बुधवार, 4 मई 2022

अनुवाद के प्रकार : शब्दानुवाद, भावानुवाद, छायानुवाद, सारानुवाद



अनुवाद के प्रकार : शब्दानुवाद, भावानुवाद, छायानुवाद, सारानुवाद।

शब्दानुवाद

अनुवाद के क्षेत्र में शब्दानुवाद को उच्च कोटि की श्रेणी में नहीं कहा जाता किन्तु अनुवादक प्रक्रिया में ऐसे अनेक बिन्दु आते हैं जब शब्दानुवाद के सिवाय कोई पर्याय नहीं रह जाता। शब्दानुवाद वैसे भी भावानुवाद के लिए पूरक तत्त्व के रूप में काफी महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है। शब्दानुवाद में स्रोत भाषा के शब्दों तथा शब्दांशों को ज्यों-का-त्यों लक्ष्य भाषा में परिवर्तित या रूपांतरित करके अनुवाद कर लिया जाता है अर्थात इसमें मूल पाठ या सामग्री की प्रत्येक शब्दाभिव्यक्ति का अनुवाद प्रायः उसी क्रम में किया जाता है। इसीलिए अनुवाद के इस प्रकार को निकृष्ट कहा जाता है क्योंकि प्रकृति भिन्न होने के साथ ही प्रत्येक भाषा का शब्द क्रम भी भिन्न-भिन्न होता है । अंग्रेजी का एक शब्द है-Pay जिसका शब्दानुवाद भुगतान अथवा वेतन होगा किन्तु बैंकिंग क्षेत्र में उसे 'भुगतान करें' इस पूरे वाक्य के अर्थ में किया जाता है। इस प्रकार, शब्दानुवाद से कभी-कभी उलझनें भी पैदा प्रयुक्त हो सकती हैं। शब्दानुवाद में मूल बातों के यथातथ्य होने के कारण अनुवाद की भाषा प्रायः कृत्रिम एवं निष्प्राण हो जाती है तथा उसमें मूल पाठ या रचना का स्वाभाविक प्रवाह नहीं रह जाता या नहीं आ पाता। फलतः अनुवाद दुर्बोध्य, बोझिल और कभी-कभार हास्यास्पद भी हो जाता है। शब्दानुवाद के रोचक उदाहरण इस प्रकार दिए जा सकते हैं-


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1. My head is eating circles.

मेरा सिर चक्कर खा रहा है।

2. He became water and water.

वह पानी-पानी हो गया।

3. Warm welcome.

गरमागरम स्वागत।

4. It was raining cats & dogs.

बिल्ली-कुत्तों की बरसात हो रही थी।

भावानुवाद

अनुवादक क्षेत्र में अन्य सभी अनुवादों की अपेक्षा भावानुवाद को उत्तम कोटि का अनुवाद माना जाता है। भावानुवाद में शब्दानुवाद की तरह केवल शब्द, वाक्यांश तथा वाक्य-प्रयोग आदि पर ध्यान न देकर स्रोत भाषा तथा लक्ष्य भाषा के मूल अर्थ, विचार और भावाभिव्यक्ति पर ही अधिक ध्यान दिया जाता है। भावानुवाद में मूल पाठ की आत्मा अर्थात मूल कथ्य की सामग्री को ही मुख्य रूप मानकर उसे लक्ष्य भाषा में यथायोग्य पद्धति से सम्प्रेषित किया जाता है। अनुवाद के क्षेत्र में कभी-कभी ऐसी स्थितियाँ पैदा होती हैं जब अनुवादक किसी भी पाठ या वाक्यांश का ठीक-ठीक शब्दानुवाद करने में असमर्थ होता है। तब ऐसी स्थिति में उस सामग्री के अनुवाद के लिए भावानुवाद का ही सहारा लेना पड़ता है। डॉ. भोलानाथ तिवारी की मान्यता है-"सामान्यतः मूल सामग्री यदि सूक्ष्म भावों वाली है तो उसका भावानुवाद करते हैं। और यदि वह तथ्यात्मक वैज्ञानिक या विचार प्रधान है तो उसका शब्दानुवाद करते है।" भावानुवाद को अनुवाद प्रक्रिया की महत्त्वपूर्ण पद्धति माना जाता है, क्योंकि भावानुवाद मूल भाषा पाठ के प्रमुख विचार भाव, अर्थ तथा संकल्पना को लक्ष्य भाषा में उनकी समस्त विशेषताओं के साथ सम्प्रेषित किया जाता है। भावानुवाद में अनुवादक का ध्यान कथ्य के भाव, विचार तथा अर्थ पर विशेष रूप से बना रहता है। वस्तुतः इसमें अनुवादक मूल भाषा (स्रोत भाषा) पाठ की सामग्री के अर्थ को सम्पूर्णतः एवं समुचित ढंग से लक्ष्य भाषा पाठ में लाने की चेष्टा करता है, फलतः इसमें स्रोत भाषा की मूल भाव-भंगिमा तथा रचनाधर्मिता प्रायः सुरक्षित बनी रहती है। अतः इस दृष्टि से भावानुवाद सर्वाधिक उपयोगी माना जा सकता है।


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छायानुवाद

छायानुवाद के सन्दर्भ में 'छाया' शब्द से तात्पर्य है धूसर तथा धुँधला प्रभाव।

छायानुवाद में मूल पाठ की अर्थच्छाया को ग्रहण कर अनुवाद किया जाता है। अर्थात इसमें स्रोत भाषा की मुख्य बातें, दृष्टिकोण तथा विचार या संकल्पना आदि को ग्रहण करके इन सबके संकलित प्रभाव को लक्ष्य भाषा में रूपांतरित किया जाता है। छायानुवाद शब्दानुवाद की तरह स्रोत भाषा अथवा मूल पाठ के शब्दों का अनुसरण न करके, या भावानुवाद की तरह मूल विचारों के भावार्थ का यथातथ्य अनुगमन न करके, इन दोनों से मुक्त होकर इनकी छाया मात्र लेकर स्वतन्त्र रूप से अनुवाद किया जाता है।




