रिका – 1582 ई.

कवितावली – 1582 ई.

गीतावली – 1583 ई.

दोहावली – 1583 ई.

20. ब्रज भाषा में रचनाएँ

→ कवितावली, गीतावली

21. अवधी भाषा में रचनाएँ

→ रामचरितमानस

22. तुलसीदास की मृत्यु कब और कहाँ हुई?

→ सन् 1623 ई., वाराणसी (काशी)

23. तुलसीदास पर लिखी गई आलोचनात्मक पुस्तकें

तुलसीदास – रामचंद्र शुक्ल

तुलसीदास का काव्य – हजारीप्रसाद द्विवेदी

कबीर - संक्षिप्त प्रश्न-उत्तर

 कबीर का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

सन् 1398 ई. में वराणसी में हुआ था।

2.कबीर के माता-पिता का नाम क्या था?

नीरू और नीमा

3.कबीर के गुरु का नाम क्या है?

रामानंद

4.कबीर की रचनाओं के नाम लिखिए।

बीजक

5.’बीजक’ का संपादन किसने किया था?

धर्मदास

6.’बीजक’ के कितने भाग हैं?

तीन

7.’साखी’ का अर्थ क्या है?

साक्षी

8.’सबद’ का अर्थ क्या है?

शब्द

9.’रमैनी’ का अर्थ क्या है?

रमैनी' शब्द का अर्थ राम के चिंतन-मनन या राम के वृत्त में रमण करना। 

10.कबीर किस भक्ति धारा के कवि हैं?

निर्गुण भक्ति के ज्ञानमार्गी धारा।

11.’निर्गुण’ का अर्थ क्या है?

जो ईश्वर के रूप, रंग, आकर – प्रकार को नहीं मानता।

13.कबीर की मृत्यु कब और कहाँ हुई थी?

सन् 1518 ई. मगहर


शनिवार, 5 जुलाई 2025

घुमक्कड़ शास्त्र निबंध की समीक्षा

 राहुल सांकृत्यायन की ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ यात्रा और भ्रमण के महत्व पर आधारित विचारोत्तेजक निबंध है। इसमें उन्होंने घुमक्कड़ी को संसार की सर्वोत्तम वस्तु बताते हुए कहा है कि “दुनिया की सर्वश्रेष्ठ वस्तु है घुमक्कड़ी, घुमक्कड़ से बढ़कर व्यक्ति और समाज का कोई हितकारी नहीं हो सकता”। लेख का मूल दृष्टांत यह है कि घुमक्कड़ ही मानवता को नई-नई खोज, ज्ञान और सभ्यता प्रदान करते हैं। लेखक अपनी व्यक्तिगत अनुभवों का निचोड़ प्रस्तुत करते हुए पाठक को निर्बाध रूप से पृथ्वी का कोना-कोना घुमकर समाज-उन्नति में योगदान देने का आह्वान करता है। संक्षेप में, यह रचना यात्रा को आत्म-विकास और सामाजिक प्रगति का अत्यंत प्रभावी मार्ग दर्शाती है।

लेखक की दृष्टि और उद्देश्य

राहुल सांकृत्यायन की दृष्टि में घुमक्कड़ी केवल जीवनशैली नहीं, बल्कि समग्र मानवता के विकास का आधार है। उन्होंने इस रचना को “यात्रा की परिवर्तनकारी शक्ति का भावुक घोषणापत्र” कहा है तथा बताया है कि यह पाठक में घुमक्कड़ होने की भावना जागृत करती है, उन्हें दुनिया की यात्रा के लिए प्रेरित करती है। अपने विवेचन में लेखक यात्राओं को आध्यात्मिक खोज बताकर समझता है कि भ्रमण केवल शगल नहीं, आत्म-खोज और ज्ञानोदय का मार्ग है। इसके साथ ही उन्होंने व्यावहारिक युक्तियाँ साझा करते हुए विशेष रूप से स्त्रियों को भी भ्रमण के लिए प्रेरित किया है। कुल मिलाकर, राहुल का उद्देश्य पाठकों को निर्भय होकर अनजान भूमि पर चलने, सीमाओं को तोड़ने और अपनी क्षमताओं का विस्तार करने की प्रेरणा देना है।

भाषा-शैली और संरचना

‘घुमक्कड़ शास्त्र’ की भाषा प्रभावशाली, सुव्यवस्थित और प्रबुद्ध है। राहुल सांकृत्यायन ने ग्रंथ की शुरुआत पारंपरिक शैली में की है, जैसे ही वे लिखते हैं: *“संस्कृत से ग्रंथ को शुरू करने के लिए पाठकों को रोष नहीं होना चाहिए… छ शास्त्रों के रचयिता छ आस्तिक ऋषियों में भी आधों ने ब्रह्म को धत्ता बता दिया है। मेरी समझ में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ वस्तु है घुमक्कड़ी…”*। इस प्रकार वे शास्त्रीय संदर्भों का प्रयोग कर आधुनिक यात्रा दर्शन प्रस्तुत करते हैं। लेख का ढांचा बहु-अध्यायी है, जिसमें विभिन्न उपशीर्षकों (जैसे ‘विद्या और वय’, ‘स्वावलंबन’, ‘स्त्री घुमक्कड़’, ‘देश-ज्ञान’ इत्यादि) के अंतर्गत यात्रा के विविध पहलुओं की चर्चा की गई है। प्रत्येक खंड में लेखक व्यक्तिगत अनुभव, सामाजिक दृष्टांत और ऐतिहासिक उदाहरणों का समावेश करता है, जिससे प्रस्तुति रोचक और प्रेरणादायक बनती है। इस शैलीगत रूपांकन से पाठक के सामने विचार स्पष्टता और तर्कशीलता के साथ प्रस्तुत होते हैं।

समाज और मानव जीवन पर प्रभाव

‘घुमक्कड़ शास्त्र’ ने समाज में गतिशीलता और विश्वदृष्टि का संदेश दिया है। राहुल सांकृत्यायन ने यह दिखाया कि इतिहास में अनेक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन घुमक्कड़ यात्रियों के माध्यम से हुए हैं – उदाहरणस्वरूप कोलंबस और वास्को-दा-गामा जैसे घुमक्कड़ों ने नई दिशाएँ खोलीं, डार्विन जैसी वैज्ञानिक उपलब्धियाँ भी घुमक्कड़ जीवन-दर्शन से प्रेरित थीं। उनके कथनानुसार, *“यदि डार्विन ने घुमक्कड़ी का व्रत नहीं लिया होता तो वह अपने महान आविष्कार कर सकता था?”*। इस प्रकार उन्होंने भ्रमण को बुद्धि-विकास और ज्ञानवर्धन से जोड़ा है। साथ ही रचना में समदर्शिता (समान दृष्टि) का भी जोर है – राहुल कहते हैं *“समदर्शिता घुमक्कड़ का एकमात्र दृष्टिकोण है और आत्मीयता उसका सार”*, जो सामाजिक सहिष्णुता और परस्पर समझ के लिए महत्वपूर्ण है। उनकी लेखनशैली ही समाज में प्रगतिशील परिवर्तन लाने की प्रेरणा देती है; मान्यता यह है कि उनकी रचनाएँ रूढ़िवादी धारणाओं को चुनौती देकर समाज को गतिशील बनाने का मार्ग दिखाती हैं। इस तरह ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ ने यात्राओं को मनुष्य की उन्नति का साधन मानकर मानव जीवन को व्यापक दृष्टि देने में योगदान दिया है।

समकालीन प्रासंगिकता

आधुनिक वैश्वीकरण और सूचना-युग में भी राहुल सांकृत्यायन के विचार प्रासंगिक हैं। उनकी यात्रा-वैचारिकी और समदर्शिता का दृष्टिकोण आज के वैश्विक समाज में अधिक सार्थक है। जैसा उन्होंने कहा *“समदर्शिता घुमक्कड़ का एकमात्र दृष्टिकोण है”*, यह विचार वर्तमान में विश्व बंधुत्व (वसुधैव कुटुंबकम) जैसी अवधारणाओं से मेल खाता है। उन्होंने अनुभवात्मक शिक्षण को महत्व देते हुए बताया कि ज्ञान को “सफ़र में नाव की तरह” लिया जाना चाहिए, बोझ की तरह नहीं; आज की शिक्षा प्रणाली में यात्रा आधारित ज्ञानार्जन इसी सिद्धांत के अनुरूप माना जाता है। साथ ही उनकी स्त्री-समर्थक सोच और स्वावलंबन-संदेश (स्त्रियों को भी स्वतंत्रता से घुमक्कड़ी के लिए कहे जाना) आधुनिक लिंग समानता और आत्मनिर्भरता के संदर्भ में प्रासंगिक हैं। इस प्रकार, ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ के प्रेरक संदेश आज भी नई पीढ़ी को चुनौतीपूर्वक सोचने एवं साहसपूर्वक आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं।

निष्कर्ष

संक्षेप में, राहुल सांकृत्यायन की ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ एक कालजयी यात्रा-प्रेरक ग्रंथ है, जिसमें यात्रा के व्यापक दर्शनों को सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है। यह रचना केवल यात्रियों के अनुभवों का संग्रह नहीं बल्कि दुनिया को समझने और उसे आगे बढ़ाने की चिरंतन प्रेरणा है। जैसा समीक्षकों ने लिखा है, यह पुस्तक पाठकों में घुमक्कड़ बनने की भावना जगाती है और कई यात्रियों की पीढ़ियों को आगे चलकर यात्रा के लिए प्रेरित करती रही है। फलस्वरूप, ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ न केवल अपने समय में बल्कि आज भी समृद्ध विचार और प्रेरणा देने वाली रचना है।


स्रोत: राहुल सांकृत्यायन, घुमक्कड़ शास्त्र (विमर्श, भारती साहित्य संग्रह) एवं संबंधित समीक्षाएँ.




