बुधवार, 4 मई 2022

श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यमो की सामाजिक जीवन में भूमिका

 

श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यमो की सामाजिक जीवन में भूमिका :-

श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यमों की उपयोगिता अलग-अलग स्थितियों तथा अलग-अलग सन्दर्भो में अलग-अलग है। किन्तु इसके बावजूद इन सभी माध्यमों का उद्देश्य तथा लक्ष्य एक ही है। समाज की शैक्षिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक धरोहर को वृद्धिगत करने तथा व्यक्ति के 'जानने' एवं 'अभिव्यक्ति' के मूलभूत अधिकार को अक्षुण्ण रखने की दिशा में श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यमों की उपयोगिता को मुख्यतः पाँच प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है।

(1) सूचना :-श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यमों के द्वारा विश्व की विभिन्न घटनाओं, सामाजिक तथा राजनीतिक स्थितियों की सूचना जन-सामान्य को यथाशीघ्र उपलब्ध हो जाती है । इसी के साथ, देश-विदेश की प्रगति तथा वैज्ञानिक आविष्कारों की गति की सूचना भी जनता तक पहुँचाते है।

(2) अभिव्यक्ति :- इन माध्यमों द्वारा व्यक्ति अपने विचार तथा भावों को स्वतन्त्र रूप से अभिव्यक्त करता है। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता सरकारी माध्यमों की अपेक्षा श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यमो में अधिक खुले रूप से रहती है। इसीलिए इनकी महत्ता अन्यों की तुलना में बढ़ जाती है।

(3) विचार तथा घटनाओं का विश्लेषण- श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यम देश-विदेश की घटनाओं की सूचना देने के साथ ही साथ उनके अर्थ का विश्लेषण भी करते हैं तथा सही मुद्दों तथा विचारों के लिए जन-सामान्य का मत-परिवर्तन करने में अहम् भूमिका अदा करते हैं।

(4) प्रगति एवं विकास-श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यम जन-सामान्य की सामाजिक तथा राजनीतिक प्रगति, आर्थिक विकास आदि के लिए सघन अभियान चलाते हैं तथा मिशन के रूप में कार्य करते हैं ।

(5) मनोरंजन -रेडियो, दूरदर्शन तथा फिल्म आदि श्रव्य और श्रव्य-दृश्य  माध्यम जनता के लिए रोचकता तथा मनोरंजन के प्रभावी साधन बनते हैं। इसके साथ, देश-विदेश की कला एवं संस्कृति के समुचित विकास के लिए भी अपना महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान करते हैं।










                                               


गोबिंद कुमार यादव, बिरसा मुंडा कॉलेज, 6294524332


रामनरेश त्रिपाठी की काव्यगत विशेषता

रामनरेश त्रिपाठी की काव्यगत विशेषता ।

प्रारंभिक स्वच्छंदतावादी कवियों में रामनरेश त्रिपाठी का नाम महत्वपूर्ण है। श्रीधर पाठक ने जिस स्वच्छंदतावाद को जन्म दिया, रामनरेश त्रिपाठी ने अपनी रचनाओं द्वारा उस परंपरा को विकसित और संपन्न किया। देश प्रेम तथा राष्ट्रीयता की अनुभूतियां उनकी रचनाओं का मुख्य विषय रही है। हिंदी कविता के मंच पर वे राष्ट्रीय भावनाओं के गायक के रूप में बहुत लोकप्रिय हुए। रामनरेश त्रिपाठी द्वारा रचित साहित्य वैविध्य पूर्ण है।

     रामनरेश त्रिपाठी ने अपने काव्य में परंपराओं का निर्वाह की अपेक्षा नवीन प्रवृत्तियों को अपनाने के प्रति अधिक आग्रह दिखाया। इन्होंने अपने काव्य में सीमित पात्रों का प्रयोग किया है। मुख्य रूप से नायक और नायिका दो ही पात्र अपनाया गया है। इनके नायकों के व्यक्तित्व का अंकन किसी महापुरुष के अभाव युक्त, गौरवशाली, शक्ति संपन्न, रूपरेखा से कम सुंदर नहीं है-

        सिकुरण रहित ललाट ललित अति,

         उन्नत कला विधान।

        पौरुषपूर्ण विषाद वक्षस्थल,

        वृषभ कन्द बलवान।

       हिंदी काव्य में विरह नारियों की अंतर्दशाओं का पर्याप्त चित्रण हुआ है। किंतु वहीं पुरुषों की दशा की अभिव्यक्ति का अभाव है। लेकिन प्रिय वियोग का विरह पुरुष के हृदय में भी होता अवश्य ही है जिसका चित्रण रामनरेश त्रिपाठी ने निम्न पंक्तियों में किया है-

          प्रेम पद्मिनी! प्रेमलता हे! प्राण बल्लभे! हे प्राणेश्वरी।

          मेरी प्रिय पद्मिनी कहां हो? हे मेरी जीवन सहचरी।

       कवि का मूल उद्देश्य राष्ट्रीयता है। इनके नायक एवं नायिकाएं देश की विपन्नता पर आंसू नहीं बहाते। इससे उनके उत्साह भावना और को बल मिलता है और यह जन संगठन में जुड़ जाते हैं-

         देखा उसने उसी भांति के अनगिनत नर कंकाल।

         चिपके पेट रीढ़ के जिनकी चुपके पुचके जाल।

      अलगाववाद, नस्लवाद, जातिवाद और संप्रदाय के दीवारें भारतीय चिंतन के इस वेदांत ज्ञान सागर के में गिर जाते हैं। त्रिपाठी जी के लिए भारतीयता का अर्थ है जहां सब अपने ही आत्म के अंश हैं-

         तू रूप है किरण में, सौंदर्य है सुमन में।

          तू प्राण है पवन विस्तार है गगन में ।

         तू ज्ञान हिंदुओं में, ईमान मुस्लिमों में,

          विश्वास क्रिश्चियन में तो सत्य है सृजन में।

      त्रिपाठी जी के काव्य में शोक भाव की अभिव्यक्ति सशक्त बन पड़ी है। शोक भाव कविता मुख्यता दो रूपों में आती है। प्रथम अपनी विपत्ति या कष्ट से। इस प्रकार का वर्णन इन के काव्य में पूर्णता अभाव है। दूसरे प्रिय वस्तु या दुष्ट जन के विनाश का अंत भी बड़ा दुखद है यहां सुख भाव के दर्शन हैं-

        रोये वृद्ध कहां है जीवन का अनमोल सहारा,

       रोकर गिरे अचेत युवक है साथी कहां हमारा।

      रामनरेश त्रिपाठी स्वदेश, प्रेम मानव सेवक और पवित्र प्रेम के गायक हैं। इनकी रचनाओं में छायावाद का सौंदर्य एवं आदर्शवाद का दृष्टिकोण एक साथ ही मिल गया है। भारत के गौरवपूर्ण अतीत का वर्णन करते हुए कवि कहता है-

         शोभित है सर्वोच्च मुकुट से जिनके देश का मस्तक।

        गूंज  रही है सकल दिशाएं जिनके जय गीतों से अब तक।

       इससे स्पष्ट होता है कि इनके काव्य में जीवन का जो पक्ष अपनाया गया है इन की व्याख्या अपने आप में पूर्ण है। प्रेम और राष्ट्र भावना को प्रकृति की पृष्ठभूमि देकर मानविय साँचे में ढालकर उज्जवल रूप दिया गया है। त्रिपाठी जी के तीनों खंड काव्य की मूल चेतना एक ही है। श्रीधर पाठक ने जिस स्वच्छन्दतावाद का मार्ग उठाया उस पर चलने वालो में रामनरेश त्रिपाठी महत्वपूर्ण है।