सारानुवाद

लम्बी रचनाओं, लम्बे भाषणों, बृहद प्रतिवेदनों तथा राजनीतिक वार्ताओं आदि को उसके कथ्य तथा मूल तत्त्व को पूर्णतः सुरक्षित रखते हुए प्रसंग अथवा सन्दर्भ की आवश्यकतानुसार संक्षेप में रूपांतरित करने की प्रक्रिया को सारानुवाद कहते हैं। ऐसे अनुवाद में स्रोत भाषा की सामग्री का सारांश मूल कथ्य को सुरक्षित रखते हुए लक्ष्य भाषा में अंतरित कर दिया जाता है। अनुवाद की इस पद्धति का सहारा मुख्यतः दुभाषिये, समाचार पत्रों के संवाददाता तथा संसद अथवा विधान मण्डलों की कार्यवाही के रिकार्ड कर्ता आदि लेते हैं।



1. 'अहुती' कहानी की समीक्षा


2. शुक्ल युगीन हिंदी आलोचना की प्रवृतियां


3. सागर कन्या और खग शावक यात्रा वृतांत की समीक्षा


4. चित्रलेखा उपन्यास मे व्यक्त पात्र-योजना


5. रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टी


6. आचार्य रामचंद्र शुक्ल की निबंध-कला


7. हिंदी साहित्य का आदिकाल : हजारी प्रसाद द्विवेदी ( पुस्तक समीक्षा )


8. 'वापसी' कहानी की समीक्षा


9. नाखुन क्यों बढते हैं ? निबंध की समीक्षा


10. जीवन की आशा : 'ध्वनि' कविता


11. रामनरेश त्रिपाठी की काव्यगत विशेषता


12. श्रव्य और दृश्य माध्यमों की समाजिक जीवन में भूमिका


13. प्रेमचंदोत्तर हिंदी उपन्यास



गोबिंद यादव
बिरसा मुंडा कॉलेज
मो. 6294524332

प्रेमचंदोत्तर हिंदी उपन्यास

प्रेमचंदोत्तर हिंदी उपन्यास

          प्रेमचन्द के उपरान्त हिन्दी उपन्यास किसी एक निश्चित दिशा की ओर अग्रसर नहीं हुआ अपितु उसकी विविध धाराएं अनेक दिशाओं की ओर प्रवाहित हुई। विषय की दृष्टि से यदि हम प्रेमचन्दोत्तर उपन्यासों का वर्गीकरण करें तो निम्न वर्ग बनाए जा सकते हैं :

1. मनोविश्लेषणवादी उपन्यास

2. साम्यवादी (प्रगतिवादी) उपन्यास

3. ऐतिहासिक उपन्यास

4. आंचलिक उपन्यास

5. प्रयोगवादी उपन्यास

1.मनोविश्लेषणवादी उपन्यास-  मनोविश्लेषणवादी उपन्यासकारों में जैनेन्द्र, इलाचन्द्र जोशी एवं अज्ञेय का उल्लेखनीय योगदान है। जैनेन्द्र (1905- 1988 ई.) ने परख (1929 ई.), सुनीता (1935 ई.) और त्यागपत्र (1937 ई.) के द्वारा हिन्दी उपन्यास को एक नई दिशा प्रदान की। उनके कुछ अन्य उपन्यास है कल्याणी (1939 ई.), सुखदा (1952 ई.), विवर्त (1953 ई.) और व्यतीत (1953ई.)। इन उपन्यासों में विभिन्न पात्रों के मन की उलझनों, एवं शंकाओं का निरूपण कथा के माध्यम से किया गया है। त्यागपत्र में 'मृणाल' के आत्मपीड़न की गाथा का मनोवैज्ञानिक चित्रण हुआ है, साथ ही अनमेल विवाह के दुष्परिणामों का चित्रण किया गया है। सुनीता में फ्रायड के सिद्धान्तों के आलोक में हरिप्रसन्न के व्यवहार का चित्रण है तथा कल्याणी एक अतृप्त और आधुनिक नारी की कथा है। 'सुखदा' एक कुण्ठाग्रस्त नारी की कहानी है। जैनेन्द्र जी ने आधुनिक समाज में नारी की स्थिति का यथातथ्य निरूपण करने का प्रयास अपने उपन्यासों में किया है।

       इस परम्परा के दूसरे उपन्यासकार इलाचन्द्र जोशी (1902-1982 ई.) ने उच्चकोटि के लगभग एक दर्जन उपन्यासों की रचना की है। उनके प्रमुख उपन्यास हैं-संन्यासी (1941 ई.), पर्दे की रानी ( 1941 ई.), प्रेत और छाया (1945 ई.), निर्वासित (1946 ई.), जिप्सी (1952 ई.) और जहाज का पंक्षी (1955 ई.)। इन उपन्यासों में जोशी जी ने मानव मन की कुण्ठाओं एवं ग्रन्थियों का सुन्दर विश्लेषण किया है। यद्यपि उनके अधिकांश उपन्यासों की मूल विषय वस्तु प्रेम एव रोमांस है तथापि उसका विवेचन मनोविज्ञान के आलोक मं किया गया है।

     मनोविश्लेषण परक उपन्यासों में अज्ञेय (1911-1981 ई.) द्वारा रचित शेखर एक जीवनी (1941 ई.), नदी के द्वीप (1951 ई.) तथा 'अपने-अपने अजनबी' का महत्वपूर्ण स्थान है। अज्ञेय में मनोविश्लेषण की गहन क्षमता के साथ-साथ सूक्ष्म सौन्दर्य बोध, कला के प्रति ईमानदार चेतना विद्यमान है। 'शेखर एक जीवनी' वैयक्तिक मनोविज्ञान के अध्ययन के क्षेत्र में एक । महती उपलब्धि मानी जा सकती है।