मंगलवार, 18 मार्च 2025

छोटा जादूगर

छोटा जादूगर


जयशंकर प्रसाद


कार्निवल के मैदान में बिजली जगमगा रही थी। हँसी और विनोद का कलनाद गूँज रहा था। मैं खड़ा था उस छोटे फुहारे के पास, जहाँ एक लड़का चुपचाप शराब पीनेवालों को देख रहा था। उसके गले में फटे कुरते के ऊपर से एक मोटी-सी सूत की रस्‍सी पड़ी थी और जेब में कुछ ताश के पत्‍ते थे। उसके मुँह पर गंभीर विषाद के साथ धैर्य की रेखा थी। मैं उसकी ओर न जाने क्‍यों आकर्षित हुआ। उसके अभाव में भी संपन्‍नता थी।


मैंने पूछा, क्‍यों जी, तुमने इसमें क्‍या देखा?"


मैंने सब देखा है। यहाँ चूड़ी फेंकते हैं। खिलौनों पर निशाना लगाते हैं। तीर से नंबर छेदते हैं। मुझे तो खिलौनों पर निशाना लगाना अच्‍छा मालूम हुआ। जादूगर तो बिलकुल निकम्‍मा है। उससे अच्‍छा तो ताश का खेल मैं ही दिखा सकता हूँ। उसने बड़ी प्रगल्‍भता से कहा। उसकी वाणी में कहीं रूकावट न थी।


मैंने पूछा, और उस परदे में क्‍या है? वहाँ तुम गए थे?"


नहीं, वहाँ मैं नहीं जा सका। टिकट लगता है।


मैंने कहा, तो चलो, मैं वहाँ पर तुमको लिवा चलूँ। मैंने मन-ही-मन कहा, 'भाई! आज के तुम्‍हीं मित्र रहे।'


उसने कहा, वहाँ जाकर क्‍या कीजिएगा? चलिए, निशाना लगाया जाए।


मैंने उससे सहमत होकर कहा, तो फिर चलो, पहले शरबत पी लिया जाए। उसने स्‍वीकार-सूचक सिर हिला दिया।


मनुष्‍यों की भीड़ से जाड़े की संध्‍या भी वहाँ गरम हो रही थी। हम दोनों शरबत पीकर निशाना लगाने चले। राह में ही उससे पूछा, तुम्‍हारे घर में और कौन हैं?"


माँ और बाबूजी।


उन्‍होंने तुमको यहाँ आने के लिए मना नहीं किया?"


बाबूजी जेल में हैं।


क्‍यों?"


देश के लिए। वह गर्व से बोला।


और तुम्‍हारी माँ?"


वह बीमार है।


और तुम तमाशा देख रहे हो?"


उसके मुँह पर तिरस्‍कार की हँसी फूट पड़ी। उसने कहा, तमाशा देखने नहीं, दिखाने निकला हूँ। कुछ पैसे ले जाऊँगा, तो माँ को पथ्‍य दूँगा। मुझे शरबत न पिलाकर आपने मेरा खेल देखकर मुझे कुछ दे दिया होता, तो मुझे अधिक प्रसन्‍नता होती!"


मैं आश्‍चर्य से उस तेरह-चौदह वर्ष के लड़के को देखने लगा।


हाँ, मैं सच कहता हूँ बाबूजी! माँजी बीमार हैं, इसीलिए मैं नहीं गया।


कहाँ?"


जेल में! जब कुछ लोग खेल-तमाशा देखते ही हैं, तो मैं क्‍यों न दिखाकर माँ की दवा करूँ और अपना पेट भरूँ।


मैंने दीर्घ नि:श्‍वास लिया। चारों ओर बिजली के लट्टू नाच रहे थे। मन व्‍यग्र हो उठा। मैंने उससे कहा, अच्‍छा चलो, निशाना लगाया जाए।


हम दोनों उस जगह पर पहुँचे जहाँ खिलौने को गेंद से गिराया जाता था। मैंने बारह टिकट खरीदकर उस लड़के को दिए।


वह निकला पक्‍का निशानेबाज। उसकी कोई गेंद खाली नहीं गई। देखने वाले दंग रह गए। उसने बारह खिलौनों को बटोर लिया, लेकिन उठाता कैसे? कुछ मेरी रूमाल में बँधे, कुछ जेब में रख लिये गए।


लड़के ने कहा, बाबूजी, आपको तमाशा दिखाऊँगा। बाहर आइए, मैं चलता हूँ। वह नौ-दो ग्‍यारह हो गया। मैंने मन-ही-मन कहा, 'इतनी जल्‍दी आँख बदल गई!"


मैं घूमकर पान की दुकान पर आ गया। पान खाकर बड़ी देर तक इधर-उधर टहलता-देखता रहा। झूले के पास लोगों का ऊपर-नीचे आना देखने लगा। अकस्‍मात् किसी ने ऊपर के हिंडोले से पुकारा, बाबूजी!"


मैंने पूछा, कौन?"


मैं हूँ छोटा जादूगर।

कलकत्‍ते के सुरम्‍य बोटैनिकल-उद्यान में लाल कमलिनी से भरी हुई एक छोटी-सी झील के किनारे घने वृक्षों की छाया में अपनी मंडली के साथ बैठा हुआ मैं जलपान कर रहा था। बातें हो रही थीं। इतने में वही छोटा जादूगर दिखाई पड़ा। हाथ में चारखाने का खादी का झोला, साफ जाँघिया और आधी बाँहों का कुरता। सिर पर मेरी रूमाल सूत की रस्‍सी से बँधी हुई थी। मस्‍तानी चाल में झूमता हुआ आकर वह कहने लगा -


बाबूजी, नमस्‍ते! आज कहिए तो खेल दिखाऊँ?"


नहीं जी, अभी हम लोग जलपान कर रहे हैं।


फिर इसके बाद क्‍या गाना-बजाना होगा, बाबूजी?"


नहीं जी, तुमको.... क्रोध से मैं कुछ और कहने जा रहा था। श्रीमतीजी ने कहा, दिखलाओ जी, तुम तो अच्‍छे आए। भला, कुछ मन तो बहले। मैं चुप हो गया, क्‍योंकि श्रीमतीजी की वाणी में वह माँ की-सी मिठास थी, जिसके सामने किसी भी लड़के को रोका नहीं जा सकता। उसने खेल आरंभ किया।


उस दिन कार्निवल के सब खिलौने उसके खेल में अपना अभिनय करने लगे। भालू मनाने लगा। बिल्‍ली रूठने लगी। बंदर घुड़कने लगा। गुड़िया का ब्‍याह हुआ। गुड्डा वर काना निकला। लड़के की वाचालता से ही अभिनय हो रहा था। सब हँसते लोट-पोट हो गए।


मैं सोच रहा था। बालक को आवश्‍यकता ने कितना शीघ्र चतुर बना दिया। यही तो संसार है।


ताश के सब पत्‍ते लाल हो गए। फिर सब काले हो गए। गले की सूत की डोरी टुकड़े-टुकड़े होकर जुड़ गई। लट्टू अपने से नाच रहे थे। मैंने कहा, अब हो चुका। अपना खेल बटोर लो, हम लोग भी अब जाएँगे।


श्रीमतीजी ने धीरे से उसे एक रूपया दे दिया। वह उछल उठा।


मैंने कहा, लड़के!"


छोटा जादूगर कहिए। यही मेरा नाम है। इसी से मेरी जीविका है।


मैं कुछ बोलना ही चाहता था कि श्रीमतीजी ने कहा, अच्‍छा, तुम इस रुपए से क्‍या करोगे?"


पहले भरपेट पकौड़ी खाऊँगा। फिर एक सूती कंबल लूँगा।


मेरा क्रोध अब लौट आया। मैं अपने पर बहुत क्रुद्ध होकर सोचने लगा, 'ओह! कितना स्‍वार्थी हूँ मैं। उसके एक रुपया पाने पर मैं ईर्ष्‍या करने लगा था न!"


वह नमस्‍कार करके चला गया। हम लोग लता-कुंज देखने के लिए चले।


उस छोटे से बनावटी जंगल में संध्‍या साँय-साँय करने लगी थी। अस्‍ताचलगामी सूर्य की अंतिम किरण वृक्षों की पत्तियों से विदाई ले रही थी। एक शांत वातावरण था। हमलोग धीरे-धीरे मोटर से हावड़ा की ओर आ रहे थे।


रह-रहकर छोटा जादूगर स्‍मरण हो आता था। तभी सचमुच वह एक झोंपड़ी के पास कंबल कंधे पर डाले मिल गया। मैंने मोटर रोककर उससे पूछा, तुम यहाँ कहाँ?"


मेरी माँ यहीं है न! अब उसे अस्‍पताल वालों ने निकाल दिया है। मैं उतर गया। उस झोंपड़ी में देखा तो एक स्‍त्री चिथड़ों से लदी हुई काँप रही थी।


छोटे जादूगर ने कंबल ऊपर से डालकर उसके शरीर से चिमटते हुए कहा, माँ!"