गोबिंद कुमार यादव, बिरसा मुंडा कॉलेज, 6294524332

 

 










मंगलवार, 26 अप्रैल 2022

जीवन की आशा : 'ध्वनि' कविता

  'ध्वनि' कविता निराला द्वारा रचित आशा का संचार करने वाली कविता है । इसमें निराला की आशावादिता को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इस कविता में वे प्रकृति के उपादानो द्वारा अपने जीवन की तुलना करते हैं और यह आशा करते हैं कि यह उनके जीवन का प्रथम चरण है, जिसमें अभी केवल जीवन है, अभी अंत बहुत दूर है। जब तक इस जीवन का उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता तब तक अंत संभव नहीं है। यह कवि के आशावादी होने का प्रतीक है।जिसमे वह जीवन के वसंत को जब तक पूरी तरह नहीं जी लेता उसे आशा है कि तब तक उसका अंत संभव नहीं है।

      प्रस्तुत कविता में निराला अपने जीवन का अभी केवल प्रारंभ ही मानते हैं। जिस प्रकार प्रकृति में वसंत में नए हरे पत्ते निकलते हैं, कलिया खिलने लगती है, डाले कोमल होती है। उसी प्रकार कवि का जीवन भी वसंत के समान है, जिसमें नए उत्साह, नई उमंगे, स्वप्न , आशा , चेतना रूपी पत्ते निकलना प्रारंभ हुए हैं इसलिए उसे इन आशाओं, उमंगो के पूरा होने तक अंत दिखाई नहीं देता-

" अभी अभी तो आया है

मेरे वन में मृदुल वसंत 

अभी न होगा मेरा अंत।" 

     कवि अपने स्वप्नों और आशाओं द्वारा जीवन की आलसता को खींचकर उसे नई ऊर्जा से भर देना चाहता है। यह उर्जा उसे जगाने का कार्य करती है। वह अपने वसंत रूपी इस जीवन के प्रारंभिक समय में उर्जा का ऐसा संचार करना चाहता है जो प्रत्येक व्यक्ति. जो अभी तक नहीं चेतना से दूर है, उसे सींचकर उसमें भी आशा और ऊर्जा का संचार करना चाहता है-

" पुष्प- पुष्प से तंद्रालस लालसा खींच लूंगा मैं,

अपने नवजीवन का अमृत सहर्ष सींच दूंगा मैं, " 

      कवि को यह आशा है कि यह उसके जीवन का प्रथम चरण है, जिसमें आगे संपूर्ण  यौवन पड़ा हुआ है। उसका मन बालक की भांति सभी दिशाओं में बहता रहता है। यह जो प्रथम चरण है इसके स्वर, राग विकसित नहीं हुए है । वह विकसित होंगे और पूरी दुनिया में  फैलेंगे; न सिर्फ फैलेंगे बल्कि चारों दिशाओं में आशा और नई चेतना का विस्तार करेंगे  और जब तक इसका विस्तार नहीं हो जाता  कवि को आशा है कि उसका अंत नहीं होगा-

" मेरे ही अविकसित राग से 

विकसित होगा बंधु , दिगंत

अभी न होगा मेरा अंत।"

     निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि यह कविता कवि की आशा पर केंद्रित है। जिसमें उसे आशा है कि वह अपनी चेतना से चारों दिशाओं में उसका विस्तार करेगा। वह क्रांति की  भी चेतना हो सकती है, वह परिवर्तन की भी चेतना हो सकती है, वह बदलाव का राग भी हो सकता है. जो देश और समाज की आवश्यकता है। 









                                                                                                                    गोबिन्द कुमार यादव

                                                                                                                    बिरसा मुंडा कॉलेज

                                                                                                                                    6294524332          


                                              


शुक्रवार, 23 जुलाई 2021

रेखाचित्रकार महादेवी वर्मा

 रेखाचित्रकार महादेवी वर्मा :-  महादेवी वर्मा ‘छायावाद’ युग के प्रमुख आलोक स्तम्भों में से एक हैं। प्रसाद, निराला, पंत जैसे कवियों की इस काव्य त्रिवेणी के बीच महादेवी जी ने अपनी रचनाधर्मिता के बल पर न केवल स्त्री प्रतिभा का लोहा मनवाया, वरन् इन कवियों की काव्य सरिता को हिन्दी साहित्य सागर रूपी विविध विधाओं के साथ उनका समन्वय किया है।  हम देखते हैं कि गद्य में जहाँ नवीन विधाओं को अत्यधिक विकसित होने का अवसर प्राप्त हुआ, वहीं दूसरी ओर कविता के लिए भी अपार संभावनाओं के द्वार खुल गए। बहरहाल यहाँ मेरा मन्तव्य महादेवी जी के रेखाचित्रों में रचे-बसे उन तमाम अनुभूतियों में गुंफित कोमल, मधुर स्मृतियों को उजागर करना है, जिसके सहारे लेखिका की जीवन दृष्टि को समझते हुए, उन सामाजिक एवं मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा करना है, जहाँ पहुंच कर मनुष्य; मनुष्य के मध्य का भेद समाप्त हो जाता है। शेष रहती है तो असीम करूणा और चरम शांति।

‘रेखाचित्र’ हिन्दी साहित्य की नवीन किंतु आधुनिक गद्य विधाओं में से एक है। प्रत्येक साहित्यिक विधा ‘वस्तु’ और ‘शिल्प’ की दृष्टि से अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखती है। कोई भी विषय किसी विशेष शिल्प के अंतर्गत संप्रेषण की विशेष योग्यता प्राप्त कर लेता है। इस तरह देखा जाय तो कहा जा सकता है कि चित्रकार की चित्र कला को जो महत्व प्राप्त है वही महत्व रेखाचित्रकार की रचना रेखाचित्र का भी है।

वास्तव में रेखाचित्र ‘शब्दचित्र’ है। जिस प्रकार चित्रकार रंगों के अंकन और सौष्ठव द्वारा चित्र का निर्माण कर उसे प्रभावशाली और सजीव बना देता है, ठीक उसी प्रकार रेखाचित्रकार सौष्ठवपूर्ण शब्दों की सहायता से अपनी रचना को स्वरूप प्रदान करता है। इसकी सफलता रचनाकार के भाषागत वैशिष्ट्य तथा जीवनानुभूतियों की सशक्त अभिव्यक्ति पर आधारित है। हिन्दी साहित्य में जब इस विधा का पहलेपहल पदार्पण हुआ, तो इसकी परिभाषा भी स्वभावतः इसके साथ ही निर्मित हुई। “स्केच की तरह ही रेखाचित्र में भी कम से कम शब्दों में कलात्मक ढंग से किसी वस्तु, व्यक्ति या दृश्य का अंकन किया जाता है। इसमें साधन शब्द होते हैं रेखाएं नहीं”