2.साम्यवादी/प्रगतिवादी उपन्यास- हिन्दी के साम्यवादी उपन्यास वे हैं जिनमें मार्क्सवादी विचारधारा का आधार ग्रहण करके कथानक का ताना-बाना बुना गया है। यशपाल, राहुल साकृत्यायन, रांगेय राघव, भैरव प्रसाद गुप्त और अमृतराय इसी कोटि के उपन्यासकार हैं। यशपाल ने पार्टी कामरेड (1945), दादा कामरेड, देशद्रोही (1943 ई.), मनुष्य के ूप (1949 ई.), अमिता (1946 ई.), दिव्या ( 1945 ई.) और 'झूठा सच' (1957 ई.), आदि उपन्यासों में अपने मार्क्सवादी विचारों को अभिव्यक्ति दी है । झूठा-सच देश विभाजन की त्रासदी पर आधारित एक ऐसा उपन्यास है जिसमें ततकालीन सामाजिक, राजनीतिक परिस्थितियों का सफलतापूर्वक चित्रण हुआ है। इनके अतिरिक्त भैरव प्रसाद गुप्त ने 'मशाल' 'सती मैया का चौरा', आदि उपन्यासों में मार्क्सवादी चेतना का निरूपण किया है।

      इस युग के महत्वपूर्ण उपन्यास लेखक हैं-भगवती चरण वर्मा और अमृतलाल नागर। वर्मा जी के कई उपन्यास प्रसिद्ध हुए हैं, यथा-चित्रलेखा (1934 ई.), भूले बिसरे चित्र, टेढ़े-मेढ़े रास्ते, सामर्थ्य और सीमा तथा सबहिं नचावत राम गोसाई। इन उपन्यासों में समकालीन राजनीति एवं समाज से कथानक लिए गए हैं तथा उपन्यासकार ने अपनी पैनी दृष्टि से संयुक्त परिवार की समस्या, शोषण, सत्याग्रह, मिल-मालिकों की दुरंगी नीति, पुलिस की धांधली, आदि का सटीक चित्रण किया है। 'चित्रलेखा ' में पाप-पुण्य की समस्या को प्रस्तुत किया गया है।

      अमृतलाल नागर ने सेठ बांकेमल, अमृत और विष, बूंद और समुद्र, महाकाल, शतरंज के मोहरे, सुहाग के नूपुर, मानस का हंस, खंजन नयन, आदि अनेक उपन्यासों की रचना की है। दू्व और समुद्र उनका श्रेष्ठतम उपन्यास है जिसमें भारतीय समाज की रीति-नीति आचार-विचार, जीवन दृष्टि, भर्यादाओं एवं मान्यताओं का चित्रण कथानक के द्वारा किया गया है। मानस का हंस' उनका एक जीवनी परक उपन्यास है जिसमें गोस्वामी तुलसीदास का जीवन वृत्तान्त प्रस्तुत किया गया है। तता प्रकार 'खंजन नयन' में सुरदास के जीवन को कथानक के रूप में बांधकर सर की जीवनी देने का प्रयास किया गया है।

3.ऐतिहासिक उपन्यास- हिन्दी के ऐतिहासिक उपन्यासकारों में बाबू वृन्दावन लाल बर्मा का उल्लेख किया जा चुका है। उनके अतिरिक्त चतुरसेन शास्त्री एवं हजारीप्रसाद द्विवेदी का नाम इस वर्ग में लिया जा। सकता है। हजारी प्रसाद जी ने बाणभट्ट की आत्मकथा, चारुचन्द्र लेख, पुनर्नवा और 'अनामदास का पोथा' में इतिहास और कल्पना का सुन्दर समन्वय करते हुए रोचक उपन्यासों की रचना की है। इन उपन्यासों में ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक वातावरण की सुन्दर प्रस्तुति हुई है। राहुल सांकृत्यायन ने 'सिंह सेनापति' और जय यौधेय' नामक ऐतिहासिक उपन्यास लिखे तथा रांगेय राघव ने 'मुर्दों का टीला' नामक ऐतिहासिक उपन्यास में मोहनजोदड़ो के गणतन्त्र का चित्रण किया है।

4.आंचलिक उपन्यास- स्वातन्त्र्योत्तर हिन्दी उपन्यासों में 'आंचलिक उपन्यास' एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही है। वे उपन्यास जिनमें किसी विशेष अंचल का चित्रण कथानक के द्वारा किया जाता है, इस वर्ग में आते हैं। हिन्दी के आंचलिक उपन्यासकारों में सर्वप्रमुख हैं-फणीश्वरनाथ रेणु जिन्होंने 'मैला आंचल' (i954 ई.) तथा परती परिकथा' (1957 ई.) नामक उपन्यासों में बिहार के ग्रामीण अंचल के रहन-सहन, रीति-रिवाज, राजनीतिक आस्थाओं, आदि का विशद चित्रण किया है। रेणु के अतिरिक्त अन्य आंचलिक उपन्यासकार हैं-नागार्जुन (रतिनाथ की चाची, बलचनमा, बाबा बटेसरनाथ, दुखमोचन, वरुण के बेटे) उदयशंकर भट्ट (सागर लहरें और मनुष्य), रांगेय राघव (कब तक पुकारू), आदि।

       ग्रामीण परिवेश को आधार बनाकर भी कुछ उपन्यास लिखे गए है। इनमें प्रमुख है- आधा गांव (राही मासूम राजा), अलग-अलग वैतरणी (शिव प्रसाद सिंह) जंगल के फूल (राजेन्द्र अवस्थी), बबूल (विवेकी राय), पानी के प्राचीर (राम दरश मिश्र), रथ के पहिए (हिमांशु श्रीवास्तव)। इन सभी उपन्यासों में आधुनिकीकरण के कारण बदलते ग्रामीण समाज का चित्रण किया गया है।

5. व्यंग्यपरक उपन्यास- इसी सन्दर्भ में उन उपन्यासों को भी लिया जा सकता है जिनमें व्यंग्यात्मक लहजे में भारतीय समाज के समग्र रूप को चित्रित करने का प्रयास किया गया है। इस दृष्टि से श्रीलाल शुक्ल कृत 'राग दरबारी' उल्लेखनीय कृति है जिसमें स्वातन्त्रयोत्तर भारत के ग्रामीण जीवन की मूल्यहीनता को परत-दर-परत उघाड़ने की कोशिश की गई है। इस उपन्यास की कथाभूमि है बड़े नगर से कुछ दूर बसा हुआ गांव शिवपालगंज, जहां की जिन्दगी प्रगति और विकास के तमाम नारों के बावजूद निहित स्वार्थों एवं अवांछनीय तत्वों के सामने घिसट रही है। शिवपालगंज की पंचायत , कालेज की प्रबन्ध समिति और कोऑपरेटिव सोसाइटी के सूत्रधार वैद्य जी साक्षात् रूप में वह राजनीतिक संस्कृति है जो प्रजातन्त्र और लोकहित के नाम पर हमारे चारों ओर फल-फूल रही है एवं लोकतांत्रिक मूल्यों का उपहास कर रही है।