मेरी आँखों से आँसू निकल पड़े।


बड़े दिन की छुट्टी बीत चली थी। मुझे अपने ऑफिस में समय से पहुँचना था। कलकत्‍ते से मन ऊब गया था। फिर भी चलते-चलते एक बार उस उद्यान को देखने की इच्‍छा हुई।साथ-ही-साथ जादूगर भी दिखाई पड़ जाता तो और भी.... मैं उस दिन अकेले ही चल पड़ा। जल्‍द लौट आना था।


दस बज चुके थे। मैंने देखा कि उस निर्मल धूप में सड़क के किनारे एक कपड़े पर छोटे जादूगर का रंगमंच सजा था। मैं मोटर रोककर उतर पड़ा। वहाँ बिल्‍ली रूठ रही थी।भालू मनाने चला था। ब्‍याह की तैयारी थी, यह सब होते हुए भी जादूगर की वाणी में वह प्रसन्‍नता की तरी नहीं थी। जब वह औरों को हँसाने की चेष्‍टा कर रहा था, तब जैसे स्‍वयं काँप जाता था। मानो उसके रोएँ रो रहे थे। मैं आश्‍चर्य से देख रहा था। खेल हो जाने पर पैसा बटोरकर उसने भीड़ में मुझे देखा। वह जैसे क्षण भर के लिए स्‍फूर्तिमान हो गया। मैंने उसकी पीठ थपथपाते हुए पूछा, आज तुम्‍हारा खेल जमा क्‍यों नहीं?"


माँ ने कहा है कि आज तुरंत चले आना। मेरी अंतिम घड़ी समीप है। अविचल भाव से उसने कहा।


तब भी तुम खेल दिखलाने चले आए!" मैंने कुछ क्रोध से कहा। मनुष्‍य के सुख-दु:ख का माप अपना ही साधन तो है। उसके अनुपात से वह तुलना करता है।


उसके मुँह पर वहीं परिचित तिरस्‍कार की रेखा फूट पड़ी।


उसने कहा, क्‍यों न आता?"


और कुछ अधिक कहने में जैसे वह अपमान का अनुभव कर रहा था।


क्षण भर में मुझे अपनी भूल मालूम हो गई। उसके झो


ले को गाड़ी में फेंककर उसे भी बैठाते हुए मैंने कहा, जल्‍दी चलो। मोटरवाला मेरे बताए हुए पथ पर चल पड़ा।


कुछ ही मिनटों में मैं झोंपड़े के पास पहुँचा। जादूगर दौड़कर झोंपड़े में माँ-माँ पुकारते हुए घुसा। मैं भी पीछे था, किंतु स्‍त्री के मुँह से, 'बे...' निकलकर रह गया। उसके दुर्बल हाथ उठकर गिर गए। जादूगर उससे लिपटा रो रहा था। मैं स्‍तब्‍ध था। उस उज्‍ज्‍वल धूप में समग्र संसार जैसे जादू-सा मेरे चारों ओर नृत्‍य करने लगा।



मंगलवार, 21 जनवरी 2025

मन्नू भण्डारी – त्रिशंकु

 

मन्नू भण्डारी – त्रिशंकु

 

“घर की चारदीवारी आदमी को सुरक्षा देती है पर साथ ही उसे एक सीमा में बाँधती भी है। स्कूल-कॉलेज जहाँ व्यक्ति के मस्तिष्क का विकास करते हैं, वहीं नियम-क़ायदे और अनुशासन के नाम पर उसके व्यक्तित्व को कुंठित भी करते हैं—बात यह है बंधु कि हर बात का विरोध उसके भीतर ही रहता है।”

ये सब मैं किसी किताब के उदाहरण नहीं पेश कर रही। ऐसी भारी-भरकम किताबें पढ़ने का मेरा बूता ही नहीं। ये तो उन बातों और बहसों के टुकड़े हैं जो रात-दिन हमारे घर में हुआ करती हैं। हमारा घर, यानी बुद्धिजीवियों का अखाड़ा। यहाँ सिगरेट के धुएँ और कॉफ़ी के प्यालों के बीच बातों के बड़े-बड़े तूमार बाँधे जाते हैं... बड़ी-बड़ी शाब्दिक क्रांतियाँ की जाती हैं। इस घर में काम कम और बातें ज्य़ादा होती हैं। मैंने कहीं पढ़ा तो नहीं, पर अपने घर से यह लगता ज़रूर है कि बुद्धिजीवियों के लिए काम करना शायद वर्जित है। मातुश्री अपनी तीन घंटे की तफ़रीहनुमा नौकरी बजाने के बाद मुक्त। थोड़ा-बहुत पढ़ने-लिखने के बाद जो समय बचता है वह या तो बात-बहस में जाता है या फिर लोट लगाने में। उनका ख़याल है कि शरीर के निष्क्रिय होते ही मन-मस्तिष्क सक्रिय हो उठते हैं और ये दिन के चौबीस घंटों में से बारह घंटे अपना मन-मस्तिष्क ही सक्रिय बनाए रखती हैं। पिताश्री और भी दो क़दम आगे! उनका बस चले तो वे नहाएँ भी अपनी मेज़ पर ही।

जिस बात की हमारे यहाँ सबसे अधिक कताई होती है, वह है— आधुनिकता! पर ज़रा ठहरिए, आप आधुनिकता का ग़लत अर्थ मत लगाइए। यह बाल कटाने और छुरी-काँटे से खाने वाली आधुनिकता कतई नहीं। यह है ठेठ बुद्धिजीवियों की आधुनिकता। यह क्या होती है सो तो ठीक-ठीक मैं भी नहीं जानती—पर हाँ, इसमें लीक छोड़ने की बात बहुत सुनाई देती है। आप लीक की दुलत्ती झाड़ते आइए, सिर-आँखों पर लीक से चिपककर आइए, दुलत्ती खाइए।

बहसों में यों दुनिया-जहान के विषय पीसे जाते हैं पर एक विषय शायद सब लोगों को बहुत प्रिय है और वह है शादी। शादी यानी बर्बादी। हल्के-फुल्के ढंग से शुरू हुई बात एकदम बौद्धिक स्तर पर चली जाती है— विवाह संस्था एकदम खोखली हो चुकी है...पति-पत्नी का संबंध बड़ा नक़ली और ऊपर से थोपा हुआ है—और फिर धुआँधार ढंग से विवाह की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। इस बहस में अक्सर स्त्रियाँ एक तरफ़ हो जातीं और पुरुष एक तरफ़, और बहस का माहौल कुछ ऐसा गर्म हो जाया करता कि मुझे पूरा विश्वास हो जाता कि अब ज़रूर एक-दो लोग तलाक़ दे बैठेंगे। पर मैंने देखा कि ऐसा कोई हादसा कभी हुआ नहीं। सारे ही मित्र लोग अपने-अपने ब्याह को ख़ूब अच्छी तरह तह-समेटकर, उस पर जमकर आसन मारे बैठे हैं। हाँ, बहस की रफ़्तार और टोन आज भी वही है।

अब सोचिए, ब्याह को कोसेंगे तो फ्री-लव और फ्री-सेक्स को तो कोसना ही पड़ेगा। इसमें पुरुष लोग उछल-उछलकर आगे रहते— कुछ इस भाव से मानो बात करते ही इनका आधा सुख तो वे ले ही लेंगे। पापा ख़ुद बड़े समर्थक! पर हुआ यों कि घर में हमेशा चुप-चुप रहने वाली दूर-दराज़ की एक दिदिया ने बिना कभी इन बहसों में भाग लिए ही इस पर पूरी तरह अमल कर डाला तो पाया कि सारी आधुनिकता अऽऽऽधम! वह तो फिर ममी ने बड़े सहज ढंग से सारी बात को सँभाला और निरर्थक विवाह के बंधन में बाँधकर दिदिया का जीवन सार्थक किया। हालाँकि यह बात बहुत पुरानी है और मैंने तो बड़ी दबी-ढँकी ज़बान से इसका ज़िक्र ही सुना है।

वैसे पापा-ममी का भी प्रेम-विवाह हुआ था। यों यह बात बिल्कुल दूसरी है कि होश सँभालने के बाद मैंने उन्हें प्रेम करते नहीं, केवल बहस करते ही देखा है। विवाह के पहले अपने इस निर्णय पर ममी को नाना से भी बहुत बहस करनी पड़ी थी और बहस का यह दौर बहुत लंबा भी चला था शायद। इसके बावजूद यह बहस-विवाह नहीं, प्रेम-विवाह ही है, जिसका ज़िक्र ममी बड़े गर्व से किया करती हैं। गर्व विवाह को लेकर नहीं, पर इस बात को लेकर है कि किस प्रकार उन्होंने नाना से मोर्चा लिया। अपने और नाना के बीच हुए संवादों को वे इतनी बार दुहरा चुकी हैं कि मुझे वे कंठस्थ-से हो गए हैं। आज भी जब वे उसकी चर्चा करती हैं तो लीक से हटकर कुछ करने का संतोष उनके चेहरे पर झलक उठता है।

बस, ऐसे ही घर में मैं पल रही हूँ—बड़े मुक्त और स्वच्छंद ढंग से। और पलते-पलते एक दिन अचानक बड़ी हो गई। बड़े होने का यह एहसास मेरे अपने भीतर से इतना नहीं फूटा, जितना बाहर से। इसके साथ भी एक दिलचस्प घटना जुड़ी हुई है। हुआ यों कि घर के ठीक सामने एक बरसाती है—एक कमरा और उसके सामने फैली छत! उसमें हर साल दो-तीन विद्यार्थी आकर रहते... छत पर घूम-घूमकर पढ़ते, पर कभी ध्यान ही नहीं गया। शायद ध्यान जाने जैसी मेरी उम्र ही नहीं थी।

इस बार देखा, वहाँ दो लड़के आए हैं। थे तो वे दो ही, पर शाम तक उनके मित्रों का एक अच्छा-ख़ासा जमघट हो जाता और सारी छत ही नहीं, सारा मोहल्ला तक गुलज़ार! हँसी-मज़ाक, गाना-बजाना और आसपास की जो भी लड़कियाँ उनकी नज़र के दायरे में आ जातीं, उन पर चुटीली फब्तियाँ। पर उनकी नज़रों का असली केंद्र हमारा घर—और स्पष्ट कहूँ तो मैं ही थी। बरामदे में निकलकर मैं कुछ भी करूँ, उधर से एक-न-एक रिमार्क हवा में उछलता हुआ टपकता और मैं भीतर तक थरथरा उठती। मुझे पहली बार लगा कि मैं हूँ—और केवल हूँ ही नहीं, किसी के आकर्षण का केंद्र हूँ। ईमानदारी से कहूँ तो अपने होने का पहला एहसास बड़ा रोमांचक लगा और अपनी ही नज़रों में मैं नई हो उठी—नई और बड़ी!