रेखाचित्र में अनेक साहित्यिक विधाओं की तरंगे उठती रहती हैं। इसमें कहानी का कौतुहल है तो, निबंध की गहराई गद्यकाव्य की भावात्मक लयात्मकता है तो, डायरी में व्यक्त निश्छल मन की अभिव्यक्ति। संस्मरण की व्यक्तिकता है तो, साक्षात्कार का खुलापन। आत्मकथा और जीवनी जैसी आत्मीयता और बेबाकीपन है तो, यात्रावृत्तांत का सीमित विस्तार। व्यंग की छेड़छाड़ है तो, रिपोर्ताज की गुनगुनाहट। विभिन्न साहित्यिक रसों में सराबोर यह रेखाएं अंगड़ाई लेती हुई विशिष्ट शब्द चित्रों में ढल कर एक ऐसा संसार रचती हैं, जिसमें रहने वाले लोग हमारे इसी लोक के प्राणी हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो रेखाचित्र विभिन्न विधाओं की विशेषताओं का विचित्र समुच्चय है। लेकिन सबसे अधिक रेखाचित्र का साम्य संस्मरण के साथ माना जाता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि लगभग समस्त विधाओं की विशेषताओं को अपने में समेटे हुए रेखाचित्र की अपनी विशेषता औऱ अपनी पहचान है।

अतिशय संवेदना, विषय संबंधी एकात्मकता, अंतर्मुखी चारित्रिक विशेषता, विश्वसनीयता, सूक्ष्म परिवेक्षण शक्ति, संक्षिप्तता तथा प्रतीकात्मकता आदि इसकी विशेषताएं मानी जा सकती हैं। यद्यपि यह कथेत्तर गद्य विधाओं मे नवीन विधा है और हिन्दी साहित्य में विधा के रूप में प्रतिष्ठित भी हो चुकी है। लेकिन क्या कारण है कि विद्वानों की दृष्टि से रेखाचित्र का सैद्धान्तिक विवेचन ओझल ही रहा?

दूसरे शब्दों में कहें तो रचनात्मक रूप में तो इस विधा को जितनी महत्ता और स्वीकारोक्ति मिली, उतने ही इसके शास्त्रीय स्वरूप की अवहेलना हुई। अतः रेखाचित्र का स्वरूप निर्धारण सरल नहीं है। इसके स्वरूप एवं वैशिष्ट्य को प्रतिस्थापित करने के लिए हमारी दृष्टि में रेखाचित्र लेखकों की रचनाओं का आधार ग्रहण किया जाना अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है।


गोबिन्द कुमार यादव

बिरसा मुंडा कॉलेज

6294524332

शनिवार, 3 जुलाई 2021

भाषा और उसके अभिलक्षण

     मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इससे उनका एक दूसरे के संपर्क में आना स्वाभाविक है। संपर्क में आने पर विचार विनिमय अनिवार्य है। अतः जिस साधन से यह विचार विनिमय होता है, उसे ही भाषा की संज्ञा दी जाती है। अथवा यह कहा जा सकता है कि भावाभिव्यक्ति के साधन को सामान्य रूप से भाषा कह दिया जाता है। जब हम भाषा की परिभाषा वैज्ञानिक तरीके से दें तो यह याद रखें कि भाषा विज्ञान में भाषा की परिभाषा को पशु पक्षियों की बोली, इशारे इत्यादि को इस रूप में नहीं लेना चाहिए। सामान्यतः विचार विनिमय के दो साधन माने गए हैं-१)शब्दों एवं वाक्य द्वारा २)संकेतों द्वारा। रेल की हरी झंडी, चौराहे की सिग्नल, चुटकी, ताली आदि की सांकेतिक भाषा को भाषा विज्ञान के वैज्ञानिक एवं संशोधित भाषा के अंतर्गत नहीं देखा जाता। यदि हम भाषा को इशारे से भावा भी व्यक्ति करते हैं तो इसे संकेत अथवा इशारे की भाषा कहते हैं।

      भाषा की उत्पत्ति पर विचार करते हुए पाणिनि उसे भाष धातु से जोड़ा जिसका अर्थ है  ‘व्यक्त वाणी’। भाषा का संबंध व्यक्ति वाणी से है।

    भाषा को लेकर हिंदी और पाश्चात्य विद्वानों में अलग-अलग मत है।

                  पाश्चात्य के विद्वानों का मत

 प्लेटो के अनुसार – “विचार आत्मा की मूक अथवा अध्वन्यात्मक बातचीत है जो ध्वन्यात्मक बनकर होठों पर प्रकट होते ही भाषा कहलाती है।“

स्वीट के अनुसार – “ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा विचारों की अभिव्यक्ति का नाम भाषा है।“

क्रोचे के अनुसार – “भाषा उस स्पष्ट तथा सुगठित ध्वनि को कहते हैं जो अभिव्यंजना के लिए निर्धारित की जाती है।“

ब्लॉक तथा ट्रेजर के अनुसार – “भाषा व्यक्त ध्वनि चिन्हों की वह पद्धति है जिसके माध्यम से समाज के व्यक्ति परस्पर व्यवहार करते हैं।

गार्डनर के अनुसार-  “विचारों की अभिव्यक्ति के लिए जिन व्यक्त और स्पष्ट ध्वनि संकेतों का व्यवहार किया जाता है उसे भाषा कहते हैं।“

                हिंदी के विद्वानों का मत

कामताप्रसाद गुरु के अनुसार-  “भाषा वह साधन है जिसके माध्यम से मनुष्य अपने विचार दूसरों पर भली-भांति प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार स्पष्ट रूप से समझ सकता है।“

मंगल देव शास्त्री के अनुसार- “भाषा मनुष्य की उस चेष्टा या व्यापार को कहते हैं जिससे मनुष्य अपने उच्चारण उपयोगी शरीर अवयवों से उच्चारण किए गए वर्णात्मक या व्यक्त शब्दों द्वारा अपने विचारों को प्रकट करते हैं।

डॉ भोलानाथ तिवारी के अनुसार- “भाषा मानव के उच्चारण अवयवों द्वारा उच्चारित यादृच्छिक ध्वनि प्रतीकों की वह संरचनात्मक व्यवस्था है जिसके द्वारा समाज के  लोग आपस में विचार विनिमय करते हैं ।

 

 

 

भाषा के अभिलक्षण।

भाषा पर जब विचार किया जाता है तब उसका आशय मनुष्य की भाषा से होता है। यहाँ अभिलक्षण से तात्पर्य विशेषता से है अथवा मूलभूत लक्षण से है। क्योंकि किसी वस्तु या पदार्थ के लक्षण ही उसे दूसरे पदार्थ से अलग करते हैं। मानव भाषा के अभिलक्षण वे हैं जो उसे अन्य प्राणियों की भाषा से अलग करते हैं। मानव भाषा के अभिलक्षण निम्न है-

1)यदृच्छिकता- यदृच्छिकता का अर्थ है ‘जैसी इच्छा हो’ या ‘माना हुआ’। ऐसा शब्द जो मन मे चित्रित होता है। शब्दो के अंदर निहीत वह बिम्ब जिसको सुनकर हमारे मन में एक चित्र आ जाता है। भोलानाथ तिवारी ने यदृच्छिकता को पहले स्थान पर रखा है।

2)सृजनात्मकता- भाषा की दूसरी विशेषता सृजनात्मकता है। भाषा में शब्द और रूप प्रायः सिमित होते है उन्ही के आधार पर हम अपनी आवश्यकता के अनुसार अनेक वाक्यो का सृजन करते है। इस अभिलक्षण को उत्पादकता भी कहा जाता है।