6. प्रयोगवादी या आधुनिकता बोध के उपन्यास- आधुनिक हिन्दी उपन्यासों की नवीनतम धारा को प्रयोगवादी उपन्यास या आधुनिकता बोध के उपन्यास कहा जा सकता है। औद्योगीकरण, बदलते हुए परिवेश, भ्रष्ट व्यवस्था, महानगरीय जीवन और यान्त्रिक सभ्यता के परिणाम से आज जीवन में तनाव, विश्वृंखलता, अकेलापन एवं निराशा घर कर गई है। कुण्ठा, संत्रास एवं असुरक्षा की भावना ने हमें संत्रस्त कर दिया है। उपन्यासकारों की दृष्टि इस ओर भी गई है और उन्होंने अनेक उपन्यासों में इन्हें अभिव्यक्ति प्रदान की है। मोहन राकेश के 'अन्धेरे बन्द कमरे' (1961 ई.) तथा 'न आने वाला कल' (1968 ई.) ऐसे ही उपन्यास हैं। इनके अतिरिक्त राजेन्द्र यादव के 'उखड़े हुए लोग' में उपन्यासकार ने टूटते हुए मानव का चित्रण किया है। राजेन्द्र यादव और मन्नू भण्डारी के सम्मिलित प्रयासों से लिखे गए उपन्यास 'एक इंच मुस्कान' खण्डित व्यक्तित्व वाले आधुनिक व्यक्तियों की प्रेम ट्रेजिडी, पर आधारित है। इस उपन्यास का नायक अमर और नायिका अमला आत्म निर्वासन से ग्रस्त हैं और प्रेम के छलावे में पड़कर निषेधात्मक मूल्यों तक जा पहुंचते हैं। मन्नू भण्डारी ने 'आपका बंटी' में तलाकशुदा दम्पति के बच्चों पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव का निरूपण किया है तो नरेश मेहता के 'यह पथ बन्धु था ' में अकेलेपन एवं अजनबीपन का बोध कराया गया है। निर्मल वर्मा के उपन्यासों-बीवे दिन (1964 ई.), 'लाल टीन की छत' और 'एक चिथड़ा सुख' में भी आधुनिकता बोध मुखरित हुआ है।

      उषा प्रियम्बदा के उपन्यास 'रुकोगी नहीं राधिका' एवं 'पचपन खम्भे लाल दीवारें' में भी आधुनिकता बोध का गहरा रूप उभरा है। भीष्म साहनी कृत 'तमस' में विभाजन की मानसिकता एवं उससे लाभ उठाने वाले लोगों को बेनकाब किया गया है। मनोहर श्याभ जोशी कृत 'कुरू-कुरु' स्वाहा में युवा पीढ़ी की दिशाहीनता को अभिव्यक्ति दी गई है। उक्त उपन्यासकारों के अतिरिक्त भी सैकड़ों उपन्यासकार नए-नए कथानकों की कल्पना कर सुन्दर उपन्यास लिख रहे हैं। शिल्प की दृष्टि से भी नवीन प्रयोग किए जा रहे हैं। धर्मवीर भारती का 'सूरज का सातबां घोड़ा', गिरधर गोपाल का 'चांदनी के खण्डहर' नवीन शिल्प की दृष्टि से उल्लेखनीय उपन्यास हैं।

       सामाजिक चेतना की सशक्त अभिव्यक्ति शिवप्रसाद सिंह के उपन्यास 'गली आगे मुड़ती है', मेहरून्निसा परवेज के उपन्यास 'उसका घर' और गिरीश अस्थाना के उपन्यास 'धूप छांही रंग' में भी हुई है।

    आधुनिकता बोध के उपन्यासों में मोहन राकेश कृत 'न आने वाला कल', निर्मल वर्मा का 'वे दिन', राजकमल चौधरी का 'मछली मरी हुई', श्रीकान्त वर्मा का 'दूसरी बार', महेन्द्र भल्ला का 'एक पति के नोट्स', कमलेश्वर कृत 'डाक बंगला' और 'काली आंधी', गंगा प्रसाद विमल का 'अपने से अलग', सुरेन्द्र वर्मा का 'मुझे चांद चाहिए' के नाम लिए जा सकते हैं। अस्तित्ववादी जीवन दर्शन, अनास्था, कुण्ठा, आदि की अभिव्यक्ति इन उपन्यासों में हुई है। नरेश मेहता का उपन्यास 'यह पथ बंधु था' में मूल्यों के प्रति निष्ठावान व्यक्ति को ट्भ हुए दिखाया गया है।