अजीब-सी स्थिति थी। जब वे फब्तियाँ कसते तो मैं ग़ुस्से से भन्ना जाती—हालाँकि उनकी फब्तियों में अशिष्टता कहीं नहीं थी।...थी तो केवल मन को सहलाने वाली एक चुहल। पर जब वे नहीं होते या होकर भी आपस में ही मशग़ूल रहते तो मैं प्रतीक्षा करती रहती... एक अनाम-सी बेचैनी भीतर-ही-भीतर कसमसाती रहती। आलम यह है कि हर हालत में ध्यान वहीं अटका रहता और मैं कमरा छोड़कर बरामदे में ही टँगी रहती।

पर इन लड़कों के इस हल्ले-गुल्ले वाले व्यवहार ने मोहल्ले वालों की नींद ज़रूर हराम कर दी। हमारा मोहल्ला यानी हाथरस—खुरजा के लालाओं की बस्ती। जिनके घरों में किशोरी लड़कियाँ थीं, वे बाँहें चढ़ा-चढ़ाकर दाँत और लात तोड़ने की धमकियाँ दे रहे थे क्योंकि सबको अपनी लड़कियों का भविष्य ख़तरे में जो दिखाई दे रहा था। मोहल्ले में इतनी सरगर्मी और मेरे ममी-पापा को कुछ पता ही नहीं। बात असल में यह है कि इन लोगों ने अपनी स्थिति एक द्वीप जैसी बना रखी है। सबके बीच रहकर भी सबसे अलग।

एक दिन मैंने ममी से कहा, “ममी, ये जो सामने लड़के आए हैं, जब देखो मुझ पर रिमार्क पास करते हैं। मैं चुपचाप नहीं सुनूँगी, मैं भी यहाँ से जवाब दूँगी।”

“कौन लड़के?”—ममी ने आश्चर्य से पूछा।

कमाल है, ममी को कुछ पता नहीं। मैंने कुछ खीज और कुछ पुलक के मिले-जुले स्वर में सारी बात बताई। पर ममी पर कोई विशेष प्रतिक्रिया ही नहीं हुई।

“बताना कौन हैं ये लड़के...”—बड़े ठंडे लहज़े में उन्होंने कहा और फिर पढ़ने लगीं। अपना छेड़ा जाना मुझे जितना सनसनीखेज़ लग रहा था, उस पर ममी की ऐसी उदासीनता मुझे अच्छी नहीं लगी। कोई और माँ होती तो फेंटा कसकर निकल जाती और उनकी सात पुश्तों को तार देती। पर ममी पर जैसे कोई असर ही नहीं।

दोपहर ढले लड़कों की मजलिस छत पर जमी तो मैंने ममी को बताया, “देखो, ये लड़के हैं जो सारे समय इधर देखते रहते हैं और मैं कुछ भी करूँ, उस पर फब्तियाँ कसते हैं।” पता नहीं मेरे कहने में ऐसा क्या था कि ममी एकटक मेरी ओर देखती रहीं, फिर धीरे से मुसकुराईं। थोड़ी देर तक छत वाले लड़कों का मुआयना करने के बाद बोलीं, “कॉलेज के लड़के मालूम होते हैं...पर ये तो एकदम बच्चे हैं।”

मन हुआ कहूँ कि मुझे बच्चे नहीं तो क्या बूढे छेड़ेंगे! पर तभी ममी बोलीं, “कल शाम को इन लोगों को चाय पर बुला लेते हैं और तुमसे दोस्ती करवा देते हैं।”

मैं तो अवाक्!

“तुम इन्हें चाय पर बुलाओगी?”—मुझे जैसे ममी की बात पर विश्वास ही नहीं हो रहा था।

“हाँ, क्यों, क्या हुआ? अरे, यह तो हमारे ज़माने में होता था कि मिल तो सकते नहीं, बस दूर से ही फब्तियाँ कस-कसकर तसल्ली करो। अब तो ज़माना बदल गया।”

मैं तो इस विचार-मात्र से ही पुलकित—लगा, ममी सचमुच कोई ऊँची चीज़ है। ये लोग हमारे घर आएँगे और मुझसे दोस्ती करेंगे। एकाएक मुझे लगने लगा कि मैं बहुत अकेली हूँ और मुझे किसी की दोस्ती की सख़्त आवश्यकता है। इस मोहल्ले में मेरा किसी से विशेष मेल-जोल नहीं और घर में केवल ममी-पापा के दोस्त ही आते हैं।

दूसरा दिन मेरा बहुत ही संशय में बीता। पता नहीं ममी अपनी बात पूरी भी करती है या यों ही रौ में कह गईं और बात ख़त्म! शाम को मैंने याद दिलाने के लिए ही कहा, “ममी, तुम सचमुच ही उन लड़कों को बुलाने जाओगी?”—शब्द तो मेरे यही थे, वरना भाव तो था कि ममी, जाओ न, प्लीज़!”

और ममी सचमुच ही चली गईं। मुझे याद नहीं, ममी दो-चार बार से अधिक मोहल्ले में किसी के घर गई हों। मैं साँस रोककर उनके लौटने की प्रतीक्षा करती रही। एक विचित्र-सी थिरकन मैं अंग-प्रत्यंग में महसूस कर रही थी। कहीं ममी साथ ही लेती आईं तो? कहीं वे ममी से बदतमीज़ी से पेश आए तो? पर नहीं, वे ऐसे लगते तो नहीं हैं। कोई घंटे-भर बाद ममी लौटीं। बेहद प्रसन्न।

“मुझे देखते ही उनकी तो सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो गई। उन्हें लगा, अभी तक तो लोग अपने-अपने घरों से ही उनके लात-दाँत तोड़ने की धमकी दे रहे थे, मैं जैसे सीधे घर ही पहुँच गई उनकी हड्डी-पसली एक करने। पर फिर तो इतनी ख़ातिर की बेचारों ने कि बस! बड़े ही स्वीट बच्चे हैं। बाहर से आए हैं—होस्टल में जगह नहीं मिली, इसलिए कमरा लेकर रह रहे हैं। शाम को जब पापा आएँगे तब बुलवा लेंगे।”

प्रतीक्षा में समय इतना बोझिल हो जाता है, यह भी मेरा पहला अनुभव था। पापा आए तो ममी ने बड़े उमंग से सारी बात बताई। सबसे कुछ अलग करने का संतोष और गर्व उनके हर शब्द में से जैसे छलका पड़ रहा था। पापा ही कौन पीछे रहने वाले थे। उन्होंने सुना तो वे भी प्रसन्न।

“बुलाओ लड़कों को! अरे, खेलन-खाने दो और मस्ती मारने दो बच्चों को।”—ममी-पापा को अपनी आधुनिकता तुष्ट करने का एक ज़ोरदार अवसर मिल रहा था।

नौकर को भेजकर उन्हें बुलवाया गया तो अगले ही क्षण सब हाज़िर! ममी ने बड़े क़ायदे से परिचय करवाया और “हलो... हाई” का आदान-प्रदान हुआ।

“तनु बेटे, अपने दोस्तों के लिए चाय बनाओ!”

धत्तेरे की! ममी के दोस्त आएँ तब भी तनु बेटा चाय बनाए और उसके दोस्त आएँ तब भी! पर मन मारकर उठी।

चाय-पानी होता रहा। ख़ूब हँसी-मज़ाक भी चला। वे सफ़ाई पेश करते रहे कि मोहल्ले वाले झूठ-मूठ ही उनके पीछे पड़े रहते हैं...वे तो ऐसा कुछ भी नहीं करते। “जस्ट फ़ॉर फ़न” कुछ कर दिया वरना इस सबका कोई मतलब नहीं।

पापा ने बढ़ावा देते हुए कहा, “अरे, इस उमर में तो यह सब करना ही चाहिए। हमें मौक़ा मिले तो आज भी करने से बाज न आएँ।”

हँसी की एक लहर यहाँ से वहाँ तक दौड़ गई। कोई दो घंटे बाद वे चलने लगे तो ममी ने कहा, “देखो, इसे अपना ही घर समझो। जब इच्छा हो, चले आया करो। हमारी तनु बिटिया को अच्छी कंपनी मिल जाएगी... कभी तुम लोगों से कुछ पढ़ भी लिया करेगी और देखो, कुछ खाने-पीने का मन हुआ करे तो बता दिया करना, तुम्हारे लिए बनवा दिया करूँगी।”—और वे लोग पापा के खुलेपन और ममी की आत्मीयता और स्नेह पर मुग्ध होते हुए चले गए। बस, जिससे दोस्ती करवाने के लिए उन्हें बुलाया गया था, यह बेचारी इस तमाशे की मात्र दर्शक भर ही बनी रही।