3)अनुकरणग्रहिता- भाषा में अनुकरण की क्षमता होती है। मानव भाषा जन्मजात नही होती है। इसे हम अनुकरण कर के ही सीखते है। मानवेत्तर जिव जंतुओं की भाषा जन्मजात होती है। किंतु मनुष्य भाषा को अनुकरण कर के सीखता है।

4)परिवर्तनशीलता- मानव भाषा परिवर्तनशील है। मानवेत्तर जीवो की भाषा  परिवर्तित नहीं होती। जैसे कोई भी जानवर पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही प्रकार की अपरिवर्तित भाषा का प्रयोग करते आ रहे हैं किंतु मानव भाषा हमेशा परिवर्तित होती रहती है ।


गोबिंद कुमार यादव

बिरसा मुण्डा कॉलेज

6294524332 

 

बुधवार, 30 जून 2021

रजिया रेखाचित्र के आधार पर रजिया का चरित्र चित्रण





रजिया रामबृक्ष बेनीपुरी के रेखाचित्र संग्रह 'माटी की मुर्ते' में संग्रहित है जिसमे उन्होंने ग्राम चरित्रों को बखूबी चित्रित किया है। रजिया रेखाचित्र को भी उन्होंने ज्यो का त्यों चित्रित कर दिया है यही इस रेखाचित्र की सुंदरता है। इसमें रजिया के समूचे जीवन का सरस और सलोना चित्र लेखक ने खिंचा है। उसका संपूर्ण जीवन एक सजीवता, मधुरता और मनोहरता में नृत्य करता हुआ प्रतीत होता है। लेखक ने रजिया के बाह्य वर्णन, वेशभूषा का सूक्ष्म वर्णन इतनी तल्लीनता के साथ किया है कि उसका वास्तविक रूप मूर्तिमान हो गया है। इस रेखा चित्र में लेखक ने रजिया के बालपन से लेकर बृद्धावस्था तक का वर्णन इतनी स्पष्टता एवं कलात्मक तरीके से किया है कि उसका संपूर्ण जीवन दृश्यमान हो जाता है। लेखक ने रजिया के वाह्य एवम आतंरिक सौंदर्य पूरी सफलता के साथ उभरा है। इस रेखाचित्र में रजिया की निम्न विशेषताएं देखने को मिलती है।
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1)बाह्य सौंदर्य- रेखाचित्र के प्रारंभ में ही लेखक रजिया के रूप सौंदर्य का चित्रण करता है। रजिया अपने बाल्यावस्था मे जितनी आकर्षक और सुन्दर दिखती है उम्र बढ़ने के साथ उसका सौंदर्य और भी निखारता जाता है। रजिया के नाल्यावस्था के सौंदर्य का चित्रण लेखन निम्न पंक्तियों में करता है-“ गोर चेहरे तो मिले है किन्तु इसकी आँखों में जो अजीब किस्म का नीलापन दीखता वह कहा, और समूचे चेहरे की काट भी कुछ निराली जरूर।“ रजिया का सौंदर्य किशोरावस्था में और निखरता गया और उसका एक स्वतंत्र अस्तित्व भी बनता गया। “ रजिया बढ़ती गई बच्ची से किशोरी हुई और अब जवानी के फूल उसपर खिलने लगे है। अब भी वह अपनी माँ के साथ आती है, कनितु पहले वह अपनी माँ की एक छाया मात्र लगती थी किन्तु अब उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी है और उसकी छाया बनने के लिए कितनो के दिलो में कसमसाहट है।“



2) संकोच एवं प्रेम भाव- लेखक का रजिया के साथ जो सम्बन्ध है उसे न दोस्ती कहा जा सकता है और न ही प्रेम। न सिर्फ लेखक ही रजिया भी सामान भाव से लेखक की तरफ आकर्षित थी। बाल्यावस्था में यह आम बात थी। जब भी लेखक गाँव अत रजिया सहज भाव से उसके पास आ जाती और ढेर सारी इधर-उधर की बाते करती। किन्तु उम्र के बढ़ने के साथ यह भाव भी बदलता गया। जब भी लेखक रजिया बाते करते गाँव के लोग उन्हें दूसरी निगाहों से देखने लगते, इस कारण रजिया में संकोच बढ़ता गया। “ फिर कुछ दिनों बाद पाया, वह अब सकुचा रही है। मेरे निकट आने के पहले वह इधर-उधर देखती है। और जब कुछ बाते करती तो ऐसी चौकन्नी से कि कोई देख न ले, सुन न ले।“

3) परिश्रमी- रजिया जन्मना परिश्रमी थी। उसके जन्म के बाद ही उसकी नियति अपने पारिवारिक कार्यक्षेत्र में जाना निश्चय था। बचपन से ही वह अपनी माँ के साथ चूड़ियां बेचने जाया करती थी और शीघ्र ही वह चूड़ियां बेचने और पहनने में पारंगत भी हो गयी। उसे चूडीहरिनो की सभी अदाएं आ गयी जो उसके पेशे के लिया आवश्यक है। “हा, रजिया अपने पेशे में भी निपुण होती जाती थी। चुड़िहारिन के पेशे के लिए सिर्फ यही नही चाहिए कि उसके पास रंग-विरंग की चूड़ियां हो- सस्ती, टिकाऊ....बल्कि यह पेशा चूड़ियों के साथ चूडीहरिनो में बनाव-श्रृंगार, रूप-रंग, नाजोअदा खोजता है।“ रजिया बहुत शीघ्र ही इसमें पारंगत हो गयी थी।

4) खुशहाल- रजिया का जीवन बेहद खुशहाल था। वह मेहनती थी। उसने प्रेम विवाह भी किया। उसके तीन पुत्र भी हुए । उनके भी बच्चे हुए। पुरे रेखाचित्र मे कही भी उसके जीवन की परेशानियों का चित्रण नही हुआ है। जीवन की स्वाभाविक उत्तर चढ़ाओ तो आते रहते है किंतु कही भी ऐसा चित्र नही उभरा है जहाँ यह दिखे कि राजियो के जीवन में किसी प्रकार की कोई परेशानी हो।
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5) ईमानदार- रजिया अपने जीवन और पेशे दोनों में ईमानदार है। अपने रिश्ते के प्रति भी वह पूर्ण ईमानदार है। वह लेखक और अपने बिच के दोस्ती को अपने पति से कभी नही छिपाती। रजिया का व्यक्तित्व एक ईमानदार युवती का है।

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते है कि रजिया रेखाचित्र में लेखक ने एक ऐसे ग्रामीण युवती का चित्र खिंचा है जो रूप सौंदर्य से लेकर उद्दात व्यक्तित्व के धनि है। उसका चरित्र एक आदर्श स्त्री का चरित्र है जिसने दोस्ती और पारिवारिक सम्बन्ध को ईमानदारी से निभाया है।









गोबिन्द कुमार यादव

बिरसा मुंडा कॉलेज



6294524332

महाकवि जयशंकर प्रसाद रेखाचित्र के आधार पर प्रसाद का चरित्र-चित्रण





'महाकवि जयशंकर प्रसाद' शीर्षक रेखाचित्र में शिवपूजन सहाय ने बताया कि प्रसाद महान् साहित्यकार एवं महाकवि थे। इसके अलावा वे विलक्षण स्मृति-शक्ति से सम्पन्न थे। वे स्वजातीय गुणों से युक्त और अनेक कलाओं के मर्मज्ञ थे। काशी की सभी विशेषताओं के भी विशेषज्ञ थे। वे काशी के पुराने, रईसों, पण्डितों, नर्तकों, लावनीबाजों एवं गायिकाओं आदि सभी की कहानियों के ज्ञाता थे। वे धर्मात्मा प्रवृत्ति के थे। व्यापारियों, मल्लाहों, सुनारों आदि की बोलियों और पशु- पक्षियों के लक्षणों के ज्ञाता भी थे।