      आधुनिक उपन्यासों में विषय-वैविध्य के साथ-साथ शैलियों के विभिन्न रूप दिखाई पड़ते हैं। आत्मकथात्मक शैली, डायरी शैली, पत्र शैली, वर्णनात्मक शैली, संवाद शैली, आदि विविध शैलियों में उपन्यास लिखे जा रहे है। आज उपन्यास का कथ्य जीवन के अधिक नजदीक है, उसमें यथार्थ का पुट अधिक है। मानवीय सम्बन्धों के बदलते रूप को उसमें उजागर करने का प्रयास किया गया है तथा महानगरीय बोध से उत्पन्न मानसिकता को अभिव्यक्ति दी गई है। मन के भीतर की परतों को उधेडने का प्रयास भी इन उपन्यासों में है। आधुनिकता बोध से उत्पन्न अकेलेपन अजनबीपन, यौन विसंगतियां, विद्रोह, कुण्ठा एवं मूल्यों का हास आज के उपन्यास के विषय है। आज नए मूल्य तलाशने का प्रयास किया जा रहा है और नैतिकता के प्राचीन मानदण्डों की अवहेलना हो रही है। 'सैक्स' एवं रोमानियत को इन उपन्यासों में अधिक स्थान मिल रहा है तथा बदलते परिवेश के कारण परिवर्तित मानसिकता को बड़ी गहराई से व्यक्त किया जाने लगा है। आज के उपन्यास ने चरित्र तो दिए हैं, किन्तु जीवन्त पात्र अर्थात् होरी जैसा पात्र देने में वह सफल नही रहा। आवश्यकता इस बात की है कि उपन्यासों में मानव को उसके सम्पूर्ण रूप में प्रस्तुत किया जाए और उसे जीवन के यथार्थ से जोड़ा जाए, इसके अभाव में वह जीवन्त दस्तावेज न बनकर 'गल्पमात्र' बनकर रह जाएगा। अस्तु हिन्दी उपन्यास ने बहुत कम समय में आशातीत प्रगति की है । नए-नए। उपन्यासकार नए-नए विषयों को लेकर उपन्यास लिख रहे हैं अंतः यह आशा की जा सकती है कि हिन्दी उपन्यास का भविष्य मंगलमय है। अस्तु, अनेक दोषों के होते हुए भी हिन्दी उपन्यास की विकास यात्रा पर हम सन्तोष कर सकते हैं।










गोबिंद कुमार यादव, बिरसा मुंडा कॉलेज, 6294524332

श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यमो की सामाजिक जीवन में भूमिका

 

श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यमो की सामाजिक जीवन में भूमिका :-

श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यमों की उपयोगिता अलग-अलग स्थितियों तथा अलग-अलग सन्दर्भो में अलग-अलग है। किन्तु इसके बावजूद इन सभी माध्यमों का उद्देश्य तथा लक्ष्य एक ही है। समाज की शैक्षिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक धरोहर को वृद्धिगत करने तथा व्यक्ति के 'जानने' एवं 'अभिव्यक्ति' के मूलभूत अधिकार को अक्षुण्ण रखने की दिशा में श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यमों की उपयोगिता को मुख्यतः पाँच प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है।

(1) सूचना :-श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यमों के द्वारा विश्व की विभिन्न घटनाओं, सामाजिक तथा राजनीतिक स्थितियों की सूचना जन-सामान्य को यथाशीघ्र उपलब्ध हो जाती है । इसी के साथ, देश-विदेश की प्रगति तथा वैज्ञानिक आविष्कारों की गति की सूचना भी जनता तक पहुँचाते है।

(2) अभिव्यक्ति :- इन माध्यमों द्वारा व्यक्ति अपने विचार तथा भावों को स्वतन्त्र रूप से अभिव्यक्त करता है। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता सरकारी माध्यमों की अपेक्षा श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यमो में अधिक खुले रूप से रहती है। इसीलिए इनकी महत्ता अन्यों की तुलना में बढ़ जाती है।

(3) विचार तथा घटनाओं का विश्लेषण- श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यम देश-विदेश की घटनाओं की सूचना देने के साथ ही साथ उनके अर्थ का विश्लेषण भी करते हैं तथा सही मुद्दों तथा विचारों के लिए जन-सामान्य का मत-परिवर्तन करने में अहम् भूमिका अदा करते हैं।

(4) प्रगति एवं विकास-श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यम जन-सामान्य की सामाजिक तथा राजनीतिक प्रगति, आर्थिक विकास आदि के लिए सघन अभियान चलाते हैं तथा मिशन के रूप में कार्य करते हैं ।

(5) मनोरंजन -रेडियो, दूरदर्शन तथा फिल्म आदि श्रव्य और श्रव्य-दृश्य  माध्यम जनता के लिए रोचकता तथा मनोरंजन के प्रभावी साधन बनते हैं। इसके साथ, देश-विदेश की कला एवं संस्कृति के समुचित विकास के लिए भी अपना महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान करते हैं।










                                               


गोबिंद कुमार यादव, बिरसा मुंडा कॉलेज, 6294524332


रामनरेश त्रिपाठी की काव्यगत विशेषता

रामनरेश त्रिपाठी की काव्यगत विशेषता ।

प्रारंभिक स्वच्छंदतावादी कवियों में रामनरेश त्रिपाठी का नाम महत्वपूर्ण है। श्रीधर पाठक ने जिस स्वच्छंदतावाद को जन्म दिया, रामनरेश त्रिपाठी ने अपनी रचनाओं द्वारा उस परंपरा को विकसित और संपन्न किया। देश प्रेम तथा राष्ट्रीयता की अनुभूतियां उनकी रचनाओं का मुख्य विषय रही है। हिंदी कविता के मंच पर वे राष्ट्रीय भावनाओं के गायक के रूप में बहुत लोकप्रिय हुए। रामनरेश त्रिपाठी द्वारा रचित साहित्य वैविध्य पूर्ण है।

     रामनरेश त्रिपाठी ने अपने काव्य में परंपराओं का निर्वाह की अपेक्षा नवीन प्रवृत्तियों को अपनाने के प्रति अधिक आग्रह दिखाया। इन्होंने अपने काव्य में सीमित पात्रों का प्रयोग किया है। मुख्य रूप से नायक और नायिका दो ही पात्र अपनाया गया है। इनके नायकों के व्यक्तित्व का अंकन किसी महापुरुष के अभाव युक्त, गौरवशाली, शक्ति संपन्न, रूपरेखा से कम सुंदर नहीं है-

        सिकुरण रहित ललाट ललित अति,

         उन्नत कला विधान।

        पौरुषपूर्ण विषाद वक्षस्थल,

        वृषभ कन्द बलवान।

       हिंदी काव्य में विरह नारियों की अंतर्दशाओं का पर्याप्त चित्रण हुआ है। किंतु वहीं पुरुषों की दशा की अभिव्यक्ति का अभाव है। लेकिन प्रिय वियोग का विरह पुरुष के हृदय में भी होता अवश्य ही है जिसका चित्रण रामनरेश त्रिपाठी ने निम्न पंक्तियों में किया है-