उनके जाने के बाद बड़ी देर तक उनको लेकर ही चर्चा होती रही। अपने घर की किशोरी लड़की को छेड़ने वाले लड़कों को घर बुलाकर चाय पिलाई जाए और लड़की से दोस्ती करवाई जाए, यह सारी बात ही बड़ी थ्रिलिंग और रोमांचक लग रही थी। दूसरे दिन से ममी हर आने वाले से इस घटना का उल्लेख करतीं। वर्णन करने में पटु ममी नीरस-से-नीरस बात को भी ऐसा दिलचस्प बना देती हैं, फिर यह तो बात ही बड़ी दिलचस्प थी। जो सुनता वही कहता, “वाह, यह हुई न कुछ बात। आपका बड़ा स्वस्थ दृष्टिकोण है चीज़ों के प्रति। वरना लोग बातें तो बड़ी-बड़ी करेंगे, पर बच्चों को घोटकर रखेंगे और ज़रा-सा शक-ओ-शुब्ह हो जाए तो बाक़ायदा जासूसी करेंगे। और ममी इस प्रशंसा से निहाल होती हुई कहतीं, “और नहीं तो क्या? मुक्त रहो और बच्चों को मुक्त रखो। हम लोगों को बचपन में यह मत करो, यहाँ मत जाओ—कह-कहकर कितना बाँधा गया था। हमारे बच्चे तो कम-से-कम इस घुटन के शिकार न हों।”

पर ममी का बच्चा उस समय एक दूसरी ही घुटन का शिकार हो रहा था और वह यह कि जिस नाटक की हीरोइन उसे बनना था, उसकी हीरोइन ममी बन बैठीं।

ख़ैर, इस सारी घटना का परिणाम यह हुआ कि उन लड़कों का व्यवहार एकदम ही बदल गया। जिस शराफ़त को ममी ने उन पर लाद दिया, उसके अनुरूप व्यवहार करना उनकी मजबूरी बन गई। अब जब भी वे अपनी छत पर ममी-पापा को देखते तो अदब में लपेटकर एक नमस्कार और मुझे देखते तो मुस्कान में लपेटकर एक ‘हाई’ उछाल देते। फब्तियों की जगह बाक़ायदा हमारा वार्तालाप शुरू हो गया—बड़ा खुला और बेझिझक वार्तालाप। हमारे बरामदे और छत में इतना ही फ़ासला था कि ज़ोर से बोलने पर बातचीत की जा सकती थी। हाँ, यह बात ज़रूर थी कि हमारी बातचीत सारा मोहल्ला सुनता था और काफ़ी दिलचस्पी से सुनता था। जैसे ही हम लोग चालू होते, पास-पड़ोस की खिड़कियों में चार-छह सिर और धड़ आकर चिपक जाते। मोहल्लों में लड़कियों के प्रेम-प्रसंग न हों, ऐसी बात तो थी नहीं—बाक़ायदा लड़कियों के भागने तक की घटनाएँ घट चुकी थीं। पर वह सब कुछ बड़े गुप्त और छिपे ढंग से होता था और मोहल्ले वाले जब अपनी पैनी नज़रों से ऐसे किसी रहस्य को जान लेते थे तो बड़ा संतोष उन्हें होता था। पुरुष मूँछों पर ताव देकर और स्त्रियाँ हाथ नचा-नचाकर, ख़ूब नमक-मिर्च लगाकर इन घटनाओं का यहाँ से वहाँ तक प्रचार करतीं। कुछ इस भाव से कि अरे, हमने दुनिया देखी है— हमारी आँखों में कोई नहीं धूल झोंक सकता है। पर यहाँ स्थिति ही उलट गई थी। हमारा वार्तालाप इतने खुलेआम होता था कि लोगों को खिड़कियों की ओट में छिप-छिपकर देखना-सुनना पड़ता था और सुनकर भी ऐसा कुछ उनके हाथ नहीं लगता था जिससे वे कुछ आत्मिक संतोष पाते।

पर बात को बढ़ना था और बात बढ़ी। हुआ यह कि धीरे-धीरे छत की मजलिस मेरे अपने कमरे में जमने लगी। रोज़ ही कभी दो तो कभी तीन या चार लड़के आकर जम जाते और दुनिया भर के हँसी-मज़ाक और गपशप का दौर चलता। गाना-बजाना भी होता और चाय-पानी भी। शाम को ममी-पापा के मित्र आते तो इन लोगों में से कोई-न-कोई बैठा ही होता। शुरू में जिन लोगों ने ‘मुक्त रहो और मुक्त रखो’ की बड़ी प्रशंसा की थी, उन्होंने मुक्त रहने का जो रूप देखा तो उनकी आँखों में भी कुछ अजीब-सी शंकाएँ तैरने लगीं। ममी की एकाध मित्र ने दबी ज़बान में कहा भी, “तनु तो बड़ी फ़ास्ट चल रही है।” ममी का अपना सारा उत्साह मंद पड़ गया था और लीक से हटकर कुछ करने की थ्रिल पूरी तरह झड़ चुकी थी। अब तो उन्हें इस नंगी सच्चाई को झेलना था कि उनकी निहायत ही कच्ची और नाज़ुक उम्र की लड़की तीन-चार लड़कों के बीच घिरी रहती है। और ममी की स्थिति यह थी कि वे न इस स्थिति को पूरी तरह स्वीकार कर पा रही थीं और न अपने ही द्वारा बड़े जोश में शुरू किए इस सिलसिले को नकार ही पा रही थीं।

आख़िर एक दिन उन्होंने मुझे अपने पास बिठाकर कहा, “तनु बेटे, ये लोग रोज़-रोज़ यहाँ आकर जम जाते हैं। आख़िर तुमको पढ़ना-लिखना भी तो है। मैं तो देख रही हूँ कि इस दोस्ती के चक्कर में तेरी पढ़ाई-लिखाई सब चौपट हुई जा रही है। इस तरह तो यह सब चलेगा नहीं।’’

“रात को पढ़ती तो हूँ।”—लापरवाही से मैंने कहा।

“ख़ाक पढ़ती है रात को, समय ही कितना मिलता है? और फिर यह रोज़-रोज़ की धमा-चौकड़ी मुझे वैसे भी पसंद नहीं। ठीक है, चार-छह दिन में कभी आ गए, गपशप कर ली पर यहाँ तो एक-न-एक रोज़ ही डटा रहता है।’’—ममी के स्वर में आक्रोश का पुट गहराता जा रहा था।

ममी की यह टोन मुझे अच्छी नहीं लगी, पर मैं चुप।

“तू तो उनसे बहुत खुल गई है, कह दे कि वे लोग भी बैठकर पढ़ें और तुझे भी पढ़ने दें। और तुझसे न कहा जाए तो मैं कह दूँगी!”

पर किसी के भी कहने की नौबत नहीं आई। कुछ तो पढ़ाई की मार से, कुछ दिल्ली के दूसरे आकर्षणों से खिंचकर होस्टल वाले लड़कों का आना कम हो गया। पर सामने के कमरे से शेखर रोज़ ही आ जाता—कभी दोपहर में तो कभी शाम! तीन-चार लोगों की उपस्थिति में उसकी जिस बात पर मैंने ध्यान नहीं दिया, वही बात अकेले में सबसे अधिक उजागर होकर आई। वह बोलता कम था, पर शब्दों के परे बहुत कुछ कहने की कोशिश करता था और एकाएक ही मैं उसकी अनकही भाषा समझने लगी थी... केवल समझने ही नहीं लगी थी, प्रत्युत्तर भी देने लगी थी। जल्दी ही मेरी समझ में आ गया कि शेखर और मेरे बीच प्रेम जैसी कोई चीज़ पनपने लगी है। यों तो शायद मैं समझ ही नहीं पाती, पर हिंदी फ़िल्में देखने के बाद इसको समझने में ख़ास मुश्किल नहीं हुई।

जब तक मन में कहीं कुछ नहीं था, सब कुछ बड़ा खुला था पर जैसे ही ‘कुछ' हुआ तो उसे औरों की नज़र से बचाने की इच्छा भी साथ हो आई। जब कभी दूसरे लड़के आते तो सीढ़ियों से ही शोर करते आते—ज़ोर-ज़ोर से बोलते। लेकिन शेखर जब भी आता रेंगता हुआ आता और फुसफुसाकर हम बातें करते। वैसे बातें बहुत ही साधारण होती थीं— स्कूल की, कॉलेज की। पर फुसफुसाकर करने में ही वे कुछ विशेष लगती थीं। प्रेम को कुछ रहस्यमय, कुछ गुपचुप बना दो तो वह बड़ा थ्रिलिंग हो जाता है वरना तो एकदम सीधा-सपाट! पर ममी के पास घर और घर वालों के हर रहस्य को जान लेने की एक छठी इंद्रिय है जिससे पापा भी काफ़ी त्रस्त रहते हैं—उससे उन्हें यह सब समझने में ज़रा भी देर नहीं लगती। शेखर कितना ही दब-छिपकर आता और ममी घर के किसी भी कोने में होतीं—फट से प्रकट हो जातीं या फिर वहीं से पूछतीं, “तनु, कौन है तुम्हारे कमरे में?”