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प्रसाद की वैदिक वाङ्गय और प्राचीन इतिहास में गहरी पैठ थी। संस्कृतसाहित्य के प्रमुख अंगों का अध्ययन-मनन करने में वे सदैव तत्पर रहते थे। शालिहोत्र एवं आयुर्वेदशास्त्र के महत्त्वपूर्ण प्रकरणों को लेकर सुन्दर प्रवचन देते थे। उन्हें मोती, हीरा आदि रत्नों के गुण-दोषों को पूरा ज्ञान था। इसी प्रकार किमाम-इत्र आदि के निर्माण में दक्ष थे। काठौषधियों और जड़ी-बूटियों के ज्ञान में वैद्यक-ग्रन्थों के श्लोक उपस्थित कर देते थे। इस प्रकार प्रसाद लोक-ज्ञान से सम्पन्न महापुरुष थे।

आचार्य शिवपूजन सहाय ने 'महाकवि जयशंकर प्रसाद' रेखाचित्र में प्रसादजी के व्यक्तित्व की अनेक विशेषताओं का वर्णन किया है। तदनुसार उनके व्यक्तित्व का निरूपण इस प्रकार है।

1. महान् साहित्यकार - प्रसाद महान् साहित्यकार एवं महाकवि थे। उन्होंने नाटक, उपन्यास, महाकाव्य आदि की रचना से हिन्दी साहित्य के भण्डार को समृद्ध किया। जब साहित्य के विविध पक्षो पर सभी साहित्यकार बाते करने लगते “तब प्रसाद जी की सरस्वती का मुखर होना देखकर चकित रह जाना पड़ता।“

2. प्रतिभासम्पन्न व्यक्तित्व - प्रसाद अनुपम प्रतिभासम्पन्न थे। उन्होंने अपनी रचनाओं तथा अन्य कार्यों में विशिष्ट प्रतिभा का परिचय दिया। साहित्य के सभी विधाओं पर प्रसाद का असाधारण अधिकार था। उनकी साहित्यिक प्रतिभाओं पर हिंदी जगत आज भी गर्व अनुभव करता है। “ हिंदी को प्रसाद जी कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध आदि के रूप में जो निधि दे गए है, उसका मूल्याङ्कन कर के आज गौरव का अनुभव किया जा रहा है।“

3. कला-मर्मज्ञ - प्रसाद अनेक कलाओं के मर्मज्ञ थे। वे काशी की विशेषताओं के विशेषज्ञ थे। पाककला के ज्ञाता और अपने व्यवसाय मे कुशल थे। उन्हें न सिर्फ साहित्य बल्कि विविध कलाओं में भी पारंगत थे।

4. सर्वशास्त्रज्ञ - प्रसाद की भारतीय शास्त्रों में, आयुर्वेद, शालिहोत्र, वेद, उपनिषद एवं संस्कृत साहित्य के सभी अंगों में गहन गति थी। उन्होंने शास्त्रों का गहन अध्ययन किया था। रेखाचित्र में लेखक लिखते हैं - "वैदिक ऋचाएं और उपनिषदों के लच्छेदार वाक्य तो उन्हें कण्ठस्थ थे ही,संस्कृत महाकवियों ने किस शब्द क कहा किस अर्थ में कैसा चमत्कार्पुर्ण प्रयोग किया है,इसको भी वे सोदाहरण उपस्थित करते चलते हैं। शालिहोत्र और आयुर्वेद-शस्त्रों के महत्वपुर्ण प्रकरणों पर उनके प्रवचन सुनने से उनके विस्तृत ज्ञान पर आश्चर्य होता था।" साहित्य अपने निबंधों में उनके शास्त्रों की गहन जानकारी को हम देख सकते है।

5. लोकज्ञान से सम्पन्न प्रसाद को विभिन्न व्यवसायों की पारिभाषिक शब्दावली और विविध बोलियों का गहन ज्ञान था। न सिर्फ हिंदी ब्रज भाषा का भी प्रसाद को अच्छा ज्ञान था। अपनी प्रारंभिक कविताएं वे ब्रज में ही किया करते थे।"खडीबोली हिंदी में ही काव्य रचना करते थे किंतु प्राचीन ब्रजभाषा काव्य में भी मर्मज्ञ थे। ब्रजभाषा सहित्य के बडे अनुरागी और प्रशंसक थे।" लोक को देखने एवं लोक संवेदना का चित्रण उनकी कविताओं में भी देखने को मिलता है।
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6. व्यवसाय में कुशल - प्रसाद अपने पैतृक व्यवसाय में कुशल थे तथा किमाम-इत्र आदि को बनाने में दक्ष थे। व्यवसाय उन्हें पारिवारिक विरासत में मिली थी। और उस व्ययसाय में वे कुशल और पारंगत थे।

7. स्वाध्यायशील - प्रसाद विद्याव्यसनी थे और रात्रि में स्वाध्याय में निरत रहते थे। स्वाध्याय से ही उन्होंने सभी शास्त्रों एवं कलाओं का ज्ञान प्राप्त किया था। स्वाध्याय से ही उन्होंने वेद, उपनिषद, लोकशास्त्र का गहन अध्ययन किया था।







गोबिंद कुमार यादव



बिरसा मुंडा कॉलेज

6294524332
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2. शुक्ल युगीन हिंदी आलोचना की प्रवृतियां


3. सागर कन्या और खग शावक यात्रा वृतांत की समीक्षा


4. चित्रलेखा उपन्यास मे व्यक्त पात्र-योजना


5. रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टी


6. आचार्य रामचंद्र शुक्ल की निबंध-कला


7. हिंदी साहित्य का आदिकाल : हजारी प्रसाद द्विवेदी ( पुस्तक समीक्षा )


8. 'वापसी' कहानी की समीक्षा


9. नाखुन क्यों बढते हैं ? निबंध की समीक्षा


10. जीवन की आशा : 'ध्वनि' कविता


12. श्रव्य और दृश्य माध्यमों की समाजिक जीवन में भूमिका

नाखून क्यों बढ़ते हैं? निबंध की समीक्षा

नाखून क्यों बढ़ते हैं? निबंध की समीक्षा

नाखून क्यों बढ़ते हैं? एक ललित निबंध है। जिसमें भारतीयता, उसकी महत्ता, यहां के लोगों की सामाजिक व्यवस्था, राजनीतिक चिंतन, रहन-सहन, भाषा ज्ञान, संस्कृति पर समान रूप से प्रकाश डालते हैं। इस निबंध में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का मानवतावादी दृष्टिकोण उभरकर सामने आया है। इसके माध्यम से बार-बार काटे जाने पर भी बढ़ जाने वाले नाखून के माध्यम से सहज शैली में सभ्यता और संस्कृति की विकासगाथा को उद्घाटित करते हैं। एक ओर नाखून का बढ़ना मनुष्य की आदिम पाशविक प्रवृत्ति और संघर्ष चेतना का प्रमाण है तो वहीं दूसरी ओर नाखून को बार-बार काटते रहना उसके मनुष्यता की निशानी है।