          प्रेम पद्मिनी! प्रेमलता हे! प्राण बल्लभे! हे प्राणेश्वरी।

          मेरी प्रिय पद्मिनी कहां हो? हे मेरी जीवन सहचरी।

       कवि का मूल उद्देश्य राष्ट्रीयता है। इनके नायक एवं नायिकाएं देश की विपन्नता पर आंसू नहीं बहाते। इससे उनके उत्साह भावना और को बल मिलता है और यह जन संगठन में जुड़ जाते हैं-

         देखा उसने उसी भांति के अनगिनत नर कंकाल।

         चिपके पेट रीढ़ के जिनकी चुपके पुचके जाल।

      अलगाववाद, नस्लवाद, जातिवाद और संप्रदाय के दीवारें भारतीय चिंतन के इस वेदांत ज्ञान सागर के में गिर जाते हैं। त्रिपाठी जी के लिए भारतीयता का अर्थ है जहां सब अपने ही आत्म के अंश हैं-

         तू रूप है किरण में, सौंदर्य है सुमन में।

          तू प्राण है पवन विस्तार है गगन में ।

         तू ज्ञान हिंदुओं में, ईमान मुस्लिमों में,

          विश्वास क्रिश्चियन में तो सत्य है सृजन में।

      त्रिपाठी जी के काव्य में शोक भाव की अभिव्यक्ति सशक्त बन पड़ी है। शोक भाव कविता मुख्यता दो रूपों में आती है। प्रथम अपनी विपत्ति या कष्ट से। इस प्रकार का वर्णन इन के काव्य में पूर्णता अभाव है। दूसरे प्रिय वस्तु या दुष्ट जन के विनाश का अंत भी बड़ा दुखद है यहां सुख भाव के दर्शन हैं-

        रोये वृद्ध कहां है जीवन का अनमोल सहारा,

       रोकर गिरे अचेत युवक है साथी कहां हमारा।

      रामनरेश त्रिपाठी स्वदेश, प्रेम मानव सेवक और पवित्र प्रेम के गायक हैं। इनकी रचनाओं में छायावाद का सौंदर्य एवं आदर्शवाद का दृष्टिकोण एक साथ ही मिल गया है। भारत के गौरवपूर्ण अतीत का वर्णन करते हुए कवि कहता है-

         शोभित है सर्वोच्च मुकुट से जिनके देश का मस्तक।

        गूंज  रही है सकल दिशाएं जिनके जय गीतों से अब तक।

       इससे स्पष्ट होता है कि इनके काव्य में जीवन का जो पक्ष अपनाया गया है इन की व्याख्या अपने आप में पूर्ण है। प्रेम और राष्ट्र भावना को प्रकृति की पृष्ठभूमि देकर मानविय साँचे में ढालकर उज्जवल रूप दिया गया है। त्रिपाठी जी के तीनों खंड काव्य की मूल चेतना एक ही है। श्रीधर पाठक ने जिस स्वच्छन्दतावाद का मार्ग उठाया उस पर चलने वालो में रामनरेश त्रिपाठी महत्वपूर्ण है।

गोबिंद कुमार यादव, बिरसा मुंडा कॉलेज, 6294524332

 

 










मंगलवार, 26 अप्रैल 2022

जीवन की आशा : 'ध्वनि' कविता

  'ध्वनि' कविता निराला द्वारा रचित आशा का संचार करने वाली कविता है । इसमें निराला की आशावादिता को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इस कविता में वे प्रकृति के उपादानो द्वारा अपने जीवन की तुलना करते हैं और यह आशा करते हैं कि यह उनके जीवन का प्रथम चरण है, जिसमें अभी केवल जीवन है, अभी अंत बहुत दूर है। जब तक इस जीवन का उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता तब तक अंत संभव नहीं है। यह कवि के आशावादी होने का प्रतीक है।जिसमे वह जीवन के वसंत को जब तक पूरी तरह नहीं जी लेता उसे आशा है कि तब तक उसका अंत संभव नहीं है।

      प्रस्तुत कविता में निराला अपने जीवन का अभी केवल प्रारंभ ही मानते हैं। जिस प्रकार प्रकृति में वसंत में नए हरे पत्ते निकलते हैं, कलिया खिलने लगती है, डाले कोमल होती है। उसी प्रकार कवि का जीवन भी वसंत के समान है, जिसमें नए उत्साह, नई उमंगे, स्वप्न , आशा , चेतना रूपी पत्ते निकलना प्रारंभ हुए हैं इसलिए उसे इन आशाओं, उमंगो के पूरा होने तक अंत दिखाई नहीं देता-

" अभी अभी तो आया है

मेरे वन में मृदुल वसंत 

अभी न होगा मेरा अंत।" 

     कवि अपने स्वप्नों और आशाओं द्वारा जीवन की आलसता को खींचकर उसे नई ऊर्जा से भर देना चाहता है। यह उर्जा उसे जगाने का कार्य करती है। वह अपने वसंत रूपी इस जीवन के प्रारंभिक समय में उर्जा का ऐसा संचार करना चाहता है जो प्रत्येक व्यक्ति. जो अभी तक नहीं चेतना से दूर है, उसे सींचकर उसमें भी आशा और ऊर्जा का संचार करना चाहता है-

" पुष्प- पुष्प से तंद्रालस लालसा खींच लूंगा मैं,

अपने नवजीवन का अमृत सहर्ष सींच दूंगा मैं, " 

      कवि को यह आशा है कि यह उसके जीवन का प्रथम चरण है, जिसमें आगे संपूर्ण  यौवन पड़ा हुआ है। उसका मन बालक की भांति सभी दिशाओं में बहता रहता है। यह जो प्रथम चरण है इसके स्वर, राग विकसित नहीं हुए है । वह विकसित होंगे और पूरी दुनिया में  फैलेंगे; न सिर्फ फैलेंगे बल्कि चारों दिशाओं में आशा और नई चेतना का विस्तार करेंगे  और जब तक इसका विस्तार नहीं हो जाता  कवि को आशा है कि उसका अंत नहीं होगा-

" मेरे ही अविकसित राग से 

विकसित होगा बंधु , दिगंत

अभी न होगा मेरा अंत।"

     निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि यह कविता कवि की आशा पर केंद्रित है। जिसमें उसे आशा है कि वह अपनी चेतना से चारों दिशाओं में उसका विस्तार करेगा। वह क्रांति की  भी चेतना हो सकती है, वह परिवर्तन की भी चेतना हो सकती है, वह बदलाव का राग भी हो सकता है. जो देश और समाज की आवश्यकता है। 









                                                                                                                    गोबिन्द कुमार यादव

                                                                                                                    बिरसा मुंडा कॉलेज

                                                                                                                                    6294524332          


                                              


शुक्रवार, 23 जुलाई 2021

रेखाचित्रकार महादेवी वर्मा

 रेखाचित्रकार महादेवी वर्मा :-  महादेवी वर्मा ‘छायावाद’ युग के प्रमुख आलोक स्तम्भों में से एक हैं। प्रसाद, निराला, पंत जैसे कवियों की इस काव्य त्रिवेणी के बीच महादेवी जी ने अपनी रचनाधर्मिता के बल पर न केवल स्त्री प्रतिभा का लोहा मनवाया, वरन् इन कवियों की काव्य सरिता को हिन्दी साहित्य सागर रूपी विविध विधाओं के साथ उनका समन्वय किया है।  हम देखते हैं कि गद्य में जहाँ नवीन विधाओं को अत्यधिक विकसित होने का अवसर प्राप्त हुआ, वहीं दूसरी ओर कविता के लिए भी अपार संभावनाओं के द्वार खुल गए। बहरहाल यहाँ मेरा मन्तव्य महादेवी जी के रेखाचित्रों में रचे-बसे उन तमाम अनुभूतियों में गुंफित कोमल, मधुर स्मृतियों को उजागर करना है, जिसके सहारे लेखिका की जीवन दृष्टि को समझते हुए, उन सामाजिक एवं मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा करना है, जहाँ पहुंच कर मनुष्य; मनुष्य के मध्य का भेद समाप्त हो जाता है। शेष रहती है तो असीम करूणा और चरम शांति।

‘रेखाचित्र’ हिन्दी साहित्य की नवीन किंतु आधुनिक गद्य विधाओं में से एक है। प्रत्येक साहित्यिक विधा ‘वस्तु’ और ‘शिल्प’ की दृष्टि से अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखती है। कोई भी विषय किसी विशेष शिल्प के अंतर्गत संप्रेषण की विशेष योग्यता प्राप्त कर लेता है। इस तरह देखा जाय तो कहा जा सकता है कि चित्रकार की चित्र कला को जो महत्व प्राप्त है वही महत्व रेखाचित्रकार की रचना रेखाचित्र का भी है।

वास्तव में रेखाचित्र ‘शब्दचित्र’ है। जिस प्रकार चित्रकार रंगों के अंकन और सौष्ठव द्वारा चित्र का निर्माण कर उसे प्रभावशाली और सजीव बना देता है, ठीक उसी प्रकार रेखाचित्रकार सौष्ठवपूर्ण शब्दों की सहायता से अपनी रचना को स्वरूप प्रदान करता है। इसकी सफलता रचनाकार के भाषागत वैशिष्ट्य तथा जीवनानुभूतियों की सशक्त अभिव्यक्ति पर आधारित है। हिन्दी साहित्य में जब इस विधा का पहलेपहल पदार्पण हुआ, तो इसकी परिभाषा भी स्वभावतः इसके साथ ही निर्मित हुई। “स्केच की तरह ही रेखाचित्र में भी कम से कम शब्दों में कलात्मक ढंग से किसी वस्तु, व्यक्ति या दृश्य का अंकन किया जाता है। इसमें साधन शब्द होते हैं रेखाएं नहीं”

रेखाचित्र में अनेक साहित्यिक विधाओं की तरंगे उठती रहती हैं। इसमें कहानी का कौतुहल है तो, निबंध की गहराई गद्यकाव्य की भावात्मक लयात्मकता है तो, डायरी में व्यक्त निश्छल मन की अभिव्यक्ति। संस्मरण की व्यक्तिकता है तो, साक्षात्कार का खुलापन। आत्मकथा और जीवनी जैसी आत्मीयता और बेबाकीपन है तो, यात्रावृत्तांत का सीमित विस्तार। व्यंग की छेड़छाड़ है तो, रिपोर्ताज की गुनगुनाहट। विभिन्न साहित्यिक रसों में सराबोर यह रेखाएं अंगड़ाई लेती हुई विशिष्ट शब्द चित्रों में ढल कर एक ऐसा संसार रचती हैं, जिसमें रहने वाले लोग हमारे इसी लोक के प्राणी हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो रेखाचित्र विभिन्न विधाओं की विशेषताओं का विचित्र समुच्चय है। लेकिन सबसे अधिक रेखाचित्र का साम्य संस्मरण के साथ माना जाता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि लगभग समस्त विधाओं की विशेषताओं को अपने में समेटे हुए रेखाचित्र की अपनी विशेषता औऱ अपनी पहचान है।

अतिशय संवेदना, विषय संबंधी एकात्मकता, अंतर्मुखी चारित्रिक विशेषता, विश्वसनीयता, सूक्ष्म परिवेक्षण शक्ति, संक्षिप्तता तथा प्रतीकात्मकता आदि इसकी विशेषताएं मानी जा सकती हैं। यद्यपि यह कथेत्तर गद्य विधाओं मे नवीन विधा है और हिन्दी साहित्य में विधा के रूप में प्रतिष्ठित भी हो चुकी है। लेकिन क्या कारण है कि विद्वानों की दृष्टि से रेखाचित्र का सैद्धान्तिक विवेचन ओझल ही रहा?