मैंने देखा कि शेखर के इस रवैए से ममी के चेहरे पर एक अजीब-सी परेशानी झलकने लगी है। पर ममी इस बात को लेकर यों परेशान हो उठेंगी, यह तो मैं सोच भी नहीं सकती थी। जिस घर में रात-दिन तरह-तरह के प्रेम-प्रसंग ही पीसे जाते रहे हों—कुँआरों के प्रेम-प्रसंग, विवाहितों के प्रेम-प्रसंग, दो-तीन प्रेमियों से एक साथ चलने वाले प्रेम-प्रसंग—उस घर के लिए तो यह बात बहुत ही मामूली होनी चाहिए। जब लड़कों से दोस्ती की है तो एकाध से प्रेम भी हो ही सकता है। ममी ने शायद समझ लिया था कि यह स्थिति आजकल की कलात्मक फ़िल्मों की तरह चलेगी—जिनकी वे बड़ी प्रशंसक और समर्थक हैं—पर जिनमें शुरू से लेकर आख़िर तक कुछ भी सनसनीखेज़ घटता ही नहीं।

जो भी हो, ममी की इस परेशानी ने मुझे भी कहीं हल्के से विचलित ज़रूर कर दिया। ममी मेरी माँ ही नहीं, मित्र और साथिन भी हैं। दो घनिष्ठ मित्रों की तरह ही हम दुनिया-जहान की बातें करते हैं, हँसी-मज़ाक करते है। मैं चाहती थी कि वे इस बारे में भी कोई बात करें, पर उन्होंने कोई बात नहीं की। बस, जब शेखर आता तो वे अपनी स्वभावगत लापरवाही छोड़कर बड़े सजग भाव से मेरे कमरे के इर्द-गिर्द ही मंडराती रहतीं।

एक दिन ममी के साथ बाहर जाने के लिए नीचे उतरी तो दरवाज़े पर ही पड़ोस की एक भद्र महिला टकरा गई। नमस्कार और कुशलक्षेम के आदान-प्रदान के बाद वे बात के असली मुद्दे पर आईं।

“ये सामने की छत वाले लड़के आपके रिश्तेदार हैं क्या?”

“नहीं तो।”

“अच्छा? शाम को रोज़ आपके घर बैठे रहते हैं तो सोचा आपके ज़रूर कुछ लगते होंगे।

“तनु के दोस्त हैं। ममी ने कुछ ऐसी लापरवाही और नि:संकोच भाव से यह वाक्य उछाला कि बेचारी तीर निशाने पर न लगने का ग़म लिए ही लौट गई।

वे तो लौट गईं पर मुझे लगा कि इस बात का सूत्र पकड़कर ही ममी अब ज़रूर मेरी थोड़ी धुनाई कर देंगी। कहने वाली का तो कुछ न बना पर मेरा कुछ बिगाड़ने का हथियार तो ममी के हाथ में आ ही गया। बहुत दिनों से उनके अपने मन में कुछ उमड़-घुमड़ तो रहा ही है पर ममी ने इतना ही कहा- “लगता है इनके अपने घर में कोई धंधा नहीं है—जब देखो दूसरे के घर में चोंच गड़ाए बैठे रहते हैं।”

मैं आश्वस्त ही नहीं हुई, बल्कि ममी की ओर से इसे हरा सिग्नल समझ कर मैंने अपनी रफ़्तार कुछ और तेज़ कर दी। पर इतना ज़रूर किया कि शेखर के साथ तीन घंटों में से एक घंटा ज़रूर पढ़ाई में गुज़ारती। वह बहुत मन लगाकर पढ़ाता और मैं बहुत मन लगाकर पढ़ती। हाँ, बीच-बीच में वह काग़ज़ की छोटी-छोटी पर्चियों पर कुछ ऐसी पंक्तियाँ लिखकर थमा देता कि मैं भीतर तक झनझना जाती। उसके जाने के बाद भी उन पंक्तियों के वे शब्द—शब्दों के पीछे के भाव, मेरी रग-रग में सनसनाते और मैं उन्हीं में डूबी रहती।

मेरे भीतर अपनी ही एक दुनिया बनती जा रही थी—बड़ी भरी-पूरी और रंगीन। आजकल मुझे किसी की ज़रूरत ही महसूस नहीं होती। लगता जैसे मैं अपने में ही पूरी हूँ। हमेशा साथ रहने वाली ममी भी आउट होती जा रही हैं और शायद यही कारण है कि इधर मैंने ममी पर ध्यान देना ही छोड़ दिया है। रोज़मर्रा की बातें तो होती हैं, पर केवल बातें ही होती हैं—उसके परे कहीं कुछ नहीं।

दिन गुज़रते जा रहे थे और मैं अपने में ही डूबी, अपनी दुनिया में और गहरे धँसती जा रही थी—बाहर की दुनिया से एक तरह से बेख़बर-सी!

एक दिन स्कूल से लौटी, कपड़े बदले। शोर-शराबे के साथ खाना माँगा, मीन-मेख के साथ खाया और जब कमरे में घुसी तो ममी ने लेटे-लेटे ही बुलाया- “तनु, इधर आओ।”

पास आई तो पहली बार ध्यान गया कि ममी का चेहरा तमतमा रहा है। मेरा माथा ठनका। उन्होंने साइड-टेबिल पर से एक किताब उठाई और उसमें से काग़ज़ की पाँच-छह पर्चियाँ सामने कर दीं। “तोबा!”—ममी से कुछ पढ़ना था सो जाते समय उन्हें अपनी किताब दे गई थी। ग़लती से शेखर की लिखी पर्चियाँ उसी में रह गईं।

“तो इस तरह चल रही है शेखर और तुम्हारी दोस्ती? यही पढ़ाई होती है यहाँ बैठकर—यही सब करने के लिए आता है वह यहाँ?”

मैं चुप। जानती हूँ, ग़ुस्से मे ममी को जवाब देने से बढ़कर मूर्खता और कोई नहीं।

“तुमको छूट दी... आज़ादी दी, पर इसका यह मतलब तो नहीं कि तुम उसका नाजायज़ फ़ायदा उठाओ।”

मैं फिर भी चुप।

“बित्ते भर की लड़की और करतब देखो इसके। जितनी छूट दी उतने ही पैर पसरते जा रहे हैं इसके। एक झापड़ दूँगी तो सारा रोमांस झड़ जाएगा दो मिनट में...”

 

इस वाक्य पर मैं एकाएक तिलमिला उठी। तमक कर नज़र उठाई और ममी की तरफ़ देखा... पर यह क्या, यह तो मेरी ममी नहीं हैं। न यह तेवर ममी का है, न यह भाषा। फिर भी यह सारे वाक्य बहुत परिचित-से लगे। लगा, यह सब मैंने कहीं सुना है और खटाक से मेरे मन में कौंधा—नाना। पर नाना को मरे तो कितने साल हो गए, ये फिर ज़िंदा कैसे हो गए? और वह भी ममी के भीतर... जो होश सँभालने के बाद हमेशा उनसे झगड़ा ही करती रहीं... उनकी हर बात का विरोध ही करती रहीं।

ममी का ‘नानई’ लहज़े वाला भाषण काफ़ी देर तक चालू रहा, पर वह सब मुझे कही से भी छू नहीं रहा था—बस कोई बात झकझोर रही थी तो यही कि ममी के भीतर नाना कैसे आ बैठे?

और फिर घर में एक विचित्र-सा तनावपूर्ण मौन छा गया। ख़ासकर मेरे और ममी के बीच। नहीं, ममी तो घर में रही ही नहीं, मेरे और नाना के बीच। मैं ममी को अपनी बात समझा भी सकती हूँ, उनकी बात समझ भी सकती हूँ—पर नाना? मैं तो इस भाषा से भी अपरिचित हूँ और इस तेवर से भी—बात करने का प्रश्न ही कैसे उठता? पापा ज़रूर मेरे दोस्त हैं, पर बिल्कुल दूसरी तरह के। शतरंज खेलना, पंजा लड़ाना और जो फ़रमाइश ममी पूरी न करें, उनसे पूरी करवा लेना। बचपन में उनकी पीठ पर लदी रहती थी और आज भी बिना किसी झिझक के उनकी पीठ पर लदकर अपनी हर इच्छा पूरी करवा लेती हूँ। पर इतने ‘माई डियर दोस्त’ होने के बावजूद अपनी निजी बातें मैं ममी के साथ ही करती आई हूँ। और वहाँ एकदम सन्नाटा—ममी को पटखनी देकर नाना पूरी तरह उन पर सवार जो हैं।

शेखर को मैंने इशारे से ही लाल झंडी दिखा दी थी सो वह भी नहीं आ रहा और शाम का समय है कि मुझसे काटे नहीं कटता।

कई बार मन हुआ कि ममी से जाकर बात करूँ और साफ़-साफ़ पूछूँ कि तुम इतना बिगड़ क्यों रही हो? मेरी और शेखर की दोस्ती के बारे में तुम जानती तो हो। मैंने तो कभी कुछ छिपाया नहीं, और दोस्ती है तो यह सब तो होगा ही। तुम क्या समझ रही थीं कि हम भाई-बहन की तरह...पर तभी ख़याल आता कि ममी हैं ही कहाँ, जिनसे जाकर यह सब कहूँ।

चार दिन हो गए, मैंने शेखर की सूरत तक नहीं देखी। मेरे हल्के से इशारे से ही उस बेचारे ने तो घर क्या, छत पर आना भी छोड़ दिया। होस्टल में रहने वाले उसके साथी भी छत पर न दिखाई दिए, न घर ही आए। कोई आता तो कम-से-कम उसका हालचाल ही पूछ लेती। मैं जानती हूँ, वह बेवकूफ़ी की हद तक भावुक है। उसे तो ठीक से यह भी नहीं मालूम कि आख़िर यहाँ हुआ क्या है? लगता है ममी के ग़ुस्से की आशंका मात्र से ही सबके हौसले पस्त हो गए थे।