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द्विवेदीजी के इस निबंध की शुरुआत बच्चे की जिज्ञासा या एक प्रश्न से होती है। "नाखून क्यों बढ़ते हैं?" यह प्रश्न बच्चे द्वारा पूछा गया सामान्य सा प्रश्न नहीं रहता, जब लेखक इस प्रश्न में अंतर्निहित उसके व्यापक अर्थ को खोलता है । हम सभी जानते हैं कि नाखूनों का आज ऐसा कोई उपयोग नहीं है जो उसके होने की आवश्यकता को सिद्ध करे। लेकिन मानव इतिहास में एक समय ऐसा भी रहा होगा जब मनुष्यों को इन नाखूनों की जरूरत थी। अपनी बर्बर अवस्था में जब मनुष्य बनमानुस की तरह रहा होगा, तब अपनी रक्षा और शिकार के लिए दांतों और नाखूनों का इस्तेमाल भी करता होगा। लेकिन आज नाखूनों का ऐसा कोई उपयोग बाकी नहीं रहा है। फिर भी, नाखून बढ़ते जाते हैं। आज नाखून को बढ़ाना अच्छा नहीं माना जाता, इसलिए मनुष्य बढ़े हुए नाखूनों को काटता है। शायद इसलिए कि बढ़े हुए नाखून असभ्यता और जंगलीपन की निशानी है।

द्विवेदीजी इस निबंध मे एक नया प्रश्न उठाते हैं। अगर मनुष्य सचमुच बर्बरता के चिह्नों से छुटकारा पाना चाहता है तो फिर वह हथियारों का निर्माण क्यों कर रहा है? किसी जमाने में मनुष्य अपनी रक्षा के लिए नख और दांत का प्रयोग करता था। फिर, पत्थर, लकड़ी और हड्डियों का इस्तेमाल करने लगा। लोहे के हथियार बने, बारूद का आविष्कार हुआ और अब एटम बम का युग है। हथियारों के इस विकास को देखें तो हम समझ सकते हैं कि मनुष्य अधिक से अधिक विध्वंसक हथियार बनाने की ओर बढ़ रहा है। हिरोशिमा और नागासाकी का उदाहरण हमारे सामने हैं जहां एटम बमों ने लगभग दो लाख लोगों को कुछ ही मिनटों में लाश में बदल दिया था। तब कैसे कह सकते है कि मनुष्य सचमुच बर्बरता से मुक्त होना चाहता है? उसकी बर्बरता लगातार बढ़ रही है –“मनुष्य की बर्बरता घाटी कहा है, वह तो बढ़ती जा रही है। मनुष्य के इतिहास में हिरोशिमा का हत्याकांड बार-बार थोड़े ही हुआ है। यह तो उसका नवीनतम रूप है।”

द्विवेदीजी निबंध में हमें यह जानकारी देते हैं कि आज सें दो हजार साल पहले भारत में नाखूनों को सजाने संवारने की कला का विकास भी हुआ थ.स्पष्ट है कि नाखूनों के जिस उपयोग का यहां संकेत दिया गया है उसका संबंध मनुष्य की विलास वृत्ति से रहा है। लेकिन द्विवेदीजी इस तरह की प्रवृत्ति के सकारात्मक पक्ष को भी हमारे सामने रखते हैं, जब वे कहते हैं कि “'समस्त अधोगामिनी वृत्तियों को और नीचे खींचने वाली वस्तुओं को भारतवर्ष ने मनुष्योचित बनाया है।“ द्विवेदीजी के कहने का तात्पर्य यह है कि वे वस्तुएं जो मनुष्य को पतन की ओर ढकेलती हैं उनको भी भारतीय परंपरा ने कला का रूप देकर मनुष्यत्व के अनुकूल बनाने का प्रयास किया है।

उन्होंने इस निबंध में मुख्य प्रश्न यह उठाया है कि मनुष्य पशुता से मुक्त क्यों नहीं हो पा रहा है? नाखून के बढ़ने को वे पशुता मानते हैं और हथियारों के निर्माण को भी- “जानते हो नाख़ून क्यों बढ़ते है? यह हमारी पशुता के अवशेष है। जानते हो ये अस्त्र-शस्त्र क्यों बढ़ रहे है? ये हमारी पशुता की निशानी है।“ नाखून का बढ़ना ऐसी ही सहजात वृत्ति है जो उस अवस्था की द्योतक है जब मनुष्य बर्बर अवस्था में रहता था । मनुष्य इस बात को आज भूल गया है कि नाखूनों का बढ़ना उसी पशुत्व का प्रमाण है। बाहरी तौर पर वह पशुत्व को छोड़ चुका है लेकिन पशुत्व का चिह्न अब भी विद्यमान है जिसे वह बढ़ने पर काट देता है। लेकिन क्या मनुष्य ने सचमुच मनुष्यता को अपना लिया है? इस प्रश्न का उत्तर है "नहीं"। क्योंकि मनुष्य नाखून भले ही काट रहा हो लेकिन हथियारों को तो लगातार बढ़ा ही रहा है।

समस्या की ही तरह वे समाधान के प्रश्न को भी सीधे रूप में नहीं रखते। वे अपनी चर्चा की शुरुआत अंग्रेजी के एक शब्द "इंडिपेंडेंस के भारतीय पर्याय से करते हैं। "इंडिपेंडेंस" का अर्थ है अनधीनता। अनधीनता का आशय है "किसी की अधीनता का अभाव' । लेकिन भारतीय पर्याय यह नहीं है। भारतीय पर्याय है, स्वाधीनता या स्वतंत्रता अर्थात स्व की अधीनता या स्व का तंत्र। इस प्रकार इसमें किसी की अधीनता का अभाव नहीं बल्कि 'स्व' की अधीनता का भाव निहित है। इसे दिवेदीजी भारतीय संस्कृति की विशेषता मानते हैं।

यहां एक शंका खड़ी हो सकती है कि क्या दिवेदीजी भारतीय परंपरा का महिमा मंडन कर रहे हैं? निश्चय ही नहीं । द्विवेदीजी कालिदास के मत का उल्लेख करते हुए स्पष्ट कर देते हैं कि उनकी दृष्टि पुरातनपंथियों जैसी नहीं है। लेकिन उनका मानना है कि अगर हमारे अतीत के कोष में मानव जाति की भलाई की कोई बात हो तो हमें उसे अवश्य स्वीकार करना चाहिए।

आचार्य द्विवेदी इसके बाद मानव जाति के लिए सामान्य धर्म की बात को उठाते हैं। आखिर मनुष्य और पशु में मुल अंतर क्या है? भारतीय परंपरा में आहार, निद्रा, भय और मैथुन ये चार बातें ऐसी मानी गयी हैं जो मनुष्य और पशु में एक समान है। स्पष्ट ही इन चार बातों के होने मात्र से कोई मनुष्य, मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं बन जाता। तब वह क्या चीज है जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है? यहाँ दिवेदीजी उस सामान्य धर्म की बात करते हैं जिसे स्वयं मनुष्य ने खोजा है और जिसे मनुष्य अपने ऊपर बंधन के तौर पर स्वीकार किया है। संयम, श्रद्धा, तप, त्याग और दूसरों के दुख- सुख के प्रति संवेदना । निश्चय ही ये ऐसे धर्म हैं जिन्हें स्वीकार करने के लिए मनुष्य बाध्य नहीं है लेकिन जिन्हें स्वीकार करके मनुष्य, मनुष्य कहलाने का अधिकारी बनता है।