दूसरे शब्दों में कहें तो रचनात्मक रूप में तो इस विधा को जितनी महत्ता और स्वीकारोक्ति मिली, उतने ही इसके शास्त्रीय स्वरूप की अवहेलना हुई। अतः रेखाचित्र का स्वरूप निर्धारण सरल नहीं है। इसके स्वरूप एवं वैशिष्ट्य को प्रतिस्थापित करने के लिए हमारी दृष्टि में रेखाचित्र लेखकों की रचनाओं का आधार ग्रहण किया जाना अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है।


गोबिन्द कुमार यादव

बिरसा मुंडा कॉलेज

6294524332

शनिवार, 3 जुलाई 2021

भाषा और उसके अभिलक्षण

     मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इससे उनका एक दूसरे के संपर्क में आना स्वाभाविक है। संपर्क में आने पर विचार विनिमय अनिवार्य है। अतः जिस साधन से यह विचार विनिमय होता है, उसे ही भाषा की संज्ञा दी जाती है। अथवा यह कहा जा सकता है कि भावाभिव्यक्ति के साधन को सामान्य रूप से भाषा कह दिया जाता है। जब हम भाषा की परिभाषा वैज्ञानिक तरीके से दें तो यह याद रखें कि भाषा विज्ञान में भाषा की परिभाषा को पशु पक्षियों की बोली, इशारे इत्यादि को इस रूप में नहीं लेना चाहिए। सामान्यतः विचार विनिमय के दो साधन माने गए हैं-१)शब्दों एवं वाक्य द्वारा २)संकेतों द्वारा। रेल की हरी झंडी, चौराहे की सिग्नल, चुटकी, ताली आदि की सांकेतिक भाषा को भाषा विज्ञान के वैज्ञानिक एवं संशोधित भाषा के अंतर्गत नहीं देखा जाता। यदि हम भाषा को इशारे से भावा भी व्यक्ति करते हैं तो इसे संकेत अथवा इशारे की भाषा कहते हैं।

      भाषा की उत्पत्ति पर विचार करते हुए पाणिनि उसे भाष धातु से जोड़ा जिसका अर्थ है  ‘व्यक्त वाणी’। भाषा का संबंध व्यक्ति वाणी से है।

    भाषा को लेकर हिंदी और पाश्चात्य विद्वानों में अलग-अलग मत है।

                  पाश्चात्य के विद्वानों का मत

 प्लेटो के अनुसार – “विचार आत्मा की मूक अथवा अध्वन्यात्मक बातचीत है जो ध्वन्यात्मक बनकर होठों पर प्रकट होते ही भाषा कहलाती है।“

स्वीट के अनुसार – “ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा विचारों की अभिव्यक्ति का नाम भाषा है।“

क्रोचे के अनुसार – “भाषा उस स्पष्ट तथा सुगठित ध्वनि को कहते हैं जो अभिव्यंजना के लिए निर्धारित की जाती है।“

ब्लॉक तथा ट्रेजर के अनुसार – “भाषा व्यक्त ध्वनि चिन्हों की वह पद्धति है जिसके माध्यम से समाज के व्यक्ति परस्पर व्यवहार करते हैं।

गार्डनर के अनुसार-  “विचारों की अभिव्यक्ति के लिए जिन व्यक्त और स्पष्ट ध्वनि संकेतों का व्यवहार किया जाता है उसे भाषा कहते हैं।“

                हिंदी के विद्वानों का मत

कामताप्रसाद गुरु के अनुसार-  “भाषा वह साधन है जिसके माध्यम से मनुष्य अपने विचार दूसरों पर भली-भांति प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार स्पष्ट रूप से समझ सकता है।“

मंगल देव शास्त्री के अनुसार- “भाषा मनुष्य की उस चेष्टा या व्यापार को कहते हैं जिससे मनुष्य अपने उच्चारण उपयोगी शरीर अवयवों से उच्चारण किए गए वर्णात्मक या व्यक्त शब्दों द्वारा अपने विचारों को प्रकट करते हैं।

डॉ भोलानाथ तिवारी के अनुसार- “भाषा मानव के उच्चारण अवयवों द्वारा उच्चारित यादृच्छिक ध्वनि प्रतीकों की वह संरचनात्मक व्यवस्था है जिसके द्वारा समाज के  लोग आपस में विचार विनिमय करते हैं ।

 

 

 

भाषा के अभिलक्षण।

भाषा पर जब विचार किया जाता है तब उसका आशय मनुष्य की भाषा से होता है। यहाँ अभिलक्षण से तात्पर्य विशेषता से है अथवा मूलभूत लक्षण से है। क्योंकि किसी वस्तु या पदार्थ के लक्षण ही उसे दूसरे पदार्थ से अलग करते हैं। मानव भाषा के अभिलक्षण वे हैं जो उसे अन्य प्राणियों की भाषा से अलग करते हैं। मानव भाषा के अभिलक्षण निम्न है-

1)यदृच्छिकता- यदृच्छिकता का अर्थ है ‘जैसी इच्छा हो’ या ‘माना हुआ’। ऐसा शब्द जो मन मे चित्रित होता है। शब्दो के अंदर निहीत वह बिम्ब जिसको सुनकर हमारे मन में एक चित्र आ जाता है। भोलानाथ तिवारी ने यदृच्छिकता को पहले स्थान पर रखा है।

2)सृजनात्मकता- भाषा की दूसरी विशेषता सृजनात्मकता है। भाषा में शब्द और रूप प्रायः सिमित होते है उन्ही के आधार पर हम अपनी आवश्यकता के अनुसार अनेक वाक्यो का सृजन करते है। इस अभिलक्षण को उत्पादकता भी कहा जाता है।

3)अनुकरणग्रहिता- भाषा में अनुकरण की क्षमता होती है। मानव भाषा जन्मजात नही होती है। इसे हम अनुकरण कर के ही सीखते है। मानवेत्तर जिव जंतुओं की भाषा जन्मजात होती है। किंतु मनुष्य भाषा को अनुकरण कर के सीखता है।

4)परिवर्तनशीलता- मानव भाषा परिवर्तनशील है। मानवेत्तर जीवो की भाषा  परिवर्तित नहीं होती। जैसे कोई भी जानवर पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही प्रकार की अपरिवर्तित भाषा का प्रयोग करते आ रहे हैं किंतु मानव भाषा हमेशा परिवर्तित होती रहती है ।


गोबिंद कुमार यादव

बिरसा मुण्डा कॉलेज

6294524332 

 

आदिकाल की समय सीमा के संबंध में विभिन्न विद्वानों के मतों की समीक्षा कीजिए।

आदिकाल की समय सीमा के संबंध में विभिन्न विद्वानों के मतों की समीक्षा कीजिए। साहित्य के इतिहास में 'आदिकाल' की काल-सीमा का निर्धारण ...