वैसे कल से ममी के चेहरे का तनाव कुछ ढीला ज़रूर हुआ है। तीन दिन से जमी हुई सख़्ती जैसे पिघल गई हो। पर मैंने तय कर लिया है कि बात अब ममी ही करेंगी।

सवेरे नहा-धोकर मैं दरवाज़े के पीछे अपनी यूनिफ़ॉर्म प्रेस कर रही थी। बाहर मेज़ पर ममी चाय बना रही थीं और पापा अख़बार में सिर गड़ाए बैठे थे। ममी को शायद मालूम ही नहीं पड़ा कि मैं कब नहाकर बाहर निकल आई। वे पापा से बोलीं— “जानते हो कल रात को क्या हुआ? पता नहीं, तब से मन बहुत ख़राब हो गया—उसके बाद मैं तो सो ही नहीं पाई।”

ममी के स्वर की कोमलता से मेरा हाथ जहाँ का तहाँ थम गया और कान बाहर लग गए।

“आधी रात के क़रीब मैं बाथरूम जाने के लिए उठी। सामने छत पर घुप्प अँधेरा छाया हुआ था। अचानक एक लाल सितारा-सा चमक उठा। मैं चौंकी। ग़ौर से देखा तो धीरे-धीरे एक आकृति उभर आई। शेखर छत पर खड़ा सिगरेट पी रहा था। मैं चुपचाप लौट आई। कोई दो घंटे बाद फिर गई तो देखा वह उसी तरह छत पर टहल रहा था बेचारा—मेरा मन जाने कैसा हो आया। तनु भी कैसी बुझी-बुझी रहती है...” फिर जैसे अपने को ही धिक्कारती-सी बोलीं— “पहले तो छूट दो और जब आगे बढ़ें तो खींचकर चारों खाने चित्त कर दो। यह भी कोई बात हुई भला।”

राहत की एक गहरी निःश्वास मेरे भीतर से निकल पड़ी। जाने कैसा आवेग मन में उमड़ा कि इच्छा हुई दौड़कर ममी के गले से लग जाऊँ। लगा जैसे अरसे के बाद मेरी ममी लौटकर आई हों। पर मैंने कुछ नहीं कहा। बस, अब खुलकर बात करूँगी। चार दिन से न जाने कितने प्रश्न मन में घुमड़ रहे थे। अब क्या, अब तो ममी हैं, और उनसे तो कम-से-कम सब कहा-पूछा जा सकता है।

पर घर पहुँचकर जो देखा तो अवाक्! शेखर हथेलियों में सिर थामे कुर्सी पर बैठा है और ममी उसी कुर्सी के हत्थे पर बैठी उसकी पीठ और माथा सहला रही हैं। मुझे देखते ही बड़े सहज-स्वाभाविक स्वर में बोलीं- “देखा इस पगले को। चार दिन से ये साहब कॉलेज नहीं गए हैं। न ही कुछ खाया-पिया है। अपने साथ इसका भी खाना लगवाना।”

और फिर ममी ने ख़ुद बैठकर बड़े स्नेह से मनुहार कर-करके उसे खाना खिलाया। खाने के बाद कहने पर भी शेखर ठहरा नहीं। ममी के प्रति कृतज्ञता के बोझ से झुका-झुका ही वह लौट गया और मेरे भीतर ख़ुशी का ऐसा ज्वार उमड़ा कि अब तक के सोचे सारे प्रश्न उसी में बिला गए।

सारी स्थिति को समय पर आने में समय तो लगा, पर आ गई। शेखर ने भी अब एक-दो दिन छोड़कर आना शुरू किया और आता भी तो अधिकतर हम लिखाई-पढ़ाई की ही बात करते। अपने किए पर शर्मिंदगी प्रकट करते हुए उसने ममी से वायदा किया कि वह अब कोई ऐसा काम नहीं करेगा, जिससे ममी को शिकायत हो। जिस दिन वह नहीं आता, मैं दो-तीन बार थोड़ी-थोड़ी देर के लिए अपने बरामदे से ही बात कर लिया करती। घर की अनुमति और सहयोग से यों सरे-आम चलने वाले इस प्रेम-प्रसंग में मोहल्ले वालों के लिए भी कुछ नहीं रह गया था और उन्होंने इस जानलेवा ज़माने के नाम दो-चार लानतें भेजकर, किसी गुल खिलने तक के लिए अपनी दिलचस्पी को स्थगित कर दिया था।

लेकिन एक बात मैंने ज़रूर देखी। जब भी शेखर शाम को कुछ ज्य़ादा देर बैठ जाता या दोपहर में भी आता तो ममी के भीतर नाना कसमसाने लगते और उसकी प्रतिक्रिया ममी के चेहरे पर झलकने लगती। ममी भरसक कोशिश करके नाना को बोलने तो नहीं देतीं, पर उन्हें पूरी तरह हटा देना भी शायद ममी के बस की बात नहीं रह गई थी।

हाँ, यह प्रसंग मेरे और ममी के बीच में अब रोज़मर्रा की बातचीत का विषय ज़रूर बन गया था। कभी वे मज़ाक में कहतीं— “यह जो तेरा शेखर है न, बड़ा लिजलिजा-सा लड़का है। अरे, इस उम्र के लड़कों को चाहिए घूमें-फिरें, मस्ती मारें। क्या मुहर्रमी-सी सूरत बनाए मजनूँ की तरह छत पर टँगा सारे समय इधर ही ताकता रहता है।”

मैं केवल हँस देती।

कभी बड़ी भावुक होकर कहतीं— “तू क्यों नहीं समझती बेटे, कि तुझे लेकर कितनी महत्त्वाकांक्षाएँ है मेरे मन में। तेरे भविष्य को लेकर कितने सपने सँजो रखे हैं मैंने।”

मैं हँसकर कहती— “ममी, तुम भी कमाल करती हो। अपनी ज़िंदगी को लेकर भी तुम सपने देखो और मेरी ज़िंदगी के सपने भी तुम्हीं देख डालो...कुछ सपने मेरे लिए भी छोड़ दो!”

कभी वे समझाने के लहज़े में कहतीं— “देखो तनु, अभी तुम बहुत छोटी हो। अपना सारा ध्यान पढ़ने-लिखने में लगाओ और दिमाग़ से ये उल्टे-सीधे फ़ितूर निकाल डालो। ठीक है, बड़े हो जाओ तो प्रेम भी करना और शादी भी। मैं तो वैसे भी तुम्हारे लिए लड़का ढूँढ़ने वाली नहीं हूँ—अपने आप ही ढूँढ़ना, पर इतनी अकल तो आ जाए कि ढंग का चुनाव कर सको।”

अपने चुनाव के रिजेक्शन को मैं समझ जाती और पूछती— “अच्छा, ममी बताओ, जब तुमने पापा को चुना था तो वह नाना को पसंद था?”

“मेरा चुनाव! अपनी सारी पढ़ाई-लिखाई ख़त्म करके पच्चीस साल की उम्र में चुनाव किया था मैंने—ख़ूब सोच-समझकर और अकल के साथ, समझी।”

ममी अपनी बौखलाहट को ग़ुस्से मे छिपाकर कहतीं। उम्र और पढ़ाई-लिखाई, ये दो ही तो ऐसे मुद्दे हैं जिस पर ममी मुझे जब-तब डाँटती रहती हैं। पढ़ने-लिखने में मैं अच्छी थी और रही उम्र का सवाल, सो उसके लिए मन होता कि कहूँ— “ममी, तुम्हारी पीढ़ी जो काम पच्चीस साल की उम्र में करती थी, हमारी उसे पंद्रह साल की उम्र में ही करेगी, इसे तुम क्यों नहीं समझती। पर चुप रह जाती। नाना का ज़िक्र तो चल ही पड़ा है, कही वे जी-जाग उठे तो!

छमाही परीक्षाएँ पास आ गई थीं और मैंने सारा ध्यान पढ़ने में लगा दिया था। सबका आना और गाना-बजाना एकदम बंद! इन दिनों मैंने इतनी जमकर पढ़ाई की कि ममी का मन प्रसन्न हो गया। शायद कुछ आश्वस्त भी। आख़िरी पेपर देने के पश्चात् लग रहा था कि एक बोझ था, जो हट गया है। मन बेहद हल्का होकर कुछ मस्ती मारने को कर रहा था। मैंने ममी से पूछा— “ममी, कल शेखर और दीपक पिक्चर जा रहे हैं, मैं भी साथ चली जाऊँ?” आज तक मैं इन लोगों के साथ कभी घूमने नहीं गई थी, पर इतनी पढ़ाई करने के बाद अब इतनी छूट तो मिलनी ही थी।

ममी एक क्षण मेरा चेहरा देखती रहीं, फिर बोलीं— “इधर आ, यहाँ बैठ! तुझसे कुछ बात करनी है।”

मैं जाकर बैठ गई पर यह न समझ आया कि इसमें बात करने को क्या है—हाँ कहो या ना। लेकिन ममी को बात करने का मर्ज़ जो है। उनकी तो हाँ-ना भी पचास-साठ वाक्यों में लिपटे बिना नहीं निकल सकती।

“तेरे इम्तिहान ख़त्म हुए, मैं तो ख़ुद पिक्चर का प्रोग्राम बना रही थी। कौन-सी पिक्चर देखना चाहती है?’’