भौतिक उन्नति इस बात की गारंटी नहीं है कि मनुष्य पशुत्व से मुक्त हो जाएगा। हथियार इसी भौतिक उन्नति का अंग है जिससे केवल विध्वंस और विनाश ही हो सकता है। लेकिन क्या मनुष्य का लक्ष्य विनाश है? महात्मा गांधी ने सावधान किया था कि सिर्फ भौतिक उन्नति से सुख और शांति नहीं मिलेगी। अपने मन को भी बदलना होगा मन से हिंसा, क्रोध, द्वेष और असत्य को दूर करना और दूसरों के लिए जीना सीखना होगा, दूसरों के लिए कष्ट सहन करना होगा।

द्विवेदीजी कहते हैं कि हो सकता है किसी दिन नाखून बढ़ना बंद हो जाएं क्योंकि जो हमारे लिए गैरे जरूरी है प्रकृति उसे हमसे अलग कर देती है - जैसे पूंछ । हो सकता है किसी दिन मनुष्य विध्वंसकारी अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण बंद कर दे। लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता है तब तक हमें बच्चों को सिखाना होगा कि नाखून का बढ़ना पशुता की निशानी है और उसको बढ़ने देना मनुष्य का आदर्श नहीं है। इसी तरह हथियारों की बढ़ोतरी हमारी पशुता की निशानी है। और उनको कम करने की इच्छा रखना हमारी मनुष्यता का प्रमाण है। हमें अपने मनुष्य होने की पहचान को नहीं भूलना चाहिए।

मानव जाति की सार्थकता विनाशकारी हथियारों का ढेर लगाने में नहीं है। मनुष्य जीवन की सार्थकता इस बात नें है कि वह प्रेम, मैत्री और त्याग के मार्ग पर चले तथा सब के कल्याण के लिए अपने को समर्पित कर दे। नाखून के बढ़ने की तरह हिंसक वृत्ति भले ही मनुष्य की सहज वृत्ति का परिणाम हो, लेकिन उससे मुक्त होने की कोशिश करना भी मनुष्यत्व की पहचान है।

इस प्रकार द्विवेदीजी नाखून बढ़ने के सवाल से मनुष्य की हिसक वृत्ति को जोड़ते हैं और हिंसक वृत्ति के सवाल को हथियारों की बढ़ोतरी से। हथियारों में वृद्धि होने से मानवजाति के संपूर्ण

विनाश का खतरा उत्पन्न हो गया है। प्रश्न यह है कि इससे मुक्त कैसे हों? द्विवेदीजी इसके लिए आत्मनियंत्रण का मार्ग सुझाते हैं जो भारतीय परंपरा की देन है और जिसके द्वारा ही मनुष्य अपने अंदर की पशुता से मुक्त हो सकता है। अतः हम कह सकते हैं कि यह निबंध हमें विश्व- शांति के महत्त्व पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है ।

निष्कर्ष रूप म हम कह सकते है कि इस निबंध में आचार्य द्विवेदीजी का मानवतावादी दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। मनुष्य ने कुछ ऐसी भावनाओं और धारणाओं को भी अंगीकार किया है जिनसे वह अपनी पाशविकता पर विजय प्राप्त कर सके । दूसरों के सुख-दुख के प्रति संवेदना का भाव. भाव, दूसरों के लिए कष्ट उठाना वृत्तियों पर विजय पा सकता है। प्रेम का ये ऐसी चीजें हैं जिनसे व्यक्ति घृणा, क्रोध, हिंसा जैसी इस प्रकार हम देखते हैं कि इस निबंध में बस्तुत: दो भिन्न तरह की भावधाराओं का संघर् दिखाया गया है जिन्हें आज की हमारी सभ्यता के मूल में निहित माना जा सकता है।













गोबिंद कुमार यादव

बिरसा मुंडा कॉलेज
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सोमवार, 10 मई 2021

वापसी कहानी की समीक्षा

 पसी कहानी उषा प्रियंवदा की प्रमुख कहानियों में से एक है जिसमे उन्होंने दो पीढियो के द्वंद को दिखाया गया है । पीढियो के द्वंद से उपजी त्रासदी एवं इसमे पुरानी पीढ़ी के हासिये पर जाने को कहानी का मूल कथ्य बनाया गया है। कहानी आधुनिकता के उस द्वंद को सामने रखती है जिसमे नई पीढ़ी अपने व्यक्तिगत जीवन मे किसी प्रकार का हस्तक्षेप बर्दास्त नही करती । कहानी का लक्ष्य विभिन्न समस्यायों एवं संवेदनाओ को व्यक्त करना है । कहानी कला के प्रमुख 6 तत्व माने गये है इन तत्वो की कसौटी पर वापसी कहानी का मूल्यांकन निम्न प्रकार से किया जा सकता है –

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      कथावस्तु के बिना कहानी की कल्पना भी नही की जा सकती है यह उसका अनिवार्य अंग है । कथावस्तु में अनेक घटनाये हो सकती है या एक घटना भी हो सकती है वापसी कहानी में लेखिका ने गजाधर बाबू के माध्यम से पीढियो के द्वंद को कथावस्तु के केंद्र में रखा है । इस कहानी में गजाधर बाबू एक रेलवे कर्मचारी होते है जो अपनी नौकरी से रिटायर होकर अपने घर जा रहे थे । रेलवे क्वार्टर को खाली करना जितना कष्टदायी था उससे अधिक खुशी इस बात की थी कि वे अपने पत्नी और बच्चो के साथ रहने रहने जा रहे है । 35 साल की नौकरी में अधिकांश समय उन्होंने अकेला काटा था वे एक सफल ब्यक्ति थे उन्होंने शहर में एक मकान बनवाया था एक लड़के और एक लड़की की शादी कर दी थी दो बच्चे ऊंची कक्षाओं में पड़ रहे थे उनका एक भरा पूरा परिवार था किंतु उनके जीवन मे विक्षोभ अधिक था नॉकरी के दौरान उन्हें अपना परिवार बहुत याद आता रहा अब उनके चेहरे में खुशी की आभा दिखाई दे रही थी – अब कितने वर्षों बाद वह अवसर आया था जब वह फिर उसी स्नेह और आदर के मध्य रहने जा रहे थे ।


जब वे अपने परिवार के बीच रहने जाते है तो परिवार में सब अपने मर्जी के थे बेटे बहु अपने हिसाब से चल रहे थे। बड़ा बेटा अमर घर का मालिक था बसंती और नरेंद्र कॉलेज में पढ़ने वाले युवा थे परिवार बढ़ जाने से घर छोटा मालूम पड़ता था अपनी पत्नी और बच्चो से उन्हें कोई सहानुभूति नही मिलती । बच्चे किसी भी काम मे उनकी दखल अंदाजी पसंद नही करते । वे चाहते थे घर मे सभी अनुशाशन में रहे किन्तु अब देर हो गयी थी । उनका अनुशासन घर मे किसी को पसंद न था अमर तो अलग होने को भी सोचता है उनकी चारपाई बैठक में ही थी घर के मामले में उनके बढ़ते दखल से किचकिच बढ़ रही थी जिससे उनकी पत्नी कहती है –“ ठीक ही है आप बीच मे न पड़ा कीजिये । बच्चे बड़े हो गए है हमारा जो कर्तब्य था कर रहे है पड़ा रहे है शादी कर देंगे ।“ गजाधर बाबू का मन इससे बहुत आहत होता है उनके दखल से अमर भून भुना कर कहता है –“ बूढ़े आदमी हो चुपचाप पड़े रहो हर चीज़ में दखल क्यो देते हो”। परिवार के सभी सदस्यों का गजाधर बाबू से किसी न किसी प्रकार की शिकायत थी जिससे आहत होकर वे दूसरी नॉकरी करने को सोचते है और जाते समय पत्नी को भी ले जाना चाहते है लेकिन वह मना कर देती है उनके जाते ही घर मे सभी खुश हो जाते है उनकी पत्नी उनकी चारपाई भी घर से निकलवा देती है और यही कहानी का अंत हो जाता है ।

     कहानी में कोई एक ब्यक्ति या एक से अधिक ब्यक्ति भी हो सकते है यह ब्यक्ति ही कहानी में पात्र या पात्र चरित्र कहलाता है । कहानी में इनकी संख्या कम होनी चाहिए तभी कहानीकार एक चरित्र के बाहरी और आंतरिक पक्षो का अधिक से अधिक मनोविश्लेषण कर सकता है साथ ही उसका मूल घटना से गहरा संबंध होना चाहिए वापसी कहानी में प्रमुख पात्र गजाधर बाबू है । साथ ही उनके पत्नी और बच्चे और रेलवे क्वार्टर में उनके साथ रहने वाला नॉकर गनेशी सहायक पात्र है । गजाधर बाबू रिटायर रेलवे कर्मचारी है जो अब बूढ़े हो चुके है जो पारिवारिक दृष्टि से सफल भी है – “ संसार की दृष्टि में उनका जीवन सफल कहा जा सकता था।“  उनका स्वभाव एकदम स्नेहशील था – “गजाधर बाबू स्वभाव से बहुत स्नेही ब्यक्ति थे और स्नेह के आकांक्षि भी।

वे अपने जीवन के तमाम जिम्मेदारियां को अच्छी तरह से निभाते है किंतु पीढियो के द्वंद से बिखर जाते है । कहानी के दूसरे प्रमुख पात्रो में अमर,नरेंद्र,बसंती उनकी पत्नी आदि आते है और इन पात्रो के माध्यम से लेखिका ने पीढियो के द्वंद का चित्रण किया है और इस द्वंद में पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी के आगे हार जाती है गजाधर बाबू अपना ही घर छोड़कर चले जाते है।

      पहले संवाद कहानी का अभिन्न अंग माना जाता था लेकिन अब उसकी अनिवार्यता समाप्त हो गयी है। ऐसे अनेक कहानिया लिखी जा रही है जिसमे संवाद का एकदम आभाव रहता है इस दृष्टि से देखे तो वापसी कहानी में भी संवाद की कमी है । कही कही सिर्फ ब्यवहारिक संवाद ही देखने को मिलते है – बिट्टी चाय तो फीकी है लाइये और चीनी ढाल दु । बसंती बोली।

रहने दो तुम्हारी अम्मा जब आयंगी तभी पी लूंगा।

ऐसे ही छिक फुक संवाद पूरे कहानी में कही कही देखने को मिलती है।

        कहानी देशकाल की उपज है इसलिए हर देश की कहानी दूसरे देश से अलग होती है इन कहानियों का अपना एक वातावरण होता है। जिसकी संस्कृति सभ्यता संस्कार का प्रभाव उनपर स्वाभाविक रूप से पड़ता है । वापसी कहानी में देशकाल की दृष्टि से भारतीय पृष्टभूमि की कहानी है । जिसमे आधुनिकता के आगमन से पीढ़ीगत अंतर को बड़ा दिया है जो इस कहानी में स्पस्ट रूप से देखी जा सकती है । गजाधर बाबू पुरानी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते है तो अमर , नरेंद्र, बसंती उनकी बहू नई पीढ़ी का एक ओर जहां पुरानी पीढ़ी में संस्कार और परिवार भाव है । वही नई पीढ़ी स्वार्थी ओर सिर्फ स्वयं के बारे में सोचने वाली है ।

     भाषा कहानी को आकर्षक बनाती है और शैली कहानी को सुसज्जित करने वाला कलात्मक आवरण होती है। भाषा जितनी सहज होगी उतनी ही आकर्षक होगी । उसमे इतनी शक्ति होनी चाहिए । जो साधारण पाठको को भी अपनी ओर आकृष्ट कर ले । कहानीकार कहानी को अपने ढ़ंग से कहना चाहता है वह उसे वर्णात्मक , संवादात्मक , आत्मकथात्मक , विवरणात्मक किसी भी शैली में लिख सकता है । वापसी कहानी में उषा प्रियंवदा ने एकदम सहज भाषा का प्रयोग किया है कही से भी उसमे न तो लाक्षणिकता है और न ही मुहावरेदार एकदम सीधा-सपाट और सरल है । शब्दचयन की दृष्टि से ही कहानीकार बेहद सजग है , ढोलची , बाल्टी जैसे ग्रामीण शब्द का प्रयोग हुआ है तो क्वार्टर , रिटायर , स्टेशन जैसे अंग्रेजी शब्दो का भी किन्तु संख्या की दृष्टि से यह बेहद कम है । लेखिका ने ज्यादातर साफ खड़ी बोली का प्रयोग किया है । शैली की दृष्टि से यह कहानी वर्णात्मक और विवरणात्मक रूप में लिखी गयी है संवादात्मकता का आभाव है ।

      उद्देश्य को भी कहानी का एक तत्व माना गया है बिना उद्देश्य के जीवन का कोई कार्य नही होता । कहानी की रचना भी बिना उद्देश्य के नही होती ।कहानियों में यह उद्देश्य उसके आवरण में छिपा रहता है यही उसका सौंदर्य है । वापसी कहानी का मूल उद्देश्य पीढ़ियों के द्वंद को रेखंकित करना है जिसमे पुरानी ओर नई पीढ़ी के बीच एक खड़ी खाई बनती जा रही है पुरानी पीढ़ी जहाँ अपने पुराने संस्कारो से चिपकी हुई है वही नई पीढ़ी पूरी तरह आधुनिक होती जा रही है इस नए और पुराने का द्वंद ही इस कहानी का मूल उद्देश्य है।

निष्कर्ष रूप मे कहा जा सकता है कि कहानी कला एक उत्कृष्ट कला है और इस दृष्टि से देखे तो उषा प्रियंवदा की यह कहानी कहानीकला के सभी विशेषताओ का सफल निर्वाहन करती है। इस कहानी में एक उत्कृष्ट कथानक है। पात्र कम किन्तु प्रभावशाली है देशकाल की दृष्टि से तेजी से आधुनिक हो रहे भारतीय पृष्ठ भूमि की कहानी है । संवादों की कमी है । जिसमे कहानी पर कोई प्रभाव नही पड़ता , भाषा शैली सहज और आकर्षक है जो पाठक को बांधे रखने में सक्षम है । कहानी आधुनिक होते भारत मे दो पीढ़ियों के बीच पनप रही खाई का चित्रण है । कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह कहानी – कहानी कला के तत्वो पर पूरी तरह से खड़ी उतरती है ।
























गोबिन्द यादव
बिरसा मुंडा कॉलेज
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हिंदी निबंध : परिभाषा, स्वरूप एवं प्रकार

 हिंदी निबंध : परिभाषा, स्वरूप एवं प्रकार 1. प्रस्तावना ‘निबंध’ हिंदी गद्य की एक महत्त्वपूर्ण विधा है। इसमें लेखक किसी विषय, विचार, समस्या, ...