“क्यों, उन लोगों के साथ जाने में क्या है?”—मेरे स्वर में इतनी खीझ भरी हुई थी कि ममी एकटक मेरा चेहरा ही देखती रह गईं।

“तनु, तुझे पूरी छूट दे रखी है बेटे, पर इतनी ही तेज़ चल कि मैं भी साथ चल सकूँ।”

“तुम साफ़ कहो न, कि जाने दोगी या नहीं? बेकार की बातें... मैं भी साथ चल सकूँ—तुम्हारे साथ चल सकने की बात भला कहाँ से आ गई!”

ममी ने पीठ सहलाते हुए कहा— “साथ तो चलना ही पड़ेगा। कभी औंधे मुँह गिरी तो उठाने वाला भी तो चाहिए न!”

मैं समझ गई कि ममी नहीं जाने देंगी, पर इस तरह प्यार से मना करती हैं तो झगड़ा भी तो नहीं किया जा सकता। बहस करने का सीधा-सा मतलब है कि उनका बघारा हुआ दर्शन सुनो—यानी पचास मिनट की एक क्लास। पर मैं क़तई नहीं समझ पाई कि जाने में आख़िर हर्ज़ क्या है? हर बात में ना-नुकुर। कहाँ तो कहती थीं कि बचपन में यह मत करो, यहाँ मत जाओ कहकर हमको बहुत डाँटा गया था और ख़ुद अब वही सब कर रही हैं। देख लिया इनकी बड़ी-बड़ी बातों को। मैं उठी और दनदनाती हुई अपने कमरे में आ गई। हाँ, एक वाक्य ज़रूर थमा आई— “ममी, जो चलेगा, वह गिरेगा भी और जो गिरेगा, वह उठेगा भी और ख़ुद ही उठेगा, उसे किसी की ज़रूरत नहीं है।”

पता नहीं, मेरी बात की उन पर प्रतिक्रिया हुई या उनके अपने मन में ही कुछ जागा कि शाम को उन्होंने ख़ुद शेखर और उसके कमरे पर आए तीनों-चारों लड़कों को बुलवाकर मेरे ही कमरे में मजलिस जमवाई और ख़ूब गर्म-गर्म खाना खिलाया। कुछ ऐसा रंग जमा कि मेरा दोपहर वाला आक्रोश धुल गया।

इम्तिहान ख़त्म हो गए थे और मौसम सुहाना था। ममी का रवैया भी अनुकल था सो दोस्ती का स्थगित हुआ सिलसिला फिर शुरू हो गया और आजकल तो जैसे उसके सिवाय कुछ रह ही नहीं गया था। पर फिर एक झटका।

उस दिन मैं अपनी सहेली के घर से लौटी तो ममी की सख़्त आवाज़ सुनाई दी— “तनु इधर आओ तो।”

आवाज़ से ही लगा कि यह ख़तरे का सिग्नल है। एक क्षण को मैं सकते में आ गई। पास गई तो चेहरा पहले की तरह सख़्त।

“तुम शेखर के कमरे में जाती हो?”—ममी ने बंदूक दाग़ी। समझ गई कि पीछे गली में से किसी ने अपना करतब कर दिखाया।

“कब से जाती हो?”

मन तो हुआ कि कहूँ जिसने जाने की ख़बर दी है, उसने बाक़ी बातें भी बता ही दी होंगी... कुछ जोड़-तोड़कर ही बताया होगा। पर ममी जिस तरह भभक रही थीं, उसमे चुप रहना ही बेहतर समझा। वैसे मुझे ममी के इस ग़ुस्से का कोई कारण समझ में नहीं आ रहा था। दो-तीन बार यदि मैं थोड़ी-थोड़ी देर के लिए शेखर के कमरे पर चली गई तो ऐसा क्या गुनाह हो गया। पर ममी का हर काम सकारण तो होता नहीं... बस, वे तो मूड पर ही चलती हैं।

अजीब मुसीबत थी...ग़ुस्से में ममी से बात करने का कोई मतलब नहीं...और मेरी चुप्पी ममी के ग़ुस्से को और भड़का रही थी।

“याद नहीं है, मैंने शुरू में ही तुम्हें मना कर दिया था कि तुम उनके कमरे पर कभी नहीं जाओगी। तीन-तीन घंटे वह यहाँ धूनी रमाकर बैठता है, उसमें जी भरा नहीं तुम्हारा?”

दुःख, क्रोध और आतंक की परतें उनके चेहरे पर गहरी होती जा रही थीं और मैं समझ ही नहीं पा रही थी कि कैसे उन्हें सारी स्थिति समझाऊँ?

“वह तो बेचारे सामने वाली ने मुझे बुलाकर आगाह कर दिया...जानती है यह सिर आज तक किसी के सामने झुका नहीं, पर वहाँ मुझसे आँख नहीं उठाई गई। मुँह दिखाने लायक़ मत रखना हमको कहीं भी। सारी गली में थू-थू हो रही है। नाक कटाकर रख दी।”

ग़ज़ब! इस बार तो सारा मोहल्ला ही बोलने लगा ममी के भीतर से! आश्चर्य है कि जो ममी आज तक अपने आस-पास से बिल्कुल कटी हुई थी...जिसका मज़ाक ही उड़ाया करती थी...आज कैसे उसके सुर-में-सुर मिलाकर बोल रही हैं।

ममी का भाषण बदस्तूर चालू...पर मैंने तो अपने कान के स्विच ही ऑफ़ कर लिए। जब ग़ुस्सा ठंडा होगा, ममी अपने में लौट आएँगी तब समझा दूँगी— ममी, इस छोटी-सी बात को तुम नाहक़ इतना तूल दे रही हो।

पर जाने कैसी डोज़ ले आई हैं इस बार कि उनका ग़ुस्सा ठंडा ही नहीं हो रहा है और हुआ यह कि अब उनके ग़ुस्से से मुझे ग़ुस्सा चढ़ने लगा।

फिर घर में एक अजीब-सा तनाव बढ़ गया। इस बार ममी ने शायद पापा को भी सब कुछ बता दिया है। कहा तो उन्होंने कुछ नहीं—वे शुरू से ही इस सारे मामले में आउट ही रहे—पर इस बार उनके चेहरे पर भी एक अनकहा-सा तनाव दिखाई ज़रूर दे रहा है।

कोई दो महीने पहले जब इस तरह की घटना हुई थी तो मैं भीतर तक सहम गई थी, पर इस बार मैंने तय कर लिया है कि इस सारे मामले में ममी को यदि नाना बनकर ही व्यवहार करना है तो मुझे भी फिर ममी की तरह ही मोर्चा लेना होगा उनसे—और मैं ज़रूर लूँगी। दिखा तो दूँ कि मैं तुम्हारी ही बेटी हूँ और तुम्हारे ही नक़्श-ए-क़दम पर चली हूँ। ख़ुद तो लीक से हटकर चली थीं... सारी ज़िंदगी इस बात की घुट्टी पिलाती रहीं, पर मैंने जैसे ही अपना पहला क़दम रखा, घसीटकर मुझे अपनी ही खींची लीक पर लाने के दंद-फंद शुरू हो गए।

मैंने मन में ढेर-ढेर तर्क सोच डाले कि एक दिन बाक़ायदा ममी से बहस करूँगी। साफ़-साफ़ कहूँगी कि ममी, इतने ही बंधन लगाकर रखना था तो शुरू से वैसे पालतीं। क्यों झूठ-मूठ आज़ादी देने की बातें करती-सिखाती रहीं। पर इस बार मेरा भी मन सुलगकर इस तरह राख हो गया था कि मैं गुमसुम-सी अपने ही कमरे में पड़ी रहती। मन बहुत भर आता तो रो लेती! घर में सारे दिन हँसती-खिलखिलाती रहने वाली मैं एकदम चुप होकर अपने में ही सिमट गई थी। हाँ, एक वाक्य ज़रूर बार-बार दोहरा रही थी— “ममी, तुम अच्छी तरह समझ लो कि मैं भी अपने मन की ही करूँगी।” हालाँकि मेरे मन में क्या है, इसकी कोई भी रूपरेखा मेरे सामने न थी।

मुझे नहीं मालूम कि इन तीन-चार दिनों में बाहर क्या हुआ। घर-बाहर की दुनिया से कटी, अपने ही कमरे में सिमटी, मैं ममी से मोर्चा लेने के दाँव सोच रही थी।

पर आज दोपहर मुझे क़तई-क़तई अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ जब मैंने ममी को अपने बरामदे से ही चिल्लाते हुए सुना— “शेखर, कल तो तुम लोग छुट्टियों में अपने घर चले जाओगे, आज शाम अपने दोस्तों के साथ खाना इधर ही खाना।”

नहीं जानती, किस ज़द्दोज़हद से गुज़रकर ममी इस स्थिति पर पहुँची होंगी।

और रात को शेखर, दीपक और रवि के साथ खाने की मेज़ पर डटा हुआ था। ममी उतने ही प्रेम से खाना खिला रही थीं...पापा वैसे ही खुले ढंग से मज़ाक कर रहे थे, मानो बीच में कुछ घटा ही नहीं। अगल-बग़ल की खिड़कियों में दो-चार सिर चिपके हुए थे। सब कुछ पहले की तरह बहुत सहज-स्वाभाविक हो उठा था।

केवल मैं इस सारी स्थिति से एकदम तटस्थ यही सोच रही थी कि नाना पूरी तरह नाना थे—शत-प्रतिशत और इसी से ममी के लिए लड़ना कितना आसान हो गया होगा। पर इन ममी से लड़ा भी कैसे जाए जो एक पल नाना होकर जीती हैं तो एक पल ममी होकर।

 


 


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